चंडीगढ़: आठ मार्च 2025 को एक वरिष्ठ IAS अधिकारी हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (HSPCB) के पंचकूला कार्यालय में एक फाइल लेकर बैठे और एक नियम लिखा. उन्होंने लिखा कि 100 करोड़ रुपये से ज्यादा की जमा राशि किसी एक बैंक में नहीं रखी जा सकती.
तत्कालीन बोर्ड के सदस्य सचिव प्रदीप कुमार ने लिखा कि बोर्ड के आधे से ज्यादा फंड किसी एक बैंक में नहीं रखे जा सकते. उन्होंने यह भी लिखा कि IDFC First Bank को हाल ही में पैनल में शामिल किया गया था, इसलिए उसमें 50 करोड़ रुपये से ज्यादा जमा नहीं किए जा सकते.
इसके बाद उन्होंने IDFC First Bank में ठीक 50 करोड़ रुपये रखने की सिफारिश की. HSPCB के चेयरमैन विनीत गर्ग ने उसी दिन इस नोट को मंजूरी दे दी.
सात महीने बाद, इसी तरह की एक फाइल में कुमार ने 12 जुलाई 2024 के उसी वित्त विभाग के सर्कुलर का हवाला दिया. उन्होंने 100 करोड़ रुपये और 50 फीसदी की सीमा लिखी, लेकिन नए बैंक के लिए 50 करोड़ रुपये वाली शर्त गायब थी.
दो सितंबर को दाखिल की गई केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की सप्लीमेंट्री चार्जशीट इसे “सर्कुलर का चुनिंदा तरीके से इस्तेमाल करना, न कि गलती से ऐसा होना” बताती है. CBI का कहना है कि जिस व्यक्ति ने मार्च में इस शर्त को खुद लिखा था, वह अक्टूबर में इसे भूल नहीं सकता था.
उस समय तक IDFC First Bank में बोर्ड का 105 करोड़ रुपये से ज्यादा पैसा जमा हो चुका था. बाद में यह रकम बढ़कर 163.68 करोड़ रुपये हो गई, जो तय सीमा से तीन गुना से भी ज्यादा थी.
चार्जशीट में कुमार को आरोपी नंबर 26 बनाया गया है. CBI का कहना है कि हर निवेश के दौरान तुलनात्मक ब्याज दरों का चार्ट कुमार ही तैयार करते थे. आरोप है कि उन्होंने बार-बार उसी बैंक में पैसा रखने की सिफारिश की, जिसकी सीमा उन्होंने खुद फाइल में दर्ज की थी.
हालांकि, प्रदीप कुमार ने किसी व्यक्तिगत गलत काम से इनकार किया है. अग्रिम जमानत की अपनी याचिका में उन्होंने कहा कि तय सीमा से ज्यादा जमा राशि चेयरमैन के मौखिक निर्देश पर की गई थी, लेकिन CBI का कहना है कि इन जमाओं को संभव बनाने वाले उनके चार्ट और नोटिंग थे.
अधिकारी और उनका काम
हरियाणा कैडर के 2011 बैच के IAS अधिकारी कुमार राज्य सिविल सेवा से प्रमोट होकर IAS बने थे. सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, उनका जन्म 6 जून 1966 को हुआ था.
जमानत याचिका पर आई रिपोर्टों के मुताबिक, वह 31 अगस्त 2022 से 10 दिसंबर 2025 तक HSPCB के सदस्य सचिव रहे. चार्जशीट में उनकी आखिरी पोस्टिंग राज्य परिवहन निदेशक के तौर पर दर्ज है.
सदस्य सचिव बोर्ड में चेयरमैन के बाद दूसरे सबसे बड़े अधिकारी होते हैं. इस मामले में उनके पद की एक खास जिम्मेदारी थी: बोर्ड की फिक्स्ड डिपॉजिट की जिम्मेदारी सदस्य सचिव के पास थी.
यह काम इस तरह होता था. अकाउंट्स स्टाफ यह जानकारी देता था कि कौन-सी जमा राशि जल्द मैच्योर होने वाली है. इसके बाद वे कोटेशन मंगाने के लिए सदस्य सचिव की मंजूरी लेते थे.
बैंक बंद लिफाफे में अपनी ब्याज दरें भेजते थे, जो सदस्य सचिव के नाम होती थीं. वह इन दरों की तुलना एक चार्ट में करते और यह सिफारिश करते थे कि पैसा किस बैंक में रखा जाए. अंतिम फैसला चेयरमैन करते थे.
इस अवधि के ज्यादातर समय बोर्ड के चेयरमैन विनीत गर्ग थे. वह 1991 बैच के IAS अधिकारी हैं और उन्होंने 2 दिसंबर 2024 को पद संभाला था. चार्जशीट में उन्हें आरोपी नंबर 27 बनाया गया है. दिप्रिंट की एक अलग रिपोर्ट में उनकी भूमिका पर विस्तार से जानकारी दी गई है.
अब तक मामला क्या है
यह मामला हरियाणा के आठ विभागों और चंडीगढ़ प्रशासन के दो विभागों के खातों से 645 करोड़ रुपये निकालने से जुड़ा है. इसमें IDFC First Bank, AU Small Finance Bank के अधिकारियों और हरियाणा सरकार के अधिकारियों पर आरोप हैं.
पंचकूला की स्पेशल CBI कोर्ट में CBI की ओर से दाखिल चार्जशीट में तीन IAS अधिकारियों समेत कुल 37 लोगों के नाम हैं.
मामला एक गड़बड़ी सामने आने के बाद शुरू हुआ. इस साल फरवरी में हरियाणा विकास एवं पंचायत विभाग की एक समिति ने IDFC First Bank के एक खाते में गड़बड़ी की जांच की.
चार्जशीट में इस समिति की रिपोर्ट का हवाला दिया गया है. रिपोर्ट में ऐसे अकाउंट स्टेटमेंट मिले, जो फर्जी दिखाई दे रहे थे. एक चेक पर रकम अंकों में 2.5 करोड़ रुपये लिखी थी, जबकि शब्दों में 25 करोड़ रुपये लिखे थे. बैंक ने फिर भी उस चेक को पास कर दिया था. समिति ने पुलिस जांच की सिफारिश की.
राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, पंचकूला ने 22 फरवरी को FIR 4/2026 दर्ज की. 25 मार्च को हरियाणा सरकार और 8 अप्रैल को केंद्र सरकार की अधिसूचनाओं के बाद यह मामला CBI को सौंप दिया गया.
कुमार और पांच अन्य IAS अधिकारियों की भूमिका की जांच से पहले CBI ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत जरूरी पूर्व मंजूरी ली और हासिल की.
इस मामले में राम कुमार सिंह और पंकज अग्रवाल के बाद कुमार तीसरे IAS अधिकारी थे, जिन्हें गिरफ्तार किया गया.
HSPCB इस पूरे घोटाले का एक हिस्सा है. CBI के मुताबिक, बोर्ड को करीब 169 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ. किसी एक विभाग के लिए यह सबसे बड़ा नुकसान है.
दिसंबर 2024 के बाद क्या बदला
चार्जशीट में उस तारीख को अहम माना गया है, जब गर्ग ने कार्यभार संभाला. इससे करीब चार महीने पहले तक IDFC First Bank बोर्ड की जमा राशि हासिल करने की कोशिश कर रहा था. उसकी दरों की पेशकश उसके सरकारी बैंकिंग ग्रुप के जरिए आती थी. CBI का कहना है कि ये दरें असली थीं. बैंक हर बार हार गया. बोर्ड की एक भी जमा राशि उसके पास नहीं गई.
फरवरी 2025 से चंडीगढ़ की सेक्टर 32 शाखा से दरों की पेशकश आने लगी. पहली पेशकश 24 फरवरी की थी. इस पर रिलेशनशिप मैनेजर अभय कुमार के हस्ताक्षर थे और इसमें 8.25 प्रतिशत ब्याज की पेशकश की गई थी. बैंक ने CBI को बताया कि उस समय ऐसी कोई दर पेश ही नहीं की गई थी. सीबीआई ने अभय कुमार और शाखा प्रबंधक ऋभव ऋषि को क्रमशः आरोपी नंबर 2 और 1 बनाया है.
चार्जशीट में बोर्ड के काम करने के तरीके में हुए बदलाव भी बताए गए हैं. तुलना वाला चार्ट बनाना ई-ऑफिस सिस्टम से हटाकर फिजिकल फाइल में कर दिया गया. चेयरमैन ने निर्देश दिया कि हर comparative chart नोटशीट के नए पेज से शुरू होना चाहिए. CBI ने मेंबर सेक्रेटरी के पर्सनल असिस्टेंट कपिल के बयान पर भरोसा किया है. उन्होंने जांचकर्ताओं को बताया कि ऐसा इसलिए किया गया था ताकि पूरी नोटशीट को बदला जा सके.
उनके बयान में यह भी बताया गया है कि प्रदीप कुमार कैसे काम करते थे. नोटशीट पर हस्ताक्षर करने से पहले वह उसे चर्चा के लिए चेयरमैन के ऑफिस ले जाते थे. चेयरमैन जो बदलाव चाहते थे, उन्हें कपिल उसमें जोड़ते थे. इसके बाद कुमार साइन करते थे. चेयरमैन दो शब्दों में मंजूरी देते थे: “as proposed”.
छह बार पैसा जमा किया गया
कुमार के खिलाफ मामला मार्च 2025 से जनवरी 2026 के बीच IDFC First Bank में बोर्ड का पैसा छह बार जमा किए जाने पर टिका है. CBI ने इन छह बार में कुल 209.42 करोड़ रुपये की राशि गिनी है, जबकि तय सीमा 50 करोड़ रुपये थी.
● पहली बार, 8 मार्च 2025 को 50 करोड़ रुपये। करीब 143.87 करोड़ रुपये की जमा राशि की अवधि पूरी हो गई थी. कुमार ने चार्ट तैयार किया. इसमें IDFC First Bank सबसे ऊपर था. 5 करोड़ रुपये से ज्यादा की जमा पर 8.2 प्रतिशत और 25 करोड़ रुपये से ज्यादा की जमा पर 8.25 प्रतिशत ब्याज दिया जा रहा था. ऊपर बताए गए उनके नोट में बैंक के लिए 50 करोड़ रुपये, HARCO Bank के लिए 71.93 करोड़ रुपये और सर्व हरियाणा ग्रामीण बैंक के लिए 21.94 करोड़ रुपये की सिफारिश की गई.
चार्जशीट के मुताबिक, इस नोट से पता चलता है कि कुमार को पहले ही दिन 50 करोड़ रुपये की सीमा के बारे में पता था. CBI का तर्क है कि अगर उन्हें यह सीमा पता नहीं होती, तो वह सबसे ज्यादा ब्याज देने वाले बैंक के लिए इससे ज्यादा रकम की सिफारिश करते.
यह पैसा सेक्टर 32 के एक सेविंग्स अकाउंट, नंबर 10219084990 में गया. CBI का कहना है कि यह अकाउंट वित्त विभाग या चेयरमैन की मंजूरी के बिना खोला गया था. जांच में यह भी कहा गया है कि अकाउंट खोलने वाले फॉर्म में ऐसी फोटो और ईमेल आईडी थी, जिन्हें जांचकर्ताओं ने बैंक अधिकारियों से जोड़ा. चार्जशीट के मुताबिक, इसके लिए जारी की गई पहली चेक बुक में 400 पन्ने थे. इसे अभय कुमार ले गए और यह कभी बोर्ड तक नहीं पहुंची.
इस जमा से पहले भी एक अंतर था. 21 फरवरी को कुमार ने चार में से सिर्फ दो जमा राशियों को फिर से निवेश करने की सिफारिश की. उन्होंने करीब 140.87 करोड़ रुपये की HARCO Bank की दो जमा राशियों को छोड़ दिया. इनकी अवधि 22 और 26 फरवरी को पूरी हो गई थी. फाइल चेयरमैन के पास गई और उन्होंने 4 मार्च को फैसला किया. चार्जशीट के मुताबिक, इसका कोई कारण दर्ज नहीं किया गया था और उस दौर में IDFC First Bank ने कोई दर की पेशकश नहीं भेजी थी. CBI ने इससे हुए ब्याज के नुकसान को गलत तरीके से हुए नुकसान का हिस्सा माना है.
● दूसरी बार, 27 मार्च 2025 को 17.9 करोड़ रुपये। तब तक बैंक की 50 करोड़ रुपये की सीमा पूरी हो चुकी थी. 18 मार्च के एक अंदरूनी नोट में पांच दूसरे बैंकों को इस दौर से बाहर रखा गया था क्योंकि उनकी सीमा पूरी हो चुकी थी. इसमें IDFC First Bank का नाम नहीं था. 19 मार्च का प्रस्ताव सीधे अभय कुमार के ईमेल पर भेजा गया.
जन स्मॉल फाइनेंस बैंक को बिल्कुल आमंत्रित नहीं किया गया था. इसके बावजूद उसने 3 करोड़ रुपये से ज्यादा की जमा पर 8.45 प्रतिशत ब्याज की पेशकश भेजी. कुमार ने जो चार्ट तैयार किया, उसमें जन स्मॉल फाइनेंस बैंक के सामने 3 करोड़ रुपये से कम की जमा पर 8.25 प्रतिशत लिखा गया. CBI का कहना है कि इससे जन स्मॉल फाइनेंस बैंक की दर IDFC First Bank से कम हो गई. अगर सही दर लिखी जाती, तो CBI के मुताबिक जन स्मॉल फाइनेंस बैंक सबसे ज्यादा दर देने वाला बैंक होता और IDFC First Bank इस मामले में आता ही नहीं.
कुमार ने IDFC First Bank के लिए 11.41 करोड़ रुपये और Environment Compensation Fund के 6.49 करोड़ रुपये की सिफारिश की. गर्ग ने 27 मार्च को इसे मंजूरी दे दी.
CBI ने बोर्ड के डेटा एंट्री ऑपरेटर सौरव शर्मा का 25 मार्च का WhatsApp संदेश भी चार्जशीट में शामिल किया है. उन्होंने अभय कुमार को लिखा था कि फाइल PA तक पहुंच गई है और PA पूछ रहे हैं कि क्या IDFC को अभी भी जमा राशि दी जा सकती है, क्योंकि उसकी सीमा पूरी हो चुकी है.
● तीसरी बार, 2 जुलाई 2025 को 37.78 करोड़ रुपये। IDFC First Bank की 25 जून की दर की पेशकश पर किसी अधिकृत व्यक्ति के हस्ताक्षर नहीं थे. CBI का कहना है कि पहली नजर में ही इसकी असलियत पर सवाल था.
चार्जशीट में एक और बात बताई गई है. प्रस्ताव भेजने वाला ईमेल अभय कुमार के पुराने ईमेल पते पर भेजा गया था. वह 10 जून को बैंक छोड़ चुके थे और अगले दिन उनका अकाउंट बंद कर दिया गया था. इसलिए ईमेल उनके पास पहुंच ही नहीं सकता था. इसके बावजूद बैंक ने दर की पेशकश भेजी. CBI इसे इस बात का सबूत मानता है कि बोर्ड के कर्मचारी ईमेल के बाहर बैंक अधिकारियों के संपर्क में थे.
IndusInd Bank ने भी यही 7.10 प्रतिशत की दर दी थी. बोर्ड के नियमों के मुताबिक, अगर दो बैंक एक जैसी दर देते हैं, तो पैसा दोनों में बराबर बांटा जाना चाहिए. कुमार ने IDFC First Bank के लिए 37.78 करोड़ रुपये और IndusInd के लिए 33.23 करोड़ रुपये की सिफारिश की. इस नोट में वित्त विभाग की तय सीमाओं का ज़िक्र नहीं था. इसके बाद बोर्ड के पास IDFC First Bank की कुल जमा राशि 105.68 करोड़ रुपये हो गई.
● चौथी बार, 1 अक्टूबर 2025 को 8 करोड़ रुपये. बोर्ड का अतिरिक्त पैसा IDFC First Bank के एक सेविंग्स अकाउंट में 7.25 प्रतिशत ब्याज पर रखा गया. किसी भी बैंक से सेविंग्स अकाउंट की ब्याज दर नहीं मांगी गई थी. यह पेशकश 29 सितंबर के एक बिना स्टांप वाले अकेले पत्र में आई थी. उसी दौर में सबसे ज्यादा फिक्स्ड डिपॉजिट दर 7.02 प्रतिशत थी. चार्जशीट के मुताबिक, कोई बैंक सेविंग्स अकाउंट पर टर्म डिपॉजिट से ज्यादा ब्याज नहीं देता.
CBI का कहना है कि यही वह नोट था, जिसमें कुमार ने 50 करोड़ रुपये वाली सीमा का ज़िक्र नहीं किया.
● पांचवीं बार, 24 अक्टूबर 2025 को 50 करोड़ रुपये। Kumar के चार्ट में IDFC First Bank, Ujjivan Small Finance Bank, Bandhan Bank और IndusInd Bank को 25-25 करोड़ रुपये देने की सिफारिश की गई थी और बाकी पैसा HARCO Bank के लिए रखा गया था. IDFC First Bank का 15 अक्टूबर का पत्र 8 अक्टूबर की अंतिम तारीख के एक हफ्ते बाद बोर्ड तक पहुंचा. इस पर कोई स्टांप नहीं था और किसी अधिकृत व्यक्ति का नाम भी नहीं था. CBI का कहना है कि कुमार ने बिना कोई सवाल उठाए इसे अपने चार्ट में शामिल कर लिया.
चार्जशीट के मुताबिक, इसके बाद गर्ग ने IndusInd Bank के लिए रखे 25 करोड़ रुपये काटकर IDFC First Bank को दे दिए. इससे IDFC First Bank में कुल जमा 163.68 करोड़ रुपये हो गई. उसी नोटशीट पर बंधन बैंक की 7.30 प्रतिशत की ज्यादा ब्याज दर भी दर्ज थी, जबकि IDFC First Bank की दर 7.25 प्रतिशत थी. CBI का कहना है कि कुमार ने इस पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं की.
● छठी बार, 22 जनवरी 2026 को 45.74 करोड़ रुपये. तब तक कुमार बोर्ड छोड़ चुके थे. चार्जशीट में ही कहा गया है कि नए मेंबर सेक्रेटरी योगेश कुमार ने चार्ट तैयार किया. गर्ग के आदेश में IDFC First Bank को 7.40 प्रतिशत की दर पर 45.74 करोड़ रुपये और Jana Bank को 7.45 प्रतिशत की दर पर 18.46 करोड़ रुपये देने की बात थी.
कुमार की भूमिका के बारे में CBI के सारांश में जनवरी 2026 तक छह बार पैसा जमा करने की बात कही गई है. लेकिन उनके काम की विस्तृत जानकारी में अक्टूबर 2025 तक के ही छह चक्रों का विवरण दिया गया है.
एजेंसी का कहना है कि बोर्ड के पास रखी सात फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदें, जिनकी मूल राशि 201.42 करोड़ रुपये थी, IDFC First Bank के रिकॉर्ड में बिल्कुल दिखाई नहीं देती हैं.
आरोप
सीबीआई का आगे कहना है कि आईएएस अधिकारी प्रदीप कुमार ने अभय कुमार, ऋभव ऋषि, मनीष जिंदल, गर्ग और बोर्ड के अकाउंट्स स्टाफ परवीन कुमार और सौरव शर्मा के साथ मिलकर एक आपराधिक साजिश की. सीबीआई का कहना है कि इसका मकसद बोर्ड के पैसे का बेईमानी से गलत इस्तेमाल करना था.
CBI ने जिन कामों का जिक्र किया है, उनमें आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी, किसी महत्वपूर्ण दस्तावेज की जालसाजी, धोखाधड़ी के लिए जालसाजी, जाली दस्तावेजों को असली बताकर इस्तेमाल करना, सबूत के तौर पर जरूरी दस्तावेजों को नष्ट करना और गलत फायदा लेना-देना शामिल है. CBI का कहना है कि comparative chart ऐसा दस्तावेज था, जिसके बारे में अधिकारी जानते थे कि आगे इसे सबूत के तौर पर जरूरत पड़ सकती है. एजेंसी का आरोप है कि उन्होंने ऐसा चार्ट बनवाया, जिससे रिकॉर्ड में मौजूद असली quotation को हटाया जा सके.
इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की धाराएं 61(2), 241, 316(5), 317(4), 318(4), 336(3), 338, 340(2) और 344 लगाई गई हैं. इसके अलावा Prevention of Corruption Act की धाराएं 7(c), 7A, 8, 9, 10 और 13(1)(a) लगाई गई हैं. मुख्य अपराधों में धारा 12 और 13(2) भी शामिल हैं.
चार्जशीट में प्रदीप कुमार के मामले में बोर्ड को हुए गलत नुकसान की रकम 1,59,85,95,089 रुपये बताई गई है. इसमें 43,80,962 रुपये का ब्याज का नुकसान भी शामिल है. बाकी रकम तय सीमा से ज्यादा जमा किए गए मूल पैसे और सेविंग्स अकाउंट में रखे गए 8 करोड़ रुपये की है. CBI के सार्वजनिक बयानों में बोर्ड को हुए नुकसान की रकम करीब 169 करोड़ रुपये बताई गई है.
प्रदीप कुमार की तरफ से क्या कहा गया
प्रदीप कुमार पर अभी मुकदमा नहीं चला है. उनका पक्ष 26 जून को पंचकूला की स्पेशल सीबीआई कोर्ट में दाखिल की गई उनकी anticipatory bail plea में दर्ज है.
उन्होंने कहा कि उन्होंने वित्त विभाग के नियमों का पालन किया. उनके मुताबिक, 8 मार्च के उनके नोट में IDFC First Bank के लिए 50 करोड़ रुपये रखने का प्रस्ताव था, जो नए empanelled बैंकों के लिए तय सीमा के अंदर था. बाद में चेयरमैन के मौखिक निर्देश पर इससे ज्यादा पैसा उस बैंक में रखा गया. उन्होंने यह भी कहा कि सेक्टर 32 का अकाउंट चेयरमैन के निर्देश पर खोला गया था और उसमें बड़ी रकम लगातार जाती रही, जबकि पंचकूला में, जहां बोर्ड का मुख्यालय है, दूसरे बैंक भी मौजूद थे.
उन्होंने अदालत को बताया कि फाइलों और बातचीत का काम बोर्ड के e-file सिस्टम के जरिए किया जाता था. CBI की चार्जशीट में कहा गया है कि चार्ट बनाने का काम इस सिस्टम से हटाकर कागज की फाइल में कर दिया गया था.
जांच से जुड़े सूत्रों ने बताया कि कुमार ने हिरासत में CBI अधिकारियों को कहा था कि उन्होंने चेयरमैन के निर्देश पर काम किया.
CBI का मामला यह है कि कुमार ने फिर भी चार्ट तैयार किए, बैंक में पैसा रखने की सिफारिश की और जब तय सीमाएं पार की गईं, तब कोई आपत्ति नहीं जताई.
सेवा के आखिरी दिन गिरफ्तारी
जून के आखिर तक कुमार तीसरे IAS अधिकारी थे, जिन पर CBI की कार्रवाई आगे बढ़ रही थी. हरियाणा सरकार ने उन्हें 8 अप्रैल को निलंबित कर दिया था. CBI के सूत्रों ने कहा कि वह अपने घर पर नहीं थे और उनका फोन बंद था. तब तक उनके वकीलों ने anticipatory bail के लिए अदालत का रुख कर लिया था और 2 जुलाई को सुनवाई तय थी.
मंगलवार, 30 जून, उनकी नौकरी का आखिरी दिन था, क्योंकि उसी दिन वह रिटायर होने वाले थे. शाम 6:25 बजे CBI ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. चार्जशीट में गिरफ्तारी का समय दर्ज है. उसी रात उन्हें स्पेशल कोर्ट में पेश किया गया और CBI को दो दिन की हिरासत मिल गई. 2 जुलाई को उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया, जहां वह अभी भी हैं. उनकी जमानत याचिका का कोई मतलब नहीं रह गया.
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