लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बीचों-बीच, एक तीन मंजिला इमारत में जहां बुकस्टोर, लाइब्रेरी और कैफे चलता है — मज़दूर बिगुल अखबार की प्रतियां रखी हुई हैं. यह 20 पेज का हिंदी मासिक अखबार है, जो मज़दूरों के अधिकारों और उनके संघर्षों पर केंद्रित है. इसकी शुरुआत 2004 में हुई थी.
हाल ही में यह अखबार चर्चा में है क्योंकि इससे स्वयंसेवक के तौर पर जुड़े लखनऊ के सामाजिक कार्यकर्ता और अनुवादक सत्याम वर्मा (65) को अप्रैल में नोएडा में हुए मज़दूरों के प्रदर्शन के दौरान कथित हिंसा के मामले में गिरफ्तार किया गया है. वर्मा पहले सोशल मीडिया पर मज़दूर यूनियन मज़दूर बिगुल दस्ता के बारे में लिख चुके हैं और प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों का समर्थन भी कर चुके हैं.
अब सत्याम वर्मा और छात्र कार्यकर्ता आकृति चौधरी (25) पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाया गया है. इस कानून के तहत किसी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए एक साल तक हिरासत में रखा जा सकता है. उन पर मज़दूरों के प्रदर्शन के दौरान “हिंसा भड़काने” का आरोप लगाया गया है.
लखनऊ विश्वविद्यालय से कुछ सौ मीटर की दूरी पर स्थित निराला नगर की इस तीन मंजिला इमारत में मुख्य रूप से जनचेतना बुकस्टोर है, जो मज़दूर बिगुल का अनौपचारिक “वितरण कार्यालय” भी है. इसी इमारत में अनुराग पुस्तकालय भी है. इन दोनों की स्थापना सत्याम वर्मा और उनकी सहयोगी कात्यायनी सिन्हा ने मिलकर की थी. जनचेतना बुकस्टोर की शुरुआत 1986 में गोरखपुर में हुई थी और 1990 के दशक के बीच में इसे लखनऊ लाया गया.
इमारत के एक हॉल में लखनऊ सिनेफाइल्स के बैनर तले दुनिया भर की फिल्मों की स्क्रीनिंग होती है, ताकि लोगों की सोच का दायरा बढ़े और सिनेमा व समाज को बेहतर ढंग से समझा जा सके. इमारत की ग्राउंड फ्लोर पर जैकोबिन कैफे भी है.

भगत सिंह, कार्ल मार्क्स और अन्य क्रांतिकारी विचारकों व लेखकों की किताबों में रुचि रखने वाले युवाओं को आकर्षित करने वाली यह इमारत लखनऊ के बौद्धिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में जानी जाती है. वहीं दूसरी ओर, मज़दूर बिगुल ने मज़दूरों, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच अपनी अलग पहचान बनाई है. यह ऐसे श्रम मुद्दों को जगह देता है, जो अक्सर मुख्यधारा की मीडिया में दिखाई नहीं देते.
10 रुपये कीमत वाला यह अखबार यूपी, हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और दिल्ली समेत कई राज्यों में पहुंचता है. यह वर्षों से मज़दूर आंदोलनों, श्रमिक अधिकार अभियानों और ट्रेड यूनियन गतिविधियों की रिपोर्टिंग करता आ रहा है. इंस्टाग्राम और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी इसकी मौजूदगी है, जहां इसके 48,000 से अधिक फॉलोअर्स हैं.
दिप्रिंट को मिली मज़दूर बिगुल की ताज़ा प्रति में अप्रैल के मज़दूर प्रदर्शन को मुख्य खबर बनाया गया है. इसके साथ गिरफ्तार लोगों की रिहाई की मांग भी की गई है. अखबार के अंदर देशभर में हुए मज़दूर आंदोलनों की विस्तृत रिपोर्टें हैं. संपादकीय पन्ने पर ‘मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र के सिद्धांत’ विषय पर लेख प्रकाशित किया गया है. अखबार में लेनिन, मार्क्स और भगत सिंह के उद्धरण भी छपे हैं.
दिप्रिंट से बातचीत में कात्यायनी, जो शुरुआत से ही मज़दूर बिगुल से जुड़ी हुई हैं, उन्होंने कहा, “यह अखबार पूरे देश में स्वयंसेवकों द्वारा चलाया जाता है, जो मज़दूरों के अधिकारों के लिए लिखते हैं.”
उन्होंने कहा, “हम सभी स्वयंसेवक के रूप में काम करते हैं और यह अखबार मज़दूरों के लिए है. इसके माध्यम से उन्हें श्रम कानूनों, उनके अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बारे में जानकारी मिलती है. अखबार अपने अलग-अलग कॉलमों के जरिए उनकी आवाज़ उठाता है और विभिन्न राज्यों में होने वाले मज़दूर आंदोलनों को जगह देता है. मुख्यधारा की मीडिया में ऐसी कवरेज नहीं मिलती, इसलिए जो लोग हमसे जुड़े हैं, वे इस अखबार को खरीदते हैं.”

मज़दूर बिगुल का संपादकीय कार्यालय इंदिरा नगर में स्थित है. हालांकि इसकी प्रसार संख्या (सर्कुलेशन) सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, लेकिन अखबार का कहना है कि यह भारत के प्रेस रजिस्ट्रार जनरल के साथ पंजीकृत है. संपादकीय टीम के सदस्यों के अनुसार, इसकी प्रतियां स्थानीय नेटवर्क और डाक सेवा के माध्यम से वितरित की जाती हैं.
जैकोबिन कैफे में बैठे लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र रोहित कुमार ने इस इमारत को “लखनऊ की ऐसी दुर्लभ जगह” बताया, जहां एक ही छत के नीचे मुश्किल से मिलने वाली किताबें, अंतरराष्ट्रीय फिल्में और अच्छा खाना मिल जाता है.
उन्होंने कहा, “यहां आपको भगत सिंह से जुड़ी लगभग हर किताब मिल जाएगी. साथ ही क्रांतिकारी लेखकों की कविता संग्रह भी उपलब्ध हैं.”
‘परेशान किया गया’
कात्यायनी के अनुसार, इस बार उन्हें मज़दूर बिगुल का अप्रैल-मई संयुक्त अंक निकालना पड़ा क्योंकि इससे जुड़े कई स्वयंसेवक, जिनमें सत्याम वर्मा भी शामिल हैं, गिरफ्तार कर लिए गए थे.
कात्यायनी ने यह भी आरोप लगाया कि राज्य पुलिस ने “उन्हें और मज़दूर बिगुल व जनचेतना से जुड़े अन्य लोगों को परेशान करने की कोशिश की.”
उन्होंने दिप्रिंट से कहा कि सत्याम वर्मा लगातार आम लोगों और मज़दूरों के अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाते रहे हैं और सरकारी नीतियों की आलोचना भी करते रहे हैं. उनका दावा है कि यही उनकी गिरफ्तारी की असली वजह है.
पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कात्यायनी ने आरोप लगाया कि 11 अप्रैल से बिना किसी नोटिस या वारंट के सत्याम वर्मा और उनके साथियों को परेशान किया जाने लगा.
उन्होंने कहा, “13 अप्रैल को सत्याम, पत्रकार संजय श्रीवास्तव और मुझे गैरकानूनी तरीके से हिरासत में लिया गया था.” उसी समय नोएडा और अन्य जगहों पर मज़दूरों के प्रदर्शन शुरू हुए थे.

कात्यायनी ने बताया कि 17 अप्रैल को पुलिस के पास जनचेतना परिसर की केवल एक मंजिल की तलाशी का वारंट था, लेकिन इसके बावजूद पूरे भवन की तलाशी ली गई.
उन्होंने कहा कि तलाशी के दौरान इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, किताबें और निजी डायरी जब्त कर ली गईं, लेकिन जब्ती की कोई कानूनी सूची (सीजर मेमो) नहीं दी गई.
उन्होंने यह भी दावा किया कि सत्याम वर्मा को बिना किसी ठोस आधार के उठाया गया, उन्हें जीवनरक्षक दवाइयां नहीं दी गईं और उनके कानूनी अधिकारों से भी वंचित रखा गया.
कात्यायनी के अनुसार, सत्याम वर्मा को दो दिन तक गैरकानूनी हिरासत में रखने के बाद ही नोएडा की अदालत में पेश किया गया.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा कि सत्याम वर्मा का नोएडा से कभी कोई सीधा संबंध नहीं रहा और न ही वहां प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों या कार्यकर्ताओं से उनका संपर्क था. इसके बावजूद उन्हें गिरफ्तार कर “साजिश का मास्टरमाइंड” बताया गया.
कात्यायनी के आरोपों पर प्रतिक्रिया के लिए दिप्रिंट ने उत्तर प्रदेश के डीजीपी कार्यालय से फोन और संदेश के जरिए संपर्क किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.
सत्याम वर्मा के वकील अली जिया कबीर चौधरी के अनुसार, 10 अप्रैल को उन्हें पहली बार हिरासत में लिया गया था, जब वे जनचेतना कार्यालय में बैठे हुए थे.
वकील ने दिप्रिंट को बताया कि उनसे कहा गया था कि वे मज़दूर बिगुल दस्ता पर लिखा अपना लेख हटा दें, जिसमें उन्होंने मज़दूरों के अधिकारों का समर्थन किया था.
कुछ समय बाद उन्हें छोड़ दिया गया, लेकिन 17 अप्रैल को फिर गिरफ्तार कर लिया गया. हालांकि, सरकारी दस्तावेज़ में उनकी गिरफ्तारी की तारीख 19 अप्रैल दर्ज है.
जिस दूसरी व्यक्ति पर एनएसए लगाया गया है, वह आकृति हैं, जो दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास की पढ़ाई कर चुकी हैं.
आकृति के पिता ने दिप्रिंट को बताया कि 11 अप्रैल को जब वह घर जा रही थीं, तब उत्तर प्रदेश पुलिस के सादे कपड़ों में आए कर्मियों ने उन्हें बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से उठा लिया. उनके साथ फैक्ट्री कर्मचारी मनीषा और सॉफ्टवेयर इंजीनियर आदित आनंद को भी हिरासत में लिया गया.
सत्याम वर्मा के दोस्तों और समर्थकों ने सोशल मीडिया पर दो पेज बनाए हैं — Campaign for the Release of Workers and Activists of Noida और Satyam Verma Rihaai Manch.
इनका घोषित उद्देश्य सत्याम वर्मा की रिहाई के लिए अभियान चलाना और उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों के विरोध में समर्थन जुटाना है.
कात्यायनी, सत्याम वर्मा और मज़दूर बिगुल से स्वयंसेवक के रूप में जुड़े अन्य लोग खुद को “राजनीतिक कार्यकर्ता” भी बताते हैं, हालांकि वे किसी राजनीतिक दल से जुड़े नहीं हैं.
प्रसिद्ध इतिहासकार के बेटे
सत्याम वर्मा प्रसिद्ध इतिहासकार, लेखक और शिक्षाविद् लाल बहादुर वर्मा के बेटे हैं. लाल बहादुर वर्मा ने गोरखपुर विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन किया था.
सत्याम के विचार कई बार उनके पिता से कुछ अलग माने जाते हैं. वामपंथी विचारधारा से प्रभावित सत्याम का मानना था कि लोगों में जागरूकता केवल आंदोलनों और सामाजिक गतिविधियों से ही नहीं, बल्कि किताबों के माध्यम से भी फैलाई जा सकती है. उन्हें किताबों से विशेष लगाव था.
सत्याम वर्मा ने हिंदी अनुवादक के रूप में पहचान बनाई. हालांकि उन्होंने कुछ समय तक एक समाचार एजेंसी में पत्रकार के रूप में काम किया, लेकिन पिछले दो दशकों से वे मुख्य रूप से अनुवादक के रूप में जाने जाते हैं.
उन्होंने Bhagat Singh and His Comrades: Documents के संपादक-अनुवादक के रूप में काम किया. इसके अलावा उन्होंने कई अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित किताबों का हिंदी में अनुवाद किया है. साथ ही विदेशी लेखकों Upton Sinclair और Jack London की किताबों का भी हिंदी में अनुवाद किया, जिससे उनकी रचनाएं हिंदी पाठकों तक पहुंच सकीं.

जनचेतना और मज़दूर बिगुल से डिजाइनर और कार्टूनिस्ट के रूप में जुड़े राम बाबू ने दिप्रिंट को बताया कि वे 2004 में अखबार की शुरुआत से ही इससे जुड़े हुए हैं.
उनके अनुसार, इस पहल से जुड़े सभी लोग स्वैच्छिक रूप से काम करते हैं. कोई अनुवाद करता है, कोई डिजाइन का काम संभालता है, जबकि कई लोग पुस्तक प्रदर्शनियों में किताबों को व्यवस्थित करने और प्रदर्शित करने में मदद करते हैं.
कात्यायनी ने बताया कि वह खुद एक कवयित्री हैं और उनकी कई किताबें पुस्तकालय में उपलब्ध हैं. वह 1980 के दशक से सत्याम वर्मा के साथ जनचेतना में सहयोगी के रूप में काम कर रही हैं.
चुनौतियों के बावजूद वह पीछे हटने को तैयार नहीं हैं.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “चाहे संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो, अखबार का प्रकाशन जारी रहेगा और यह मज़दूर आंदोलन नहीं रुकेगा.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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