scorecardresearch
Monday, 5 October, 2026
होमदेशअर्थजगतअमेरिका ने शुरू की ईरान के आखिरी तेल बैरल की उलटी गिनती, गालिबाफ ने US कर्ज पर दिया नया फॉर्मूला

अमेरिका ने शुरू की ईरान के आखिरी तेल बैरल की उलटी गिनती, गालिबाफ ने US कर्ज पर दिया नया फॉर्मूला

अमेरिका पर ग़ालिबाफ़ का ताज़ा गणितीय तंज इंजीनियरिंग के सिद्धांतों पर आधारित है, जिसके अनुसार किसी ढांचे पर पड़ने वाला तनाव, उस पर लदे भार और उसे सहारा देने वाली मज़बूती का अनुपात होता है. यह एक जवाबी प्रतिक्रिया भी है.

Text Size:

नई दिल्ली: कई दुश्मन देश मिसाइल या प्रतिबंधों से अमेरिका को धमकाते रहते हैं; लेकिन ईरान की संसद के स्पीकर और तेहरान के मुख्य वार्ताकार मोहम्मद बग़र ग़ालिबाफ़ ने वॉशिंगटन के लिए बेचैनी की एक अनोखी वजह बताई है: बीजगणित (algebra).

पिछले महीने, ‘दिप्रिंट’ ने उनके पेश किए गए शुरुआती समीकरण का विश्लेषण किया था: फेडरल रिजर्व द्वारा तीन साल में पहली बार ब्याज दरें बढ़ाने के साथ ही, ग़ालिबाफ़ ने ‘टेलर रूल’ (एक ऐसा फॉर्मूला जिस पर केंद्रीय बैंकर तीन दशकों से ज़्यादा समय से भरोसा करते आ रहे हैं) में बदलाव किया. उन्होंने इसमें होर्मुज जलडमरूमध्य  और बाब अल-मंदेब से जुड़े कुछ पहलू जोड़े. इस बदलाव से यह बात सामने आई कि ब्याज दर में किसी भी बदलाव से शिपिंग लेन (जहाजों के रास्ते) को फिर से नहीं खोला जा सकता. हालांकि मुझे लगा कि यह एक मज़ाक था, लेकिन यह ठोस आर्थिक सिद्धांतों पर आधारित था.

दिप्रिंट के मैक्रोइकॉनॉमिक विश्लेषण भी करते हैं, ने एक और समीकरण पेश किया है, और इस बार उनका निशाना अमेरिकी ट्रेजरी है. 30 सितंबर की शाम को, उन्होंने एक बॉन्ड ट्रेडर के नोट्स की तरह संक्षिप्त शैली में “हाउस पर तनाव का रास्ता” (Trajectory of Stress on the House) नाम से एक जानकारी साझा की. इस फॉर्मूले में अमेरिका के कर्ज और उसे संभालने की उसकी क्षमता की तुलना की गई, इसमें ईरान के प्रभाव को भी शामिल किया गया, और अंत में एक असमानता दिखाई गई जो उल्टी गिनती जैसी थी: तनाव का मौजूदा स्तर नवंबर के लिए अनुमानित स्तर से कम है, और नवंबर का स्तर 2027 के लिए अनुमानित स्तर से कम है.

जहां पहला समीकरण गंभीर आर्थिक आधार वाला एक मज़ाक था, वहीं दूसरा समीकरण एक ज़्यादा चिंताजनक भविष्यवाणी है. यह एक जवाब भी था. तीन दिन पहले, ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने फॉक्स न्यूज़ को बताया था कि ईरान का लगभग 15 मिलियन बैरल तेल समुद्र में है, और दो हफ़्तों के भीतर, जब आखिरी खेप चीन पहुँच जाएगी, तो ईरान के पास व्यापार के लिए कोई तेल नहीं बचेगा. बेसेंट असल में ईरान के तेल भंडार के समय का हिसाब लगा रहे थे, और ग़ालिबाफ़ ने अमेरिका के कर्ज पर केंद्रित एक टाइमलाइन पेश करके इसका जवाब दिया.

समीकरण को समझना

यह फॉर्मूला इंजीनियरिंग के सिद्धांतों पर आधारित है, जहां किसी ढांचे पर तनाव का मतलब है उस पर पड़ने वाला भार और उसे सहारा देने वाली ताकत का अनुपात. अमेरिका की आर्थिक स्थिति के संदर्भ में, “वज़न” का मतलब उसके कर्ज़ से है: इसमें मैच्योर हो चुके ट्रेज़री बॉन्ड (जिनके लिए रीफाइनेंसिंग की ज़रूरत है) और घाटे को पूरा करने के लिए नया कर्ज़ शामिल है, और इस पूरे ढांचे को रीफाइनेंस करने के लिए मौजूदा ब्याज दर से गुणा किया जाता है. यह कॉन्सेप्ट ईरान के लिए नया नहीं है. कांग्रेसनल बजट ऑफिस का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026 में ब्याज भुगतान 1,039 बिलियन डॉलर होगा, जबकि ट्रेज़री अभी हर दिन औसतन 2.8 बिलियन डॉलर ब्याज के तौर पर दे रही है. ग़ालिबाफ़ का खास शब्द, “यील्ड वेलोसिटी” (यील्ड में बदलाव की रफ़्तार), अहम है क्योंकि बॉन्ड मार्केट में, यील्ड में बदलाव की रफ़्तार ही—न कि उनकी मात्रा—लेवरेज्ड निवेशकों को नुकसान पहुंचाती है और व्यवस्थित बिकवाली को बाज़ार की भारी गिरावट में बदल देती है.

यील्ड तेज़ी से बढ़ रही है. सितंबर के मध्य में, 10-वर्षीय ट्रेज़री यील्ड बढ़कर 5.04 प्रतिशत हो गई, जो जुलाई 2007 के बाद सबसे ज़्यादा है, और हाल ही में यह 5.34 प्रतिशत से ऊपर चली गई, जो 2002 के बाद से नहीं देखा गया था. दूसरी ओर, इस कर्ज़ को संभालने की “क्षमता” कम हो रही है. फ़ेडरल रिज़र्व के पास दखल देने की सीमित क्षमता है; उसने 16 सितंबर को सर्वसम्मति से अपनी टारगेट रेंज को 3.75 से 4 प्रतिशत तक बढ़ाने के लिए वोट किया, जो जुलाई 2023 के बाद पहली बढ़ोतरी थी. “फ़ेड पार्किंग लॉट” —एक ऐसी सुविधा जहां मनी मार्केट फंड पहले सेंट्रल बैंक में बेकार पड़ा कैश जमा करते थे, जो नए ट्रेज़री बिल खरीद सकता था—काफ़ी कम हो गया है. इसके अलावा, विदेशी मांग में कमी और रेगुलेटरी बैलेंस शीट की सीमाओं से बंधे बैंकों के कारण खरीदारों की संख्या और कम हो जाती है, जबकि कर्ज़ की सप्लाई बढ़ती है. गौरतलब है कि ग़ालिबाफ़ ने “ग्रोथ” (विकास) पर सवाल उठाया—जो अमेरिका के आर्थिक हिसाब-किताब को ठीक करने वाला एकमात्र कारक है—और हालिया डेटा उनकी सावधानी को सही ठहराते हैं: सितंबर में पेरोल में केवल 29,000 की बढ़ोतरी हुई, जो सभी अनुमानों से कम थी, जबकि बेरोज़गारी बढ़कर 4.2 प्रतिशत हो गई.

इसके बाद, “ईरान लीवर्स” (ईरान के हथियार) सामने आते हैं: एनर्जी, बॉन्ड और फ़ेडरल रिज़र्व. यह अगला हिस्सा उस कहानी को पूरा करता है जो पहले समीकरण से शुरू हुई थी. स्ट्रेट्स टेलर रूल का निशाना सेंट्रल बैंक था; यह समीकरण राजकोष को लक्षित करता है, जो सामूहिक रूप से एक विकट परिस्थिति को दर्शाता है: तेल संकट फेडरल रिजर्व को ब्याज दरें बढ़ाने के लिए विवश करता है, और प्रत्येक दर वृद्धि अमेरिका के खरबों डॉलर के ब्याज बोझ को और भी बदतर बना देती है. अर्थशास्त्रियों के पास इस स्थिति के चरम बिंदु के लिए एक शब्द है. अपने 1981 के शोधपत्र “सम अनप्लीजेंट मॉनेटारिस्ट एरिथमेटिक” में, थॉमस सार्जेंट और नील वालेस ने प्रदर्शित किया कि जब सरकारी ऋण पर्याप्त रूप से बड़ा हो जाता है, तो केंद्रीय बैंक अपनी स्वायत्तता खो देता है, क्योंकि महंगाई से निपटना राजकोष के लिए अत्यधिक महंगा हो जाता है. उन्होंने इसे राजकोषीय प्रभुत्व नाम दिया, और ग़ालिबफ़ के दोनों समीकरण, जब एक साथ देखे जाते हैं, तो एक बाहरी दृष्टिकोण से इस स्थिति को और भी तीव्र करने का प्रयास प्रस्तुत करते हैं.

किसका ‘हाउस’?

“हाउस” शब्द को समझने के लिए सितंबर की शुरुआत में वापस जाना होगा, जब बेसेंट ने सदर्न मेथोडिस्ट यूनिवर्सिटी में लोगों को संबोधित करते हुए कहा था, “अब ‘हाउस’ मैं हूँ”, और ट्रेडर्स को येन पर उनके खिलाफ दांव लगाने की चुनौती दी थी. घलीबाफ़ ने इस बयान पर ध्यान दिया. 24 सितंबर को, जब यील्ड 5 प्रतिशत से ऊपर चली गई, तो उन्होंने नई उधारी लागतों के लिए अमेरिका की तारीफ की और कहा कि यह “दो साल बाद का निचला स्तर” है. “दो साल बाद” का मतलब 2027 से है, जो उनकी असमानता के खत्म होने का समय है.

यह अभियान बहुत पहले शुरू हो गया था, और इसका आगे बढ़ना इस कहानी का सबसे खास हिस्सा है. जून 2025 में, ब्रासीलिया में ब्रिक्स (BRICS) संसदीय मंच पर, घलीबाफ़ ने अभी भी डी-डॉलरलाइज़ेशन (de-dollarisation) की वकालत की और प्रतिबंधों के खिलाफ उपाय के तौर पर राष्ट्रीय मुद्राओं, डिजिटल एसेट्स और सहयोगी बैंकिंग प्लेटफॉर्म को बढ़ावा दिया. हालाँकि, युद्ध शुरू होने के कुछ ही हफ्तों के भीतर, उनके बयानों का लहजा पूरी तरह बदल गया. मार्च के आखिर तक, वह लोगों को ट्रंप की घोषणाओं को एक ‘कॉन्ट्रेरियन इंडिकेटर’ (उलटा संकेत) के तौर पर समझने की सलाह दे रहे थे, और कह रहे थे, “अगर वे इसे बढ़ाते हैं, तो इसे शॉर्ट करो,” जिस पर ‘आयरिश टाइम्स’ ने टिप्पणी की कि वह किसी धार्मिक नेता के बजाय मैक्रोइकॉनॉमिक न्यूज़लेटर जैसे लग रहे थे. अप्रैल में, उन्होंने होर्मुज संकट के दौरान ट्रेजरी में हेजिंग (hedging) को “कागज पर काम करने वाला ताश का घर” कहकर खारिज कर दिया, और सितंबर के मध्य तक, वह नारों से हटकर गणितीय समीकरणों पर आ गए थे.

दो घड़ियां, एक सवाल

क्या उनका आकलन सही है? आंशिक रूप से, लेकिन वह उसी बात का गलत मतलब निकालते हैं जिसे वह सबसे ज्यादा मनवाना चाहते हैं. अमेरिका के कर्ज के हालात पर उनका विश्लेषण कई अमेरिकी अर्थशास्त्रियों की राय से मेल खाता है, और तेल के झटके ने निस्संदेह फेडरल रिजर्व को सख्त मौद्रिक नीतियां लागू करने के लिए मजबूत किया है. हालाँकि, उनकी व्याख्या इस स्थिति में ईरान की भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर बताती है. बाजार यील्ड में बढ़ोतरी का कारण फेडरल रिजर्व द्वारा सख्ती की उम्मीद, मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष, अमेरिका के राजकोषीय और कर्ज के हालात को लेकर चिंता और मजबूत आर्थिक आंकड़ों का मिला-जुला असर मानता है. अमेरिका की राजकोषीय चुनौतियां पहला टैंकर रोके जाने से बहुत पहले से ही गंभीर थीं. ईरान उस बोझ को और बढ़ा रहा है जिसे वाशिंगटन ने खड़ा किया था, न कि तेहरान ने. इसके अलावा, ग़ालिबाफ़ की अपनी स्थिति काफ़ी ज़्यादा नाज़ुक है. अगस्त में, उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर ईरान की आबादी भुखमरी का सामना करती है तो देश टिक नहीं पाएगा. इस बात पर कट्टरपंथियों ने उनकी आलोचना की; उनका तर्क था कि ऐसी कमज़ोरी को स्वीकार करने से अमेरिका का दबाव और बढ़ेगा. आँकड़े उनकी चिंता को सही ठहराते हैं: जुलाई में ईरान की 12 महीने की महंगाई दर 66 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, और खाने-पीने की चीज़ों की कीमतें पिछले साल के मुक़ाबले 128 प्रतिशत बढ़ गईं. बेसेंट ईरान के टिके रहने की क्षमता को हफ़्तों में आंकते हैं, जबकि ग़ालिबाफ़ अमेरिका की क्षमता को सालों में; दोनों एक-दूसरे की कमज़ोरियों को तो उजागर करते हैं, लेकिन अपनी कमज़ोरियों पर साफ़ तौर पर चुप रहते हैं.

इस स्थिति को सबसे बेहतर ढंग से समझाने वाले विचारक कोई मैक्रो-इकोनॉमिस्ट नहीं, बल्कि जीवविज्ञानी जॉन मेनार्ड स्मिथ हैं. ‘वॉर ऑफ़ एट्रिशन’ (लंबे संघर्ष से थकाकर हराने की लड़ाई) पर आधारित उनके 1974 के मॉडल से पता चला कि सहनशक्ति की प्रतियोगिता में जीत मज़बूत प्रतिभागी की नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की होती है जो लंबे समय तक संघर्ष की कीमत चुका सकता है. ग़ालिबाफ़ की रणनीति इस बात पर टिकी है कि अमेरिका का राजनीतिक संकल्प—जिसकी परीक्षा नवंबर में वोटिंग और फिर 2027 में डेट सीलिंग (कर्ज़ की सीमा) के ज़रिए होगी—ईरान की आर्थिक सहनशक्ति के जवाब देने से पहले ही कमज़ोर पड़ जाएगा. बेसेंट की रणनीति ठीक इसके उलट है.

कैसीनो से वाकिफ़ हर जुआरी यह बुनियादी नियम जानता है कि जीत हमेशा ‘हाउस’ (कैसीनो चलाने वाले) की ही होती है. हालांकि, बहुत कम लोगों को वह छिपी हुई शर्त याद रहती है: ‘हाउस’ तभी जीतता है जब तक सभी प्रतिभागियों को यह भरोसा हो कि वह अपनी ज़िम्मेदारियां पूरी कर सकता है. बेसेंट ने दावा किया है कि वह ‘हाउस’ का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि ग़ालिबाफ़ ने पिछले सात महीने दूसरों को अपनी स्थिति पर फिर से विचार करने के लिए मनाने में बिताए हैं. चाहे जो भी समय-सीमा पहले पूरी हो, दुनिया ने एक ऐसा सबक सीखा है जिसे वह आसानी से नहीं भूलेगी: इस सदी में, किसी ‘चोकपॉइंट’ (अहम रास्ते) के अवरुद्ध होने पर जो चीज़ सबसे ज़्यादा खतरे में पड़ सकती है, वह शायद तेल नहीं, बल्कि भरोसा है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: गांधीवादी छवि के पीछे भारत हमेशा ‘हार्ड स्टेट’ रहा, नेहरू से मोदी तक इसे और मजबूती मिली


 

share & View comments