गुरुग्राम: हरियाणा कैडर के एक निलंबित IAS अधिकारी ने IDFC बैंक निवेश घोटाला मामले में अग्रिम जमानत की मांग करते हुए कहा है कि उन्होंने वित्त विभाग के सभी दिशानिर्देशों का पूरी तरह पालन किया था. उन्होंने यह भी दावा किया कि बाद में जो “अनियमित” जमा किए गए, वे तत्कालीन हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैन विनीत गर्ग के मौखिक निर्देश पर किए गए थे. विनीत गर्ग खुद भी CBI की जांच के दायरे में हैं.
‘फरार‘ चल रहे 60 वर्षीय प्रदीप कुमार ने 26 जून को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 482 के तहत पंचकूला की विशेष CBI अदालत में अग्रिम जमानत याचिका दाखिल की. कथित घोटाले का मामला सामने आने के बाद हरियाणा सरकार ने उन्हें 8 अप्रैल को निलंबित कर दिया था. वह इसी महीने के आखिरी दिन सेवानिवृत्त होने वाले हैं.
सरकारी धन को IDFC फर्स्ट बैंक की सेक्टर-32, चंडीगढ़ शाखा में जमा करने से जुड़े कथित कई करोड़ रुपये के घोटाले का CBI मामला 8 अप्रैल को दर्ज किया गया था.
इस मामले में CBI दो वरिष्ठ हरियाणा IAS अधिकारियों. राम कुमार सिंह और पंकज अग्रवाल. को गिरफ्तार कर चुकी है.
CBI ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17-A के तहत जांच की मंजूरी आठ IAS अधिकारियों के खिलाफ ली है. इनमें याचिकाकर्ता प्रदीप कुमार और विनीत गर्ग भी शामिल हैं, जिन पर प्रदीप कुमार ने अपनी याचिका में आरोप लगाए हैं. केंद्रीय एजेंसी अब तक इन सभी से कम से कम एक बार पूछताछ कर चुकी है.
याचिका में क्या कहा गया है
प्रदीप कुमार 31 अगस्त 2022 से 10 दिसंबर 2024 तक हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पंचकूला में सदस्य सचिव रहे. याचिका में कहा गया है कि उनके कार्यकाल के दौरान बोर्ड की सभी धनराशि का निवेश 12 जुलाई 2024 को वित्त विभाग की ओर से जारी दिशानिर्देशों के अनुसार ही किया गया.
इन दिशानिर्देशों में पहली बार सूचीबद्ध किए गए किसी भी बैंक में अधिकतम 50 करोड़ रुपये तक ही जमा करने की सीमा तय की गई थी.
याचिका के मुताबिक, 5 मार्च 2025 को HSPCB की 143.87 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि निवेश करने का प्रस्ताव तैयार किया गया. खातों के विभाग ने सूचीबद्ध बैंकों से ब्याज दरें मांगीं, जिसमें IDFC फर्स्ट बैंक ने 8.25 प्रतिशत की सबसे अधिक कॉलेबल फिक्स्ड डिपॉजिट ब्याज दर की पेशकश की.
याचिका में शामिल प्रदीप कुमार की फाइल टिप्पणी के अनुसार, उन्होंने IDFC फर्स्ट बैंक में 50 करोड़ रुपये, HARCO बैंक में 71.93 करोड़ रुपये और सर्व हरियाणा ग्रामीण बैंक में 21.94 करोड़ रुपये निवेश करने की सिफारिश की थी. यह सभी निवेश तय सीमा के भीतर थे.
1991 बैच के IAS अधिकारी विनीत गर्ग ने HSPCB चेयरमैन के तौर पर इस प्रस्ताव को “जैसा प्रस्तावित है” लिखकर मंजूरी दी थी.
याचिका में इस शुरुआती निवेश और उसके बाद हुए निवेश के बीच साफ अंतर बताया गया है.
इसमें कहा गया है कि बाद में 27 मार्च, 1 जुलाई, 30 जुलाई, 1 अक्टूबर और 23 अक्टूबर 2025 को IDFC फर्स्ट बैंक में जो अतिरिक्त निवेश किए गए, वे गर्ग के “मौखिक निर्देशों” पर किए गए. तब तक पहली बार सूचीबद्ध बैंक में 50 करोड़ रुपये निवेश की तय सीमा पूरी हो चुकी थी.
याचिका में कहा गया है कि 23 अक्टूबर को गर्ग ने खुद IDFC फर्स्ट बैंक में प्रस्तावित 25 करोड़ रुपये के निवेश को बढ़ाकर 50 करोड़ रुपये कर दिया. जबकि उस समय सूचीबद्ध एक दूसरे बैंक ने इससे अधिक रिटर्न की पेशकश की थी.
याचिका में कहा गया है कि 2 दिसंबर 2024 को चेयरमैन का पद संभालने के बाद गर्ग ने निर्देश दिया कि फिक्स्ड डिपॉजिट निवेश से जुड़ी फाइलों को ई-फाइल सिस्टम से हटाकर भौतिक फाइलों में रखा जाए. यह व्यवस्था 25 मार्च 2025 से लागू कर दी गई. याचिका में यह भी कहा गया है कि गर्ग के निर्देश पर ही IDFC फर्स्ट बैंक की सेक्टर-32, चंडीगढ़ शाखा में बैंक खाता खोला गया.
10 दिसंबर 2025 को प्रदीप कुमार का तबादला राज्य परिवहन विभाग में निदेशक के रूप में हो गया और उन्होंने यह विभाग छोड़ दिया. याचिका में कहा गया है कि उनके जाने के बाद भी उनके उत्तराधिकारी IAS अधिकारी योगेश कुमार की ओर से भेजे गए एक प्रस्ताव में गर्ग ने अपने अधिकार से बदलाव किया. याचिका का तर्क है कि इससे यह साबित होता है कि IDFC फर्स्ट बैंक के पक्ष में फैसले लेने का सिलसिला चेयरमैन चला रहे थे, सदस्य सचिव नहीं.
CBI द्वारा FIR दर्ज करने के बाद राज्य सरकार ने राम कुमार सिंह और प्रदीप कुमार को निलंबित कर दिया, जबकि जांच के दायरे में आए अन्य IAS अधिकारियों से उनके अहम विभाग वापस ले लिए गए. 9 अप्रैल को विनीत गर्ग को भी हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के चेयरमैन पद से हटाकर प्रिंटिंग एंड स्टेशनरी विभाग में अतिरिक्त मुख्य सचिव बना दिया गया.
दिप्रिंट ने प्रदीप कुमार की याचिका की PDF विनीत गर्ग को भेजकर उस पर लगाए गए आरोपों पर उनका पक्ष जानना चाहा. लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला. जवाब मिलने पर खबर को अपडेट किया जाएगा.
उधर, योगेश कुमार ने दिप्रिंट से कहा, “चल रही जांच पर टिप्पणी करना मेरे लिए उचित नहीं होगा.”
पूरा ‘घोटाला’
IDFC फर्स्ट बैंक घोटाले की शुरुआत हरियाणा के पंचायत विभाग की एक समिति की जांच से हुई. जांच में पता चला कि 26 सितंबर 2025 को मुख्यमंत्री ग्रामीण आवास योजना (MMGAY-2.0) के तहत IDFC फर्स्ट बैंक और AU स्मॉल फाइनेंस बैंक में दो खाते खोले गए थे. इनमें क्रमशः 50 करोड़ रुपये और 25 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए गए थे.
जांच में पाया गया कि इन रकमों के इस्तेमाल के लिए सक्षम प्राधिकारी से कोई मंजूरी नहीं ली गई थी. जांच में यह भी सामने आया कि बैंक द्वारा प्रोसेस किए गए चेकों पर तत्कालीन HSPCB महानिदेशक डी.के. बेहेरा समेत अन्य लोगों के “फर्जी” हस्ताक्षर थे. साथ ही डेबिट नोट्स पर पत्र संख्या और डिस्पैच नंबर भी नहीं थे.
लेनदेन से जुड़े अलर्ट और पुष्टि संदेश पंचायत विभाग के एक सुपरिंटेंडेंट के नाम पर रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर भेजे जा रहे थे.
शुरुआत में राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने 23 फरवरी 2026 को पंचकूला थाने में FIR दर्ज की थी. बाद में हरियाणा सरकार ने 25 मार्च 2026 को मामला CBI को सौंप दिया. सरकार ने इसके पीछे अंतरराज्यीय प्रभाव, अपराध से कमाई गई रकम के विदेश भेजे जाने की आशंका और सरकारी अधिकारियों व बैंक कर्मचारियों की भूमिका को वजह बताया.
CBI ने 8 अप्रैल 2026 को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता, 2023 की कई धाराओं के तहत मामला दोबारा दर्ज किया.
उसी दिन CBI द्वारा गिरफ्तार किए जा चुके प्रदीप कुमार और दूसरे IAS अधिकारी राम कुमार सिंह को राज्य सरकार ने निलंबित कर दिया.
मामला दर्ज होने के समय सरकारी खजाने को 550 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान बताया गया था. बाद में जांच बढ़ने पर यह आंकड़ा बढ़कर आठ सरकारी विभागों में 645 से 657 करोड़ रुपये तक पहुंच गया.
याचिका के मुताबिक, दिसंबर 2024 में HSPCB चेयरमैन बनने के बाद विनीत गर्ग के कार्यकाल में निवेश संबंधी फैसलों में बड़ा बदलाव आया. CBI ने भ्रष्टाचार की जांच आगे बढ़ाने से पहले गर्ग समेत आठ IAS अधिकारियों के खिलाफ धारा 17-A के तहत जरूरी मंजूरी हासिल की थी. एजेंसी इन सभी से पूछताछ कर चुकी है.
जमानत याचिका
प्रदीप कुमार की याचिका में कहा गया है कि CBI की अपनी जांच में भी यह सामने आया है कि उनका दूसरे आरोपियों से कोई सीधा या परोक्ष संपर्क नहीं था.
उन्होंने अपनी स्वास्थ्य स्थिति का भी हवाला दिया है. याचिका में कहा गया है कि उन्हें हाई ब्लड प्रेशर और मधुमेह है. साथ ही उन्होंने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और हिरासत में पूछताछ के लिए जरूरी शर्तों से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसलों. सिद्धाराम सटलिंगप्पा म्हेत्रे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2011) और अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014). का भी हवाला दिया है.
यह याचिका पंचकूला जिला अदालत परिसर के अधिवक्ता एस.के. अग्निहोत्री और शुभम शर्मा के जरिए दाखिल की गई है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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