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Sunday, 26 April, 2026
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केंद्र को राज्यों को अधीनस्थ के रूप में नहीं देखना चाहिए: न्यायमूर्ति नागरत्ना

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पटना, चार अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने शनिवार को केंद्र से राज्यों को “अधीनस्थ नहीं बल्कि सहयोगी” के रूप में देखने का आग्रह किया और कहा कि शक्तियों का पृथक्करण ‘समान अधिकार वाले पक्षों की एक संवैधानिक व्यवस्था’ है।

पटना के चाणक्य विधि विश्वविद्यालय में व्याख्यान देते हुए, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने “केंद्र-राज्य संबंधों” के मामले में “दलीय मतभेदों” को एक तरफ रखने का आह्वान करते हुए इस बात पर जोर दिया कि शासन इस बात पर निर्भर नहीं होना चाहिए कि “केंद्र में कौन सी पार्टी सत्ता में है और राज्य स्तर पर कौन सी पार्टी सत्ता में है”।

इस अवसर पर उच्चतम न्यायालय के साथी न्यायाधीश अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश संगम कुमार साहू, जो विश्वविद्यालय के कुलाधिपति भी हैं, और कुलपति फैजान मुस्तफा जैसे प्रख्यात न्यायविद भी उपस्थित थे।

राजेंद्र प्रसाद स्मृति व्याख्यान का विषय था ‘अधिकारों से परे संविधानवाद: संरचना क्यों मायने रखती है’।

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि संघवाद “केवल स्वायत्तता के बारे में नहीं है” बल्कि “सत्ता के अलग-अलग केंद्रों के बारे में भी है, जिनमें से प्रत्येक दूसरे के लिए संतुलन बनाने में सक्षम है। यह सुनिश्चित करता है कि शासन किसी एकतरफा आदेश का मामला नहीं है, बल्कि यह आपसी बातचीत और समन्वय का हिस्सा है।”

उन्होंने आगे कहा, “इसलिए, केंद्र और राज्य सरकारों के बीच बेहतर सहयोग की तत्काल आवश्यकता है। संविधान में दिए गए प्रावधानों को छोड़कर, राज्य सरकारें केंद्र सरकार के अधीन नहीं हैं, और इसलिए सत्ता में चाहे कोई भी राजनीतिक दल हो, उन्हें उचित सम्मान दिया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, “केंद्र-राज्य संबंधों के मामले में अंतर-दलीय मतभेदों या भिन्न राजनीतिक विचारधाराओं को दरकिनार रखना होगा, क्योंकि राज्य संवैधानिक शासन के दायरे में आता है और यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि केंद्र में कौन सी पार्टी सत्ता में है और राज्य स्तर पर कौन सी पार्टी सत्ता में है।”

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, “नागरिकों को दोनों सरकारों द्वारा शुरू की गई कल्याणकारी योजनाओं और उपायों का लाभ मिलना चाहिए। इसीलिए अक्सर कहा जाता है कि भारत का संविधान संरचना में संघीय और भावना में एकात्मक है।”

उन्होंने यह भी कहा, ‘विकास के मामलों में किसी राज्य के नागरिकों के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता… जब बात नागरिकों के लिए विकास कार्यक्रमों की हो, तो राज्यों के साथ ‘चुनिंदा रुख’ नहीं अपनाया जा सकता। निष्पक्षता के नाते, इसमें समानता का दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है।’

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने यह भी रेखांकित किया कि “एक परिपक्व संघीय व्यवस्था को अदालतों का विरोधियों के रूप में रुख करने की हड़बड़ी नहीं करनी चाहिए; उसे संवाद, बातचीत और मध्यस्थता का रास्ता अपनाना चाहिए। जब राज्य एक-दूसरे के खिलाफ या केंद्र के खिलाफ मुकदमे दायर करना शुरू करते हैं, तो यह सहकारी संघवाद की मजबूती नहीं, बल्कि कमजोरी को दर्शाता है।”

उन्होंने आगे कहा, “इसी तरह, केंद्र को राज्यों को अधीनस्थ नहीं बल्कि सहयोगी इकाई के रूप में देखना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत का संविधान संरचना में संघीय और भावना में एकात्मक कहा जाता है। फिर भी, सरकारों – केंद्र और राज्यों – के बीच शक्तियों का ऊर्ध्वाधर पृथक्करण कोई पदानुक्रम या प्राथमिकता का आधार नहीं है। यह समान शक्तियों की संवैधानिक व्यवस्था है।”

भाषा प्रशांत पवनेश

पवनेश

यह खबर ‘भाषा’ न्यूज़ एजेंसी से ‘ऑटो-फीड’ द्वारा ली गई है. इसके कंटेंट के लिए दिप्रिंट जिम्मेदार नहीं है.

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