नई दिल्ली: गन्ने पर बहुत ज़्यादा निर्भर रहने के बजाय, भारत का एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम अब मक्का और चावल जैसे अनाज से बने फीडस्टॉक्स से तेज़ी से आगे बढ़ रहा है. इंडस्ट्री के प्रतिनिधियों का कहना है कि इस बदलाव का मकसद एनर्जी सिक्योरिटी को मज़बूत करना, सप्लाई सोर्स में विविधता लाना और किसानों के लिए इनकम के नए मौके बनाना है.
पिछले एक दशक में यह प्रोग्राम तेज़ी से बढ़ा है. पब्लिक सेक्टर की ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) द्वारा एथेनॉल की खरीद 2013-14 में 38 करोड़ लीटर से बढ़कर 2024-25 में 904 करोड़ लीटर हो गई.
ब्लेंडिंग लेवल भी 2014-15 में 1.14 प्रतिशत से बढ़कर चालू एथेनॉल सप्लाई ईयर (ESY) 2025-26 (नवंबर 2025 से अक्टूबर 2026) में 20 प्रतिशत हो गया है. सरकारी डेटा के अनुसार, इस प्रोग्राम ने चीनी मिलों के लिए 1.29 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा का रेवेन्यू बनाया है और 42,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा का इन्वेस्टमेंट आकर्षित किया है.
जैसे-जैसे भारत E20 ब्लेंडिंग—20 परसेंट एथेनॉल और 80 परसेंट पेट्रोल से आगे बढ़ रहा है और E85 और E100 जैसे ज़्यादा ब्लेंड की खोज कर रहा है, यह बहस तेज़ी से बदल रही है कि देश के बायोफ्यूल के लक्ष्यों को किन फसलों से पूरा किया जाना चाहिए.
ऑल-इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (AIDA) की डिप्टी डायरेक्टर जनरल भारती बालाजी के अनुसार, अनाज (मक्का और चावल) अब भारत के एथेनॉल प्रोडक्शन में लगभग 65 परसेंट का योगदान देते हैं, बाकी गन्ने से आता है.
AIDA डेटा से पता चलता है कि ESY 2025-26 में सप्लाई के लिए कॉन्ट्रैक्ट किए गए 1,059 करोड़ लीटर में से, लगभग 515 करोड़ लीटर पहले ही छह महीनों में सप्लाई हो चुके थे. मक्का सबसे बड़ा फीडस्टॉक बनकर उभरा, जिसने 182 करोड़ लीटर का योगदान दिया. एथेनॉल प्रोडक्शन में इसका हिस्सा ESY 2022-23 में सिर्फ़ 6.2 परसेंट से बढ़कर ESY 2024-25 में लगभग 50 परसेंट हो गया है.
बालाजी ने दिप्रिंट को बताया, “सरकार को एहसास हुआ कि इतने बड़े एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम के लिए सिर्फ एक फीडस्टॉक पर निर्भर रहना रिस्की था.” हालांकि, यह प्रोग्राम शुरू में शुगर इंडस्ट्री के लिए एक सपोर्ट सिस्टम के तौर पर बना था, लेकिन पॉलिसी बनाने वालों ने धीरे-धीरे फीडस्टॉक बास्केट को बढ़ाकर इसमें मक्का, टूटे चावल और खराब अनाज को भी शामिल कर लिया.
बालाजी ने कहा, “मक्का किसानों के पास कोई दूसरा मार्केट नहीं था. उनके लिए कोई रेवेन्यू नहीं आ रहा था. तभी सरकार ने इंसेंटिव देना शुरू किया और कई किसान इसमें कूद पड़े और पूरी तरह मक्का उगाने लगे.”
उन्होंने आगे कहा कि डाइवर्सिफिकेशन लॉजिस्टिक्स की वजह से भी हुआ. गन्ने की खेती ज़्यादातर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और कर्नाटक में होती है, जबकि मक्का और चावल देश के ज़्यादातर हिस्सों में उगाए जाते हैं, जिससे एथेनॉल प्रोडक्शन कुछ ही राज्यों पर कम डिपेंडेंट हो गया है.
मक्का का विरोधाभास
कृषि अर्थशास्त्री और इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक रिलेशंस (आईसीआरआईईआर) के अशोक गुलाटी व्यापक रूप से इस बात से सहमत हैं कि मक्का, चावल या गन्ने की तुलना में एथेनॉल के लिए अधिक उपयुक्त कच्चा माल है. हालांकि, उनका कहना है कि भारत की सबसे बड़ी चुनौती अब भी कम उत्पादकता है.
दुनिया का सबसे बड़ा मक्का आधारित एथेनॉल कार्यक्रम चलाने वाला अमेरिका प्रति हेक्टेयर लगभग 11 टन मक्का पैदा करता है, जबकि भारत में यह आंकड़ा करीब 3.5 टन है.
गुलाटी ने दिप्रिंट से कहा, “जब तक हम बेहतर तकनीक, जिसमें जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलें भी शामिल हैं, का उपयोग करके उत्पादन को कम से कम 6, 7 या 8 टन प्रति हेक्टेयर तक नहीं बढ़ाते, तब तक मक्का एथेनॉल के लिए वास्तव में प्रतिस्पर्धी नहीं बन पाएगा.”
उन्होंने यह भी कहा कि मक्का को अन्य विकल्पों की तुलना में काफी कम पानी की ज़रूरत होती है. आम तौर पर मक्का की एक फसल के लिए तीन से चार बार सिंचाई करनी पड़ती है, जबकि पंजाब में चावल के लिए 22 बार तक और महाराष्ट्र में गन्ने के लिए 25 से 30 बार तक सिंचाई की जरूरत पड़ती है.
उन्होंने कहा, “चावल बहुत ज्यादा पानी पीने वाली फसल है. फिर गन्ना भी बहुत ज्यादा पानी लेने वाली फसल है. मक्का ऐसी फसल नहीं है जो बहुत ज्यादा पानी मांगती हो.”
हालांकि, आईसीएआर-इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ शुगरकेन रिसर्च (आईआईएसआर) के निष्कर्ष कुछ अलग तस्वीर पेश करते हैं. संस्थान ने पाया है कि एथेनॉल उत्पादन के लिए पानी के उपयोग के मामले में गन्ना ज्यादा कुशल है. उसके अनुसार, प्रति हेक्टेयर मासिक पानी की खपत गन्ने में 1,313 घन मीटर, मक्का में 1,691 घन मीटर और चावल में 2,548 घन मीटर है.
भारत के पास इस समय चावल का बड़ा अधिशेष भंडार है. भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के पास मौजूद चावल का स्टॉक निर्धारित बफर मानकों से लगभग तीन गुना बताया जाता है. बालाजी का कहना है कि इस भंडार के एक हिस्से को एथेनॉल उत्पादन में लगाना एक व्यावहारिक समाधान है.
उन्होंने कहा, “जो चावल अन्यथा बर्बाद हो जाता, उसे अब ऊर्जा उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.” उनका तर्क है कि उद्योग ऐसे अनाज को खपा रहा है जिसका अन्यथा बहुत कम आर्थिक उपयोग होता.
हालांकि, गुलाटी इससे सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि इसका आर्थिक गणित बिल्कुल मेल नहीं खाता.
एफसीआई चावल की खरीद और भंडारण लगभग 42 रुपये प्रति किलोग्राम की लागत पर करता है, जिसमें बिजली और उर्वरकों पर दी जाने वाली सब्सिडी भी शामिल होती है. यही चावल बाद में एथेनॉल डिस्टिलरियों को 22-23 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेच दिया जाता है.
गुलाटी ने कहा, “मुझे लगता है कि यह सरकार की सबसे अव्यावहारिक नीतियों में से एक है. यह पैसे की बर्बादी है. दुनिया में कहीं भी चावल को सिस्टम में डालकर एथेनॉल का उत्पादन नहीं किया जाता.”
उन्होंने यह भी कहा कि सब्सिडी एथेनॉल उत्पादन की वास्तविक लागत को छिपा देती है.
उन्होंने कहा, “आपको देखना होगा कि एथेनॉल उत्पादन का सबसे किफायती तरीका क्या है. क्योंकि बिजली और उर्वरकों के रूप में छिपी हुई सब्सिडी आपके एथेनॉल उत्पादन में जा रही है.”
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) की एसोसिएट फेलो श्रुति जैन का कहना है कि एथेनॉल की अर्थव्यवस्था अब भी काफी हद तक सरकारी समर्थन पर निर्भर है.
उन्होंने कहा, “अगर केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा दिया जाने वाला प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष समर्थन न हो, तो एथेनॉल के लिए पेट्रोल जैसे पारंपरिक ईंधनों से प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल होगा, क्योंकि इसकी ऊर्जा घनत्व (एनर्जी डेंसिटी) कम होती है.”
मांग पैदा करने की चुनौती
तेल विपणन कंपनियां (ओएमसी) टेंडर आधारित व्यवस्था के जरिए एथेनॉल खरीदती हैं, जिसमें कीमत कच्चे माल के आधार पर तय होती है. बालाजी के अनुसार, मौजूदा वर्ष में मक्का आधारित एथेनॉल की कीमत 71.86 रुपये प्रति लीटर है, जबकि चावल आधारित एथेनॉल के लिए 60.32 रुपये और गन्ना आधारित एथेनॉल के लिए 65.61 रुपये प्रति लीटर दिए जा रहे हैं.
बालाजी ने बताया कि भारत में इस समय लगभग 370 एथेनॉल संयंत्र हैं, जिनकी कुल स्थापित उत्पादन क्षमता करीब 2,000 करोड़ लीटर है.
इसके मुकाबले, ई20 मिश्रण के लिए सालाना लगभग 1,100 करोड़ लीटर एथेनॉल की जरूरत होती है. वहीं दवा उद्योग और अन्य औद्योगिक उपयोग—जैसे पेंट के लिए सॉल्वेंट, प्लास्टिक निर्माण में इंटरमीडिएट, करीब 300 करोड़ लीटर एथेनॉल की खपत करते हैं. इसके बाद भी लगभग 700 करोड़ लीटर एथेनॉल के लिए कोई बाजार नहीं बचता.
इसी कारण उद्योग संगठन नेपाल, बांग्लादेश, थाईलैंड और फिलीपींस जैसे देशों को एथेनॉल निर्यात की अनुमति मांग रहा है. साथ ही एथेनॉल आधारित खाना पकाने के ईंधन और ई85 तथा ई100 पर चलने वाले फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा देने की भी मांग कर रहा है.
बालाजी के अनुसार, करीब 40 नई एथेनॉल डिस्टिलरियां जल्द शुरू होने वाली हैं, जिससे मांग पैदा करना इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती बन जाएगा. उद्योग प्रतिनिधि फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों पर जीएसटी कम करने की भी मांग कर रहे हैं, जो फिलहाल 18 से 40 प्रतिशत के बीच है. उनका कहना है कि मौजूदा कर व्यवस्था फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को नुकसान पहुंचाती है, जबकि इलेक्ट्रिक वाहनों पर केवल 5 प्रतिशत जीएसटी लगता है.
हालांकि, ओआरएफ की श्रुति जैन ने चेतावनी दी कि एथेनॉल उत्पादन बढ़ने से समय के साथ फसल पैटर्न प्रभावित हो सकता है. उनका कहना है कि एथेनॉल के लिए इस्तेमाल होने वाली फसलों से अधिक मुनाफा मिलने पर किसान दालों और तिलहनों की जगह मक्का, गन्ना और चावल जैसी फसलों को प्राथमिकता दे सकते हैं.
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