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Tuesday, 16 June, 2026
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मोहन भागवत बोले- भारत सुपरपावर बनेगा, लेकिन अमेरिका-चीन की राह पर नहीं चलेगा

RSS प्रमुख ने कहा कि भारत का उदय उसकी सभ्यतागत मूल्यों के अनुसार होना चाहिए. बोले- ‘अगर भारत सुपरपावर बनकर अमेरिका या चीन जैसा व्यवहार करने लगे, तो वह भारत नहीं रहेगा.’

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नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने सोमवार को अमेरिका की उस नीति की आलोचना की, जिसमें वह अपने हितों को सबसे ऊपर रखता है. उन्होंने कहा कि अगर पूरी दुनिया अमेरिका की जीवनशैली अपनाने लगे, तो मानवता को जीवित रहने के लिए पृथ्वी जैसे कई ग्रहों की जरूरत पड़ेगी.

भागवत ने आगे कहा कि भारत का ‘विश्वगुरु’ के रूप में उभरना उसकी सभ्यतागत मूल्यों से प्रेरित होना चाहिए और इसका उद्देश्य दुनिया में शांति और समृद्धि लाना होना चाहिए. उन्होंने कहा कि आर्थिक समृद्धि के साथ संयम, नैतिक आचरण और दूसरों के कल्याण की भावना भी जरूरी है.

इस बात पर जोर देते हुए कि भारत को दूसरे देशों की नकल नहीं करनी चाहिए, भागवत ने कहा, “अगर भारत सुपरपावर बन जाए और अमेरिका या चीन जैसा व्यवहार करने लगे, तो वह भारत नहीं रहेगा. जब भारत जागता है और सक्षम बनता है, तो दुनिया में शांति और खुशहाली आती है. लोगों के बीच संबंध अधिक सौहार्दपूर्ण और शांतिपूर्ण बनते हैं.”

RSS प्रमुख ने ये बातें नई दिल्ली में हीरो एंटरप्राइज द्वारा आयोजित 18वें बीएमएल मुंजाल अवॉर्ड्स समारोह में मुख्य भाषण देते हुए कहीं. उन्होंने कहा कि भारत सिर्फ एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक ऐसी सभ्यता है जो आक्रमणों, विदेशी शासन और ऐतिहासिक उथल-पुथल के बावजूद कायम रही है.

अमेरिका के उपभोग आधारित विकास मॉडल की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा, “सबसे अच्छे जीवन स्तर की बात अक्सर अमेरिका के संदर्भ में की जाती है, लेकिन अगर भारत के 142 करोड़ लोग अमेरिका की तरह जीने लगें, तो एक पृथ्वी पर्याप्त नहीं होगी, छह पृथ्वियों की जरूरत पड़ेगी. वे पृथ्वी के संसाधनों का इतना उपयोग कर रहे हैं कि यह भी नहीं सोचते कि दूसरे लोगों का भी उन संसाधनों पर अधिकार है.”

भागवत ने कहा कि अमेरिका के अन्य देशों के साथ संबंध अक्सर ‘अमेरिकी हित पहले’ की सोच से प्रभावित होते हैं.

उन्होंने एक घटना का ज़िक्र करते हुए कहा कि एक अमेरिकी ने उनसे कहा था कि भारत और अमेरिका अर्थव्यवस्था, रक्षा और सैन्य क्षेत्र जैसे कई क्षेत्रों में ‘स्वाभाविक मित्र’ हो सकते हैं—“बशर्ते अमेरिकी हित सुरक्षित रहें.”

भागवत ने भारत की सभ्यतागत सोच की तुलना उस वैश्विक व्यवस्था से की जिसे उन्होंने स्वार्थ आधारित बताया. उन्होंने कहा कि कई देश दोस्ती और सहयोग तभी करते हैं, जब उनके रणनीतिक या आर्थिक हित पूरे होते हों.

उन्होंने कहा, “वे (अमेरिका) इतने समृद्ध हैं, फिर भी दुनिया के बाकी लोगों के साथ उसे बांटने के बारे में नहीं सोचते. ऐसा क्यों है? क्योंकि वे इस भावना को समझते नहीं हैं और महसूस भी नहीं करते. उनमें अपनापन नहीं है.”

उन्होंने संकट के समय भारत द्वारा पड़ोसी देशों की मदद का भी ज़िक्र किया. मालदीव को पानी उपलब्ध कराने और श्रीलंका की सहायता करने जैसे उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यह कर्तव्य और सद्भावना पर आधारित अलग सोच को दिखाता है.

उन्होंने कहा, “हो सकता है कि हम इतने समृद्ध न हों कि सभी की मदद कर सकें, लेकिन जब हमारे पड़ोसी संकट में होते हैं, तो हम उनके साथ खड़े होते हैं.”

भागवत ने कहा कि भारत ने हमेशा समृद्धि को व्यक्तिगत धन संचय नहीं, बल्कि सामूहिक कल्याण का माध्यम माना है. उन्होंने आर्थिक शक्ति बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया, लेकिन चेतावनी दी कि चरित्र के बिना शक्ति विनाशकारी हो सकती है.

उन्होंने कहा, “जब भारत आगे बढ़ता है, तो सिर्फ भारत को लाभ नहीं होता. जब भारत का विकास होता है, तो पूरी दुनिया में शांति और खुशहाली फैलती है. एक प्रयास से तीन उद्देश्यों की पूर्ति होती है—व्यक्ति का कल्याण, राष्ट्र का कल्याण और आने वाली पीढ़ियों का कल्याण.”

भारत के भविष्य को लेकर विश्वास जताते हुए भागवत ने कहा कि आने वाले दशकों में भारत वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभा सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि संघ तकनीक का विरोध नहीं करता.

उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि अगले 20 से 30 वर्षों में भारत दुनिया का नंबर एक देश बनेगा. भारत विश्वगुरु बनेगा. वह शक्तिशाली भी बनेगा, लेकिन अपनी शक्ति का उपयोग दुनिया के कल्याण के लिए करेगा. भारत मानवता का मार्गदर्शक बनेगा. यही हमारी कल्पना है.”

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि दुनिया ताकतवर की बात सुनती है, इसलिए भारत को हर प्रकार की शक्ति की जरूरत है. “लेकिन शक्ति के साथ अच्छे इरादे और चरित्र भी होना चाहिए.”

उन्होंने श्रम की गरिमा, समृद्धि के समान वितरण, नैतिक तरीके से संपत्ति बनाने और राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका पर भी जोर दिया.

भागवत ने कहा, “गंगा हजारों वर्षों से बह रही है. वह प्राचीन है, लेकिन उसमें बहने वाला पानी हमेशा नया होता है. गंगा शाश्वत भी है और निरंतर नई भी. भारत भी शाश्वत है और निरंतर नया होता रहता है. भारत सिर्फ एक भौगोलिक क्षेत्र का नाम नहीं है. भारत एक अस्तित्व और सभ्यतागत पहचान का नाम है.”

उन्होंने कहा कि भारत शाश्वत और निरंतर नया होने वाला राष्ट्र है. “पीढ़ियां आती-जाती रहती हैं, लेकिन वे उसी मार्ग पर चलती रहती हैं. आज सब कुछ Gen Z के अनुरूप और अलग रूप में दिखाई देता है, फिर भी वहां भारत मौजूद है. जैसा कि आपने अपने विषय में सही कहा, असली संपत्ति लोग हैं.”

भागवत ने कहा कि भारत का विकास सिर्फ देश के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए लाभकारी होगा. उन्होंने कहा कि भारत को अपनी युवा पीढ़ी को सेवा, देशभक्ति और चरित्र के मूल्यों के साथ आगे बढ़ाने के लिए तैयार करना चाहिए.

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत के पास ऐसे विचार हैं जो पर्यावरण क्षरण और अस्थिर उपभोग जैसी वैश्विक चुनौतियों का समाधान देने में मदद कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि वैश्विक समस्याओं के समाधान में भारत की एक विशेष भूमिका है.

उन्होंने कहा, “दुनिया अपनी कई समस्याओं का समाधान खोज रही है. कुछ समस्याओं का समाधान दूसरे देशों में मिल चुका है, लेकिन कुछ अधूरे काम ऐसे हैं जिन्हें केवल भारत ही पूरा कर सकता है, क्योंकि उसके पास सभ्यतागत ज्ञान है.”

उन्होंने संपत्ति और अवसरों के समान वितरण की भी वकालत की और कहा कि समृद्धि कुछ लोगों के हाथों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए.

उन्होंने कहा, “हमें भरपूर समृद्धि पैदा करनी चाहिए. हमें अतिरिक्त उत्पादन करना चाहिए. लेकिन वह समृद्धि हर व्यक्ति तक पहुंचनी चाहिए. बड़े पैमाने पर उत्पादन जरूरी है, लेकिन लोगों द्वारा उत्पादन भी उतना ही महत्वपूर्ण है. किसी राष्ट्र की असली संपत्ति उसके प्राकृतिक संसाधन और उसके लोगों की मेहनत होती है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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