नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने प्रदर्शन और भीड़ को नियंत्रित करने की कार्रवाई के दौरान पुलिसकर्मियों के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरे अनिवार्य करने की मांग वाली जनहित याचिका (PIL) को केंद्र सरकार के पास प्रतिनिधित्व के तौर पर विचार करने के लिए भेजने को कहा है.
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन सांभरे की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि बॉडी-वॉर्न कैमरों के इस्तेमाल को लेकर किसी भी निर्देश के व्यापक असर पर विचार करना जरूरी है. यह मुद्दा सिर्फ दिल्ली पुलिस से जुड़ा नहीं है, बल्कि पूरे पुलिस तंत्र से जुड़ा है.
पीठ ने कहा, “हम उन्हें कानून बनाने का निर्देश क्यों दें? यह नहीं कहा जा सकता कि यह कोई ऐसा क्षेत्र है जिस पर कानून नहीं है.”
अदालत ने सवाल किया कि जब विधायिका ने पुलिस की कार्यप्रणाली को नियंत्रित करने वाले क्षेत्रों में कानूनी प्रावधान किए हैं, तो इस मामले में न्यायिक आदेश की जरूरत क्यों है.
याचिकाकर्ता चाहत राघव ने PIL दायर कर दिल्ली पुलिस और प्रदर्शन तथा भीड़ नियंत्रण में तैनात रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) के जवानों के लिए बॉडी-वॉर्न कैमरों का इस्तेमाल अनिवार्य करने की मांग की है. याचिका में कैमरों से रिकॉर्ड होने वाले वीडियो के स्टोरेज, सुरक्षित रखने की अवधि, उसकी विश्वसनीयता और सबूत के तौर पर इस्तेमाल को लेकर एक व्यापक व्यवस्था बनाने की भी मांग की गई है.
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अखिल सिब्बल ने कहा कि बॉडी-वॉर्न कैमरे प्रदर्शनों के दौरान पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ा सकते हैं. खासकर उन मामलों में जहां पुलिस की ज्यादती के आरोपों के बाद प्रदर्शनकारियों पर भी जवाबी आरोप लगाए जाते हैं.
सिब्बल ने कहा कि पुलिस कुछ स्थितियों में पहले से ही बॉडी-वॉर्न कैमरों का इस्तेमाल करती है, लेकिन यह इस्तेमाल सीमित और कभी-कभार ही होता है. उन्होंने कहा कि रैलियों और प्रदर्शनों को लेकर दिल्ली पुलिस के 2022 के स्थायी आदेश में बॉडी-वॉर्न कैमरों का विशेष प्रावधान नहीं है और इसके लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल की जरूरत है.
याचिकाकर्ता ने ट्रैफिक पुलिस द्वारा ऐसी तकनीक के इस्तेमाल और बॉडी-वॉर्न कैमरों की खरीद के लिए जारी टेंडर का भी हवाला दिया. उनका कहना है कि यह तकनीक पहले से उपलब्ध है और अधिकारी इसका इस्तेमाल कर सकते हैं.
हालांकि, अदालत ने न्यायिक हस्तक्षेप की जरूरत पर सवाल उठाया और पूछा कि क्या इस मुद्दे को कार्यपालिका या विधायिका के स्तर पर नहीं सुलझाया जाना चाहिए.
केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट के PIL नियमों के तहत याचिकाकर्ता को पहले संबंधित अधिकारियों के सामने अपना प्रतिनिधित्व देना जरूरी है. उन्होंने कहा कि मौजूदा याचिका को इसी तरह के प्रतिनिधित्व के तौर पर माना जा सकता है.
शर्मा ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों से जुड़े एक मामले में अधिकारियों को SOP बनाने का निर्देश दिया था और मौजूदा व्यवस्था में प्रदर्शन की वीडियोग्राफी का प्रावधान पहले से मौजूद है.
सिब्बल ने इस दलील का विरोध किया. उन्होंने कहा कि मौजूदा वीडियोग्राफी व्यवस्था इस मुद्दे को पूरी तरह से हल नहीं करती. दिल्ली पुलिस के स्थायी आदेश में जिस रिकॉर्डिंग की बात है, वह भीड़ नियंत्रण में सीधे शामिल पुलिसकर्मियों द्वारा पहने जाने वाले बॉडी-वॉर्न कैमरों से अलग है.
अदालत ने आखिरकार ASG के बयान को रिकॉर्ड किया और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे छह महीने के भीतर बॉडी-वॉर्न कैमरों के इस्तेमाल को लेकर SOP बनाने पर अपना फैसला बताएं.
अदालत ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता भी दी कि अगर इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं होती है तो वह दोबारा हाई कोर्ट का रुख कर सकता है.
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