नयी दिल्ली, दो नवंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से न केवल अवैध बिक्री को बढ़ावा मिल रहा है, बल्कि लोग उन वैध ‘हरित पटाखों’ (ग्रीन पटाखों) को भी नहीं खरीद पा रहे हैं जिनका स्थापित केंद्रों पर परीक्षण किया जा चुका है।
शीर्ष अदालत ने दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 7 और 8 नवंबर को सुबह 6 से 7 बजे तक और रात 8 से 10 बजे तक हरित पटाखे चलाने की अनुमति दी है। अदालत ने कहा कि इस मामले में उसके द्वारा पहले दिए गए निर्देशों का पालन न होना और उनका उल्लंघन किया जाना एक ‘बार-बार होने वाली समस्या’ रही है।
न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने 29 अक्टूबर के अपने आदेश में कहा, ‘‘इसलिए, इस चर्चा को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय पूर्ण प्रतिबंध को जारी रखने के बजाय एक अस्थाई अवधि के लिए हरित पटाखों के विनिर्माण, भंडारण, बिक्री और उन्हें छोड़ने पर विनियमन के पक्ष में है।’’
न्यायालय ने साफ किया कि पटाखों पर लगा पूर्ण प्रतिबंध 9 नवंबर से दोबारा लागू हो जाएगा।
पीठ ने कहा कि उसे ऐसे पर्याप्त आंकड़े नहीं दिए गए हैं जिससे यह पता चले कि 2024 में दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर लगाए गए पूर्ण प्रतिबंध से कोई फायदा हुआ है, खासकर इसलिए क्योंकि वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) में कोई सुधार नहीं देखा गया है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि भारतीय बाजार में अवैध पटाखों के आने से होने वाले नुकसान और दोनों पक्षों के हितों में संतुलन बनाने के लिए, 15 अक्टूबर 2025 को पूर्ण प्रतिबंध में ढील दी गई थी।
इस अस्थाई ढील के पीछे एक उद्देश्य यह भी था कि राज्य सरकारें पर्यावरण और स्वास्थ्य पर हरित पटाखे चलाने के सटीक असर का पता लगा सकें और अपनी रिपोर्ट न्यायालय के सामने रखें ताकि आगे का फैसला लिया जा सके। पीठ ने कहा, ‘‘दुर्भाग्य से, राज्य सरकारें इन निर्देशों का पालन करने में पूरी तरह असफल रहीं। इसके बाद, पूर्ण प्रतिबंध दोबारा लागू होने पर भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ।’’
पीठ ने कहा कि न्यायमित्र के रूप में न्यायालय की मदद कर रहे वकील द्वारा सौंपे गए एक नोट से पता चला कि पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद इस साल दशहरा और उसके अगले दिन वायु गुणवत्ता के स्तर में भारी गिरावट आयी थी।
न्यायालय ने इसे ‘चिंताजनक’ बताते हुए कहा कि पूर्ण प्रतिबंध होने के बावजूद हरित पटाखों के नाम पर पारंपरिक पटाखे बेचे गए और बेचे जा रहे हैं।
भाषा वैभव नरेश
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