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Wednesday, 30 September, 2026
होमदेशउमर खालिद और शरजील इमाम को दिल्ली HC ने फिर जमानत देने से किया इनकार

उमर खालिद और शरजील इमाम को दिल्ली HC ने फिर जमानत देने से किया इनकार

हाई कोर्ट ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के जनवरी के उस आदेश से बंधा हुआ है, जिसमें JNU के दो पूर्व छात्रों की ज़मानत याचिका खारिज कर दी गई थी; ये छात्र UAPA के तहत आरोपों में छह साल से जेल में बंद हैं.

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नई दिल्ली: दिल्ली हाई कोर्ट ने बुधवार को 2020 के दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में JNU के पूर्व छात्रों उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं. कोर्ट ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के जनवरी के उस आदेश से बंधा हुआ है, जिसमें दोनों को जमानत देने से इनकार किया गया था.
जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और दिनेश भट्ट की दो जजों की बेंच ने कहा कि इस समय जमानत देना सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों में बदलाव करने जैसा होगा. सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी में कहा था कि खालिद और इमाम सुरक्षित गवाहों की गवाही दर्ज होने के बाद या उसके आदेश के एक साल बाद, जो भी पहले हो, अपनी जमानत याचिकाएं फिर से दाखिल कर सकते हैं. इनमें से कोई भी शर्त अभी पूरी नहीं हुई है.
दोनों पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत आरोप लगाए गए हैं और वे छह साल से हिरासत में हैं. यह मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के कुछ हिस्सों में हुई हिंसा से जुड़ा है. यह हिंसा नागरिकता (संशोधन) अधिनियम और प्रस्तावित राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के खिलाफ प्रदर्शनों के दौरान हुई थी. दंगों में 50 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी.
दोनों ने दलील दी कि लंबे समय से जेल में रहना और बाद में किसी दूसरे UAPA मामले में सुप्रीम कोर्ट का आया फैसला परिस्थितियों में बदलाव को दिखाता है. हालांकि, हाई कोर्ट ने कहा कि किसी दूसरी बेंच का फैसला उनके मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए खास निर्देशों को बदल नहीं सकता.

गुलफिशा फातिमा का मामला

5 जनवरी के अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के पांच दूसरे आरोपियों के लिए अलग रुख अपनाया और उन्हें जमानत दे दी. खालिद और इमाम को जमानत देने से इनकार करते हुए कोर्ट ने गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को 12 शर्तों के साथ जमानत दी.

कोर्ट ने कहा कि इन पांचों की स्थिति बाकी आरोपियों से अलग थी और यह नहीं दिखाया गया था कि निष्पक्ष सुनवाई के लिए उनका जेल में रहना जरूरी था. लेकिन खालिद और इमाम के मामले में कोर्ट ने पाया कि उनके खिलाफ मौजूद सामग्री UAPA की धारा 43D(5) के तहत जमानत पर रोक लगाती है.

फिर भी कोर्ट ने लंबे समय तक बिना मुकदमा पूरा हुए जेल में रखने को लेकर संवैधानिक चिंता को माना और खालिद और इमाम को सुरक्षित गवाहों की गवाही दर्ज होने के बाद या एक साल बाद फिर से जमानत मांगने की अनुमति दी.

खालिद के लिए बुधवार का आदेश दिल्ली हाई कोर्ट की तरफ से उनकी नियमित जमानत याचिका खारिज किए जाने का तीसरा मौका है. इससे पहले अक्टूबर 2022 और सितंबर 2025 में भी ऐसी ही याचिकाएं खारिज की गई थीं. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने दोनों आदेशों को बरकरार रखा था. इमाम की जमानत याचिका अब दूसरी बार हाई कोर्ट ने खारिज की है.

UAPA का बड़ा सवाल

यह मामला UAPA के तहत लंबे समय तक जेल में रखे जाने को लेकर चल रही बड़ी बहस के बीच आया है. हाल में अदालतों ने कई मामलों में जमानत दी है, जहां मुकदमे के कई सालों तक पूरा होने की संभावना नहीं थी. अदालतों ने संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए जल्दी सुनवाई के अधिकार को ध्यान में रखा है. अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा से जुड़ा है.

मिसाल के तौर पर, दिल्ली हाई कोर्ट ने कश्मीरी मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज और पत्रकार इरफान मेहराज को चार साल से ज्यादा समय तक हिरासत में रहने के बाद जमानत दी. दूसरी अदालतों ने भी UAPA के तहत जमानत याचिकाओं पर फैसला करते समय मुकदमों की रफ्तार को ध्यान में रखा है.

इस बहस के केंद्र में धारा 43D(5) है. इसमें जमानत के लिए कड़ी शर्त रखी गई है, जब अदालत को यह मानने के उचित आधार मिलते हैं कि आरोपी के खिलाफ लगाया गया आरोप पहली नजर में सही है. सुप्रीम कोर्ट के 2021 के केए नजीब फैसले और उसके बाद के फैसलों में भी यह बताया गया है कि कानून में जमानत पर लगाई गई पाबंदी को संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए गए अधिकार के साथ कैसे संतुलित किया जाना चाहिए.

आदित्य इदरा TPSJ के पूर्व छात्र हैं और अभी दिप्रिंट के साथ इंटर्नशिप कर रहे हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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