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Sunday, 19 April, 2026
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अदालतें वादी के लिए ‘कैसीनो’ नहीं हैं: दिल्ली उच्च न्यायालय

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नयी दिल्ली, चार जुलाई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को कहा कि एक वादी के लिए अदालत कानूनी दावे के रूप में दांव लगाने के लिए कोई ‘कैसीनो’ (जुए का अड्डा) नहीं है।

अदालत ने यह भी कहा कि निष्पक्ष रहने के लिये न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी बंधी होती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि न्यायिक प्रक्रिया का मजाक बना वाले बेईमान वादी की शरारत, धोखे या धोखाधड़ी के प्रति उसकी आंखें बंद हैं।

न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी ने कहा कि अदालत गंभीर और वास्तविक दावे पेश करने का मंच है और यह बेईमान वादियों के झूठे दावों के लिए न्यायिक मंजूरी प्राप्त करने का स्थान नहीं है और जब उनकी बेईमानी पकड़ी जाए तो उन्हें अपने बेईमान दावे को वापस लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

न्यायाधीश ने कहा कि अदालत में धोखाधड़ी या कपटपूर्ण आचरण पूरी कार्यवाही को प्रभावित करता है और यदि अदालत को ऐसा लगता है कि धोखाधड़ी की जा रही है, तो उसे वादी को किसी भी तरह का लाभ नहीं लेने देना चाहिए और इस तरह के किसी भी प्रयास को शुरू में ही समाप्त कर देना चाहिए।

अदालत ने यह टिप्पणी एक मुकदमे की सुनवाई के दौरान की। इस मामले में वादी और प्रतिवादी एक संपत्ति के खरीदार और विक्रेता हैं और बिक्री के संबंध में संभावित अवैध लेनदेन को सार्थक बनाने के लिए निर्देश प्राप्त करने की कोशिश कर रहे थे। हालांकि, याचिकाकर्ता मामले में जांच से बचने के लिए अब उसे वापस लेने की अनुमति मांग रहा था।

भाषा नोमान दिलीप सुरेश

दिलीप

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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