तीन राज्य. तीन चुनावी नतीजे. तीन बड़े झटके.
पश्चिम बंगाल में जनता ने ममता बनर्जी के 15 साल के शासन का अंत कर दिया और भारतीय जनता पार्टी को बड़ी जीत दिलाई. राजनीतिक विश्लेषकों को चुनाव के आखिरी दौर तक भी इस नतीजे की उम्मीद नहीं थी. तमिलनाडु में फिल्म स्टार विजय, जिनके पास पहले कोई राजनीतिक अनुभव नहीं था, उन्होंने पांच साल से भी कम पुरानी पार्टी तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) को बड़ी जीत दिलाई. इसके साथ ही द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) सत्ता से बाहर हो गई और पिछले 60 सालों से चल रही द्रविड़ राजनीति की पकड़ को बड़ा झटका लगा.
केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) ने लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) को करारी हार दी. इससे भारतीय कम्युनिस्ट राजनीति को एक बड़ा और शायद कभी न भरने वाला प्रतीकात्मक झटका लगा है. आजाद भारत में पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी भी राज्य में लेफ्ट पार्टी की सरकार नहीं है. इन तीनों चुनावी नतीजों को मिलाकर देखें तो यह हाल के भारतीय राजनीतिक इतिहास के सबसे नाटकीय हफ्तों में से एक माना जाएगा. विश्लेषक आने वाले महीनों तक इन नतीजों पर चर्चा करेंगे—जैसे सत्ता विरोधी लहर, पहचान की राजनीति, फिल्मी सितारों का असर और विचारधारा आधारित राजनीति की घटती ताकत.
लेकिन एक दूसरा सवाल भी है, जो चुनावी बहस में अक्सर पीछे छूट जाता है. यह सवाल उन नई सरकारों के सामने आएगा, जब जश्न खत्म हो जाएगा. ये सवाल चुनावी जनादेश से नहीं, बल्कि बजट के आंकड़ों से तय होंगे. इनमें राज्यों की आर्थिक स्थिति, लंबे समय तक आर्थिक मजबूती बनाए रखने की चुनौती और इन राज्यों के अलग-अलग विकास मॉडल कितने सफल रहेंगे, जैसे मुद्दे शामिल हैं. ऐसा लगता है कि आंकड़े कुछ ऐसी बातें बता रहे हैं, जिन्हें आम मतदाता शायद पूरी तरह नहीं देख पाए.
अर्थव्यवस्था चुनाव नहीं होती
नीचे दिया गया चार्ट ऐसी बातें दिखाता है, जो सिर्फ चुनावी नतीजों से समझ में नहीं आतीं. तमिलनाडु की वास्तविक प्रति व्यक्ति आय 2011-12 के बाद लगभग दोगुनी हो गई है और एक ऐसे इंडेक्स में करीब 210 तक पहुंच गई है, जहां तीनों राज्यों की शुरुआत 100 से मानी गई थी.
इसके मुकाबले, केरल की विकास दर काफी धीमी रही और वह मोटे तौर पर राष्ट्रीय औसत के आसपास ही रही. पश्चिम बंगाल में सबसे धीमी वृद्धि देखी गई और बाकी दो राज्यों की तुलना में उसकी विकास रफ्तार सबसे कमजोर रही.

ये आंकड़े सिर्फ नंबर नहीं हैं. ये पिछले एक दशक में लिए गए फैसलों का नतीजा हैं. ये फैसले इस बात से जुड़े थे कि हर राज्य किस तरह की अर्थव्यवस्था बनाना चाहता था, सरकार अपना पैसा कहां खर्च कर रही थी और सबसे जरूरी बात—क्या यह खर्च ऐसी उत्पादन क्षमता बना रहा था, जो भविष्य में खुद को संभाल सके.
तीनों राज्यों में एक बात समान है—तीनों ने बड़े पैमाने पर कर्ज लिया, समय के साथ अपना कर्ज बढ़ाया और उन पर भारी कर्ज है. इसलिए इनके बीच तुलना इस बात की नहीं है कि कौन जिम्मेदारी से वित्त चला रहा है और कौन नहीं. असली तुलना इस बात की है कि यह कर्ज आखिर किस काम के लिए लिया गया.
कर्ज की क्वालिटी
यह चार्ट इस पूरी चर्चा का सबसे अहम हिस्सा है और इसे ध्यान से समझने की ज़रूरत है.

डैश वाली लाइनें पूंजीगत खर्च यानी कैपिटल एक्सपेंडिचर को राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (GSDP) के अनुपात में दिखाती हैं. इसका मतलब वह सरकारी खर्च है जो सड़क, बंदरगाह, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर, बिजली ढांचा और शहरी सिस्टम जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर पर किया जाता है. वहीं, सीधी लाइनें हर राज्य के कर्ज और GSDP के अनुपात को दिखाती हैं.
तमिलनाडु का कर्ज अनुपात बढ़ा है, लेकिन वह लगभग 29-30 प्रतिशत के आसपास स्थिर हो गया है. खास बात यह है कि वहां पूंजीगत खर्च भी बढ़ा है और दोनों आंकड़े लगभग साथ-साथ बढ़ते दिखते हैं. इसका मतलब है कि राज्य एक तरफ कर्ज बढ़ा रहा है और दूसरी तरफ इंफ्रास्ट्रक्चर भी विकसित कर रहा है.
इसके विपरीत, पश्चिम बंगाल की शुरुआत ही बहुत ज्यादा कर्ज के बोझ के साथ हुई थी, जो GSDP के 40 प्रतिशत से ज्यादा था. वहां पूंजीगत खर्च बढ़ा जरूर है, लेकिन काफी कम स्तर से.
केरल की स्थिति ज्यादा चिंता वाली दिखाई देती है. वहां कर्ज बढ़कर GSDP के लगभग 37-38 प्रतिशत तक पहुंच गया है, लेकिन पूंजीगत खर्च उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ा, जितनी तेज़ी से राज्य का खर्च बढ़ा.
विकास अर्थशास्त्र के नज़रिए से इसे समझना आसान है. तमिलनाडु ने बड़े स्तर पर ऐसा कर्ज लिया, जिससे भविष्य में आर्थिक फायदा देने वाली संपत्तियां बनाई जा सकें.
दूसरी तरफ, केरल का ज्यादातर कर्ज वेतन, पेंशन, कल्याण योजनाओं और बढ़ते ब्याज भुगतान जैसे तय खर्चों पर गया.
पश्चिम बंगाल बीच की स्थिति में है. वहां पूंजीगत खर्च बढ़ा है, लेकिन उससे अभी तक इतना निजी निवेश नहीं आया है, जो उसके असर को और बड़ा बना सके.
जब कर्ज खुद को ही खाने लगे
नीचे दिया गया चार्ट तीनों राज्यों की नई सरकारों के लिए सबसे ज्यादा चिंता का विषय होना चाहिए, क्योंकि यह दिखाता है कि राज्यों की आमदनी का कितना हिस्सा सिर्फ ब्याज चुकाने में जा रहा है. इसे वित्तीय दबाव मापने का सबसे अहम पैमाना माना जाता है.

पश्चिम बंगाल ने इस दौर की शुरुआत भारत के सबसे ज्यादा ब्याज बोझ वाले राज्यों में से एक के रूप में की थी. उसकी कुल राजस्व प्राप्तियों का करीब 28-29 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ पुराने कर्ज का ब्याज चुकाने में जा रहा था. पिछले एक दशक में यह आंकड़ा कम हुआ है और अब पश्चिम बंगाल तमिलनाडु और केरल के करीब पहुंच गया है. यह एक बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है, लेकिन इसके लिए विकास संबंधी खर्चों को सीमित करना पड़ा.
इसके उलट, केरल का रास्ता बिल्कुल अलग रहा. 2018 के बाद वहां ब्याज भुगतान तेजी से बढ़ा और अब भी 22 प्रतिशत से ऊपर बना हुआ है. इसका मतलब है कि राज्य की कमाई का बड़ा हिस्सा पहले से ही तय खर्चों में चला जाता है, उससे पहले कि अस्पतालों में स्टाफ रखा जाए, सड़कें बनाई जाएं या शिक्षकों को वेतन दिया जाए.
वहीं, तमिलनाडु ने अपनी बड़ी विकास योजनाओं के बावजूद ब्याज के बोझ को काफी हद तक नियंत्रित रखा है. इससे पता चलता है कि राज्य ने जो कर्ज लिया, उससे ऐसे फायदे मिले जिन्होंने उसके खर्च का कुछ हिस्सा संभाल लिया.
तीनों राज्यों की नई सरकारों को बहुत जल्द इस सच्चाई का सामना करना पड़ेगा. किसी राज्य के पास वित्तीय आजादी सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि उसने कितना कर्ज लिया है, बल्कि इससे तय होती है कि पुराने खर्च और देनदारियां चुकाने के बाद उसके पास फैसले लेने के लिए कितना पैसा बचता है.
तीन ढांचे, तीन कमजोरियां
आर्थिक ढांचे से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि तीनों राज्यों की वित्तीय स्थिति अलग-अलग क्यों है.

तमिलनाडु की अर्थव्यवस्था में मजबूत सेवा क्षेत्र के साथ-साथ मजबूत मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर भी है. पिछले एक दशक में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा लगातार 22 से 25 प्रतिशत के बीच बना रहा.
यह बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि मैन्युफैक्चरिंग बाकी कई सेवा क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा मजबूत आर्थिक जुड़ाव बनाती है, टैक्स से स्थिर कमाई देती है और निर्यात बढ़ाने व निजी निवेश आकर्षित करने की नींव तैयार करती है.
विजय सरकार को ऐसी अर्थव्यवस्था मिली है, जिसमें वित्तीय चुनौतियों के बावजूद मजबूत उत्पादन क्षमता मौजूद है.

इसके मुकाबले, केरल की अर्थव्यवस्था की कहानी अलग है. वहां सेवा क्षेत्र का दबदबा है और उसका हिस्सा GSVA का 55 प्रतिशत से ज्यादा है. वहीं, मैन्युफैक्चरिंग पूरे समय सिर्फ 10-12 प्रतिशत के आसपास ही रही.
राज्य की विकास दर औद्योगिक विस्तार की बजाय विदेशों से आने वाले पैसे (रेमिटेंस) और सरकारी खर्च पर ज्यादा निर्भर रही है.
केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार को सिर्फ राजनीतिक चुनौती नहीं मिली है, बल्कि उससे भी बड़ी समस्या मिली है—ऐसी अर्थव्यवस्था, जहां कल्याणकारी योजनाओं का बोझ राज्य की कमाई की क्षमता से ज्यादा हो गया है.

पश्चिम बंगाल इन दोनों के बीच की स्थिति में है. 2016 के बाद वहां मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा धीरे-धीरे बढ़कर लगभग 17-18 प्रतिशत तक पहुंचा है, लेकिन यह अब भी तमिलनाडु से कम है.
साथ ही, वहां ऐसा निजी निवेश माहौल नहीं बन पाया है, जहां सरकारी खर्च के साथ-साथ निजी पूंजी भी तेजी से आए.
बीजेपी, जिसने अपने राष्ट्रीय एजेंडे में आर्थिक प्रशासन और औद्योगिक निवेश को प्राथमिकता दी है, अब एक बड़ी परीक्षा का सामना करेगी. उसे यह साबित करना होगा कि क्या राजनीतिक बदलाव के जरिए दशकों से चली आ रही औद्योगिक गिरावट को वास्तव में बदला जा सकता है.
सब्सिडी का जाल
आखिरी चार्ट एक ऐसी जटिलता दिखाता है, जो तमिलनाडु को वित्तीय अनुशासन का मॉडल मानने वाली सीधी कहानी को चुनौती देता है.
2021-22 के बाद से तमिलनाडु ने अपनी सब्सिडी से जुड़ी प्रतिबद्धताओं में बड़ी बढ़ोतरी की है और यह आंकड़ा लगभग 60,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है. यह केरल और पश्चिम बंगाल दोनों से ज्यादा है.
यह रुझान भारतीय राज्यों की उस राजनीति को दिखाता है, जहां हर चुनाव में नई मुफ्त योजनाएं और लाभ देने के वादे किए जाते हैं. इससे भविष्य की सरकारों पर वित्तीय दबाव और बढ़ जाता है.

विजय की टीवीके ने काफी लोकलुभावन वादों के साथ चुनाव लड़ा था, इसलिए यह उम्मीद करना मुश्किल है कि सब्सिडी का यह रुख बदलेगा.
सबसे बड़ा सवाल यह है और तमिलनाडु के मजबूत औद्योगिक आधार की वजह से उसके पास केरल और पश्चिम बंगाल से ज्यादा क्षमता है—क्या राज्य कल्याणकारी योजनाओं के साथ-साथ उत्पादन बढ़ाने वाले पूंजीगत खर्च को भी लगातार बढ़ा पाएगा?
या फिर बढ़ती सब्सिडी का दबाव आखिरकार उस इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश को कमजोर कर देगा, जो तमिलनाडु की आर्थिक सफलता की सबसे बड़ी वजह रहा है.
केरल और पश्चिम बंगाल को भी इसी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन उनके पास वित्तीय लचीलापन काफी कम है.
चुनाव के बाद की सुबह
चुनाव खत्म होने के अगले दिन भी किसी राज्य पर ब्याज चुकाने की जिम्मेदारी खत्म नहीं होती. उसकी अर्थव्यवस्था का ढांचा वही रहता है और कर्ज व GSDP का अनुपात भी नहीं बदलता.
कुछ ही दिनों में नए मुख्यमंत्री अपने वित्त सचिवों के साथ बैठक करेंगे और उन बैठकों में चुनावी वोट शेयर की कोई चर्चा नहीं होगी.
15 साल के आंकड़ों से निकलने वाला सबसे बड़ा निष्कर्ष सीधा है—कर्ज अपने आप में खराब या अस्थिर नहीं होता. असली बात यह है कि उस कर्ज का इस्तेमाल किस काम के लिए किया गया.
अगर कर्ज का इस्तेमाल उत्पादन क्षमता बढ़ाने में होता है, तो उससे भविष्य में आर्थिक फायदा मिलता है. लेकिन अगर कर्ज सिर्फ खर्च चलाने और उपभोग बढ़ाने के लिए लिया जाता है, तो वह भविष्य को गिरवी रखने जैसा होता है.
विजय को तमिलनाडु की मजबूत औद्योगिक अर्थव्यवस्था विरासत में मिली है, जो तीनों राज्यों में सबसे ज्यादा वित्तीय लचीलापन देती है. हालांकि, उनकी सब्सिडी योजनाओं पर शुरुआत से नजर रखने की जरूरत होगी.
केरल की कांग्रेस सरकार को सबसे मुश्किल आर्थिक विरासत मिली है. वहां लंबे समय से जिस औद्योगिक विस्तार को टाला जाता रहा, अब उसकी जरूरत सबसे ज्यादा है.
वहीं, पश्चिम बंगाल की BJP सरकार के सामने सबसे कठिन परीक्षा है. उसे यह साबित करना होगा कि क्या राजनीतिक बदलाव वास्तव में 50 साल की औद्योगिक गिरावट को पलट सकता है.
जनता अपना फैसला सुना चुकी है. अब अर्थशास्त्री नजर बनाए हुए हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)