नई दिल्ली: पुरानी दिल्ली की गलियों में, जहां मुहर्रम का चांद दिल्ली-6 की स्ट्रीट लाइटों से भी ज्यादा चमकता है, वहां रेनू, समा और रूपरानी आधी रात के बाद भी जागती रहती हैं. वे धीमी आवाज में बातें करती हैं और अपने बच्चों को आराम से सुलाने के लिए हाथ से हवा करती रहती हैं. राजधानी से दो महीने दूर रहने के बाद वे फिर लौट आई हैं.
रेनू ने कहा, “सड़कों पर भीख मांगने का यह सबसे अच्छा समय होता है.”
ये महिलाएं मुहर्रम के दौरान भीख मांगने के लिए जामा मस्जिद इलाके में आई हैं. शेल्टर होम में जगह नहीं मिलने के बाद उन्होंने किराये पर प्लास्टिक की चारपाइयां ली हैं. उन पर तीन-चार लोग, जिनके शरीर सालों की मुश्किलों से दुबले हो चुके हैं, रात भर एक साथ सिमटकर सोते हैं.
रेनू ने कहा, “हम बारी-बारी से सोते हैं. कई बार ठीक से नींद भी नहीं आती. डर रहता है कि कोई नशे में आदमी हमारे बच्चों या हमारे साथ छेड़छाड़ न करे.”
उनका यह डर बेवजह नहीं है. इसी हफ्ते साउथ दिल्ली के मेहरौली में फुटपाथ पर सो रही 11 साल की एक बेघर बच्ची का 29 साल के एक व्यक्ति ने अपहरण कर लिया. उसके साथ दुष्कर्म किया और हत्या करने के बाद शव गुरुग्राम के जंगल में फेंक दिया. दिल्ली की सड़कों और भीड़भाड़ वाले शेल्टर होम में रहने वाली 32,000 से ज्यादा बेघर महिलाओं की नींद पर यौन हिंसा का डर हमेशा हावी रहता है. मांएं रात में बार-बार जागती हैं. वे सोने की जगह चुनने से पहले वहां लगे सीसीटीवी कैमरे और पेट्रोल पंप देखती हैं. सुरक्षा के लिए वे अपने साथियों, रिश्तेदारों और यहां तक कि आवारा कुत्तों पर भी भरोसा करती हैं.


दिल्ली में तीन लाख से ज्यादा बेघर लोग हैं. शेल्टर होम में 20,000 से भी कम लोगों के रहने की जगह है. ऐसे में बहुत से परिवार फुटपाथों और खुले स्थानों पर सोने को मजबूर हैं. स्टेट लेवल शेल्टर मॉनिटरिंग कमेटी के सर्वे में डेढ़ लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर सोते मिले.
सेंटर फॉर होलिस्टिक डेवलपमेंट के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर सुनील कुमार अलेडिया ने कहा, “दिल्ली में भारत के सबसे ज्यादा शेल्टर होम हैं, लेकिन उनकी हालत सबसे खराब जगहों में गिनी जाती है. शहर में करीब 202 शेल्टर होम हैं. इनमें पक्की इमारतें और पोर्टेबल केबिन दोनों शामिल हैं. लेकिन इनमें से सिर्फ 21 महिलाओं के लिए हैं. यही बताता है कि व्यवस्था कितनी कमजोर है.”
आईआईटी फ्लाईओवर से लेकर पुरानी दिल्ली तक, रात होते ही फुटपाथ और सार्वजनिक जगहें लोगों के सोने की जगह बन जाती हैं. दिप्रिंट ने जामा मस्जिद, नेहरू प्लेस, आईआईटी, हौज खास, मुनिरका, सराय काले खां, बंगला साहिब और लाल किला के आसपास की बस्तियों का दौरा किया. वहां कहीं भी बेघर परिवारों को किसी दूसरी जगह बसाने के कोई सबूत नहीं मिले.


इन लोगों के लिए सड़कें ही उनकी बस्ती हैं. वे यहां तब तक रहते हैं, जब तक गांव में अपने परिवार का पेट पालने लायक पैसे नहीं जुटा लेते. लेकिन इन बस्तियों की भी अपनी परेशानियां हैं. आपसी झगड़े, महिलाओं की सुरक्षा की चिंता और रात में चैन की नींद न मिलना.
अलेडिया ने कहा, “शेल्टर होम में महिलाओं की सुरक्षा की नियमित निगरानी नहीं होती. समय पर ऑडिट नहीं होते और जवाबदेही भी बहुत कम है. सड़कों पर रहने वाले सबसे कमजोर लोग यौन हिंसा और दूसरी तरह की हिंसा का सबसे ज्यादा शिकार होते हैं. लेकिन ऐसे मामलों की खबर अक्सर तभी सामने आती है, जब बहुत ज्यादा दबाव बनता है. कई मामले तो कभी सामने ही नहीं आते.”
रेनू, समा और रूपरानी के लिए यही डर दिल्ली में हर रात का हिस्सा है. फिर एक दिन वे उत्तर प्रदेश के लाजगंज लौटने के लिए ट्रेन पकड़ लेती हैं.

रंग-बिरंगे फ्लाईओवर, वर्टिकल गार्डन
फुटपाथ पर रात की नींद तेज रफ्तार से गुजरती एसयूवी गाड़ियों की सफेद चमकती हेडलाइट्स से बार-बार टूटती रहती है. सड़कों पर गहरी नींद एक सपना जैसी बात है.
रामेशी का पति और उसका सबसे बड़ा बच्चा अभी भी सड़क पर सूरजमुखी के फूल बेच रहे हैं. बाकी तीन बच्चे ताजे फूलों से भरे हरे प्लास्टिक के टब के पास सोने की कोशिश कर रहे हैं. वे प्रवासी मजदूर हैं, जो अपने गांव और दिल्ली की सड़कों के बीच आते-जाते रहते हैं.
दस साल पहले रामेशी अपने पति के साथ राजस्थान से दिल्ली आई थी. अनजान शहर में आने के बाद दोनों ने कमरा किराये पर न लेने का फैसला किया. उन्हें लगा कि दिल्ली के खराब मौसम से बचने के लिए भी पैसे खर्च करना उनके बस की बात नहीं है.
उन्होंने कहा, “हमें लगा कुछ पैसे बच जाएंगे.”
रामेशी और उसके पति को मुनिरका के पास एक शेल्टर होम के बारे में बताया गया. दिल्ली पहुंचने के बाद वे सबसे पहले वहीं गए. लेकिन दो दिन बाद फिर सड़क पर लौट आए.
रामेशी ने कहा, “हम सिर्फ एक-दो दिन शेल्टर होम में रहे और फिर बाहर आ गए. वहां बहुत ज्यादा लोग रहते हैं. उनमें से कई नशा करते हैं. शराब पीते हैं, लड़ाई करते हैं और किसी को चैन से रहने नहीं देते.”

उन्हें आज भी एक हिंसक झगड़ा याद है.
उन्होंने कहा, “अगर मेरे बच्चे को चोट लग जाती तो?”
उनके लिए शेल्टर होम सिर्फ झगड़े की वजह से नहीं, बल्कि उससे भी बड़े खतरे की जगह था. पिछली अरविंद केजरीवाल सरकार के दौरान दिल्ली महिला आयोग की ओर से टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज से कराई गई 143 पन्नों की रिपोर्ट में करीब 14 शेल्टर होम में “यौन और शारीरिक हिंसा के गंभीर मामले” सामने आए थे. रिपोर्ट में कहा गया कि “सजा” के नाम पर लोगों के साथ मारपीट की जाती थी, खाना नहीं दिया जाता था, गर्म पानी फेंका जाता था और गुप्तांगों में मिर्च पाउडर डाला जाता था. जिन शेल्टर होम पर सवाल उठे, उनमें से ज्यादातर निजी तौर पर चलाए जा रहे थे.
शेल्टर होम में सख्त नियम हैं. रात में दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं. नए लोगों को अपनी जानकारी वहां के प्रभारी के पास दर्ज करानी होती है. यह जानकारी शेल्टर स्टाफ के व्हाट्सएप ग्रुप में भी साझा की जाती है. सुबह और रात की ड्यूटी के लिए दो कर्मचारी रहते हैं. लेकिन पिछले 20 साल से दिल्ली के बेघर लोगों के साथ काम कर रहे अलेडिया कहते हैं कि ये व्यवस्था हिंसा झेलने वाली महिलाओं को ज्यादा सुरक्षा नहीं दे पाती.


उन्होंने कहा, “जब बेघर महिलाएं दुष्कर्म, यौन हमले या किसी के लापता होने की शिकायत दर्ज कराती हैं, तो कई मामलों में उन्हें सही ध्यान नहीं मिलता.” उन्होंने कहा कि मेहरौली की घटना के बाद भी हालात में कोई खास बदलाव नहीं दिखा.
रामेशी को लगता है कि इसके मुकाबले सड़कें कम खतरनाक हैं.
आज वह एक रंग-बिरंगे फ्लाईओवर के नीचे सोती है. उसके एक तरफ वर्टिकल गार्डन हैं और दूसरी तरफ ट्रैफिक से भरी सड़कें.
उसने कहा, “हम और कहां जाएं? अब यही हमारा घर है.”

निगरानी भरी नजरों के बीच खाना बनाना
जहां रमेशी वापस फुटपाथ पर लौट आई, वहीं अंजलि, जिसे उसके पड़ोसी तंजिला के नाम से जानते हैं, ने वहीं रहने का फैसला किया.
उसे शेल्टर होम में रहते हुए अब 10 साल से ज्यादा हो चुके हैं. इतने सालों में यह शेल्टर उसके लिए एक समुदाय जैसा बन गया है.
लेकिन अब बढ़ता हुआ परिवार चिंता की वजह बन गया है. अब वे एक ऐसे कमरे में तीन बिस्तर साझा करते हैं, जो किसी कॉर्पोरेट ऑफिस की लॉबी से भी छोटा है. दो बिस्तर सोने के लिए हैं. तीसरे को खाने की मेज बना दिया गया है, जिसके ऊपर रात के खाने के लिए बर्तन रखे हैं. उसके पति को भूख लग रही है. आज खाने में चिकन और चावल बने हैं. छह लोगों के परिवार के लिए यही सस्ता खाना पड़ता है.
शेल्टर के अंदर खाना बनाने की इजाजत नहीं है. यहां दिन में दो बार खाना दिया जाता है और कई गाड़ियां खाना छोड़ने आती रहती हैं. ज्यादातर खाना शाकाहारी होता है. लेकिन अंजलि का परिवार प्रोटीन खाना चाहता है.
आरके पुरम में एसआईटीएम बस स्टेशन के पीछे उसने और दूसरी महिलाओं ने अस्थायी चूल्हे बना रखे हैं, क्योंकि “गैस बहुत महंगी है.” वे शाम 4 से 5 बजे के बीच खाना बनाती हैं, जब काम से लौट आती हैं और भीड़ कम हो जाती है.



“हम अधिकारियों से लगातार कह रहे हैं कि हमें यहीं खाना बनाने की इजाजत दे दें.” अंजलि ने कहा. “अगर देर हो जाए तो बहुत परेशानी होती है. बस स्टेशन पर बहुत भीड़ हो जाती है और लोग हमें घृणा से देखते हैं.”
अंजलि शाहपुर जाट के मध्यमवर्गीय घरों में घरेलू सहायिका का काम करती है. परिवार की महीने की कमाई करीब 20,000 रुपये है. फिलहाल इतना पैसा है कि बच्चों की पढ़ाई चल रही है. वह चाहती है कि उसके बच्चे पढ़ें, जो वह खुद नहीं कर सकी. आगे चलकर परिवार पास की किसी झुग्गी में रहने जाना चाहता है.
“हम वहां जाना चाहते हैं.” उसने कहा. “लेकिन हमें डर लगता है. वहां बहुत सारे गैरकानूनी काम होते हैं.”

गरीबी और संघर्ष का कभी न खत्म होने वाला चक्र
हर साल रेनू अपने बड़े परिवार के करीब 20 लोगों के साथ भीख मांगने दिल्ली आती है. इनमें ज्यादातर महिलाएं होती हैं. वे उत्तर प्रदेश के लाजगंज से उन महीनों में आती हैं, जब भीख ज्यादा मिलती है. मौसम खत्म होने पर वे गांव लौट जाती हैं, जहां किसानों के खेतों में मजदूरी करती हैं. वहां जो पैसा मिलता है, उसी से अगले कुछ महीनों का गुजारा होता है. उत्तर प्रदेश के बेड़िया दलित समुदाय से आने वाली 35 साल की रेनू की पूरी वयस्क जिंदगी इसी तरह बीती है.
दिल्ली के कई बेघर परिवारों की तरह वह और उसका परिवार भी शहर के अलग-अलग हिस्सों में जगह बदलते रहते हैं. गर्मियों में वे फ्लाईओवर के नीचे की जगह छोड़कर चौराहों, पेट्रोल पंपों और सड़क के डिवाइडरों के पास चले जाते हैं, जहां रातें थोड़ी ठंडी होती हैं. सर्दियों में वे फिर अस्थायी शेल्टर में लौटते हैं और बाद में दोबारा फुटपाथ पर आ जाते हैं.
इस मुहर्रम में उसने जामा मस्जिद के पास किसी शेल्टर होम में जगह मिलने की उम्मीद की थी. लेकिन ऐसा नहीं हो सका.
“जो हमेशा वहां रहती हैं, हमें अंदर नहीं रहने देतीं. उन्होंने कब्जा कर के रखा है.”

अब उसका परिवार तीन लोगों के लिए एक चारपाई रोज 30 रुपये में किराए पर लेता है. खर्च कम करने के लिए दो बड़े लोग एक ही चारपाई पर सोते हैं और 15-15 रुपये देते हैं. एक व्यक्ति के लिए बनी चारपाई पर दो बड़े और एक बच्चा सोते हैं. जबकि सड़क के ठीक सामने सरकारी शेल्टर होम मौजूद है. कई महिलाओं ने दिप्रिंट को बताया कि जो लोग पहले से वहां रहते हैं, उन्होंने अपने अनौपचारिक नियम बना लिए हैं और नए लोगों को अक्सर अंदर आने से रोकते हैं या परेशान करते हैं.
सेंटर फॉर होलिस्टिक डेवलपमेंट ने फरवरी से सितंबर 2025 के बीच दिल्ली के आठ जिलों के 22 शेल्टर होम में एक अध्ययन किया. इसमें पाया गया कि महिलाओं में बेघर होने की सबसे बड़ी वजह गरीबी, हिंसा और व्यवस्था की अनदेखी है. सर्वे में शामिल 190 महिलाओं में से करीब 36 प्रतिशत छह महीने से दो साल तक बेघर रही थीं. करीब 14 प्रतिशत पांच साल से ज्यादा समय से बिना स्थायी घर के रह रही थीं. जबकि लगभग 16 प्रतिशत ऐसे परिवारों से थीं, जिनमें पीढ़ियों से बेघर रहने की स्थिति चली आ रही है.

सुनीता के जन्म के कुछ समय बाद ही उसे नेहरू प्लेस के पास फुटपाथ पर लाया गया था. उसके परदादा-परदादी काम की तलाश में राजस्थान के टोंक से आए थे. उनके बाद की पीढ़ियां भी यहीं रह गईं.
“हमारी जिंदगी यहीं शुरू हुई थी और इसी फुटपाथ पर खत्म होगी.”
अब वह 35 साल की है और छह बच्चों की मां है. सबसे बड़े बच्चे की शादी हो चुकी है. सबसे छोटा बच्चा स्कूल छोड़ चुका है और अब दिल्ली के फुटपाथों पर उसके साथ रहता है. वह और उसका पति दिहाड़ी मजदूरी से जो कमाते हैं, वह गांव भेज देते हैं ताकि छोटे बच्चों की पढ़ाई का खर्च चल सके.
“दुख सुख यही देख लिया.” उसने अपनी बहन के छोटे बच्चे के पीछे दौड़ते हुए कहा.

सुनीता जैसे परिवार दशकों से इन्हीं इलाकों में रह रहे हैं. मौसम के हिसाब से वे पास के फुटपाथों, पार्कों और चौराहों के बीच जगह बदलते रहते हैं. उदाहरण के लिए लाल किले के आसपास कुछ परिवार धीरे-धीरे पास के सार्वजनिक पार्कों और खुले मैदानों के अंदर रहने लगे हैं.
26 साल की काली कुछ ही मीटर दूर सोती है. फुटपाथ पर जिंदा रहने के लिए लोग एक-दूसरे का सहारा लेते हैं. रात में वह आवारा कुत्तों के साथ सोती है, क्योंकि उसे लगता है कि उनकी मौजूदगी उसे कुछ सुरक्षा देती है.
“हम कुत्तों के साथ सोते हैं क्योंकि हमें डर रहता है कि कोई हमारे बच्चों को उठा न ले जाए.” उसने कहा. “इससे शराब पीकर आने वाले लोग और नशेड़ी भी हमारे पास आकर नहीं सोते.”
राजू और साजू, दो छोड़े गए सफेद कुत्ते, अब इस इलाके का हिस्सा बन चुके हैं.
“हम उन्हें दूध, पारले-जी और कभी-कभी चिकन के कुछ टुकड़े भी देते हैं.” 60 साल के राधा किशन ने कहा, जो नेहरू प्लेस मेट्रो स्टेशन बनने से पहले से इस फुटपाथ पर रह रहे हैं. “ये कुत्ते काटते नहीं हैं, लेकिन कुछ भी संदिग्ध लगता है तो भौंकने लगते हैं. यही हमारे रक्षक हैं.”

हर रात सोने से पहले की एक तय दिनचर्या
जब दिल्ली की बेघर महिलाएं सोने की जगह चुनती हैं, तो पहले अपनी तरफ से सुरक्षा का पूरा अंदाजा लगाती हैं. वे देखती हैं कि वहां सीसीटीवी कैमरे हैं या नहीं, पास में कोई पेट्रोल पंप है जो पूरी रात खुला रहता हो, सड़क पर रोशनी है या नहीं और आसपास कोई सुरक्षा गार्ड मौजूद है या नहीं.
उनकी सुरक्षा उनकी अपनी दिनचर्या पर भी निर्भर करती है. परिवार एक साथ सोते हैं. बड़ी उम्र की महिलाएं आधी रात के बाद भी जागती रहती हैं. बच्चों को अपने बिल्कुल पास सुलाया जाता है. मोबाइल तकिए के नीचे रखे जाते हैं. सोने से पहले बैग और बर्तनों को एक साथ बांध दिया जाता है.
दिल्ली के फुटपाथों पर सोने वाली महिलाओं ने बताया कि महरौली की घटना के बाद भी उनके आसपास शहर के काम करने के तरीके में कोई बदलाव नहीं आया. उन्होंने कहा कि न तो पुलिस की गश्त बढ़ी और न ही कोई नई सुरक्षा व्यवस्था की गई. उनकी हर रात की दिनचर्या आज भी पहले जैसी ही है.
रेनू के लिए यह दिनचर्या तब शुरू होती है, जब बाकी सभी लोग सो जाते हैं. उसकी मां रात के सन्नाटे में धीरे-धीरे एक गीत गुनगुनाती है. यह गीत उनके लिए जाना-पहचाना है. जब-जब परिवार दिल्ली आया है, वह हर साल यही गीत गाती रही है.
रेनू अपनी मां का गीत सुनते हुए पास में सो रहे बच्चों पर नजर बनाए रखती है.
“इनकी बेटी और बहू सो रहे हैं, तो ये कैसे सो जाएंगी.” उसने कहा.
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