नई दिल्ली: ओडिशा हाई कोर्ट ने भुवनेश्वर के एक निवासी को दो से ज्यादा बच्चे होने के कारण एक कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी की प्राथमिक सदस्यता से अयोग्य ठहराने के फैसले को बरकरार रखा है. अदालत ने बढ़ती आबादी की गंभीर तस्वीर पेश करते हुए कहा कि जनसंख्या विस्फोट “हाइड्रोजन बम” से भी ज्यादा खतरनाक है.
भुवनेश्वर के रहने वाले बिश्वरंजन मोहंती ने हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच में सिंगल जज के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी अयोग्यता को सही ठहराया गया था. जस्टिस कृष्णा एस. दीक्षित और जस्टिस चित्तरंजन दास की बेंच के सामने मोहंती ने दावा किया कि तीसरा बच्चा उनका बायोलॉजिकल बेटा नहीं है.
यह कानूनी विवाद ओडिशा कोऑपरेटिव सोसाइटीज एक्ट, 1962 की धारा 28(3)(p) से जुड़ा था. इस धारा के अनुसार, अगर किसी व्यक्ति के 1 जनवरी 1995 तक दो से ज्यादा बच्चे हैं, तो वह किसी कोऑपरेटिव सोसाइटी की प्रबंधन समिति का सदस्य, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष बनने के योग्य नहीं रहेगा.
30 जून को दिए गए नौ पन्नों के फैसले में डिवीजन बेंच ने कहा कि ओडिशा कोऑपरेटिव सोसाइटीज एक्ट में दो बच्चों की सीमा जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए एक “सकारात्मक कदम” है. अदालत ने कहा कि देश की जनसंख्या वृद्धि दर पहले ही “माल्थसियन खतरे” की सीमा पार कर चुकी है.
ब्रिटिश दार्शनिक बर्ट्रेंड रसेल का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि दुनिया इस समय दो “एक-दूसरे के विपरीत खतरों” का सामना कर रही है. पहला खतरा यह है कि इंसान “हाइड्रोजन बमों के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल” से खुद अपना अंत कर सकता है. दूसरा खतरा यह है कि आबादी इतनी बढ़ जाए कि लोगों के लिए सिर्फ “भूख और बदहाली भरी जिंदगी” ही बच जाए.
बढ़ती आबादी के खतरे पर जोर देते हुए अदालत ने कहा कि यह एक “बहुत बड़ी चुनौती” है, जो पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव डालती है.
अदालत ने कहा, “बेकाबू जनसंख्या वृद्धि पर्यावरण, समाज और अर्थव्यवस्था पर बहुत बड़ा दबाव डालती है. दुनिया भर में लगभग सभी लोग इस बात से सहमत हैं कि जरूरत से ज्यादा आबादी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है, संसाधनों की कमी पैदा करती है और सामाजिक समस्याओं को बढ़ाती है.”
अदालत ने यह भी साफ किया कि किसी व्यक्ति के परिवार में कितने सदस्य हैं, इसकी बुनियादी जांच रजिस्ट्रार को करनी होगी. लेकिन अगर जांच में यह साबित हो जाए कि उसके दो से ज्यादा बच्चे हैं, तो कानून के अनुसार वह अपने आप अयोग्य हो जाएगा.
इसी साल 15 जनवरी को जस्टिस कृष्णा दीक्षित और जस्टिस चित्तरंजन दास की इसी बेंच ने एक दूसरे मामले में भी बढ़ती आबादी के खतरे पर जोर दिया था. ग्राम पंचायत सदस्य महेश्वर जेना ने ओडिशा ग्राम पंचायत एक्ट, 1964 के तहत अपनी सदस्यता खत्म किए जाने को चुनौती दी थी. इस कानून के अनुसार, दो से ज्यादा बच्चे होने पर कोई व्यक्ति ग्राम पंचायत का सदस्य नहीं रह सकता.
बर्ट्रेंड रसेल का हवाला देते हुए बेंच ने उस मामले में भी जेना की अयोग्यता को सही ठहराया था और कहा था कि “जनसंख्या विस्फोट हाइड्रोजन बम से भी ज्यादा खतरनाक है.” यही बात अदालत ने मोहंती के मामले में भी दोहराई.
पिता होने से इनकार करने की कोशिश
बिश्वरंजन मोहंती ने जब तीसरे बच्चे का पिता होने से इनकार किया, तो अदालत ने उनकी दलीलों को “विचार करने लायक नहीं” माना. अदालत ने कहा कि तीसरे बच्चे के जन्म रजिस्टर में पिता वाले कॉलम में साफ तौर पर मोहंती का ही नाम दर्ज था.
मोहंती ने हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच में क्रॉस अपील दायर करते हुए कहा कि उनके साथ प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का पालन नहीं किया गया और उन्हें अपनी बात रखने का पूरा मौका नहीं मिला.
अदालत ने बाद में जन्म रजिस्टर में बदलाव करने की कोशिश, जिसमें मोहंती के भाई को बच्चे का जैविक पिता बताने की मांग की गई थी, उसे मुकदमा शुरू होने के बाद तैयार किया गया ऐसा सबूत माना जिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता.
बेंच ने कहा कि अचानक पिता का नाम बदलने की कोशिश यह दिखाती है कि मोहंती के पास “नैतिक आत्मविश्वास” की कमी थी. अदालत ने यह भी कहा कि जो व्यक्ति “संघ के सर्वोच्च पद” तक पहुंच चुका हो, वह अचानक अपने परिवार की स्थिति के बारे में अनजान होने या अशिक्षित होने का दावा नहीं कर सकता.
मोहंती के इस दावे पर कि उन्हें निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिली, अदालत ने कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को “मंत्र की तरह बार-बार नहीं दोहराया जा सकता.” अदालत ने कहा कि उन्हें नोटिस दिया गया था और उन्होंने लिखित जवाब भी दाखिल किया था. उस जवाब में उन्होंने तीन बच्चों होने के आरोप का साफ तौर पर खंडन भी नहीं किया था. इसलिए उनके साथ किसी तरह का अन्याय नहीं हुआ.
बेंच ने कोऑपरेटिव सोसाइटीज के डिप्टी रजिस्ट्रार के अधिकार को भी सही ठहराया. अदालत ने कहा कि यह अधिकारी राज्य की जनसंख्या नियंत्रण नीति का “संरक्षक” है.
अदालत ने अपील खारिज करते हुए जनवरी 2025 में सिंगल जज के फैसले और कोऑपरेटिव अधिकारियों के आदेश को बरकरार रखा.
अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट के अंदर की गई ऐसी अपील की अपनी सीमाएं होती हैं. जब संबंधित अधिकारियों ने कानून के मुताबिक पूरी प्रक्रिया अपनाई हो, तब अदालत तथ्यों की दोबारा गहराई से जांच नहीं करेगी.
आखिर में बेंच ने कहा कि दो बच्चों की सीमा वाला कानून पूरी तरह वैध है और बढ़ती हुई बेकाबू आबादी, जो “गरीबी और भूख” की वजह बनती है, उससे निपटने के लिए यह जरूरी कानूनी व्यवस्था है.
जनसंख्या नियंत्रण के पीछे कानून बनाने की मंशा पर बात करते हुए बेंच ने संविधान के 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 का भी जिक्र किया. इस संशोधन के जरिए “जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन” को समवर्ती सूची में शामिल किया गया था, ताकि केंद्र और राज्य दोनों इस विषय पर अपनी नीतियां बना सकें.
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