नई दिल्ली: नीति आयोग ने गुरुवार को जारी अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि अगर भारत 2035 तक 691 अरब डॉलर की बायोइकोनॉमी बनाना चाहता है, तो उसे सिर्फ दुनिया की “फार्मेसी” बने रहने से आगे बढ़कर वैश्विक बायोटेक्नोलॉजी इनोवेशन हब बनना होगा.
‘रोडमैप फॉर बिल्डिंग इंडिया ऐज ए लीडिंग बायोइकोनॉमी पावरहाउस बाय 2035’ नाम की इस रिपोर्ट में 50,000 करोड़ रुपये का बायोइकोनॉमी ग्रोथ फंड, मिशन मोड में छह राष्ट्रीय कार्यक्रम, तेज रेगुलेटरी मंजूरी, AI आधारित बायोटेक्नोलॉजी और उद्योग व शिक्षा संस्थानों के बीच मजबूत सहयोग का प्रस्ताव दिया गया है. इसका मकसद 3 करोड़ से ज्यादा उच्च गुणवत्ता वाली नौकरियां पैदा करना और भारत को दुनिया की शीर्ष तीन बायोटेक्नोलॉजी ताकतों में शामिल करना है.
इस रोडमैप को केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जितेंद्र सिंह, नीति आयोग की सीईओ निधि छिब्बर और नीति फ्रंटियर टेक हब की प्रमुख एवं डिस्टिंग्विश्ड फेलो देबजानी घोष ने लॉन्च किया.
लॉन्च के दौरान जितेंद्र सिंह ने कहा कि दुनिया अब “बायोलॉजिकल सेंचुरी” में प्रवेश कर रही है. उन्होंने कहा कि आईटी क्रांति के समय भारत पीछे रह गया था, लेकिन अब भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है, जिनके पास BioE3 (Biotechnology for Economy, Environment and Employment) के तहत बायोटेक्नोलॉजी की समर्पित नीति है.
उन्होंने कहा, “अगर 20वीं सदी आईटी की सदी थी, तो 21वीं सदी बायोटेक्नोलॉजी की सदी होगी.” उन्होंने कहा कि इस बार भारत पीछे नहीं रहेगा.
पिछले 10 वर्षों में भारत की बायोइकोनॉमी 2014 के 10 अरब डॉलर से बढ़कर 2025 में 195.3 अरब डॉलर तक पहुंच गई है. यानी इसमें करीब 16 गुना बढ़ोतरी हुई है. अब इसका देश की जीडीपी में 4.8 प्रतिशत योगदान है.
रिपोर्ट के मुताबिक, यह आंकड़ा 2035 तक बढ़कर 691 अरब डॉलर और मिशन मोड में काम होने पर 2047 तक 2.6 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगले चरण की विकास यात्रा के लिए भारत को अपनी ताकतों का बेहतर इस्तेमाल करना होगा. इनमें दुनिया का सबसे बड़ा वैक्सीन निर्माण तंत्र, 10,000 से ज्यादा बायोटेक स्टार्टअप, अमेरिका के बाहर 700 से ज्यादा US FDA से मंजूर मैन्युफैक्चरिंग प्लांट और वैश्विक बाजार में 20 से ज्यादा बायोसिमिलर उत्पाद शामिल हैं.
हालांकि रिपोर्ट का कहना है कि ये सभी क्षमताएं अभी बिखरी हुई हैं और इन्हें बेहतर समन्वय के साथ लागू करने की जरूरत है.
रिपोर्ट में कहा गया है, “अगला चरण सिर्फ धीरे-धीरे विकास करने का नहीं होना चाहिए.” इसमें कहा गया है कि अगर योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू किया जाए, तो भारत दुनिया की प्रमुख बायोटेक्नोलॉजी ताकतों में शामिल हो सकता है.
छह राष्ट्रीय बायो मिशन
रिपोर्ट की सबसे बड़ी सिफारिश यह है कि अलग-अलग चल रहे बायोटेक्नोलॉजी कार्यक्रमों की जगह छह राष्ट्रीय बायो मिशन शुरू किए जाएं. इनके लिए अलग फंड, तय समयसीमा और जवाबदेही तय हो.
इन मिशनों में GeneIndia के तहत सस्ती जीन और सेल थेरेपी, AgriBio 2.0 के तहत जलवायु के अनुकूल फसलें, BioX Foundry के जरिए सिंथेटिक बायोलॉजी उत्पादों का व्यावसायीकरण, One Health Grid के तहत AI आधारित बीमारी निगरानी प्रणाली, Marine Biotechnology के जरिए ब्लू इकोनॉमी को बढ़ावा और BioPharmaNext के तहत भारत को बायोलॉजिक्स, बायोसिमिलर, वैक्सीन और AI आधारित दवा खोज का वैश्विक केंद्र बनाने का प्रस्ताव है.
रिपोर्ट में कहा गया है, “इन मिशनों को सिर्फ अनुदान आधारित कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहना चाहिए. इन्हें ऐसे एकीकृत प्लेटफॉर्म के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जिनमें रिसर्च, मैन्युफैक्चरिंग, रेगुलेटरी तालमेल, प्रशिक्षित मानव संसाधन और खरीद की व्यवस्था शामिल हो, ताकि ठोस नतीजे मिल सकें.”
जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत पहले ही स्वदेशी वैक्सीन, कम लागत वाली CAR-T सेल थेरेपी और स्वदेशी एंटीबायोटिक विकसित करके अपनी क्षमता दिखा चुका है. उन्होंने कहा कि भारत अब स्वास्थ्य क्षेत्र में इनोवेशन के लिए दुनिया का किफायती केंद्र बन चुका है.
उन्होंने यह भी कहा कि इस रोडमैप के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए निजी उद्योगों के साथ ज्यादा सहयोग जरूरी होगा.
फंडिंग, सुधार और प्रतिभा
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की बायोटेक्नोलॉजी महत्वाकांक्षाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौतियां फंडिंग, रेगुलेटरी व्यवस्था और प्रशिक्षित मानव संसाधन की कमी हैं.
रिपोर्ट में 2026 से 2035 के बीच 50,000 करोड़ रुपये का बायोइकोनॉमी ग्रोथ फंड बनाने की सिफारिश की गई है, ताकि लैब में होने वाली रिसर्च और व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन के बीच की दूरी को कम किया जा सके.
रिपोर्ट में कहा गया है, “यह फंड ब्लेंडेड फाइनेंस, कैटेलिटिक इक्विटी और इंफ्रास्ट्रक्चर सहायता के जरिए बायोमैन्युफैक्चरिंग, एडवांस्ड थेरेपी, फर्मेंटेशन प्लेटफॉर्म, बायोमैटेरियल, डायग्नोस्टिक्स और सिंथेटिक बायोलॉजी जैसे क्षेत्रों को समर्थन देगा.”
रिपोर्ट में बायोमैन्युफैक्चरिंग के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) जैसी योजना, रेगुलेटरी सैंडबॉक्स, आधुनिक मंजूरी प्रणाली और तेज क्लियरेंस प्रक्रिया का भी प्रस्ताव दिया गया है, ताकि देरी कम हो और इनोवेशन व निवेश को बढ़ावा मिले.
बेहतर समन्वय के लिए रिपोर्ट में एम्पावर्ड कमेटी ऑन नेशनल बायो मिशन्स, नेशनल बायोडाटा काउंसिल और बायोइकोनॉमी इन्वेस्टमेंट एंड पॉलिसी फोरम बनाने की भी सिफारिश की गई है.
रिपोर्ट में बायोटेक्नोलॉजी शिक्षा को मजबूत करने, पीएचडी और पोस्ट-डॉक्टोरल कार्यक्रम बढ़ाने और कम्प्यूटेशनल बायोलॉजी, AI आधारित बायोटेक्नोलॉजी और रेगुलेटरी साइंस में विशेषज्ञता विकसित करने की भी बात कही गई है.
रिपोर्ट के अंत में कहा गया है कि “आने वाले पांच साल तय करेंगे कि भारत सिर्फ बायोटेक्नोलॉजी का विस्तार करता है या इस जैविक सदी को दिशा भी देता है.” रिपोर्ट में कहा गया है कि अब बायोटेक्नोलॉजी को भी डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की तरह राष्ट्रीय बुनियादी ढांचे का हिस्सा माना जाना चाहिए.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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