नई दिल्ली: फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री बनने के बाद बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने अपनी पहली विदेश यात्रा पूरी कर ली है, जिसका लंबे समय से इंतिजार किया जा रहा था. मलेशिया और फिर चीन की उनकी दो देशों की यात्रा को बांग्लादेश की विदेश और सुरक्षा नीति में बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है. यह दिखाता है कि ढाका अब अपने क्षेत्रीय संबंधों में भारत से हटकर नई दिशा में बढ़ रहा है. रहमान चाहें तो सिर्फ चीन जा सकते थे, लेकिन उन्होंने बीजिंग की जगह सबसे पहले कुआलालंपुर को चुना. कई लोगों का मानना है कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया ताकि दिल्ली में ज्यादा चर्चा न हो.
लेकिन सवाल यह है कि उन्होंने दिल्ली से दूरी क्यों बनाई और पुरानी कूटनीतिक परंपरा क्यों तोड़ी. खासकर तब, जब रहमान 2024 के ‘जुलाई आंदोलन’ के बाद भारत के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश कर रहे थे. इसी आंदोलन में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार चली गई थी. क्या इसकी वजह भारत की तरफ से बांग्लादेशी नागरिकों को वीजा देने में कथित देरी थी. या फिर शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा. या रहमान घरेलू राजनीति को ध्यान में रखते हुए भारत की तरफ दोस्ती का संकेत देना चाहते हैं, लेकिन आखिर में चीन की ओर बढ़ रहे हैं. इसकी वजह इनमें से कोई एक या सभी हो सकती हैं. लेकिन यह मानना गलत होगा कि भारत को इस कदम का पहले से अंदाजा नहीं था.
बांग्लादेश की नई विदेश नीति के राजनीतिक संदेश से अलग हटकर, यह समझना जरूरी है कि रहमान की चीन यात्रा क्यों अहम है.
मुख्य नतीजे
बांग्लादेश के प्रधानमंत्री की तीन दिन की चीन यात्रा काफी व्यापक रही. इसमें सुरक्षा सहयोग, विकास, कनेक्टिविटी, निवेश, समुद्री मामलों, चिकित्सा, और बहुपक्षीय सहयोग जैसे कई मुद्दों पर चर्चा हुई. दोनों देशों के बीच कुल 13 समझौता ज्ञापनों (MoU) पर साइन हुए. रहमान ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के शीर्ष नेताओं से भी मुलाकात की, जिनमें बीजिंग के ग्रेट हॉल में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ बैठक भी शामिल थी.
चीनी सरकारी मीडिया ने इस यात्रा को दोनों देशों के रिश्तों में “अपग्रेड” बताया. उसने रहमान के उस बयान का भी जिक्र किया जिसमें उन्होंने चीन को बांग्लादेश का “सबसे भरोसेमंद और सबसे अहम साझेदार” कहा.
हालांकि, दोनों देशों के रिश्तों को “रणनीतिक साझेदारी” का दर्जा पहली बार अक्टूबर 2016 में मिला था, जब शी जिनपिंग बांग्लादेश गए थे. उसी साल बांग्लादेश चीन की अरबों डॉलर की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) योजना में भी शामिल हुआ था.
बांग्लादेश-चीन रिश्तों में ये दोनों बड़े बदलाव शेख हसीना के दूसरे कार्यकाल में हुए थे, जिन्हें भारत के करीबी नेता के तौर पर देखा जाता था. अगर हसीना भारत के साथ करीबी रिश्तों के बावजूद चीन के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत कर सकती थीं, तो उनकी सरकार हटने के बाद चुनी गई नई सरकार से “इंडिया फर्स्ट” नीति की उम्मीद करना शायद सही नहीं होगा. खासकर तब, जब भारत अब भी शेख हसीना को अपने यहां मेहमान के तौर पर रखे हुए है.
पार्टी स्तर पर रिश्ते मजबूत करना
सरकारी स्तर की औपचारिक बैठकों के अलावा, रहमान की चीन यात्रा के दौरान एक अहम घटनाक्रम यह भी रहा कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर साइन हुए. इस पर खास ध्यान देने की जरूरत है. पिछले एक दशक से चीन भारतीय उपमहाद्वीप के देशों में सरकार के साथ-साथ राजनीतिक दलों के साथ भी अपने रिश्ते मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, ताकि उसका राजनीतिक प्रभाव बढ़ सके.
खास बात यह है कि दक्षिण एशिया की मौजूदा राजनीतिक स्थिति में बांग्लादेश और नेपाल में नए नेता और नए राजनीतिक दल उभरकर आए हैं. चीन के लिए यह शुरुआती दौर में ही उनके साथ मजबूत रिश्ते बनाने का मौका है. यह राजनीतिक बदलाव भारत के प्रभाव और ज्यादा राष्ट्रवादी सोच से दूरी का भी संकेत देता है. बांग्लादेश और नेपाल के युवा नेता अब इतिहास के बोझ के साथ नहीं चलना चाहते, जिसमें सबसे करीबी पड़ोसी भारत के साथ पुराने रिश्ते भी शामिल हैं.
चीन अच्छी तरह समझता है कि चुनावों के दौरान और राजनीतिक अस्थिरता के समय राजनीतिक दलों के साथ सीधे रिश्ते बहुत काम आते हैं. बांग्लादेश के अलावा, हाल ही में नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर कहानाल की चीन यात्रा के दौरान भी चीन ने ऐसा ही प्रस्ताव रखा था. उसने “पॉलिटिकल पार्टी+ चैनल” बनाने की बात कही, ताकि सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी के साथ दोस्ताना रिश्ते और मजबूत किए जा सकें.
समुद्री सहयोग, कनेक्टिविटी, रक्षा और व्यापार
राजनीतिक दलों के बीच रिश्तों के अलावा, चीन और बांग्लादेश के बीच सुरक्षा और समुद्री सहयोग पर भी करीब से नजर रखने की जरूरत है. दोनों देशों के संयुक्त बयान में यह कहा गया कि वे “समुद्री मामलों में सहयोग मजबूत करेंगे”, लेकिन इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी गई. इसे सावधानी से देखने की जरूरत है. चीन बांग्लादेश, म्यांमार, इंडोनेशिया, थाईलैंड और श्रीलंका जैसे बंगाल की खाड़ी से जुड़े देशों में समुद्री ढांचे का विकास कर अपनी रणनीतिक मौजूदगी बढ़ा रहा है.
यह रणनीति प्रस्तावित चीन-म्यांमार-बांग्लादेश आर्थिक गलियारे (CMBEC) में भी दिखाई देती है. यह भारत के पूर्वी और उत्तर-पूर्वी इलाकों के पास एक अहम रणनीतिक परियोजना है. रहमान और उनके चीनी समकक्ष की बैठक में इस परियोजना पर चर्चा हुई और इसकी घोषणा भी की गई. इस खबर ने दिल्ली में काफी ध्यान खींचा है क्योंकि इसका रणनीतिक महत्व है. हालांकि, आगे की कार्ययोजना सामने आने के बाद ही भारत पर इसके असली असर का सही अंदाजा लगाया जा सकेगा. भारत की सीमा म्यांमार और बांग्लादेश दोनों से लगती है.
इसके अलावा दोनों देशों ने मोंगला पोर्ट के आधुनिकीकरण और विस्तार परियोजना तथा चट्टोग्राम में चीनी आर्थिक और औद्योगिक क्षेत्र के विकास को आगे बढ़ाने पर भी सहमति जताई. अंतरिम नेता मोहम्मद यूनुस ने मार्च 2025 में चीन यात्रा के दौरान यह प्रस्ताव रखा था. हालिया फैसला दिखाता है कि चीन इस परियोजना को आगे बढ़ाना चाहता है क्योंकि इसका रणनीतिक महत्व है. ये दोनों बंदरगाह भारत के काफी करीब हैं और यहां चीन की मौजूदगी नई दिल्ली की चिंता बढ़ा रही है.
विदेश और सुरक्षा नीति के मोर्चे पर चीन और बांग्लादेश ने विदेश मंत्रियों के बीच रणनीतिक वार्ता की व्यवस्था बनाने और कूटनीति व रक्षा के लिए “2+2 संवाद” शुरू करने की संभावनाएं तलाशने पर भी सहमति जताई है. ये व्यवस्थाएं दोनों देशों के बीच नियमित बातचीत बनाए रखने में मदद करेंगी, लेकिन इनका एक बड़ा उद्देश्य चीन के रक्षा निर्यात को भी बढ़ाना है. ग्लोबल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ढाका चीन से 24 जे-10सीई लड़ाकू विमान खरीदना चाहता है. पाकिस्तान ने मई 2025 में भारत के खिलाफ इन्हीं विमानों का इस्तेमाल किया था.
चीन बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदारों में से एक है. दोनों देशों के बीच सालाना व्यापार करीब 18 अरब डॉलर का है. 2024 तक चीन का बांग्लादेश के साथ व्यापार अधिशेष 21.7 अरब डॉलर बताया गया. चीन का निर्यात 22.8 अरब डॉलर रहा, जबकि बांग्लादेश से आयात सिर्फ 1.16 अरब डॉलर था. इससे साफ है कि व्यापार में चीन का दबदबा है.
यह व्यापार घाटा बांग्लादेश के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है. इस यात्रा के दौरान इसे कम करने के लिए कुछ कदम उठाए गए, जिनमें सबसे पहले शुल्क से जुड़ा फैसला शामिल है.
संयुक्त बयान में कहा गया, “बांग्लादेश ने चीन द्वारा 100 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर शून्य शुल्क की सुविधा देने के फैसले का स्वागत किया है और बांग्लादेश में निवेश करने वाली चीनी कंपनियों के लिए अनुकूल माहौल बनाएगा.”
ताइवान पर कोई नरमी नहीं
अगर चीन के दूसरे देशों के साथ जारी संयुक्त बयानों को ध्यान से देखा जाए, तो शुरुआत के कुछ पैराग्राफ अक्सर बीजिंग की सुरक्षा चिंताओं को सामने रखते हैं. इसके बाद के हिस्सों में बातचीत का असली उद्देश्य साफ किया जाता है.
हालिया संयुक्त बयान में कहा गया कि बांग्लादेश ने “वन चाइना” सिद्धांत के प्रति अपनी “मजबूत प्रतिबद्धता” दोहराई है.
बयान में कहा गया, “ताइवान, चीन जनवादी गणराज्य का अभिन्न हिस्सा है और चीन जनवादी गणराज्य की सरकार पूरे चीन की एकमात्र वैध सरकार है. बांग्लादेश किसी भी तरह की ‘ताइवान की आजादी’ का कड़ा विरोध करता है और राष्ट्रीय एकीकरण हासिल करने के लिए चीनी सरकार के प्रयासों का पूरा समर्थन करता है.”
ऐसे मुद्दों पर दूसरे देशों की ओर से दिए गए कूटनीतिक समर्थन को चीन अपनी रणनीति और वैश्विक मंचों पर अपनी स्थिति के लिए अहम मानता है. लेकिन यह क्षेत्र और दुनिया के दूसरे देशों को यह संदेश देने का भी तरीका है कि वे ताइवान के साथ संबंध न बढ़ाएं और ताइपे को अलग-थलग रखें. दिलचस्प बात यह है कि चीन-बांग्लादेश के आधिकारिक संयुक्त बयानों में ताइवान का पहली बार जिक्र अप्रैल 2005 में तत्कालीन चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ की बांग्लादेश यात्रा के दौरान हुआ था. पिछले दो दशकों में शब्द जरूर बदले हैं, लेकिन संदेश वही रहा है.
इसमें कोई शक नहीं कि व्यापार, कनेक्टिविटी और रक्षा जैसे दूसरे सहयोगों के साथ-साथ ताइवान का मुद्दा भी अब चीन की एक तय मांग बन चुका है. इससे यह भी पता चलता है कि बीजिंग अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने के लिए अपनी ताकत का इस्तेमाल कैसे करता है. खासकर उन छोटे और कम ताकतवर देशों पर दबाव बनाकर. बाद में इसी दबाव को कूटनीति, साझेदारी और आपसी सम्मान जैसी नरम भाषा में पेश किया जाता है.
हाल के वर्षों में भारत के पड़ोसी देशों में चीन की रणनीति साफ तौर पर यही रही है कि वह वहां के संसाधनों, घटनाओं और राजनीतिक बदलावों का फायदा उठाए, जो भारत से दूरी बनाने की कोशिश कर रहे हैं. चाहे मालदीव हो, श्रीलंका, नेपाल या बांग्लादेश, बीजिंग कोई मौका नहीं छोड़ रहा है. लेकिन सच्चाई यह भी है कि दक्षिण एशिया के इन देशों के लिए चीन को दी गई रियायतों की कीमत उनकी अपनी शांति और स्थिरता होती है.
आगे का रास्ता
दक्षिण एशिया के देशों में हाल के राजनीतिक बदलावों ने सिर्फ उनकी घरेलू राजनीति ही नहीं, बल्कि उनकी विदेश और सुरक्षा नीति भी बदल दी है. भारत लंबे समय से उनका हर परिस्थिति में साथ देने वाला दोस्त रहा है, लेकिन नई राजनीतिक ताकतें अब छोटे समय के राजनीतिक फायदे के लिए दिल्ली से दूरी बनाना चाहती हैं. इन देशों का मानना है कि चीन उनके लिए ज्यादा भरोसेमंद साझेदार साबित होगा. लेकिन बांग्लादेश के लिए आगे का रास्ता भारत और चीन में से किसी एक को चुनना नहीं होना चाहिए. उसे विकास की जरूरतों और अपनी लंबी अवधि की रणनीतिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाकर चलना चाहिए.
साथ ही, नई दिल्ली को भी यह समझना होगा कि सिर्फ भौगोलिक नजदीकी, साझा इतिहास और 1971 के युद्ध की विरासत के भरोसे प्रभाव और दोस्ती हमेशा कायम नहीं रह सकती. उसे यह भी समझना होगा कि ढाका की युवा नेतृत्व वाली और विकास पर केंद्रित नई राजनीतिक व्यवस्था भारत को इस आधार पर परखेगी कि वह विकास, कनेक्टिविटी, जल सहयोग और दूसरे क्षेत्रों में कितनी सक्रियता से काम करता है. साथ ही, वीजा जैसे मुद्दों को भी बहुत सावधानी से संभालना होगा, क्योंकि इनका असर भारत-बांग्लादेश रिश्तों की सबसे मजबूत कड़ी, यानी दोनों देशों के लोगों, पर पड़ता है.
ऋषि गुप्ता ग्लोबल स्ट्रैटेजिक अफेयर्स के एक्सपर्ट हैं. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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