चंडीगढ़: पंजाब पुलिस के पूर्व असिस्टेंट इंस्पेक्टर जनरल राज जीत सिंह की गुरुवार को गिरफ्तारी करीब एक दशक पुराने भोला ड्रग केस में एक बड़ा पड़ाव है. इस मामले ने पंजाब की राजनीति पर गहरा असर डाला है, क्योंकि इसमें ड्रग तस्करों, पुलिस के कुछ हिस्सों और नेताओं के बीच कथित संबंधों की बात सामने आई थी. यह गिरफ्तारी ऐसे समय हुई है जब चुनाव वाले इस राज्य में ड्रग्स की खुलेआम उपलब्धता एक बड़ा मुद्दा बनती जा रही है. राज्य में विधानसभा चुनाव अगले साल की शुरुआत में होने हैं.
राज जीत 2023 में सेवा से बर्खास्त किए जाने और घोषित अपराधी घोषित होने के बाद तीन साल से ज्यादा समय से जांच एजेंसियों से बच रहे थे. गुरुवार सुबह उन्हें एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स ने पटियाला के एक घर से गिरफ्तार किया. यह गिरफ्तारी सुप्रीम कोर्ट में उनकी जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान आत्मसमर्पण करने की पेशकश के कुछ ही दिन बाद हुई.
सुप्रीम कोर्ट ने 10 सितंबर को उन्हें आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया था. जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने राज जीत के वकील का यह बयान दर्ज किया कि वह आत्मसमर्पण करने के लिए तैयार हैं. कोर्ट ने उन्हें ऐसा करने के बाद नियमित जमानत मांगने की अनुमति दी. इस मामले की अगली सुनवाई 1 अक्टूबर को होनी है.
राज जीत एक बहुत सम्मानित अधिकारी रहे हैं और राज्य के कुछ बड़े पुलिस अधिकारियों के करीबी माने जाते थे. वह उस समय विवादों में आए जब एक जांच में ड्रग रैकेट चलाने के आरोपी बर्खास्त इंस्पेक्टर इंदरजीत सिंह के साथ उनके कथित संबंध सामने आए. राज जीत की कथित भूमिका को लेकर पंजाब पुलिस के शीर्ष नेतृत्व के दो लड़ते हुए गुटों के बीच भी विवाद हुआ. एक गुट पर उन्हें बचाने की कोशिश करने का आरोप लगा, जबकि दूसरा गुट उन्हें ‘फंसाने’ की कोशिश करता हुआ माना गया.
भोला ड्रग केस का राजनीतिकरण बहुत ज्यादा हो गया था, जबकि पंजाब में बढ़ती ड्रग समस्या पर ध्यान दिया जाना चाहिए था. इस जांच का इस्तेमाल बार-बार शिरोमणि अकाली दल के नेता बिक्रम सिंह मजीठिया पर हमला करने के लिए किया गया. इसके अलावा, पुलिस के अंदर मौजूद विरोधी गुटों पर भी आरोप लगे कि वे अपनी आपसी लड़ाई निपटाने के लिए ड्रग जांच का इस्तेमाल कर रहे थे.
कैप्टन की एंट्री
2013 में अर्जुन अवॉर्ड पाने वाले पहलवान और पंजाब पुलिस के पूर्व अधिकारी जगदीश भोला को इस मामले में मुख्य आरोपी के रूप में गिरफ्तार किए जाने के बाद से मजीठिया भोला ड्रग केस का मुख्य चेहरा बने हुए थे. लेकिन 2017 में कैप्टन अमरिंदर सिंह के राज्य की सत्ता में आने के बाद राज जीत इस कहानी में आए.
उन्होंने पंजाब में ड्रग्स के खिलाफ एक स्पेशल टास्क फोर्स यानी STF बनाई. इसकी कमान उस समय के एडिशनल डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस यानी ADGP हरप्रीत सिंह सिद्धू को दी गई.
जून 2017 में STF ने इंस्पेक्टर इंदरजीत सिंह को जालंधर स्थित उनके सरकारी घर से गिरफ्तार किया. उनके पास बड़ी मात्रा में हेरोइन, अवैध हथियार और गोलियां, साथ ही ऐसी भारतीय और विदेशी मुद्रा मिली जिसका हिसाब नहीं था. गिरफ्तारी के कुछ ही दिनों के अंदर इंदरजीत को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया. इसके बाद STF ने अपनी जांच का ध्यान राज जीत सिंह पर लगाया. उस समय राज जीत मोगा के सीनियर सुपरिंटेंडेंट ऑफ पुलिस यानी SSP थे और उन्हें इंदरजीत का संरक्षण देने वाला अधिकारी माना जाता था.
2013 में राज जीत तरन तारन के SSP थे, जब इंदरजीत वहां तैनात था. बाद में जब राज जीत होशियारपुर और फिर मोगा चले गए, तब भी इंदरजीत को उनके अधीन महत्वपूर्ण पोस्टिंग मिलती रहीं.
कार्रवाई की आशंका को देखते हुए राज जीत ने चल रहे भोला ड्रग केस में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का रुख किया. उन्होंने मांग की कि इंदरजीत के मामले की जांच STF के प्रमुख सिद्धू से हटाकर किसी दूसरे अधिकारी को दी जाए. उनका कहना था कि सिद्धू उनके खिलाफ व्यक्तिगत पक्षपात रखते हैं. दिसंबर 2017 में कोर्ट ने तीन सदस्यों वाली एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम यानी SIT बनाई. इसकी अध्यक्षता DGP स्तर के अधिकारी सिद्धार्थ चट्टोपाध्याय ने की. SIT के दूसरे सदस्य ADGP प्रबोध कुमार और उस समय के इंस्पेक्टर जनरल कुंवर विजय प्रताप सिंह थे.
SIT को खास तौर पर राज जीत सिंह के इंदरजीत सिंह के साथ कथित संबंधों से जुड़े आरोपों की जांच करने का काम दिया गया था. लेकिन जांच जल्द ही मूल सवाल से कहीं ज्यादा बड़ी और विवादित हो गई.
इसके बाद SIT ने तीन रिपोर्ट जमा कीं. इन रिपोर्टों में इंदरजीत के काम और उसे कई पोस्टिंग और प्रमोशन कैसे मिले, इसकी जांच की गई. रिपोर्टों में आरोप दर्ज किए गए कि इंदरजीत ड्रग मामलों में हेरफेर करता था. इनमें ड्रग्स प्लांट करने, लोगों को झूठे मामलों में फंसाने, फॉरेंसिक सैंपल में देरी करने और मामलों का इस्तेमाल करके पैसे वसूलने के आरोप भी शामिल थे.
SIT ने इंदरजीत के करियर में राज जीत की भूमिका की भी जांच की. एक रिपोर्ट में पाया गया कि राज जीत ने खास तौर पर इंदरजीत की तरन तारन में पोस्टिंग की मांग की थी. इसके बाद उन्होंने उसे वहां इंटेलिजेंस इंचार्ज के तौर पर तैनात किया. यह उस समय हुआ जब रिकॉर्ड में इंदरजीत के खिलाफ आपराधिक मामले और पहले की एक बड़ी सजा दर्ज थी.
SIT ने इंदरजीत को डबल प्रमोशन देने की राज जीत की सिफारिश की भी जांच की. साथ ही उस प्रमाण-पत्र की भी जांच की गई जिसमें कहा गया था कि इंदरजीत के खिलाफ कोई आपराधिक मामला या विभागीय जांच लंबित नहीं थी. SIT ने इंदरजीत की बाद की पोस्टिंग भी देखीं, जिसमें उसका होशियारपुर ट्रांसफर भी शामिल था. उस समय की सिफारिशों में उसे मेहनती और ईमानदार बताया गया था.
पैसों से जुड़े सवालों की भी जांच हुई. SIT ने राज जीत की संपत्ति से जुड़े रिटर्न और संपत्ति खरीदने से जुड़े दस्तावेज हासिल किए. इसमें 2013 के बाद उनकी अचल संपत्ति में बढ़ोतरी देखी गई. SIT ने इस पैसे के स्रोत के बारे में उनसे जवाब मांगा.
SIT के तीनों सदस्यों की रिपोर्ट के अलावा, मई 2018 में चट्टोपाध्याय ने कोर्ट में एक अलग रिपोर्ट भी जमा की. पहले की रिपोर्टों के उलट, इस रिपोर्ट पर SIT के तीनों सदस्यों के हस्ताक्षर नहीं थे. प्रबोध कुमार और कुंवर विजय प्रताप सिंह ने इस रिपोर्ट से खुद को अलग रखा.
अपनी अलग रिपोर्ट में चट्टोपाध्याय ने आरोप लगाया कि पंजाब के सबसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने राज जीत को और संरक्षण दिया था.
पुलिस के अंदर की लड़ाई
यही वह समय था जब राज जीत-इंदरजीत की जांच पुलिस के ऊपरी स्तर पर चल रही कड़वी आपसी लड़ाई से पूरी तरह जुड़ गई. यह पुलिस के अलग-अलग गुटों के बीच सत्ता की लड़ाई का केंद्र बन गई.
भोला ड्रग केस में सितंबर 2023 के अपने फैसले में हाई कोर्ट की जस्टिस जी.एस. संधावालिया की अध्यक्षता वाली डिवीजन बेंच ने मूल SIT के काम और चट्टोपाध्याय की अलग रिपोर्ट के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर बताया. कोर्ट ने कहा कि तीन सदस्यों वाली SIT को 2017 की FIR से जुड़े राज जीत के इंदरजीत के साथ कथित संबंधों की जांच के लिए बनाया गया था. कोर्ट ने यह भी कहा कि दूसरे अधिकारियों की किसी संभावित मिलीभगत की अलग से जांच की जा सकती है. कोर्ट ने 8 मई की रिपोर्ट पर उठाई गई आपत्तियों और उससे जुड़े पक्षपात और सेवा में आपसी प्रतिद्वंद्विता के आरोपों को भी दर्ज किया.
SIT की रिपोर्टें 2018 में हाई कोर्ट में जमा की गई थीं और कई साल तक सीलबंद लिफाफे में रहीं. आखिरकार 28 मार्च 2023 को हाई कोर्ट ने इन्हें खोल दिया. हालांकि चट्टोपाध्याय की वह रिपोर्ट नहीं खोली गई जिस पर SIT के दूसरे सदस्यों के हस्ताक्षर नहीं थे.
इसके बाद राज्य सरकार ने राज जीत के खिलाफ कार्रवाई की. 17 अप्रैल 2023 को उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया. सरकार ने यह भी आदेश दिया कि इंदरजीत के मामले में उन्हें आरोपी बनाया जाए. उनकी आय से ज्यादा संपत्ति जमा करने के आरोप में एक अलग विजिलेंस केस भी दर्ज किया गया.
बाद में कोर्ट ने राज जीत की अग्रिम जमानत की याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने कहा कि उनकी भूमिका की जांच जरूरी है. इसके बाद से वह फरार रहे. उनके खिलाफ लुकआउट सर्कुलर भी जारी किया गया.
यह सब कैसे शुरू हुआ
भोला ड्रग केस मार्च 2013 का है. उस समय कनाडा के नागरिक और कथित ड्रग तस्कर अनूप कहलोन को पंजाब पुलिस ने पांच अन्य लोगों के साथ गिरफ्तार किया था. उनके पास जीरकपुर से 26 किलो हेरोइन बरामद हुई थी. कहलोन से पूछताछ के दौरान ओलंपिक कांस्य पदक विजेता बॉक्सर विजेंदर सिंह और उनके स्पैरिंग पार्टनर राम सिंह का नाम सामने आया. इसके बाद यह मामला पूरे देश की खबर बन गया.
इसके बाद लगातार गिरफ्तारियां हुईं और ज्यादा ड्रग्स बरामद हुए. पुलिस ने इसे देश में 6,000 करोड़ रुपये के ड्रग नेटवर्क का खुलासा बताया. इसके तार कनाडा, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के ड्रग तस्करों से जुड़े बताए गए. उस समय सुखबीर बादल गृह मंत्री थे और पंजाब पुलिस ने मोहाली, पटियाला और फतेहगढ़ साहिब में दर्ज कई मामलों में पूरे भारत से 75 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया.
पंजाब पुलिस ने भोला को करोड़ों रुपये के ड्रग गिरोह का मुख्य सरगना बताया. नौ महीने तक पीछा करने के बाद नवंबर 2013 में भोला को हरियाणा से गिरफ्तार कर लिया गया.
भोला से पूछताछ के आधार पर पुलिस ने माझा इलाके के दो अकाली नेताओं, जगजीत सिंह चहल और मनजिंदर सिंह बिट्टू औलख को गिरफ्तार किया. पुलिस का आरोप था कि वे भोला को सिंथेटिक ड्रग ‘आइस’ बनाने के लिए केमिकल सप्लाई करते थे.
नवंबर 2013 में चहल और औलख की गिरफ्तारी के कुछ ही दिनों बाद, कोर्ट में पेशी के लिए ले जाते समय भोला ने मजीठिया का नाम लिया और कहा कि वह उस ड्रग नेटवर्क में शामिल थे जिसके लिए भोला को गिरफ्तार किया गया था. इसके बाद मजीठिया के लिए राजनीतिक संकट खड़ा हो गया. उस समय वह प्रकाश सिंह बादल की अगुवाई वाली SAD-BJP सरकार में मंत्री थे. 2014 के लोकसभा चुनाव की तैयारी कर रही कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने मजीठिया पर जोरदार हमला शुरू कर दिया.
इस बढ़ते विवाद के बीच मानवाधिकार संगठन लॉयर्स फॉर ह्यूमन राइट्स इंटरनेशनल यानी LFHRI ने पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट का रुख किया. संगठन ने भोला के आरोपों की पूरी जांच की मांग की. हालांकि, कोर्ट ने पंजाब में नेताओं, पुलिस और ड्रग डीलरों के कथित गठजोड़ पर चल रही एक जनहित याचिका यानी PIL में LFHRI को शामिल तो किया, लेकिन जांच को केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI को नहीं सौंपा.
2014 में भोला के मामले को इस PIL के साथ जोड़ दिया गया. 2017 में राज जीत के मामले को भी इसमें शामिल कर लिया गया.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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