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Friday, 9 October, 2026
होमदेशखेत में मिला था बच्चे का बिना सिर वाला शव, मौत की सज़ा पाने वाला आरोपी अब बरी

खेत में मिला था बच्चे का बिना सिर वाला शव, मौत की सज़ा पाने वाला आरोपी अब बरी

सात अक्टूबर को जस्टिस अनूप चितकारा और हरमीत सिंह देओल की बेंच ने 2018 में ढाई साल के बच्चे की हत्या के आरोपी व्यक्ति की सजा और मौत की सजा रद्द कर दी.

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चंडीगढ़: 16 जून, 2018 की सुबह छह बजे हिसार के गैबीपुर गांव में एक किसान को अपने ज्वार के खेत के पास खाली पड़े खेत में एक छोटे बच्चे का शव मिला.

शव का सिर और कपड़े नहीं थे. खोपड़ी एक नाली के पास पड़ी थी. पास में खून से सनी एक टी-शर्ट मिली, जो सफेद रंग की थी और जिस पर बैंगनी रंग से ‘नो गोल’ लिखा था.

आठ साल बाद, पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि राज्य सरकार यह साबित नहीं कर सकी कि वह बच्चा कौन था या उसकी हत्या किसने की थी. अदालत ने कहा कि इस बारे में उचित संदेह से परे सबूत नहीं मिले.

सात अक्टूबर को जस्टिस अनूप चितकारा और हरमीत सिंह देओल की बेंच ने हेम राज की दोषसिद्धि और मौत की सजा रद्द कर दी. हेम राज पर 2018 में ढाई साल के शिवा की हत्या का आरोप लगा था. बेंच ने राज्य सरकार की ओर से मौत की सजा की पुष्टि के लिए दायर याचिका को बेकार बताते हुए खारिज कर दिया. साथ ही, हेम राज को बिना किसी जमानतदार के निजी मुचलके पर तुरंत रिहा करने का आदेश दिया.

ट्रायल कोर्ट की फाइंडिंग्स

हिसार की सेशन कोर्ट ने सात मार्च, 2022 को हेम राज को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 और 201 के तहत दोषी ठहराया था. एक हफ्ते बाद उसे फांसी की सजा सुनाई गई.

यह मामला काफी हद तक शिवा की मां सुमन के बयान पर टिका था. शव मिलने के तीन दिन बाद उन्होंने मजिस्ट्रेट को बताया कि हेम राज से उनकी कुछ महीने पहले दोस्ती हुई थी. हेम राज ने उनसे कहा था कि उनका बेटा “एक बिहारी का बेटा” है और वह उसे अपने पास नहीं रखेगा.

इस बयान के मुताबिक, 13 जून की रात हेम राज ने बच्चे को सड़क पर पटक दिया, उस पर कसी (खुरपी जैसी धारदार चीज़) से वार किया और शव को खेत में फेंक दिया. सुमन ने कहा कि हेम राज ने उन्हें धमकी दी थी कि अगर उन्होंने या उनके परिवार के किसी सदस्य ने हत्या के बारे में किसी को बताया, तो वह उन्हें मार देगा.

हेम राज को 20 जून, 2018 को गिरफ्तार किया गया था.

लेकिन अदालत में गवाही देते समय सुमन ने कुछ और ही कहा. उन्होंने माना कि मजिस्ट्रेट के सामने दिया गया बयान उसी का था, लेकिन कहा कि उन्होंने रिश्तेदारों के दबाव में ऐसा बयान दिया था और उन्होंने हेम राज को निर्दोष बताया.

हाई कोर्ट ने बयान क्यों नहीं माना

बेंच ने कहा कि पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किया गया बयान अपने आप में ठोस सबूत नहीं होता. अगर गवाह बाद में अपने बयान से पलट जाता है, तो सिर्फ उसी बयान के आधार पर उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता.

अभियोजन पक्ष के मामले के दूसरे आधार भी एक-एक करके कमजोर पड़ गए.

सबसे पहले शव की बात. शव सड़ चुका था. शरीर का निचला हिस्सा सही-सलामत था, लेकिन सिर की त्वचा, शरीर का ऊपरी हिस्सा और दोनों हाथ गायब थे. हड्डी से मिले डीएनए की जांच नहीं हो सकी, क्योंकि वह खराब हो चुका था. फॉरेंसिक लैब भी इस बारे में कोई राय नहीं दे सकी. अदालत ने कहा कि शव “संभवतः” शिवा का था, लेकिन यह बात उचित संदेह से परे साबित नहीं हुई.

इसके बाद कपड़ों का मामला आया. बच्चे की पहचान करने का दूसरा एकमात्र आधार टी-शर्ट और अंडरवियर थे. अदालत में सुमन को ये कपड़े कभी नहीं दिखाए गए, ताकि वह बता सके कि उनका बेटा इन्हें पहनता था या नहीं. ट्रायल जज ने भी खुद अपने अधिकार का इस्तेमाल करके उनसे यह सवाल नहीं पूछा. गवाह के तौर पर पेश हुईं शिवा की बुआएं भी अपने पहले के बयानों से पलट गईं.

इसके बाद पुलिस हिरासत में पहचान का मामला था. पुलिस ने कहा कि हेम राज ने खुद कपड़ों की पहचान की थी. उस समय वह पुलिस हिरासत में था. साक्ष्य अधिनियम की धारा 26 के तहत पुलिस हिरासत में दिए गए ऐसे कबूलनामे को उसके खिलाफ सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

आखिर में हत्या में इस्तेमाल हथियार, यानी कसी का मामला आया. पुलिस ने कहा कि हेम राज के बताने पर यह हथियार बरामद किया गया था. हाई कोर्ट ने कहा कि धारा 27 के तहत हथियार की बरामदगी और अपराध से उसके संबंध को कानूनी रूप से साबित नहीं किया गया. हथियार पर खून मिला था, लेकिन यह पता नहीं चल सका कि वह किसका खून था. शव का पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर को भी यह हथियार कभी नहीं दिखाया गया.

सरपंच का बयान

अर्जुन देव मेहता ने पुलिस को इस घटना की जानकारी दी थी. वह गांव के सरपंच थे. उन्होंने अदालत को बताया कि उन्होंने सुना था कि बच्चे को डुबोकर मारा जा रहा है, लेकिन फॉरेंसिक और मेडिकल सबूत इससे अलग थे. डॉक्टर ने बताया था कि खोपड़ी में फ्रैक्चर होने से सिर पर चोट लगी और इसी वजह से बच्चे की मौत हुई. अदालत ने पाया कि सरपंच के दो अलग-अलग बयानों में एक-दूसरे से विरोधाभास था.

बेंच ने जांच में सामने आई एक और ऐसी बात की ओर ध्यान दिलाया, जिसका जवाब नहीं मिला. वह यह कि शरीर का ऊपरी हिस्सा गायब था, लेकिन निचले हिस्से को जानवरों ने नुकसान क्यों नहीं पहुंचाया.

अदालत ने अपराध की गंभीरता को कम नहीं बताया. उसने इसे तीन साल से कम उम्र के बच्चे की नृशंस हत्या कहा,  लेकिन साथ ही कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी को इस अपराध से जोड़ने वाले ऐसे सबूत पेश नहीं कर सका, जिन्हें कानून के तहत अदालत में स्वीकार किया जा सके. इसलिए हेम राज को संदेह का लाभ दिया गया.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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