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Tuesday, 12 May, 2026
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AIADMK में अंदरूनी फूट सामने, शन्मुगम गुट के विधायकों ने विजय की TVK को समर्थन देने का ऐलान किया

करीब 30-36 विधायकों के गुट ने कहा कि वह तमिलनाडु में AIADMK की चुनावी हार के बाद पार्टी को फिर से मजबूत करने पर ध्यान देने के लिए TVK सरकार का समर्थन कर रहा है.

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चेन्नई: ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान मंगलवार को खुलकर सामने आ गई, जब पार्टी के विधायकों के एक गुट ने ऐलान किया कि वह तमिलनाडु में तमिलगा वेत्री कषगम (टीवीके) के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार का समर्थन करेगा.

सी.वी. शन्मुगम के नेतृत्व वाले पार्टी विधायकों ने औपचारिक रूप से मुख्यमंत्री जोसेफ विजय की टीवीके सरकार को समर्थन देने का ऐलान किया. यह फैसला एआईएडीएमके के 2026 तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में उम्मीद से खराब प्रदर्शन के कुछ दिन बाद आया है.

एआईएडीएमके के वरिष्ठ नेता सी.वी. शन्मुगम ने एस.पी. वेलुमणि और अन्य नेताओं के साथ कहा कि इस गुट ने टीवीके को समर्थन देने का फैसला इसलिए किया है ताकि सरकार स्थिर रह सके और एआईएडीएमके चुनावी हार के बाद संगठन को दोबारा मजबूत करने पर ध्यान दे सके. पार्टी ने 47 विधानसभा सीटें जीतीं, लेकिन चुनाव के बाद की स्थिति में वह बंटी हुई नज़र आई.

शन्मुगम ने मंगलवार को मीडिया से कहा, “हमने इस पार्टी की स्थापना डीएमके के खिलाफ की थी. 53 सालों से हमारी राजनीति डीएमके के खिलाफ रही है. इस इतिहास को देखते हुए एक प्रस्ताव रखा गया था कि डीएमके के समर्थन से एआईएडीएमके की सरकार बनाई जाए, लेकिन हमारे ज्यादातर सदस्यों ने इसे खारिज कर दिया और इसका विरोध किया.”

उन्होंने कहा कि अगर पार्टी डीएमके के साथ गठबंधन करती, तो एआईएडीएमके का अस्तित्व खत्म हो जाता. उन्होंने ऐसे हालात को स्वीकार करने से इनकार कर दिया.

उन्होंने कहा, “इस समय हमारे पास कोई गठबंधन नहीं है और अब हमारा ध्यान अपनी पार्टी को फिर से मजबूत और सक्रिय करने पर होना चाहिए. आखिर में हमने चुनाव जीतने वाली टीवीके को समर्थन देने का फैसला किया. हम जनता के जनादेश को स्वीकार करते हैं. जनता ने विजय को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला दिया है. हम मुख्यमंत्री विजय को बधाई देते हैं और मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली टीवीके सरकार को अपना समर्थन देते हैं.”

शन्मुगम ने कहा कि एस.पी. वेलुमणि और जी. हरि को क्रमशः विधायक दल का नेता और उपनेता चुना गया है. वेलुमणि ने मीडिया से कहा कि इस गुट का एआईएडीएमके को तोड़ने का कोई इरादा नहीं है, बल्कि वे पार्टी की चिंता के कारण टीवीके को समर्थन दे रहे हैं.

वेलुमणि ने कहा, “हम पर पार्टी तोड़ने के आरोप लगाए जा रहे हैं. ये सभी झूठे आरोप हैं. हम लंबे समय से इस पार्टी में हैं और इसे तोड़ना नहीं चाहते. हम सिर्फ आम परिषद की बैठक बुलाना चाहते हैं और लगातार चुनावी हार के कारणों पर चर्चा कर सही फैसला लेना चाहते हैं.”

यह संकट तब शुरू हुआ जब टीवीके ने सरकार बनाने के लिए चुनाव के बाद सहयोगी दलों की तलाश शुरू की.

इस कदम के बाद एआईएडीएमके के अंदर चल रही पुरानी खींचतान फिर सामने आ गई. शन्मुगम और वेलुमणि जैसे वरिष्ठ नेताओं के नेतृत्व वाले करीब 30-36 विधायकों के गुट को एक निजी रिसॉर्ट में रखा गया.

माना जा रहा था कि यह गुट लगातार चुनावी हार के बाद पार्टी के राजनीतिक अस्तित्व और महत्व को बनाए रखने के लिए टीवीके सरकार को समर्थन देने के पक्ष में था.

तनाव सोमवार को खुलकर सामने आ गया, जब पार्टी के 47 विधायक शपथ ग्रहण के लिए तमिलनाडु विधानसभा में दो अलग-अलग गुटों में पहुंचे.

करीब 11-17 विधायकों का छोटा गुट पार्टी महासचिव एडप्पडी के. पलानीस्वामी (ईपीएस) के साथ पहुंचा, जबकि लगभग 30-36 विधायकों का दूसरा गुट दूसरे नेताओं के साथ अलग से पहुंचा.

अंतर तब साफ दिखाई दिया जब एआईएडीएमके के नवनिर्वाचित सदस्य तमिलनाडु की 17वीं विधानसभा के पहले सत्र में पहुंचे.

पूर्व मंत्री शन्मुगम के नेतृत्व वाले एआईएडीएमके विधायकों के एक गुट ने प्रोटेम स्पीकर एम.वी. करुप्पैया को पत्र देकर पूर्व मंत्री वेलुमणि को एआईएडीएमके विधायक दल का नेता घोषित करने की मांग की.

वहीं, दूसरे गुट के विधायकों, जिनमें पूर्व राज्य मंत्री एन. थलावई सुंदरम भी शामिल थे, ने करुप्पैया से पार्टी महासचिव पलानीस्वामी को विधायक दल का नेता घोषित करने की मांग की.

यह घटनाक्रम 13 मई को विजय सरकार के अहम फ्लोर टेस्ट से पहले सामने आया है.

टीवीके 108 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन 234 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए उसे 118 सीटों की ज़रूरत थी.

कांग्रेस और छोटे सहयोगी दलों जैसे सीपीआई, सीपीआई (एम), आईयूएमएल और वीसीके का समर्थन पहले से मिलने के बाद एआईएडीएमके के बागी विधायकों का समर्थन सरकार की संख्या को और मजबूत करने वाला माना जा रहा है.

पार्टी सूत्रों ने इस टूट को ईपीएस के लिए प्रतीकात्मक और दर्दनाक बताया, लेकिन वेलुमणि और शन्मुगम फिलहाल मजबूत स्थिति में नज़र आ रहे हैं. बताया जा रहा है कि कई विधायक सरकार में शामिल होने या बाहर से समर्थन देने के लिए तैयार हैं.

यह बगावत ईपीएस के नेतृत्व में लगातार चुनावी हार और कई विधायकों की राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहने की इच्छा से जुड़ी है. यही कारण है कि वे तेज़ी से उभर रही टीवीके के साथ जाना चाहते हैं, जिसने पारंपरिक डीएमके-एआईएडीएमके राजनीति को झटका दिया है.

हालांकि, आर.बी. उदयकुमार, ओ.एस. मणियन और कुछ अन्य वरिष्ठ नेता अब भी पलानीस्वामी के साथ खड़े हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विधानसभा चुनावों में एआईएडीएमके की स्थिति कमजोर होती दिख रही थी और ईपीएस के नेतृत्व पर सवाल उठने लगे थे.

राजनीतिक विश्लेषक सुमंत रमण ने कहा कि ज्यादातर विधायक दूसरी तरफ हैं.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “ऐसा नहीं है कि वे ईपीएस के खिलाफ हैं, लेकिन उन्हें अब भरोसा नहीं रहा कि वह पार्टी को जीत दिला सकते हैं. तर्क के हिसाब से ईपीएस को इस्तीफा दे देना चाहिए, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वह हालात को कैसे संभालते हैं.”

2016 में जे. जयललिता की मौत के बाद ईपीएस ने पार्टी के कई अंदरूनी विवाद संभाले थे, लेकिन शशिकला से अलगाव, ओपीएस के साथ प्रतिद्वंद्विता, दोहरे नेतृत्व मॉडल को लेकर संघर्ष और वरिष्ठ नेता के.ए. सेंगोट्टैयन को बाहर किए जाने से पार्टी के भीतर विभाजन और गहरा हो गया.

राजनीतिक टिप्पणीकार एस. गुरुमूर्ति ने दिप्रिंट से कहा, “ईपीएस सख्त नेता हैं, लेकिन उतने सक्षम नहीं हैं. राज्य में एआईएडीएमके कमजोर हो रही है और यह साफ दिखाई दे रहा है.”

उन्होंने कहा कि अगर औपचारिक तौर पर पार्टी टूटती है, तो इससे राज्य की राजनीति पूरी तरह बदल सकती है और लंबे समय से चली आ रही द्रविड़ राजनीति की दोध्रुवीय व्यवस्था खत्म हो सकती है. इसका फायदा टीवीके को मिल सकता है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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