नयी दिल्ली, एक नवंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) वाई के सभरवाल के दो कारोबारी बेटों के खिलाफ आयकर आकलन का रास्ता साफ कर दिया है। यह मामला 2010 में दिल्ली के सिकंदरा रोड स्थित एक प्रमुख संपत्ति की खरीद के लिए धन जुटाने वाले शेयर लेनदेन से संबंधित है।
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने चेतन और नितिन सभरवाल की ओर से दायर चार अपील खारिज कर दीं। इसके साथ ही पीठ ने आकलन वर्ष 2008-09 और 2009-10 के लिए जारी आयकर पुन: आकलन नोटिस को बरकरार रखा।
न्यायमूर्ति सभरवाल ने भारत के 36वें प्रधान न्यायाधीश के रूप में एक नवंबर 2005 से 14 जनवरी 2007 तक सेवाएं दी थीं। उनका लंबा न्यायिक करियर दिल्ली उच्च न्यायालय, मुंबई उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में रहा।
शीर्ष अदालत ने कहा कि आयकर विभाग द्वारा 31 मार्च 2015 को जारी नोटिस आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 147 और 148 के तहत निर्धारित ‘विश्वास करने का आधार’ (रीजन टू बिलीव) की वैध कसौटी पर खरा उतरता है।
उच्चतम न्यायालय ने 28 अक्टूबर को दिए अपने फैसले में कहा कि महानिदेशक की जांच रिपोर्ट में आकलन अधिकारी के पास यह उचित विश्वास करने के लिए ठोस सामग्री थी कि कर योग्य आय का आकलन नहीं हो पाया है।
अक्टूबर 2007 में सभरवाल बंधुओं और दो अन्य शेयरधारकों ने पवन इम्पेक्स (प्राइवेट) लिमिटेड तथा एसवीआईआईटी सॉफ्टवेयर (प्राइवेट) लिमिटेड के शेयर जीवाईएस रियल एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड को बेचने का समझौता किया था। इन शेयरों की कीमत क्रमशः 195 करोड़ रुपये और 60 करोड़ रुपये तय की गई थी। प्रत्येक विक्रेता को बिक्री राशि में एक-चौथाई हिस्सा मिलना था। चेतन सभरवाल का आकलन वर्ष 2008-09 के लिए दिसंबर 2010 में आयकर आकलन पूरा कर लिया गया था और उनके द्वारा घोषित आय को स्वीकार कर लिया गया था।
इसके बाद आयकर विभाग की जांच में शेयरों के मूल्यांकन को लेकर सवाल उठे। विभाग ने प्रथम दृष्टया पाया कि बिक्री से प्राप्त राशि संबंधित जमीन और इमारतों की वास्तविक लागत के आधार पर उचित ठहराई जा सकने वाली कीमत से काफी अधिक थी।
भाषा अमित रंजन
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