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Monday, 18 May, 2026
होमदेशभोजशाला फैसले की पड़ताल: कैसे MP हाईकोर्ट ने अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ‘मार्गदर्शक’ माना

भोजशाला फैसले की पड़ताल: कैसे MP हाईकोर्ट ने अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ‘मार्गदर्शक’ माना

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने शुक्रवार को धार स्थित विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को वाग्देवी (देवी सरस्वती) को समर्पित एक मंदिर घोषित कर दिया, जिससे वहां की साझा पूजा की स्थिति समाप्त हो गई.

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नई दिल्ली: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने शुक्रवार को धार स्थित विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को वाग्देवी यानी देवी सरस्वती को समर्पित मंदिर घोषित कर दिया. अदालत ने कहा कि यह जगह, जिसे 1904 से ब्रिटिश दौर के स्मारक संरक्षण कानून के तहत संरक्षित किया गया था, अब भी प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958 के दायरे में आती है.

इसी वजह से अदालत ने कहा कि 15 अगस्त 1947 तक पूजा स्थलों की धार्मिक स्थिति को जस का तस बनाए रखने वाले पूजा स्थल अधिनियम, 1991 का इस जगह पर कोई असर नहीं पड़ता.

यह फैसला मस्जिद कमेटी के वकील की उस दलील के जवाब में आया, जिसमें कहा गया था कि 1947 में इस जगह पर मुस्लिम नमाज पढ़ते थे, इसलिए इसकी पहचान मस्जिद के रूप में तय मानी जाएगी. लेकिन अदालत ने कहा कि यह जगह दूसरे कानून के तहत आती है, इसलिए 1991 के कानून के प्रावधान यहां लागू नहीं होंगे.

इस फैसले के साथ परिसर में मंदिर और मस्जिद दोनों के रूप में चल रही साझा पूजा व्यवस्था प्रभावी तौर पर खत्म हो गई. हाई कोर्ट ने अपने फैसले का आधार सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले में दिए गए 10 सिद्धांतों को बनाया और 2019 के फैसले को “मार्गदर्शक” माना. अदालत ने कहा कि धार्मिक चिन्हों और पुराने ढांचों से जुड़े पुरातात्विक सबूत यह तय करने में “बहुत अहम” हैं कि धार्मिक अधिकार किसके हैं.

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में सबूत का मानक “पूरी गणितीय निश्चितता” नहीं, बल्कि “संभावना का संतुलन” होता है. अयोध्या फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने कहा, “आधुनिक अदालतों का काम धार्मिक पूर्णता तय करना नहीं, बल्कि आस्था और विश्वास के सबूत देखना है.”

हालांकि इससे पहले कई वकीलों ने इस मामले और अयोध्या विवाद के बीच अंतर पर जोर दिया था. उन्होंने कहा था कि अयोध्या मामले में पूरी सिविल ट्रायल हुई थी, गवाहों और दस्तावेजी सबूतों की जांच हुई थी और मामला अपील के रूप में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था. यह भी कहा गया था कि अयोध्या फैसला ऐसा लाइसेंस नहीं बन सकता कि हर धार्मिक विवाद को सीधे अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका में उठाया जाए.

इन दलीलों के उलट हाई कोर्ट ने कहा कि भोजशाला मामला पारंपरिक “मालिकाना विवाद” नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिले “पूजा के मौलिक अधिकार” की सुरक्षा का मामला है. अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 226 की “विशेष और व्यापक शक्ति” उसे हस्तक्षेप करने का अधिकार देती है जब मौलिक अधिकार दांव पर हों.

अदालत ने यह भी कहा कि यह मामला “मौजूदा सामग्री” जैसे गजेटियर, ऐतिहासिक रिकॉर्ड और एएसआई के नए वैज्ञानिक सर्वे के आधार पर तय किया जा सकता है, इसलिए अयोध्या मामले जैसी पूरी सिविल ट्रायल जरूरी नहीं थी. यानी अदालत ने अयोध्या फैसले के सिद्धांत अपनाए, लेकिन वही प्रक्रिया नहीं अपनाई.

मौजूदा विवाद

यह विवाद एक ऐसे परिसर को लेकर है, जिसे हिंदू समुदाय सरस्वती सदन बताता है. उनका कहना है कि यह 11वीं सदी में परमार वंश के राजा भोज द्वारा बनाया गया संस्कृत शिक्षा और पूजा का केंद्र था. वहीं मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद कहता है, जहां उसके अनुसार सदियों से नमाज पढ़ी जाती रही है.

शुक्रवार के फैसले की तुरंत वजह 2022 में दायर याचिकाएं थीं. इनमें हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस नाम के संगठन की याचिका प्रमुख थी. इसमें 2003 के भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें हिंदुओं को मंगलवार और बसंत पंचमी पर पूजा की अनुमति दी गई थी, जबकि मुसलमानों को हर शुक्रवार नमाज पढ़ने की इजाजत थी. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत मिले उनके धार्मिक अधिकार का उल्लंघन है और पूरे संरक्षित स्मारक को सिर्फ हिंदू पूजा के लिए आरक्षित किया जाना चाहिए.

जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने स्थल का दौरा करने के बाद कहा कि यह मानने की “कोई वजह नहीं है” कि विवादित जगह भोजशाला नहीं है, जहां “मां सरस्वती का मंदिर” था. इस तरह अदालत ने इस जगह को “सांप्रदायिक विवाद वाले स्मारक” से बदलकर पूरी तरह मान्यता प्राप्त हिंदू धार्मिक और शैक्षणिक केंद्र बना दिया और उसकी पहचान को लेकर लंबे समय से चली आ रही कानूनी अस्पष्टता खत्म कर दी.

दोनों पक्षों ने क्या दलील दी

हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस और अन्य पक्षों के वकीलों ने कहा कि 1034 ईस्वी में बनने के बाद से इस जगह में “हिंदू मंदिर की सभी विशेषताएं” रही हैं. उनकी मुख्य कानूनी दलील थी कि “एक बार संपत्ति देवता की हो जाए, तो बाद में चाहे नुकसान हो या आक्रमणकारियों द्वारा तोड़फोड़, वह संपत्ति देवता की ही रहती है.”

ऐतिहासिक रिकॉर्ड पेश कर यह दावा किया गया कि इस मंदिर को इस्लामी शासकों ने तोड़कर उसी सामग्री से मस्जिद बनाई थी. उन्होंने फर्श पर बने “यंत्र और संस्कृत श्लोक”, नक्काशीदार खंभे और परिसर में मिली “खंडित मूर्तियों” को इस बात का सबूत बताया कि इस ढांचे की मूल पहचान मस्जिद नहीं थी. यह भी कहा गया कि गैर-वक्फ जमीन पर कानूनी रूप से मस्जिद नहीं हो सकती और चूंकि यह जमीन देवता की थी, इसलिए यहां वैध वक्फ संपत्ति बन ही नहीं सकती थी.

दूसरी तरफ मस्जिद कमेटी के वकीलों ने कहा कि यह जगह कई सदियों से मस्जिद प्रबंधन के “लगातार, शांतिपूर्ण और बिना रुकावट कब्जे” में रही है. उन्होंने 1935 की धार रियासत की अधिसूचना का हवाला दिया, जिसमें इस ढांचे को कानूनी रूप से मस्जिद माना गया था.

उन्होंने पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 का सहारा लिया, जो 15 अगस्त 1947 तक किसी भी पूजा स्थल की धार्मिक पहचान को स्थिर मानता है. उनका कहना था कि चूंकि उस तारीख पर यहां नमाज पढ़ी जाती थी, इसलिए इसकी पहचान मस्जिद के रूप में चुनौती नहीं दी जा सकती.

इसके अलावा उन्होंने कहा कि मूर्तियों या पुराने स्थापत्य अवशेषों की मौजूदगी से मौजूदा मालिकाना हक तय नहीं होता, क्योंकि कई मध्यकालीन इमारतों में पुराने खंडहरों की सामग्री इस्तेमाल की गई थी, लेकिन इससे इमारत की धार्मिक पहचान नहीं बदल जाती.

ASI का वैज्ञानिक सर्वे

इस मामले में सबसे अहम मोड़ तब आया जब हाई कोर्ट ने एएसआई को आधुनिक तकनीकों जैसे जीपीआर यानी ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार और कार्बन डेटिंग का इस्तेमाल करते हुए “पूरी वैज्ञानिक जांच, सर्वे और खुदाई” करने का आदेश दिया. 2024 में सौंपी गई 10 खंडों वाली रिपोर्ट ने शुक्रवार के फैसले की बुनियाद तैयार की.

इस दौरान एएसआई की रिपोर्ट में साफ कहा गया कि मौजूदा स्मारक सीधे एक “पहले से मौजूद बड़े ढांचे” के ऊपर बनाया गया था, जो 10वीं-11वीं सदी के परमार काल का था. सर्वे में 94 मूर्तियां और उनके टुकड़े मिले, जिनमें विष्णु, गणेश, ब्रह्मा और नरसिंह की आकृतियां शामिल थीं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि मस्जिद की वास्तुकला में इंसानों और जानवरों की ऐसी आकृतियां सख्ती से प्रतिबंधित होती हैं.

150 से ज्यादा संस्कृत और प्राकृत शिलालेख मिलने के बाद, जिनमें “शारदा सदन” यानी शारदा या सरस्वती के घर का उल्लेख करने वाले साहित्यिक लेख भी शामिल थे, एएसआई ने निष्कर्ष निकाला कि मिहराब जैसी मस्जिद की विशेषताएं बाद में पहले से मौजूद मंदिर ढांचे में जोड़ी गई थीं.

अदालत ने कहा कि मौजूदा ढांचा मूल रूप से “पहले के मंदिरों के हिस्सों से बनाया गया” था. मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों की रक्षा और दोनों पक्षों के बीच “पूर्ण न्याय सुनिश्चित” करने के लिए अदालत ने छह क्रॉस याचिकाओं का निपटारा किया.

अदालत ने पूजा स्थल अधिनियम की कैसे व्याख्या की

एक बड़ा सवाल यह था कि क्या पूजा स्थल अधिनियम, 1991 हाई कोर्ट को इस जगह को मंदिर घोषित करने से रोक सकता है. लेकिन अदालत ने 1991 के कानून की धारा 4(3) लागू करते हुए इस सवाल का जवाब दिया. इस धारा में साफ कहा गया है कि प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल एवं अवशेष अधिनियम, 1958 के तहत आने वाले स्मारकों पर यह कानून लागू नहीं होगा.

अदालत ने कहा कि भोजशाला 18 मार्च 1904 से संरक्षित स्मारक रही है और बाद में इसे 1958 के कानून के तहत भी जारी रखा गया. इसलिए “1991 कानून के तहत कानूनी रोक” इस मामले पर लागू नहीं होती. इसी वजह से अदालत ने 1947 में वहां क्या इस्तेमाल हो रहा था, इसके बजाय उस जगह के “असल” ऐतिहासिक स्वरूप के आधार पर फैसला किया.

सरकार के लिए अदालत के आदेश

हाई कोर्ट ने 7 अप्रैल 2003 के एएसआई आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें शुक्रवार को नमाज और मंगलवार को हिंदू पूजा की अनुमति दी गई थी. अदालत ने मुस्लिम समुदाय को परिसर में नमाज पढ़ने की अनुमति भी खत्म कर दी और कहा कि 20वीं सदी के रिकॉर्ड में इस जगह को मस्जिद बताना एक प्रशासनिक गलती थी, क्योंकि 1958 कानून की धारा 16 के तहत “जगह की असली पहचान तय करने की कानूनी जिम्मेदारी” पूरी नहीं की गई थी.

इस जगह को हिंदू मंदिर घोषित करते हुए दो जजों की बेंच ने कहा कि इसका प्रबंधन उसी रूप में किया जाए. पूजा का रोज का कार्यक्रम प्रशासन तय करेगा, लेकिन इस फैसले से वे पाबंदियां प्रभावी रूप से हट गईं, जो हिंदुओं को हर दिन पूजा करने से रोकती थीं.

अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह “भोजशाला मंदिर और संस्कृत शिक्षा के प्रबंधन और प्रशासन” को लेकर फैसला करे.

इसके अलावा अदालत ने भारत सरकार को निर्देश दिया कि वह “लंदन म्यूजियम से देवी सरस्वती की प्रतिमा वापस लाने के लिए हर संभव कोशिश करे” और उसे फिर से इस परिसर में स्थापित करे. वहीं एएसआई को 1958 के प्राचीन स्मारक कानून के तहत इस जगह के प्रबंधन और संरक्षण का काम जारी रखने का निर्देश दिया गया है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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