नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश सरकार ने बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में गौतम बुद्ध नगर की जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम की भूमिका का बचाव किया. मामला दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा आकृति चौधरी के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाने से जुड़ा है.
चौधरी पर 13 अप्रैल को नोएडा में मजदूरों की वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन के बाद हुई हिंसा भड़काने का आरोप है. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2 सितंबर को चौधरी की NSA के तहत हिरासत रद्द कर दी थी और जिला मजिस्ट्रेट की ओर से इसे मंजूरी देने की आलोचना की थी.
बुधवार को सुनवाई के दौरान IAS अधिकारी मेधा रूपम के वकील ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट को किसी आदेश को रद्द करने का पूरा अधिकार है, लेकिन वह किसी एक सरकारी अधिकारी को निशाना बनाकर उसकी आलोचना नहीं कर सकता. वहीं, आकृति चौधरी के वकील ने उसकी हिरासत के आधार को चुनौती दी. उन्होंने कहा कि हिंसा होने से पहले ही चौधरी पुलिस हिरासत में थी.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “आप उन्हें अलग करके कैसे 5 लाख रुपये का जुर्माना लगा सकते हैं.” कोर्ट ने मामले को अंतरिम आदेश के लिए सुरक्षित रख लिया और चौधरी के वकील से राज्य सरकार और मेधा रूपम की ओर से दाखिल अपीलों पर लिखित जवाब देने को कहा. चौधरी के वकील ने माना कि जिला मजिस्ट्रेट अकेले इसके लिए जिम्मेदार नहीं थीं. लेकिन उन्होंने रूपम के आदेश को पढ़कर बताया कि इसमें जरूरी तथ्यों को नजरअंदाज किया गया था और उनकी मुवक्किल की विचारधारा को “घृणित” बताया गया था.
कोर्ट में IAS अधिकारी का मामला एक अहम कानूनी सवाल उठाता है. क्या किसी ऐसे अधिकारी को, जिसने वैधानिक अधिकार का इस्तेमाल किया हो, किसी निवारक हिरासत के आदेश के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?
सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2 सितंबर के आदेश को चुनौती दी. हाई कोर्ट ने चौधरी के खिलाफ NSA के तहत हिरासत का आदेश रद्द करते हुए उन्हें रिहा करने का निर्देश दिया था, जब तक कि किसी दूसरे मामले में उनकी जरूरत न हो. इसी आदेश में हाई कोर्ट ने IAS अधिकारी मेधा रूपम को गैरकानूनी हिरासत के लिए जिम्मेदार ठहराया था और उनके वेतन से 5 लाख रुपये काटकर चौधरी को मुआवजे के तौर पर देने का आदेश दिया था.
राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने बुधवार को कहा कि हाई कोर्ट का फैसला सही दिशा में नहीं था, क्योंकि उसने हिरासत के आदेश की स्वतंत्र रूप से जांच नहीं की. उन्होंने यह भी कहा कि निवारक हिरासत का आदेश जारी करने की प्रक्रिया कई स्तरों वाली होती है और जिला मजिस्ट्रेट इसमें शामिल अधिकारियों में से सिर्फ एक होती हैं.
जस्टिस एस.सी. शर्मा और एन.के. सिंह की पीठ को इस प्रक्रिया के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि एक पूर्व हाई कोर्ट जज की अध्यक्षता वाली सलाहकार समिति ने कारण बताते हुए हिरासत को मंजूरी दी थी. वरिष्ठ वकील ने कहा, “पूरी व्यवस्था एक व्यक्ति के फैसले पर नहीं चली. एक हाई कोर्ट जज, जो सलाहकार बोर्ड के अध्यक्ष थे, ने इसे मंजूरी दी. इसके बाद राज्य ने और फिर केंद्र ने इसे मंजूरी दी. इस युवा महिला अधिकारी पर आरोप क्यों लगाया जा रहा है? जब वह पूरी प्रक्रिया की सिर्फ एक कड़ी थीं तो उन पर जुर्माना क्यों लगाया जाए? किसी ने उस सलाहकार समिति को जिम्मेदार नहीं ठहराया, जिसमें एक पूर्व हाई कोर्ट जज शामिल थे.”
अपने फैसले में हाई कोर्ट ने रूपम की आलोचना करते हुए उनके आचरण को “उपहास के योग्य” बताया था, क्योंकि उन्होंने अदालत के मुताबिक मनमाने तरीके से निवारक हिरासत का आदेश दिया था.
रोहतगी ने पीठ को सलाहकार बोर्ड की भूमिका के बारे में बताया. इस बोर्ड की अध्यक्षता आमतौर पर किसी पूर्व हाई कोर्ट जज के पास होती है और कुछ मामलों में इसमें सिर्फ जज ही सदस्य हो सकते हैं. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और कई अन्य हाई कोर्ट पहले भी निवारक हिरासत के आदेश रद्द कर चुके हैं, लेकिन कभी सलाहकार समिति की इस तरह आलोचना नहीं की गई.
उन्होंने कहा कि निवारक हिरासत लगाने का अनुरोध पुलिस करती है और जिला मजिस्ट्रेट तक पहुंचने से पहले पुलिस व्यवस्था के भीतर चार अलग-अलग स्तरों पर इसकी जांच होती है. इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट इसे राज्यपाल के पास भेजती हैं. राज्यपाल इसे सलाहकार बोर्ड को भेजते हैं. बोर्ड किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के प्रस्ताव को मंजूर या खारिज करने के लिए कारणों वाला आदेश देता है. बोर्ड की राय मिलने के बाद फाइल राज्यपाल के पास वापस जाती है. राज्यपाल आदेश को अंतिम रूप देकर इसे केंद्र के पास भेजते हैं. केंद्र इसे मंजूर या खारिज कर सकता है.
रोहतगी ने पीठ को बताया कि इस मामले में हर स्तर के अधिकारी ने आकृति चौधरी को हिरासत में लेने की मंजूरी दी थी. उन्होंने कहा कि इसके खिलाफ उनकी ओर से दिया गया आवेदन भी खारिज कर दिया गया था.
वरिष्ठ वकील ने कहा कि हाई कोर्ट को किसी आदेश को रद्द करने का पूरा अधिकार है, लेकिन वह किसी एक अधिकारी को चुनकर उसकी आलोचना नहीं कर सकता. उन्होंने कहा, “यह व्यक्तिगत बदले या राजनीति का मामला नहीं है.” उन्होंने हाई कोर्ट के आदेश को भी चुनौती दी.
उन्होंने कहा कि जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम ने हिरासत के आदेश को लेकर अपने स्तर पर सोच-विचार किया था, लेकिन हाई कोर्ट ने इस पहलू को नजरअंदाज कर दिया. खासकर उस हिंसा को, जिसमें कई पुलिसकर्मी घायल हुए थे और सार्वजनिक ढांचे को नुकसान पहुंचा था.
रोहतगी ने कहा कि हाई कोर्ट ने हिरासत के आदेश का विश्लेषण करने और उसके सामने पुलिस की ओर से दाखिल जवाब पर विचार करने के बजाय चौधरी की गिरफ्तारी सही थी या नहीं, इस पर विचार किया, जबकि यह उसके सामने मुद्दा ही नहीं था. उन्होंने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने कार्यवाही का दायरा यह तय करना था कि NSA लगाने से पहले अधिकारियों ने जरूरी प्रक्रियात्मक सुरक्षा का पालन किया था या नहीं. मौजूदा मामले में ऐसा नहीं किया गया.
मेधा रूपम की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती दी. उन्होंने कहा कि IAS अधिकारी ने पुलिस की ओर से दी गई वास्तविक जानकारी के आधार पर हिरासत को लेकर अपनी संतुष्टि बनाई थी. मेहता ने कहा कि सभी जरूरी सुरक्षा उपायों का पूरी तरह पालन किया गया था, लेकिन हाई कोर्ट ने इस पहलू की जांच करने के बजाय गिरफ्तारी की कानूनी स्थिति पर विचार किया, चौधरी को लगभग जमानत दे दी और NSA का आदेश रद्द कर दिया.
कोर्ट को बताया गया कि चौधरी जेल में इसलिए हैं क्योंकि 10 और FIR में उनका नाम है और इन मामलों में उन्हें अभी जमानत नहीं मिली है.
‘कोई सबूत नहीं, 99 फीसदी दिखावटी कहानी’
आकृति चौधरी के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस ने जजों के सामने इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला रखा. हाई कोर्ट ने उन परिस्थितियों की विस्तार से जांच की थी, जिनके आधार पर NSA के तहत हिरासत का आदेश दिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि निवारक हिरासत खुफिया जानकारी के आधार पर भी की जा सकती है.
जस्टिस शर्मा और सिंह की पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट का दायरा सिर्फ यह देखने तक है कि प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन हुआ था या नहीं. उसे हिरासत में लिए गए व्यक्ति के खिलाफ जुटाए गए सबूतों के गुण-दोष में नहीं जाना चाहिए. हालांकि, गोंसाल्वेस ने इस बात का विरोध किया. उन्होंने कहा कि अगर तथ्यों से पता चलता है कि हिरासत कमजोर सबूतों के आधार पर की गई है, तो प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का पालन होने के बावजूद उसकी न्यायिक जांच से बचा नहीं जा सकता.
उन्होंने कहा कि चौधरी के खिलाफ लंबित अलग-अलग मामले 13 अप्रैल को हुई एक ही घटना से जुड़े हैं.
गोंसाल्वेस ने कहा कि हिरासत की पहली शर्त, यानी चौधरी ने भीड़ को भड़काया था, सही नहीं थी, क्योंकि हिंसा होने से पहले ही वह पुलिस हिरासत में थीं.
उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट ने राज्य से बार-बार वह भड़काऊ भाषण पेश करने को कहा था, जो चौधरी ने कथित तौर पर भीड़ को भड़काने और सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने के लिए दिया था.
हालांकि, जब पुलिस ऐसा नहीं कर सकी, तो चौधरी ने अपने भाषण की एक कॉपी अदालत के सामने रखी. उन्होंने कहा, “जज बार-बार पूछ रहे थे, ‘मुझे एक ग्राम सबूत दीजिए.’ एक माइक्रोग्राम भी सबूत नहीं दिया गया, बल्कि 99 फीसदी दिखावटी कहानी पेश की गई.” उन्होंने आगे कहा, “अगर मैंने हिंसा में बिल्कुल भी योगदान नहीं दिया, तो आप मुझे जेल में डालकर क्या कर रहे हैं.”
पीठ के इस सवाल पर कि हिरासत का आदेश किस आधार पर रद्द किया गया, गोंसाल्वेस ने कहा कि इसका कारण यह था कि चौधरी भीड़ में मौजूद ही नहीं थीं.
हालांकि, जब पीठ ने कहा कि जिला मजिस्ट्रेट ने पुलिस की ओर से उन्हें दिए गए नोट्स के आधार पर कार्रवाई की थी और सलाहकार समिति ने भी इस मामले को देखा था, तो गोंसाल्वेस ने इस बात पर सहमति जताई.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: BAPS एफिल टावर विवाद हिंदू vs बाकी लोगों का मुद्दा नहीं, मैं इसे गुजराती समस्या के तौर पर देखता हूं