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Friday, 14 August, 2026
होमदेश‘ताकि वे जनता की सेवा कर सकें’: मुजफ्फरनगर दंगे में BJP नेताओं के खिलाफ केस वापस लेने की मंजूरी मिली

‘ताकि वे जनता की सेवा कर सकें’: मुजफ्फरनगर दंगे में BJP नेताओं के खिलाफ केस वापस लेने की मंजूरी मिली

यूपी कोर्ट ने कहा है कि यह मामला 'पूरी तरह से राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से प्रेरित' है. राहत पाने वालों में यूपी के मंत्री कपिल देव अग्रवाल, पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान और एसपी सांसद हरेंद्र मलिक शामिल हैं.

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नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में बीजेपी के 10 नेताओं, जिनमें राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार कपिल देव अग्रवाल और विधान परिषद सदस्य (MLC) अशोक कटारिया शामिल हैं, और मुजफ्फरनगर से समाजवादी पार्टी के सांसद हरेंद्र मलिक को मुजफ्फरनगर की विशेष MP/MLA कोर्ट से राहत मिली है. कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को 2013 के मुजफ्फरनगर सांप्रदायिक दंगों से जुड़े उनके खिलाफ दर्ज केस को वापस लेने की अनुमति दे दी है.

इस मामले में 20 आरोपी थे. इनमें पूर्व बीजेपी विधायक उमेश मलिक और अशोक कंसल, बीजेपी नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान, बीजेपी के पूर्व यूपी मंत्री सुरेश राणा, बीजेपी के पूर्व सांसद कुंवर भारतेंद्र सिंह और सोहनवीर सिंह, बीजेपी के पूर्व मुजफ्फरनगर जिला अध्यक्ष यशपाल पंवार और विश्व हिंदू परिषद की नेता साध्वी प्राची जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं. अन्य आरोपियों में कल्लू, योगेश, सचिन, रविंद्र, मिंटू, श्यामपाल, बिट्टू, आचार्य दीपक सरसिन्हा उर्फ दीपक त्यागी और शिवकुमार शामिल हैं.

मुजफ्फरनगर की विशेष कोर्ट ने कहा कि केस वापस लेने से आरोपियों को “जनता और समाज की ज्यादा समर्पण के साथ सेवा करने” का मौका मिलेगा. कोर्ट ने अभियोजन को केस वापस लेने की अनुमति दे दी.

12 अगस्त को अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और MP-MLA कोर्ट के जज देवेंद्र कुमार फौजदार ने अपने आदेश में कहा, “ऊपर बताए गए सम्मानित कानूनी सिद्धांतों और मौजूदा मामले के तथ्यों को देखने से पता चलता है कि फिलहाल परिस्थितियां बदल गई हैं और वर्तमान स्थिति में समाज में कोई सांप्रदायिक अस्थिरता नहीं है. FIR की सामग्री देखने से पता चलता है कि यह मामला पूरी तरह राजनीतिक दुश्मनी से प्रेरित था और इस मामले में कोई बड़ा मुद्दा शामिल नहीं है.”

मुजफ्फरनगर दंगों से जुड़े नेताओं के खिलाफ इस मामले में अभियोजन पक्ष ने इस साल 10 मार्च को CrPC की धारा 321 के तहत केस वापस लेने के लिए आवेदन दिया था. इस आवेदन में सरकार के इस फैसले की जानकारी दी गई थी कि वह इस मामले में अभियोजन वापस लेना चाहती है. इसमें यह भी कहा गया था कि राज्यपाल ने मामले में अभियोजन वापस लेने के लिए कोर्ट में आवेदन देने की लिखित अनुमति दे दी थी.

जज ने केस वापस लेने की अनुमति देते हुए कहा कि रिकॉर्ड देखने से साफ पता चलता है कि “यह मामला सामान्य प्रकृति का है और राजनीतिक दुश्मनी और विरोध के कारण दर्ज किया गया था.”

कोर्ट ने कहा, “अगर इस मामले में आरोपियों के खिलाफ अभियोजन वापस लेने की अनुमति दी जाती है, तो वे जनता और समाज की ज्यादा समर्पण के साथ सेवा कर सकेंगे. ऊपर बताए गए मामले में अभियोजन वापस लेने से विवाद खत्म होगा और दोनों पक्षों के बीच अच्छे संबंध बनेंगे. इससे निश्चित रूप से जनता के हित और न्याय के हित को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी.”

‘न्याय के हित में’

यह मामला 31 अगस्त 2013 की एक घटना से जुड़ा था. आरोप था कि हिंदू समुदाय के कुछ लोगों ने नंगला मंदौड़ में भारतीय इंटर कॉलेज के सामने स्कूल के मैदान में एक बैठक करने के लिए प्रशासन से अनुमति मांगी थी. लेकिन जिले में CrPC की धारा 144 के तहत प्रतिबंधात्मक आदेश लागू होने के कारण प्रशासन ने अनुमति नहीं दी थी.

हालांकि, आरोप लगाया गया कि हजारों लोग ट्रैक्टर-ट्रॉलियों, कारों, मोटरसाइकिलों और पैदल भारतीय इंटर कॉलेज के मैदान में इकट्ठा हुए. उन्होंने बैरिकेड हटाए, पुलिस का रास्ता रोका और भड़काऊ भाषण दिए, जिनसे एक खास समुदाय के खिलाफ नफरत फैली.

उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 188 के तहत सरकारी कर्मचारी की ओर से जारी आदेश का पालन न करने, धारा 341 के तहत गलत तरीके से रास्ता रोकने और धारा 353 के तहत सरकारी कर्मचारी को उसका काम करने से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल का इस्तेमाल करने के आरोप में मुकदमा चल रहा था. इसके साथ ही आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम की धारा 7 के तहत किसी व्यक्ति को उसके रोजगार या कारोबार को नुकसान पहुंचाने के लिए परेशान करने का आरोप भी था.

अभियोजन पक्ष ने कोर्ट को बताया कि संबंधित घटना भीड़ को भड़काने का नतीजा थी और आरोपियों की ओर से किए गए कथित काम किसी व्यक्तिगत दुश्मनी या मकसद से प्रेरित नहीं थे.

इसलिए उन्होंने “मामले की प्रकृति को देखते हुए, जनहित और न्याय के हित में” केस वापस लेने की अनुमति मांगी थी, ऐसा आदेश में कहा गया है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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