नई दिल्ली: दिल्ली में 10 साल के मोहम्मद नाजिम की एक खुले और बिना सुरक्षा वाले सीवर के गड्ढे में गिरने से मौत हो गई थी. इस घटना के 12 साल बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार और दिल्ली जल बोर्ड (DJB) को उसके माता-पिता को 16.9 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है. इसके साथ 9 प्रतिशत ब्याज भी देना होगा.
सितंबर 2014 में नाजिम को जीटीबी अस्पताल लाया गया था, जहां उसे मृत घोषित कर दिया गया. इसके बाद उसके माता-पिता, जिनमें पिता 15,000 रुपये महीने कमाने वाले कॉन्ट्रैक्ट पेंटर हैं और मां गृहिणी हैं, ने कई साल तक सरकारी एजेंसियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी. इन एजेंसियों ने अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की.
दिल्ली हाई कोर्ट ने 2019 में दायर याचिका पर फैसला सुनाते हुए कहा कि दिल्ली जल बोर्ड (DJB), इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड (EIL) और निजी ठेकेदार M/s DSCL-Fengshun-Wabag Consortium ने कई साल तक एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालने का खेल खेला.
हाई कोर्ट में तीनों पक्षों ने कहा कि नाजिम “शरारती” था, घटना वाली जगह “निजी संपत्ति” थी और वहां लगे सुरक्षा ढक्कन स्थानीय लोगों ने चुरा लिए थे. लेकिन अदालत ने इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया और ‘रेस इप्सा लोक्विटर’ (Res Ipsa Loquitur) सिद्धांत लागू किया, जिसका मतलब है कि घटना खुद ही लापरवाही साबित करती है.
जस्टिस मिनी पुष्कर्णा ने कहा कि रिहायशी इलाके में खुला और बिना सुरक्षा वाला गड्ढा होना अपने आप में लापरवाही का पक्का सबूत है.
अदालत ने यह भी कहा कि इतने वर्षों बाद भी संबंधित अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट के 2010 के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया. इन दिशा-निर्देशों में संबंधित अधिकारियों को लिखित सूचना देना, ड्रिलिंग एजेंसियों का अनिवार्य पंजीकरण और सभी खतरनाक कुओं व गड्ढों पर कंक्रीट का प्लेटफॉर्म और स्टील प्लेट से ढक्कन लगाना जरूरी बताया गया था.
अदालत ने 2011 के गोपालपुर विक्टिम एसोसिएशन मामले का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि उस क्षेत्र में किसी के प्रवेश को रोकना दिल्ली जल बोर्ड की जिम्मेदारी थी.
हाई कोर्ट ने 2007 के किशन लाल और 2012 के सत्तार शेख मामलों का भी हवाला दिया. अदालत ने कहा कि बच्चों को लापरवाही का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. साथ ही उस दलील को भी खारिज कर दिया कि पीड़ित खुद खुले मैनहोल वाली जगह पर चला गया था.
परोक्ष जिम्मेदारी
दिल्ली हाई कोर्ट की जस्टिस मिनी पुष्कर्णा ने इस मामले में संबंधित अधिकारियों की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि यह ऐसा मामला है जिसमें सरकारी एजेंसियों ने एक बच्चे की मौत के प्रति पूरी तरह लापरवाही दिखाई.
अदालत ने कहा कि सभी पक्ष उस परियोजना में सक्रिय रूप से शामिल थे, जिसके तहत उस इलाके में काम चल रहा था जहां यह हादसा हुआ.
हाई कोर्ट ने कहा कि काम के संचालन और क्रियान्वयन में दिल्ली जल बोर्ड और अन्य एजेंसियों की सक्रिय भूमिका थी. इसलिए इस मामले में “परोक्ष जिम्मेदारी” (Vicarious Liability) साफ तौर पर बनती है और अगर लापरवाही साबित होती है तो कोई भी एजेंसी खुद को जिम्मेदारी से अलग नहीं कर सकती.
अपने अंतिम फैसले में हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार और दिल्ली जल बोर्ड को नाजिम के माता-पिता को 16,92,511.60 रुपये मुआवजा और उस पर 9 प्रतिशत ब्याज देने का आदेश दिया.
अदालत ने कहा कि जब सरकारी लापरवाही से संविधान के अनुच्छेद 21 यानी जीवन के अधिकार का उल्लंघन होता है, तो उसका समाधान तुरंत उपलब्ध होना चाहिए, खासकर समाज के गरीब लोगों के लिए.
अदालत ने कहा कि अलग-अलग सरकारी एजेंसियों द्वारा एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालने की कोशिश नागरिक प्रशासन की व्यवस्था के पूरी तरह विफल होने का संकेत है.
अदालत ने कहा कि मुआवजा कुछ राहत जरूर देता है, लेकिन यह फैसला सरकार के लिए एक बड़ा संदेश भी है. अदालत ने चेतावनी दी कि एक कल्याणकारी राज्य गरीब किसानों या मजदूरों की कीमत पर खुद को समृद्ध नहीं बना सकता.
फैसले में कहा गया कि इस परिवार ने जो दर्द, मानसिक आघात और आर्थिक परेशानी झेली है, उसे सिर्फ कानूनी समयसीमा से नहीं आंका जा सकता. इसलिए अदालत ने मामले में 12 साल की देरी को लेकर सरकार की तकनीकी आपत्तियां भी खारिज कर दीं.
सीवर से होने वाली मौतें
नाजिम की मौत अकेली घटना नहीं है. खराब और असुरक्षित सीवर व्यवस्था लोगों की जान के लिए लगातार खतरा बनी हुई है. हालांकि नाजिम कोई सफाई कर्मचारी नहीं था जिसकी सीवर या सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान मौत हुई हो, लेकिन उसकी मौत भी इसी तरह की लापरवाही और खतरनाक सीवर ढांचे के कारण हुई.
हाल ही में लोकसभा में पेश किए गए आंकड़े देशभर में खतरनाक तरीके से होने वाली सीवर सफाई की गंभीर तस्वीर दिखाते हैं.
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने फरवरी 2026 में लोकसभा को बताया कि 2014 से 2025 के बीच सीवर और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई के दौरान 859 सफाई कर्मचारियों की मौत हुई. सबसे ज्यादा 131 मौतें साल 2019 में हुई थीं.
इसके अलावा 28 जुलाई 2026 को मंत्रालय ने लोकसभा में बताया कि पिछले तीन वर्षों में 166 मौतें हुई हैं.
इस सूची में महाराष्ट्र सबसे ऊपर रहा, जहां 29 लोगों की मौत हुई. इसके बाद तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में 21-21 और राजस्थान में 20 मौतें दर्ज की गईं. इसी अवधि में दिल्ली में भी 12 ऐसी मौतें हुईं.
सबसे चिंता की बात यह रही कि 166 मौतों के बावजूद सिर्फ 110 मामलों में ही एफआईआर दर्ज हुई. यानी कई परिवारों को आपराधिक जांच की शुरुआत तक नहीं मिल सकी.
मंत्रालय ने कहा कि ये मौतें तय सुरक्षा नियमों का पालन नहीं करने की वजह से हुईं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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