हैदराबाद: आंध्र प्रदेश स्वच्छता व्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए कचरा प्रबंधन को इसमें शामिल कर रहा है और सभी सफाई कर्मचारियों को एक ही व्यवस्था के तहत लाने की दिशा में काम कर रहा है.
सरकार की कचरा प्रबंधन की पहल क्लीन केरल कंपनी लिमिटेड से सीख लेते हुए, जिसमें समुदायों को शामिल करके पूरी तरह से कचरा प्रबंधन किया जाता है, स्वच्छ आंध्र कॉरपोरेशन (SAC) अपने पुराने पड़े सभी कचरे को साफ करने की योजना बना रहा है. इसका लक्ष्य 2030 तक औद्योगिक क्षेत्रों में लैंडफिल पर निर्भरता को पूरी तरह खत्म करना है. स्वच्छ आंध्र कॉरपोरेशन के चेयरमैन कोम्मारेड्डी पट्टाभि राम ने दिप्रिंट को यह जानकारी दी.
SAC को केंद्र और राज्य सरकार दोनों से फंड मिलता है.
आंध्र प्रदेश की कचरा प्रबंधन व्यवस्था को औपचारिक बनाने की योजना के तीन हिस्से हैं: पहला, 1,500 किलो पुराने कचरे को हटाना और यह सुनिश्चित करना कि उसके डंपयार्ड साफ किए जाएं; दूसरा, पूरे कचरे को बायो-माइनिंग के जरिए प्रोसेस करके ईंधन तैयार करना; और तीसरा, एक ऐप के जरिए पूरा कचरा इकट्ठा करने की एक समान व्यवस्था बनाना, जिसमें लोग सीधे अपने घर से कचरा उठवाने की सुविधा ले सकेंगे.
तेलुगु देशम पार्टी (TDP) के राष्ट्रीय प्रवक्ता और चेयरपर्सन पट्टाभि राम ने दिप्रिंट को बताया कि आंध्र और पूरे भारत में कचरा संभालने की व्यवस्था अलग-अलग हिस्सों में बंटी हुई और काफी हद तक अनौपचारिक है. इसमें जवाबदेही और काम करने की क्षमता भी कम है.
उन्होंने कहा, “स्वच्छ आंध्र मिशन के जरिए हमारी पहल सिर्फ स्पष्ट लाइसेंस, डिजिटल रिकॉर्ड और अलग कलेक्शन नेटवर्क के जरिए इस क्षेत्र को व्यवस्थित नहीं करेगी, बल्कि ट्रक-दर-ट्रक और हाथों-हाथ कचरा पहुंचाने की व्यवस्था को एक ऐसी व्यवस्थित और जांची जा सकने वाली व्यवस्था में बदलेगी, जो लोगों की आजीविका को सुरक्षित करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि कोई भी संसाधन बेकार न जाए.”
इससे जुड़ी बड़ी नीति राज्य की ‘सर्कुलर इकोनॉमी पॉलिसी’ है, जिसे आंध्र प्रदेश ने अगस्त 2025 में लागू किया था. इसका मकसद एक समान और एकीकृत सर्कुलर इकोनॉमी और कचरा रीसाइक्लिंग नीति अपनाना है. इसमें नीति आयोग की ओर से बताए गए औद्योगिक कचरे के सभी 11 प्रकारों पर ध्यान दिया गया है. इनमें प्लास्टिक, ई-कचरा, इस्तेमाल किया हुआ तेल, ELV, बैटरी, कपड़ा, टायर, बायोमास और धातु शामिल हैं.
इसके अलावा, आंध्र प्रदेश ऐसी व्यापक नीति लागू करने वाला पहला राज्य होने के साथ-साथ इसमें राज्य से जुड़े क्षेत्रों को भी शामिल किया गया है. उद्योग एवं वाणिज्य विभाग की ओर से जारी नीति दस्तावेज के अनुसार, इनमें पशुपालन और मछली पालन से निकलने वाला कचरा भी शामिल है.
पुराने कचरे को साफ करना
चेयरपर्सन ने बताया कि 125 शहरी स्थानीय निकायों और 660 मंडलों में हर दिन 7,500 टन से ज्यादा कचरा पैदा होता है. ऐसे में स्वच्छ आंध्र कॉरपोरेशन की प्राथमिकता बड़े शहरों और कस्बों के बाहर बने बड़े डंपयार्ड में जमा 1.5 टन पुराने कचरे को साफ करना है.
बेंगलुरु, मुंबई और पुणे के उलट, जहां घरों में पहले से ही कचरे को अलग-अलग करने की साफ व्यवस्था है, आंध्र के शहर अभी इस मामले में पीछे हैं. इसलिए आंध्र अपने सभी नगरपालिकाओं और कॉरपोरेशनों में कचरा अलग करने वाले प्लांट लगाने के लिए करीब 550 करोड़ रुपये खर्च करेगा. यहां घरों से इकट्ठा किए गए कचरे को अलग-अलग किया जाएगा और उसकी प्रकृति के हिसाब से अलग-अलग ट्रीटमेंट प्लांट में भेजा जाएगा.
जब कचरे को जैविक और गैर-जैविक कचरे में अलग कर दिया जाएगा, तो गैर-रीसाइकिल होने वाले सूखे कचरे को गुंटूर और विशाखापत्तनम में बने दो वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट में भेजा जाएगा. ये प्लांट हर दिन 1,200 टन से ज्यादा कचरे को प्रोसेस कर सकते हैं. इस कचरे को रिफ्यूज-डिराइव्ड फ्यूल (RDF) में बदला जाता है. इसका इस्तेमाल बिजली संयंत्रों में ईंधन के तौर पर किया जाता है और निजी कंपनियों के साथ किए गए पावर परचेज एग्रीमेंट (PPA) के जरिए यह बिजली ग्रिड को बेची जाती है.
डंपयार्ड को जल्दी साफ करने की प्रक्रिया तेज करने के लिए SAC कडपा, कुरनूल, नेल्लोर और काकीनाडा में चार और कचरा ट्रीटमेंट प्लांट लगाने में मदद करेगा. SAC के अधिकारियों ने दिप्रिंट को बताया कि हर प्लांट पर 300-350 करोड़ रुपये खर्च होंगे.
इन प्लांट को निजी कंपनियां लगाएंगी. राज्य सरकार 50-60 करोड़ रुपये की व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (VGF) देगी और बाकी रकम निजी कंपनी लगाएगी.
गीले कचरे को बायोफ्यूल या बेहतर गुणवत्ता वाली खाद में बदला जाएगा. इसके बाद इसे मार्कफेड कॉरपोरेशन के जरिए किसानों को बेचा जाएगा. अधिकारियों के मुताबिक, आंध्र के घरों से निकलने वाले कचरे से हर साल 3 लाख टन से ज्यादा जैविक खाद बनाई जा सकती है. SAC ने गीले कचरे को खाद में बदलने में मदद के लिए आचार्य एनजी कृषि विश्वविद्यालय के साथ समझौता किया है.
पट्टाभि राम ने कहा, “आंध्र में आर्थिक विकास की नींव औद्योगीकरण है, लेकिन हम यह भी सुनिश्चित करना चाहते हैं कि कचरे से पैदा होने वाली गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने वाला पहला राज्य भी हम ही हों. हमारा लक्ष्य ‘इस्तेमाल करो और फेंक दो’ वाली व्यवस्था से ‘इस्तेमाल करो, वापस हासिल करो और दोबारा इस्तेमाल करो’ वाली व्यवस्था की ओर बढ़ना है.”
कचरा इकट्ठा करने के लिए ऐप
SAC का एक बड़ा लक्ष्य यह भी है कि कूड़ा बीनने वालों, कबाड़ बीनने वालों और सफाई कर्मचारियों के साथ सम्मान से व्यवहार हो और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाया जाए. इसके लिए उनके काम को संगठित क्षेत्र के तहत लाया जा रहा है. पहला कदम यह सुनिश्चित करना है कि इन कर्मचारियों द्वारा इकट्ठा किया गया कचरा व्यापारियों और बिचौलियों के बजाय सीधे नगरपालिकाओं को बेचा जाए.
SAC के एक अधिकारी ने कहा, “व्यापारी कूड़ा और प्लास्टिक कबाड़ बीनने वालों से 10 रुपये प्रति किलो खरीदते हैं और इसे रीसाइक्लिंग कंपनियों को 40 रुपये प्रति किलो में बेचते हैं. इस प्रक्रिया से बिचौलियों को हटाने के लिए हम कबाड़ बीनने वालों के लिए विकासशील ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और बच्चों का विकास (DWCRA) या स्वयं सहायता समूह (SHG) मॉडल जैसी सहकारी समितियां बनाने की कोशिश कर रहे हैं. एक बार ये समूह एक संस्था बन जाएंगे, तो आर्थिक रूप से सबसे कमजोर तबके के कर्मचारियों के बैंक खाते खोलना और उन्हें इसका लाभ सीधे देना आसान होगा.”
SAC की वेबसाइट पर एक डैशबोर्ड होगा, जिसमें हर नगरपालिका में इकट्ठा और अलग किए गए कचरे की मात्रा और श्रेणी की जानकारी होगी. इससे रीसाइक्लिंग कंपनियां स्थानीय निकायों से सीधे कचरा खरीद सकेंगी. सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC) के शहरी आंकड़ों के अनुसार, आंध्र प्रदेश में करीब 94,713 प्राथमिक शहरी परिवारों या व्यक्तियों की आय का मुख्य स्रोत सफाई का काम था.
इसी के साथ घरों से समय-समय पर कागज, प्लास्टिक, मेडिकल और ई-कचरा सीधे इकट्ठा करने के लिए एक मोबाइल ऐप तैयार किया जा रहा है. जिन घरों या दफ्तरों में कम से कम 10 किलो कचरा फेंकने के लिए हो, वे ऐप पर इसे उठाने का अनुरोध कर सकते हैं. इसके बाद कचरा उठाने वाले लॉजिस्टिक्स कर्मचारी घर से कचरा ले जाएंगे. इस ऐप को खास तौर पर भारत के नए सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2026 के अनुसार तैयार किया गया है. ये नियम 1 अप्रैल से लागू हुए हैं और पुराने 2016 के नियमों की जगह लाए गए हैं.
चार तरह के कचरे को अलग करने की व्यवस्था के अलावा, नए नियमों में एक ऑनलाइन पोर्टल की भी व्यवस्था की गई है, जहां ठोस कचरे के पूरे जीवनचक्र, उसके संग्रह और प्रोसेसिंग की जानकारी दिखाई जाएगी.
नए नियमों के तहत ‘पॉल्यूटर-पेज-प्रिंसिपल’ भी लागू किया गया है. इसके तहत कचरा अलग करने के नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों और संस्थानों पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (PCB) सख्त शुल्क लगा सकते हैं.
अधिकारी ने दिप्रिंट को बताया, “ऐसे मामलों में यह ऐप बड़े दफ्तरों और गेटेड सोसाइटियों के लिए मददगार हो सकता है, जहां बड़ी मात्रा में कचरा पैदा होता है. वे राज्य की ओर से संचालित सुविधाओं के जरिए समय पर कचरा इकट्ठा करवाकर उसे सही तरीके से फेंक सकेंगे.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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