प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी तीन देशों की यात्रा के तहत पहला पड़ाव इंडोनेशिया में किया. 6 से 11 जुलाई तक चलने वाली इस यात्रा में वह इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जाएंगे. जकार्ता में उन्होंने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो से मुलाकात की. यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंता बढ़ रही है और ताइवान के भविष्य को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.
मई में बीजिंग में हुई बहुप्रतीक्षित शी-ट्रंप शिखर बैठक ने दुनिया की दो सबसे बड़ी ताकतों के रिश्तों में बड़े बदलाव का संकेत दिया. कई विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप की इस यात्रा के बाद ‘अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता’ की जगह अब ‘लेन-देन वाली कूटनीति के जरिए चीन के खतरे को संभालने’ की रणनीति ने ले ली है. अब जब दोनों महाशक्तियां अपने आपसी रिश्तों को नए तरीके से तय कर रही हैं और क्षेत्रीय प्राथमिकताएं बदल रही हैं, तो जापान, ताइवान, फिलीपींस, मलेशिया, ब्रुनेई और इंडोनेशिया जैसे फर्स्ट आइलैंड चेन देशों में अमेरिका की भूमिका को लेकर चिंता बढ़ रही है, खासकर अगर ताइवान को लेकर कोई संकट पैदा होता है.
ऐसे समय में भारत जैसे देश के लिए, जिसकी क्षेत्रीय सुरक्षा में बड़ी हिस्सेदारी है और जिसके लिए चीन की चुनौती सिर्फ समुद्री क्षेत्र तक सीमित नहीं है, प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा क्या संदेश देती है?
लेकिन ठहरिए, यह सिर्फ एक यात्रा और एक जवाब की कहानी नहीं है.
प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब विदेश मंत्री एस. जयशंकर भी छह शहरों के दौरे पर हैं. इनमें खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के चार देश—कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान, इसके बाद अमेरिका के न्यूयॉर्क और बेल्जियम के ब्रसेल्स शामिल हैं. 5 से 15 जुलाई तक चलने वाला जयशंकर का 11 दिन का दौरा पश्चिम एशिया, यूरोप और अमेरिका को कवर करता है.
जयशंकर की यह तीन महाद्वीपों—एशिया, यूरोप और अमेरिका की यात्रा ऐसे समय हो रही है, जब पश्चिम एशिया में संकट जारी है और यूरोप में रूस-यूक्रेन युद्ध अभी भी चल रहा है. आमतौर पर जयशंकर ऐसे दौरों में प्रधानमंत्री के साथ होते हैं, लेकिन इस बार दोनों नेताओं का अलग-अलग क्षेत्रों में जाना इस बात का संकेत है कि इंडो-पैसिफिक, पश्चिम एशिया, यूरोप और अमेरिका में हुए बड़े वैश्विक बदलावों के बाद भारत एक सोच-समझकर बनाई गई नई रणनीति पर काम कर रहा है.
संतुलित रणनीति
जुलाई का महीना भारत की कूटनीति के लिए सबसे व्यस्त महीनों में से एक हो सकता है क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी और एस. जयशंकर दुनिया के बड़े ताकतवर देशों और क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं. जिन देशों का दौरा हो रहा है, वे सभी भारत के दोस्त हैं और भारत का स्वागत कर रहे हैं. इन दौरों का मुख्य मकसद संबंध मजबूत करना, ठोस नतीजे हासिल करना, पुराने रिश्तों को आगे बढ़ाना और भविष्य की रणनीति तैयार करना है.
ये दोनों दौरे इस बात का संकेत हैं कि ऊर्जा के मोर्चे पर भारत के सामने कितनी जरूरी चुनौतियां हैं, लेकिन यह भारत के लिए इंडो-पैसिफिक, यूरोप और दूसरे बाज़ारों में नए मौके तलाशने का भी अवसर है. साथ ही, इससे दुनिया में भारत की ताकत और भूमिका को भी और मजबूत करने की कोशिश होगी. जयशंकर 13 जुलाई को न्यूयॉर्क में 2028-29 के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अस्थायी सदस्यता के लिए भारत की आधिकारिक दावेदारी भी शुरू करेंगे.
सबसे पहले बात करें इंडो-पैसिफिक की. अमेरिका-चीन संबंधों में नए बदलाव और उसके बाद इस क्षेत्र में बढ़ी अनिश्चितता, साथ ही क्वाड जैसे समूहों को लेकर उठ रहे सवालों के बीच भारत की सक्रिय कूटनीति यह दिखाती है कि दिल्ली इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सुरक्षा और स्थिरता को किसी दूसरे देश के बदले हुए रिश्तों की वजह से खतरे में नहीं पड़ने देना चाहता. इंडो-पैसिफिक में हो रहे घटनाक्रम पर तुरंत ध्यान देने की ज़रूरत है. अगर अमेरिका जैसे समान सोच वाले देश पीछे हटने का फैसला करते हैं, तो जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भारत के साथ मिलकर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को शांतिपूर्ण और स्थिर बनाए रखने में बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं.
संपर्क बढ़ाना और रिश्तों को आगे बढ़ाना, साथ ही नए मौके
साथ ही, यह दौरा सिर्फ संबंध मजबूत करने के लिए नहीं है, बल्कि इसका मकसद ठोस नतीजे हासिल करना भी है. इसमें निवेश, क्रिटिकल मिनरल्स, आधुनिक तकनीक, सप्लाई चेन को सुरक्षित करना, समुद्री सहयोग और सबसे अहम, इंडो-पैसिफिक में रक्षा सहयोग को साझेदारी का मुख्य हिस्सा बनाना शामिल है. भारत और इंडोनेशिया के बीच ब्रह्मोस मिसाइल समझौते पर लंबे समय से काम चल रहा है. अगर यह पूरा होता है, तो रक्षा सामान निर्यात करने वाले देश के रूप में भारत की यात्रा में यह एक और बड़ी उपलब्धि होगी.
इससे भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी में रक्षा सहयोग यानी हार्ड पावर का भी नया पहलू जुड़ता है. अब तक यह नीति मुख्य रूप से सॉफ्ट पावर पर आधारित थी, जिसमें लोगों के बीच संबंध, साझा सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रिश्तों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता था.
इसी तरह, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के साथ भारत की साझेदारी में जो नए कदम उठाए गए हैं, उन्हें आगे बढ़ाने से भविष्य में रणनीतिक तौर पर भारत को फायदा मिलेगा. ऑस्ट्रेलिया के साथ रिश्तों में बड़ा बदलाव 2020 में शुरू हुआ था, जब प्रधानमंत्री मोदी और उस समय के ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन के बीच वर्चुअल शिखर सम्मेलन हुआ था. उस दौरान दोनों देशों ने अपने रिश्तों को कम्प्रीहेंसिव स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप (CSP) का दर्जा दिया था.
2025 में ऑस्ट्रेलिया के उप-प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री रिचर्ड मार्ल्स सीएसपी के पांच साल पूरे होने पर दिल्ली आए थे. अब प्रधानमंत्री मोदी का अगला पड़ाव ऑस्ट्रेलिया है, जहां वार्षिक नेताओं के शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया जाएगा. माना जा रहा है कि इससे दोनों देशों के रिश्तों को और बड़ी मजबूती मिलेगी.
अगर इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के साथ भारत के रिश्ते लगातार आगे बढ़े हैं, तो प्रधानमंत्री मोदी का न्यूजीलैंड दौरा और भी ज्यादा ऐतिहासिक है, क्योंकि यह करीब 40 साल में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली आधिकारिक न्यूजीलैंड यात्रा होगी. यह दौरा सिर्फ रिश्तों को फिर से मजबूत करने के लिए नहीं होगा, बल्कि इस साल अप्रैल में भारत और न्यूजीलैंड के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को भी आगे बढ़ाएगा. इस समझौते के तहत भारतीय निर्यात पर 100 प्रतिशत शुल्क (ड्यूटी) खत्म हो गया है. साथ ही, 20 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता, डेयरी और कृषि उत्पादों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर सहमति और दोनों देशों के बीच लोगों की आवाजाही बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है.
इस बीच, यह दौरा उस समझौते में किए गए वादों को जमीन पर उतारने में भी मदद करेगा, जहां व्यापार और निवेश सबसे बड़ी प्राथमिकता होंगे.
इंडो-पैसिफिक में नए हालात को समझने की कोशिश
इन मुख्य मुद्दों के अलावा, भारत इस मौके का इस्तेमाल अमेरिका-चीन संबंधों में आए बदलाव के बाद बने नए हालात, विकल्पों और जिम्मेदारियों पर चर्चा करने के लिए भी कर रहा है. खासकर यह समझने के लिए कि इसका इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर क्या असर पड़ेगा. हालांकि, चीन के मामले में एक सीमा भी है. इसकी वजह यह है कि व्हाइट हाउस में नई सरकार आने के बाद इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड—तीनों ने चीन के साथ अपने रिश्तों को संभालने की दिशा में काम किया है और व्यापार समेत कई नए समझौते भी बीजिंग के साथ किए हैं.
हालांकि, इंडो-पैसिफिक को लेकर अमेरिका के रुख में बदलाव कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस समय यह बदलाव काफी अहम है. खासकर तब, जब ताइवान स्ट्रेट में चीन की सैन्य गतिविधियां बढ़ रही हैं. इससे सिर्फ ताइवान के भविष्य पर ही सवाल नहीं उठते, बल्कि पूरे क्षेत्र को सप्लाई चेन में रुकावट, तकनीक पर चीन के बढ़ते दबदबे और दूसरी चुनौतियों का भी खतरा है. ऐसे में इस तरह के दौरे ‘नई विश्व व्यवस्था’ (New World Order) से निपटने की रणनीति पर सही समय पर चर्चा करने का मौका देते हैं.
दूसरी ओर, अमेरिका और ईरान के बीच हुए एमओयू के तुरंत बाद जयशंकर का खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के चार सदस्य देशों का दौरा भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित करने के मकसद से है. भारत की बढ़ती आबादी, ऊर्जा की बढ़ती जरूरतें और खाड़ी देशों में बड़ी भारतीय आबादी यह दिखाती है कि भारत के लिए यह कितना ज़रूरी है. साथ ही, यह भी दिखाता है कि भारत इस क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिए खाड़ी देशों का रणनीतिक सहयोगी बनना चाहता है.
दिलचस्प बात यह है कि जब पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू हुआ, तब भी भारत ने सभी पक्षों के साथ बातचीत करने की अपनी सहज नीति दिखाई और किसी एक पक्ष का साथ देने के दबाव को स्वीकार नहीं किया. यही रुख इस क्षेत्र में शांति की बात करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है.
पश्चिमी देशों में आज भी कई लोग यह सोचते हैं कि भारत ईरान-इज़रायल या रूस-यूक्रेन जैसे एक-दूसरे के विरोधी देशों के साथ एक साथ अच्छे रिश्ते कैसे बनाए रखता है. भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ इस सवाल का जवाब देती है. हालांकि, इस नीति का पूरा स्वरूप, उसकी बुनियाद और सोच अभी भी लगातार विकसित हो रही है, और ऐसे घटनाक्रम उसकी मजबूती की परीक्षा लेते हैं. वहीं, पश्चिम एशिया, यूरोप और अमेरिका में भारत की यह संतुलित नीति जितनी मजबूत होती जा रही है, उतनी ही यह पश्चिमी देशों के लिए अध्ययन का विषय बनी हुई है.
लेकिन पश्चिमी देशों को यह समझने की जरूरत है कि पश्चिम के हितों को सबसे महत्वपूर्ण और 140 करोड़ भारतीयों के हितों को कम महत्वपूर्ण मानने का नजरिया नहीं अपनाया जा सकता.
आखिर में, प्रधानमंत्री मोदी और एस. जयशंकर के कई शहरों और कई देशों के ये दौरे एक स्पष्ट रणनीतिक सोच और भारत की संतुलित विदेश नीति को दिखाते हैं. इनका उद्देश्य अलग-अलग क्षेत्रों के साथ साझेदारी मजबूत करना, आर्थिक और तकनीकी सहयोग बढ़ाना, समुद्री संपर्क को और मजबूत करना और दुनिया में बढ़ते बिखराव के बीच नई दिल्ली की भूमिका को एक मजबूत और प्रभावशाली आवाज के रूप में आगे बढ़ाना है.
ऋषि गुप्ता ग्लोबल स्ट्रैटेजिक अफेयर्स के एक्सपर्ट हैं. इस लेख में व्यक्त विचार पूरी तरह लेखक के अपने हैं और किसी भी रूप में उनके वर्तमान या पूर्व संस्थानों के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते.
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