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Tuesday, 23 June, 2026
होममत-विमतपंजाब में कल के उग्रवादी आज 'शहीद' हैं, गैर-हिंदू बहुल राज्य में BJP की उम्मीद

पंजाब में कल के उग्रवादी आज ‘शहीद’ हैं, गैर-हिंदू बहुल राज्य में BJP की उम्मीद

पश्चिम बंगाल में अपनी पकड़ मजबूत करने के बाद, BJP अब एक नई और आक्रामक चुनावी रणनीति बनाकर सिख-बहुल राज्य पर नज़र गड़ाए हुए है.

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मान लीजिए कोई विपक्षी नेता उग्रवादियों को “शहीद” कह दे. ऐसे में दक्षिणपंथी तंत्र तुरंत सक्रिय हो जाएगा और उसे भारत-विरोधी समेत राष्ट्र-विरोधी बता देगा. या फिर उसे सीधे “टुकड़े-टुकड़े गैंग” का सदस्य कह दिया जाएगा, यानी ऐसा व्यक्ति जो भारत को तोड़ने की सोच रखने वालों के प्रति सहानुभूति रखता है.

लेकिन इस महीने की शुरुआत में जब महाराष्ट्र के मंत्री और वरिष्ठ बीजेपी नेता गिरीश महाजन ने इससे भी ज्यादा बातें कहीं, तब ऐसा कोई गुस्सा देखने को नहीं मिला. महाजन ने दमदमी टकसाल सिख सेमिनरी में, जिसका नेतृत्व कभी जरनैल सिंह भिंडरावाले करते थे, कहा कि सेना का ऑपरेशन ब्लू स्टार एक “काला दिन” था. उन्होंने उस ऑपरेशन में मारे गए लोगों को “शहीद” कहा. इसके बाद महाजन ने 1984 में भारतीय सेना की कार्रवाई की तुलना अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली के स्वर्ण मंदिर पर किए गए हमलों से कर दी.

अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी सहित बीजेपी के नेताओं ने ऑपरेशन ब्लू स्टार का समर्थन किया था. आडवाणी ने अपनी आत्मकथा ‘माय कंट्री, माय लाइफ’ (2008) में लिखा था कि बीजेपी ने “आखिरकार” प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को “सेना का इस्तेमाल करने और स्वर्ण मंदिर को उसके राष्ट्र-विरोधी कब्जाधारियों से मुक्त कराने” के लिए मजबूर कर दिया था.

इतिहास के सबक

लेकिन महाजन, और कई अन्य लोग, यह कह सकते हैं कि वह आडवाणी वाली बीजेपी का इतिहास था, जिसका काफी हिस्सा मोदी-शाह दौर में बदल चुका है. अगस्त 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑपरेशन ब्लू स्टार पर भारत सरकार और अपनी ही पार्टी की स्थापित लाइन से अलग रुख अपनाया और इसे “अकाल तख्त पर हमला” कहा.

मोदी ने लोकसभा में कहा, “मिजोरम में ही इंदिरा जी को अपने ही लोगों के खिलाफ सेना इस्तेमाल करने की आदत पड़ी थी.” उन्होंने आरोप लगाया कि 1966 में भारतीय वायुसेना ने आम नागरिकों पर हमला किया था. मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) ने 1 मार्च 1966 को भारत से स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी. वह सेना और अर्धसैनिक बलों के ठिकानों पर कब्जा करना चाहता था. योजना यह थी कि कम से कम 48 घंटे तक स्वतंत्र मिजोरम का झंडा फहराया जाए, ताकि पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र में उनका मुद्दा उठा सके. इंदिरा गांधी ने हवाई हमला इसलिए करवाया था ताकि एमएनएफ आइजोल में असम राइफल्स की चौकी पर कब्जा न कर सके.

मुमकिन है कि मोदी को मिजोरम में भारतीय वायुसेना की कार्रवाई के कारणों की पूरी जानकारी न दी गई हो. या फिर वह अपने भाषण के जोश में बह गए हों. जो भी हो, सच यह है कि मोदी ने बाद में यह आरोप दोबारा नहीं दोहराए. उन्हें जल्द ही समझ आ गया होगा कि सिर्फ इंदिरा गांधी को दोष देने के लिए भी सेना या वायुसेना की कार्रवाई पर सवाल उठाना कभी “स्मार्ट राजनीति” नहीं होता. सशस्त्र बलों को राजनीति में घसीटना लोगों को पसंद नहीं आता.

यहीं पर गिरीश महाजन हद से आगे निकल गए. सेना की कार्रवाई में मारे गए उग्रवादियों को शहीद बताना बहुत आगे जाने वाली बात है. और हमारी सेना की कार्रवाई की तुलना अहमद शाह अब्दाली के हमलों से करना इसे और भी गंभीर बना देता है. तो फिर बीजेपी उनकी टिप्पणियों की निंदा क्यों नहीं कर रही है, या कम से कम उनसे दूरी क्यों नहीं बना रही है? महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने तो महाजन का बचाव भी किया और कहा कि उनकी टिप्पणियों को 1984 के सिख-विरोधी दंगों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए.

एक नया राजनीतिक मोर्चा

बीजेपी ने फिर भी उनके बयान को क्यों स्वीकार किया है? क्योंकि यह पंजाब में उसकी बड़ी राजनीतिक योजना के साथ मेल खाता है, जहां उसे ज्यादातर एक हिंदू पार्टी के रूप में देखा जाता है. दो राज्य जो विभाजन से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे, वे बंगाल और पंजाब थे. बीजेपी को बंगाल में सत्ता पाने में आठ दशक लग गए, इसके बावजूद कि पाकिस्तान से आए बड़े पैमाने पर विस्थापित लोगों की पीड़ा और कठिनाइयां मौजूद थीं. इसलिए पंजाब अब बीजेपी का अगला राजनीतिक लक्ष्य बन गया है.

कल्पना कीजिए कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बीच बातचीत हो रही है.

भागवत: नरेन भाई, हमें आप पर बहुत गर्व है. आपने लगभग हमें हिंदू राष्ट्र दे दिया है.

मोदी: मेरा सवाल यही है मोहन जी. क्या यह गलत है अगर जेपी नड्डा आपसे कहते हैं कि हमारी बीजेपी आज सक्षम है और खुद अपना काम संभाल सकती है?

भागवत: नहीं नरेन भाई, समस्या यह नहीं है. समस्या यह है कि आप एक व्यक्ति के रूप में हमारे बड़े लक्ष्य से बड़े होते जा रहे हैं. यानी सामाजिक और राष्ट्रीय पुनर्निर्माण. जैसा आप जानते हैं, कोई भी व्यक्ति बड़े लक्ष्य से बड़ा नहीं हो सकता.

मोदी: यही तो मेरी समस्या है मोहन जी. आपने हमारे घोषणापत्र में तीन लक्ष्य रखे थे. अयोध्या राम मंदिर निर्माण, समान नागरिक संहिता और अनुच्छेद 370 हटाना. हमने लगभग सब लागू कर दिया है. अब और क्या उम्मीद है?

इस समय मोहन भागवत चुप हो जाते हैं.

थोड़ी देर बाद मोदी फिर कहते हैं, “ठीक है. मैंने वह भी किया है जो श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल में चाहते थे. मैं आपको पंजाब भी दूंगा.”

भागवत कुछ देर मोदी को देखते हैं और फिर चले जाते हैं.

यह एक काल्पनिक बातचीत है. लेकिन सच यह है कि मोदी शायद इसी दिशा में काम कर रहे हैं. पंजाब अगला बड़ा लक्ष्य है. फरवरी में जब पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल के चुनावों पर ध्यान था, तब प्रधानमंत्री मोदी जालंधर के पास डेरा सचखंड बल्लां गए थे गुरु रविदास जयंती के मौके पर. पंजाब में दलितों की आबादी 32 प्रतिशत है, जो किसी भी राज्य में अनुसूचित जातियों का सबसे बड़ा अनुपात है. छह हफ्ते बाद, चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनाव प्रचार के बीच, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पंजाब के मोगा में एक रैली कर रहे थे. अब इस लेख के समय बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन भी तीन दिन के पंजाब दौरे पर हैं.

उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर और पंजाब में अगले साल फरवरी-मार्च में चुनाव हैं. इनमें से पहले चार राज्यों में बीजेपी सत्ता में है, इसलिए दांव बड़ा है. फिर भी बीजेपी के शीर्ष नेता पंजाब में इतना समय क्यों दे रहे हैं, जहां उनकी पकड़ कम मानी जाती है? पंजाब में बीजेपी अब भी मुख्य रूप से एक हिंदू पार्टी मानी जाती है, जहां 38.5 प्रतिशत हिंदू और 57.7 प्रतिशत सिख हैं. इसी वजह से शिरोमणि अकाली दल ने अपने पूर्व सहयोगी को लोकसभा की 13 में से केवल 3 सीटें और विधानसभा की 117 में से 23 सीटें देती थीं. 2020 में अकाली दल से अलग होने के बाद बीजेपी को 2022 के विधानसभा चुनाव में 6.6 प्रतिशत वोट मिले. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे 18 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले और वह तीन सीटों पर दूसरे स्थान पर रही. ये सीटें थीं गुरदासपुर, जालंधर और लुधियाना.

तो आखिर बीजेपी को इतना भरोसा क्यों है कि मोदी और शाह जैसे नेता बंगाल और असम जैसे बड़े चुनावी राज्यों से समय निकालकर पंजाब में प्रचार शुरू कर रहे थे? सच यह है कि बीजेपी अब तक किसी गैर हिंदू बहुल राज्य में मुख्यमंत्री नहीं बना पाई है. एक ही अपवाद है, तकनीकी रूप से मणिपुर, जहां हिंदू आबादी ईसाइयों से सिर्फ 0.10 प्रतिशत ज्यादा है. पंजाब की जनसांख्यिकी बीजेपी के लिए और भी कठिन है.

फिर भी बीजेपी को भरोसा है.

एक वरिष्ठ मंत्री ने हाल ही में चुनिंदा पत्रकारों से कहा, “हम पंजाब में किसी के साथ गठबंधन नहीं करेंगे. हम तीन मुद्दों पर चुनाव लड़ेंगे. खराब शासन, नशे की समस्या और धर्म परिवर्तन.”

जनसंघ के समय से ही बीजेपी पंजाब की बड़ी राजनीति में बहुत मजबूत नहीं रही है. 1952 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने दो जनसंघ विधायकों का समर्थन देकर पटियाला और ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन की अकाली दल सरकार को समर्थन दिया था. कम्युनिस्टों ने भी बाहर से समर्थन दिया था. 1967 और 1969 में भी जनसंघ और कम्युनिस्ट दोनों अकाली दल सरकारों के साथ थे.

तब से बहुत कुछ बदल गया है. आम आदमी पार्टी एक मुख्य राजनीतिक ताकत बन गई है, जबकि अकाली दल और कांग्रेस अपनी जगह वापस पाने की कोशिश कर रहे हैं. हाल के नगर निकाय चुनावों में आम आदमी पार्टी का दबदबा रहा, जिससे पता चलता है कि विपक्ष अभी उसकी पकड़ को कमजोर नहीं कर पाया है. दिलचस्प बात यह है कि 2022 विधानसभा चुनाव से एक साल पहले कांग्रेस ने भी नगर निकाय चुनाव जीते थे, लेकिन विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी सत्ता में आ गई.

हाल ही में अकाल तख्त ने मुख्यमंत्री भगवंत मान को “एंटी गुरु” और “एंटी खालसा पंथ” कहा है, जिससे आम आदमी पार्टी के लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं. लेकिन उसे इस बात से थोड़ी राहत है कि कांग्रेस और अकाली दल अभी भी अपने अंदरूनी झगड़ों में फंसे हुए हैं. लेकिन क्या यह बीजेपी के लिए पंजाब में बड़ा सपना देखने के लिए काफी है, जबकि प्रधानमंत्री मोदी का प्रभाव राज्य में सीमित माना जाता है और किसान आंदोलन की यादें अभी भी लोगों के बीच मौजूद हैं?

लेकिन बीजेपी के बड़े नेता जिस तीन मुद्दों की बात कर रहे हैं, उन पर ध्यान दें. खराब शासन आज पंजाब में भी उतना ही मुद्दा है जितना कभी बंगाल में था. यह जरूरी नहीं कि पंजाब “उड़ता पंजाब” जैसा हो, लेकिन युवाओं की हालत एक तरह की अव्यवस्था और निराशा का एहसास जरूर देती है. एक मुद्दा जिसे बीजेपी उठा रही है, वह है धर्म परिवर्तन. मजहबी सिखों का ईसाई धर्म अपनाना और वाल्मीकि हिंदुओं का धर्म बदलना एसजीपीसी और हिंदू संगठनों में चिंता पैदा कर रहा है.

ऐसे धर्म परिवर्तन की वास्तविक संख्या कोई ठीक से नहीं जानता. जैसे बंगाल में “घुसपैठियों” की असल संख्या भी लोग नहीं जानते थे. यह पहचान और संस्कृति को लेकर असुरक्षा पैदा कर सकता है, चाहे वह नौकरी या आजीविका से सीधे जुड़ा न हो. पंजाब भी इससे अलग नहीं है. बीजेपी को इससे कोई परेशानी नहीं होगी अगर एसजीपीसी और हिंदू संगठन इसी तरह की चिंता महसूस करें.

संक्षेप में कहा जाए तो बीजेपी पंजाब में वही कर रही है जो वह मुश्किल राजनीतिक इलाकों में करती है. हर संभावित रास्ते को आजमाना. अल्पसंख्यक हिंदुओं को जोड़ना, दलितों तक पहुंच बनाना जैसे डेरा सचखंड बल्लां की यात्रा के जरिए, और सिख समुदाय तक पहुंच बनाने की कोशिश करना जैसे गिरीश महाजन के “शहीद” वाले बयान से. साथ ही जाट सिख केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब इकाई का प्रमुख बनाना. अगर शिरोमणि अकाली दल फिर से गठबंधन करना चाहे तो बीजेपी अपने शर्तों पर तैयार होगी. अगर नहीं, तो वह चार-तरफा मुकाबले में भी उम्मीद लगाए रखेगी. यहां तक कि अगर त्रिशंकु विधानसभा बनती है, तब भी केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी को संतुष्टि ही होगी.

डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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