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Friday, 29 May, 2026
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भारतीय अदालतों ने पीरियड्स में बुनियादी ढांचे के लिए कैसे तैयार किया संवैधानिक आधार

सुप्रीम कोर्ट ने इस हफ़्ते केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह जनवरी के उस आदेश के पालन पर हर तीन महीने में प्रोग्रेस रिपोर्ट जमा करे, जिसमें स्कूलों में मासिक धर्म से जुड़ी साफ़-सफ़ाई की सुविधाओं को ज़रूरी बनाया गया था.

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को फिर दोहराया कि स्कूलों में मासिक धर्म (पीरियड्स) स्वच्छता सुविधाओं की कमी के कारण युवा लड़कियों की शिक्षा प्रभावित नहीं होनी चाहिए. साथ ही कोर्ट ने केंद्र सरकार को हर तीन महीने में प्रगति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया, जिसमें यह बताया जाए कि जनवरी के फैसले को लागू करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं. इस फैसले में मासिक धर्म स्वच्छता को मौलिक अधिकार माना गया था.

कोर्ट जनवरी के डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत सरकार मामले के फैसले के पालन की निगरानी कर रहा था, जिसमें कहा गया था कि मासिक धर्म स्वच्छता संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत समानता और जीवन के मौलिक अधिकार का हिस्सा है.

30 जनवरी का यह फैसला 2022 में सामाजिक कार्यकर्ता जया ठाकुर द्वारा दायर जनहित याचिका पर आया था. इसमें केंद्र और राज्य सरकारों से मांग की गई थी कि कक्षा 6 से 12 तक की छात्राओं को मुफ्त सैनिटरी नैपकिन दिए जाएं और सभी सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और आवासीय स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय सुनिश्चित किए जाएं.

याचिका में कहा गया था कि स्कूलों में मासिक धर्म स्वच्छता सुविधाओं की कमी से लड़कियों की अनुपस्थिति बढ़ती है और स्कूल छोड़ने की दर भी ज्यादा होती है. इसके बाद कोर्ट ने पूरे देश के स्कूलों में सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध कराने और लड़कियों के लिए अलग शौचालय सुनिश्चित करने के व्यापक निर्देश दिए. साथ ही कोर्ट ने कहा कि मासिक धर्म कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे फुसफुसाहट में साझा किया जाए, और इसके खिलाफ जागरूकता अभियान चलाने का आदेश दिया ताकि इससे जुड़ी शर्म दूर हो सके.

सोमवार को कोर्ट ने अपना फैसला अमेरिकी शिक्षिका मेलिसा बर्टन के एक कथन से शुरू किया. “एक पीरियड को वाक्य खत्म करना चाहिए, न कि किसी लड़की की शिक्षा को.”

कोर्ट ने कहा. “इसका अच्छा उपयोग करें. यह देश की महिलाओं और लड़कियों के भले के लिए है. लड़कियों को सिर्फ इस वजह से शिक्षा नहीं छोड़नी चाहिए और घर बैठकर घरेलू काम नहीं करना चाहिए.” जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की बेंच ने केंद्र सरकार से कहा कि वह सुनिश्चित करे कि मासिक धर्म स्वच्छता पर दिए गए निर्देश पूरे देश में लागू हो रहे हैं.

कोर्ट ने लड़की-बच्चे के सम्मान और शिक्षा के अधिकार पर जोर देते हुए कहा. “सुरक्षित और स्वच्छ मासिक धर्म प्रबंधन उपायों की कमी सम्मानजनक जीवन को कमजोर करती है क्योंकि इससे किशोर छात्राओं को या तो स्कूल छोड़ना पड़ता है या असुरक्षित तरीके अपनाने पड़ते हैं, या दोनों, जिससे मासिक धर्म वाली लड़कियों की शारीरिक स्वतंत्रता का उल्लंघन होता है.”

फंडामेंटल राइट

मासिक धर्म स्वास्थ्य के अधिकार की न्यायिक यात्रा सिर्फ सैनिटरी नैपकिन से शुरू नहीं हुई थी, बल्कि मौलिक अधिकारों की व्यापक व्याख्या से शुरू हुई थी.

2017 में के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत सरकार मामले में निजता और निर्णय लेने की स्वतंत्रता को मौलिक अधिकार माना गया. एक साल बाद 2018 के कॉमन कॉज बनाम भारत सरकार मामले में गरिमा को संवैधानिक जीवन का केंद्र माना गया.

पुट्टस्वामी और कॉमन कॉज इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इन्हीं ने वह संवैधानिक भाषा दी जिससे मासिक धर्म स्वास्थ्य का फैसला जुड़ा. इनके जरिए कोर्ट ने मासिक धर्म स्वच्छता को सिर्फ सार्वजनिक स्वास्थ्य या कल्याण का मुद्दा नहीं, बल्कि निजता, गरिमा और स्वतंत्रता का मुद्दा माना.

2018 का इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य मामला, जिसे सबरीमाला मामला कहा जाता है, महिलाओं और गरिमा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण फैसला था. कोर्ट ने मासिक धर्म आयु की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकने को भेदभावपूर्ण और संवैधानिक नैतिकता के खिलाफ माना.

हालांकि सबरीमाला फैसला अभी पुनर्विचार में है, लेकिन इसने महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े कानून में एक महत्वपूर्ण आधार दिया. बहुमत के फैसले में कहा गया कि मासिक धर्म एक जैविक प्रक्रिया है और महिला की पहचान का हिस्सा है, और इसे धार्मिक प्रथाओं से बाहर करने का आधार नहीं बनाया जा सकता.

तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने अनुच्छेद 17 का हवाला दिया, जो छुआछूत पर रोक लगाता है, और कहा कि मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं को बाहर करना संवैधानिक रूप से सही नहीं है. इस मामले में एकमात्र असहमति का फैसला जस्टिस इंदु मल्होत्रा का था, जो उस बेंच की एकमात्र महिला जज थीं, और उन्होंने धार्मिक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप का विरोध किया.

हालांकि मासिक धर्म उत्पादों पर पहला बड़ा न्यायिक मामला एक कर विवाद था. 2017 में जीएसटी लागू होने पर सैनिटरी नैपकिन को 12 प्रतिशत स्लैब में रखा गया था, जैसे मोबाइल फोन और चमड़े के सामान. दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई कि यह महिलाओं की गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार के खिलाफ है.

इसी तरह की एक याचिका बॉम्बे हाई कोर्ट में भी दायर हुई. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की ट्रांसफर याचिका पर दोनों हाई कोर्ट की कार्यवाही रोक दी.

बाद में यह मामला अपने आप खत्म हो गया. 2018 में जीएसटी काउंसिल ने सैनिटरी नैपकिन पर पूरी तरह टैक्स हटा दिया और इसे शून्य कर दिया.

इस मामले में याचिकाएं समाप्त हो गईं, लेकिन इससे यह शुरुआती न्यायिक बहस शुरू हुई कि मासिक धर्म उत्पाद स्वास्थ्य जरूरत हैं या टैक्स योग्य वस्तु.

हालांकि कोर्ट ने मासिक धर्म अवकाश पर अलग रुख अपनाया है. मार्च 2026 के एक जनहित मामले में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि पूरे देश में मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य नहीं किया जा सकता.

कोर्ट ने कहा कि ऐसा नियम महिलाओं के रोजगार पर असर डाल सकता है क्योंकि नियोक्ता महिलाओं को बोझ समझ सकते हैं. इसलिए यह मामला नीति निर्माताओं पर छोड़ना चाहिए, न कि कोर्ट को इसे राष्ट्रीय आदेश बनाना चाहिए.

न्यायिक यात्रा यह दिखाती है कि सुप्रीम कोर्ट मासिक धर्म से जुड़ी शर्म को खत्म करने से आगे बढ़कर इसे जीवन और शिक्षा के अधिकार का हिस्सा मानने तक पहुंच गया है.

लेकिन साथ ही कोर्ट का मासिक धर्म अवकाश को अनिवार्य न करना यह दिखाता है कि कुछ नीतिगत मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा भी होती है.

मासिक धर्म स्वास्थ्य का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक आने से पहले 2020 में गुजरात हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका ने न्यायपालिका को इस मुद्दे की सामाजिक और धार्मिक शर्म से सामना कराया था.

इस मामले में भुज स्थित श्री सहजानंद गर्ल्स इंस्टिट्यूट की 60 से ज्यादा छात्राओं से कथित रूप से अंडरगारमेंट्स उतरवाए गए थे ताकि यह साबित किया जा सके कि वे मासिक धर्म में नहीं हैं, क्योंकि परिसर में खून लगे सैनिटरी नैपकिन मिला था.

यह घटना हॉस्टल के उन नियमों से जुड़ी थी जिनमें मासिक धर्म वाली छात्राओं को डाइनिंग हॉल, बिस्तर, रसोई और पूजा स्थानों में जाने से रोका जाता था और उन्हें तीन दिन अलग रहना होता था.

जस्टिस पारदीवाला ने इस मामले में गुजरात हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच का आदेश लिखा था. वे अब 2026 में सुप्रीम कोर्ट की उस बेंच का हिस्सा हैं जो जया ठाकुर मामले में निगरानी कर रही है.

2020 के गुजरात हाई कोर्ट आदेश में व्यापक निर्देश दिए गए थे, जिसमें मासिक धर्म के आधार पर सामाजिक बहिष्कार को रोकने, जागरूकता अभियान चलाने, स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षित करने और लागू करने के लिए फंड देने की बात थी.

कोर्ट की वर्तमान मामले में निगरानी जरूरी है क्योंकि असली चुनौती लागू करने की है. सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार तो माना है, लेकिन इसका संरक्षण इस पर निर्भर करता है कि स्कूल इसे लागू करें ताकि लड़कियों की शिक्षा बिना बाधा जारी रह सके.

सौम्या शर्मा दिप्रिंट स्कूल ऑफ़ जर्नलिज़्म की एल्युमनाई हैं, और अभी दिप्रिंट के साथ इंटर्नशिप कर रही हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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