नयी दिल्ली, 29 मई (भाषा) पिछले एक दशक में बुनियादी ढांचा विकास में लगभग 360 अरब डॉलर के निवेश से भारत की लॉजिस्टिक लागत घटकर वित्त वर्ष 2025-26 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 10-10.7 प्रतिशत पर आ गई है, जो एक दशक पहले 13-14 प्रतिशत थी। उद्योग मंडल सीआईआई और रियल एस्टेट परामर्श कंपनी नाइट फ्रैंक की शुक्रवार को जारी एक संयुक्त रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई।
रिपोर्ट में कहा गया कि लॉजिस्टिक दक्षता को अगले स्तर पर ले जाने के लिए भारत को और अधिक ‘मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक पार्क’ (एमएमएलपी) की आवश्यकता होगी।
‘फास्ट-ट्रैकिंग एमएमएलपी टू इनेबल मोडल शिफ्ट: इंडियाज मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक ट्रांसफॉर्मेशन: ए स्ट्रैटेजिक आउटलुक’ शीर्षक वाली इस रिपोर्ट के अनुसार, इस प्रगति को दर्शाते हुए वैश्विक लॉजिस्टिक प्रदर्शन सूचकांक (एलपीआई) में भारत की रैंकिंग 2014 में 54वें स्थान से सुधरकर 2023 में 38वें स्थान पर पहुंच गई।
इसमें कहा गया कि इन निरंतर प्रयासों के परिणामस्वरूप देश के लॉजिस्टिक तंत्र में काफी सुधार हुआ है, जिससे संपर्क सुविधा, व्यापार सुगमता और आपूर्ति श्रृंखला प्रदर्शन बेहतर हुआ है।
हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि इन सुधारों के बावजूद भारत की लॉजिस्टिक आपूर्ति श्रृंखला को अभी भी पूरी तरह से कुशल बनाना बाकी है।
इसके अनुसार, भारत की लॉजिस्टिक दक्षता बढ़ाने में एमएमएलपी की मुख्य भूमिका है और 2047 तक माल परिवहन के तौर-तरीकों में बदलाव के लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश को 216 एमएमएलपी की जरूरत होगी। प्रत्येक एमएमएलपी की औसत क्षमता 16-17 एमएमटी प्रति वर्ष होनी चाहिए।
रिपोर्ट में कहा गया कि माल ढुलाई के लिए सड़क परिवहन पर अत्यधिक निर्भरता, एकीकृत एमएमएलपी के विकास में देरी और प्रथम एवं अंतिम चरण की अपर्याप्त संपर्क सुविधा अब भी रेल तथा अन्य अधिक दक्ष परिवहन माध्यमों की ओर माल परिवहन के बदलाव में बाधा बनी हुई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, “मुख्य चुनौती अब बुनियादी ढांचे की कमी नहीं, बल्कि संपर्क केंद्रों की कमी है। एमएमएलपी वह महत्वपूर्ण कड़ी हैं, जो रेल परिवहन की लागत संबंधी बढ़त को एक स्थान से अंतिम गंतव्य तक प्रतिस्पर्धात्मकता में बदल सकती हैं।”
भाषा योगेश रमण
रमण
यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.