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Wednesday, 14 October, 2026
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भारतीयों के लिए ब्रेस्ट कैंसर का टीका बनाने की 10 साल से कोशिश, IIT मद्रास में क्या हो रहा है?

नेशनल कैंसर टिशू बायोबैंक में, रिसर्चर ब्रेस्ट कैंसर के लिए एक एक्सपेरिमेंटल mRNA-बेस्ड वैक्सीन बनाने के लिए 10,000 कैंसर टिशू सैंपल की रिपॉजिटरी का इस्तेमाल कर रहे हैं.

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चेन्नई: फ्रीजर और स्टेनलेस स्टील के लिक्विड नाइट्रोजन टैंकों से भरे एक ठंडे कमरे में नंगे पैर चलते हुए इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) मद्रास के बायोटेक्नोलॉजी विभाग के प्रोफेसर एस. महालिंगम इन डिब्बों की ओर इशारा करते हैं और सात तक गिनते हैं.

उन्होंने कहा, “हमने चेन्नई के 12 से ज्यादा अस्पतालों के मरीजों से कैंसर के करीब 10,000 टिशू सैंपल इकट्ठा किए हैं.” टिशू के इन सैंपल को लिक्विड नाइट्रोजन के सात टैंकों में रखा गया है. वहीं, अलग-अलग फ्रीजर में, जहां तापमान बहुत कम रखा जाता है, खून के अलग-अलग हिस्सों और ट्यूमर के टिशू से निकाले गए DNA और RNA को रखा गया है.

यह नेशनल कैंसर टिशू बायोबैंक (NCTB) है, जिसे 2015 में आईआईटी मद्रास में बनाया गया था. बायोबैंक ऐसी व्यवस्थित जगह होती है, जहां ट्यूमर के टिशू, खून और DNA जैसे जैविक सैंपल इकट्ठा करके सुरक्षित रखे जाते हैं. इनके साथ मरीजों के मेडिकल रिकॉर्ड भी रखे जाते हैं, ताकि शोधकर्ता भविष्य में होने वाली रिसर्च में इनका इस्तेमाल कर सकें.

10 साल बाद अब शोधकर्ता NCTB में इकट्ठा किए गए सैंपल का इस्तेमाल करके ब्रेस्ट कैंसर के लिए मैसेंजर RNA (mRNA) पर आधारित एक प्रायोगिक टीका बना रहे हैं. mRNA टीका कोशिकाओं को एक खास प्रोटीन बनाने का निर्देश देता है. इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता उस चीज़ को पहचानना और उससे लड़ना सीखती है, जिसे निशाना बनाया गया है. आम टीकों के उलट, इसमें कोई जीवित या कमजोर किया गया वायरस नहीं होता.

प्रोफेसर महालिंगम ने दिप्रिंट को बताया, “हमने ट्यूमर के ऐसे एंटीजन की पहचान की है, जिनके बारे में दूसरे आबादी समूहों के आंकड़ों में पहले कभी जानकारी नहीं दी गई है. हमने ट्यूमर के ऐसे एंटीजन की भी पहचान की है, जिनके बारे में पहले ही जानकारी दी जा चुकी है.”

IIT मद्रास के बायोटेक्नोलॉजी विभाग के प्रोफेसर एस. महालिंगम बायोबैंक में. यहां ट्यूमर के टिशू को लिक्विड नाइट्रोजन के टैंकों में करीब माइनस 196 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखा जाता है. इस केंद्र में ऐसे सात टैंक हैं | फोटो: स्नेहा रिछारिया/दिप्रिंट
IIT मद्रास के बायोटेक्नोलॉजी विभाग के प्रोफेसर एस. महालिंगम बायोबैंक में. यहां ट्यूमर के टिशू को लिक्विड नाइट्रोजन के टैंकों में करीब माइनस 196 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखा जाता है. इस केंद्र में ऐसे सात टैंक हैं | फोटो: स्नेहा रिछारिया/दिप्रिंट

महालिंगम ने बताया कि ट्यूमर एंटीजन प्रोटीन या प्रोटीन के ऐसे हिस्से होते हैं, जिन्हें शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता पहचान सकती है. इनमें से कुछ तब बनते हैं, जब बदलावों के कारण कैंसर कोशिकाओं में बनने वाले प्रोटीन का रूप बदल जाता है. उन्होंने कहा, “म्यूटेशन कैंसर कोशिकाओं में बनने वाले प्रोटीन को बदल सकते हैं. इससे ऐसे नए एंटीजन बनते हैं, जिन्हें हम नए एंटीजन कहते हैं.”

महालिंगम की टीम भारतीय मरीजों के ट्यूमर के सैंपल पर की गई रिसर्च के दौरान पहचाने गए कुछ खास एंटीजन का इस्तेमाल करके mRNA टीके का एक प्रारूप तैयार कर रही है.

mRNA टीके बनाने की तकनीक पहले से मौजूद है. इसका इस्तेमाल कोविड-19 के टीके बनाने में भी किया जा चुका है. ऐसे टीकों में शरीर को आनुवंशिक निर्देश दिए जाते हैं, जिनकी मदद से कोशिकाएं एक चुना हुआ प्रोटीन या प्रोटीन का कोई हिस्सा बनाती हैं. कैंसर के टीके का मकसद शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को चुने गए ट्यूमर एंटीजन की पहचान करना सिखाना है, ताकि वह ऐसे एंटीजन वाली कैंसर कोशिकाओं के खिलाफ प्रतिक्रिया कर सके.

IIT मद्रास की इस परियोजना की खास बात यह है कि इसमें भारतीय मरीजों में पहचाने गए एंटीजन पर ध्यान दिया जा रहा है. हालांकि, यह अभी साबित होना बाकी है कि इन एंटीजन को निशाना बनाने से ब्रेस्ट कैंसर के खिलाफ शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को उपयोगी प्रतिक्रिया देने के लिए तैयार किया जा सकता है या नहीं.

प्रोफेसर महालिंगम ने कहा, “हम इसका सीक्वेंस नहीं बता सकते, क्योंकि हम अभी इसके लिए mRNA टीका बना रहे हैं.” उन्होंने बताया कि टीम ने पेटेंट के लिए आवेदन भी किया है.

शोधकर्ता टीके का प्रारूप तैयार करने का काम पूरा कर रहे हैं और ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित चूहे के मॉडल पर इसका परीक्षण करने की तैयारी कर रहे हैं. अगर आगे की रिसर्च से इस टीके को विकसित करने की संभावना को समर्थन मिलता है, तो इंसानों पर इसके परीक्षण के बारे में विचार किया जाएगा.

यह काम भारतीय मरीजों में कैंसर के आनुवंशिक स्वरूप को समझने की एक बड़ी कोशिश का हिस्सा है. इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर के ताज़ा GLOBOCAN अनुमानों के मुताबिक, 2024 में भारत में कैंसर के करीब 15.6 लाख नए मामले सामने आए और लगभग 9 लाख लोगों की इससे मौत हुई. ब्रेस्ट कैंसर सबसे ज्यादा पाया जाने वाला कैंसर था. इसके करीब 2.37 लाख मामले सामने आए, जबकि 2022 में इसके 1.92 लाख मामले और 98,337 मौतें दर्ज की गई थीं.

बिना इंडियन सैंपल के कैंसर की स्टडी करने में दिक्कत

बायोबैंक का आइडिया 2013 में शुरू हुआ, जब प्रोफेसर महालिंगम को अपने लैब एक्सपेरिमेंट के नतीजों को वैलिडेट करने के लिए प्राइमरी कैंसर टिशू सैंपल की ज़रूरत थी. उन्हें ऐसी रिपॉजिटरी खोजने में मुश्किल हुई जहां से रिसर्चर ऐसे काम के लिए टिशू ले सकें.

उन्होंने कहा, “इस देश में, हमारे पास बहुत सारे कैंसर पेशेंट और बहुत सारे कैंसर रिसर्चर हैं, लेकिन कोई पब्लिकली अवेलेबल बायोरिपॉजिटरी नहीं है जो रिसर्चर को कैंसर टिशू देने में मदद कर सके.”

उन्होंने डिपार्टमेंट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी से संपर्क किया, जिसने इस इनिशिएटिव को फंड किया. बायोबैंक 2015 में दो हॉस्पिटल के साथ शुरू हुआ और तब से इसका नेटवर्क 12 से ज़्यादा हॉस्पिटल तक बढ़ गया है. महालिंगम ने कहा कि देश भर से सैंपल इकट्ठा किए गए हैं, जिनमें से लगभग 50-60 परसेंट तमिलनाडु के बाहर से आए हैं.

स्टोरेज रूम में लिक्विड-नाइट्रोजन टैंक लगे हैं. हर एक में भविष्य की रिसर्च के लिए ट्यूमर टिशू की लगभग 13,000 वायल रखी जा सकती हैं | फोटो: स्नेहा रिछारिया/दिप्रिंट
स्टोरेज रूम में लिक्विड-नाइट्रोजन टैंक लगे हैं. हर एक में भविष्य की रिसर्च के लिए ट्यूमर टिशू की लगभग 13,000 वायल रखी जा सकती हैं | फोटो: स्नेहा रिछारिया/दिप्रिंट

इस रिपॉजिटरी में अलग-अलग कैंसर वाले मरीज़ों के सैंपल हैं, जिनमें ब्रेस्ट, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल और लिवर कैंसर के साथ-साथ ल्यूकेमिया भी शामिल है. कुछ मरीज़ों, खासकर ल्यूकेमिया वाले बच्चों के सैंपल इलाज के अलग-अलग स्टेज पर इकट्ठा किए जाते हैं, जिससे रिसर्चर समय के साथ बीमारी में होने वाले बदलावों को ट्रैक कर पाते हैं.

प्रोफेसर महालिंगम ने कहा कि ऐसे रिसोर्स की ज़रूरत तब साफ होती है जब रिसर्चर ऐसे मरीज़ों की तुलना करते हैं जिन्हें एक जैसे कैंसर दिखते हैं लेकिन इलाज पर अलग तरह से रिस्पॉन्स देते हैं.

उन्होंने एक जैसी उम्र और एक ही तरह के ट्यूमर वाले 10 ब्रेस्ट कैंसर मरीज़ों के बारे में बताया, जिन्हें एक जैसी कीमोथेरेपी दी गई थी. कुछ ने इलाज पर रिस्पॉन्स दिया, जबकि कुछ ने नहीं.

उन्होंने कहा, “इसका मतलब है कि जेनेटिक या जीनोमिक बदलावों में अंतर है.”

रिसर्च करने वालों को यह जांचने की ज़रूरत है कि क्या ऐसे अंतर इस बात से जुड़े हैं कि ट्यूमर कैसे डेवलप होता है या इलाज पर कैसे रिस्पॉन्स देता है, और क्या वे संभावित इलाज के टारगेट की ओर इशारा करते हैं. पश्चिमी आबादी से मिले नतीजे भारतीय मरीज़ों में मौजूद हर जेनेटिक बदलाव को नहीं पकड़ सकते हैं.

कैंसर की दवाएं और इलाज अक्सर मरीज़ों की आबादी से मिले सबूतों का इस्तेमाल करके बनाए और जांचे जाते हैं, जिनमें यूरोपियन मूल के लोगों को पहले से जीनोमिक रिसर्च में ज़्यादा दिखाया गया है. इससे भारतीय मरीज़ों में पाए जाने वाले जेनेटिक बदलाव, ट्यूमर कैसे बनते हैं और इलाज पर कैसे असर डालते हैं, यह समझने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सबूतों में कम रह सकते हैं.

प्रोफेसर महालिंगम ने कहा, “हमें यह समझना होगा कि हमारी अपनी आबादी का जीनोमिक माहौल कैसा है.”

उन्होंने BRCA1 और BRCA2 का ज़िक्र किया, ये दो जीन ब्रेस्ट और ओवेरियन कैंसर के विरासत में मिले खतरे से जुड़े हैं. इन जीन में बदलाव, या म्यूटेशन, किसी व्यक्ति में इन कैंसर के होने का खतरा बढ़ा सकते हैं.

टीम ने लगभग 1,000 ब्रेस्ट कैंसर सैंपल का एनालिसिस किया और पाया कि लगभग 4 प्रतिशत मरीज़ों में इन जीन में म्यूटेशन थे, जो दुनिया भर में बताए गए आंकड़ों से कम है.

रिसर्चर्स ने RECQL1 सहित दूसरे जीन में भी अंतर पाया है, जो डैमेज DNA को रिपेयर करने में शामिल है. महालिंगम ने कहा कि इस जीन में एक खास जेनेटिक बदलाव भारतीय आबादी के लगभग 3.6 से 3.9 प्रतिशत में पाया गया, जबकि कुछ दूसरे डेटासेट में यह 1 प्रतिशत से भी कम था. रिसर्चर अभी भी इस बात की जांच कर रहे हैं कि मरीज़ों के लिए इस अंतर का क्या मतलब है.

इन जेनेटिक अंतरों की स्टडी करके, रिसर्चर यह समझने की उम्मीद करते हैं कि कुछ मरीज़ एक ही कैंसर ट्रीटमेंट पर अलग-अलग तरह से रिस्पॉन्ड क्यों करते हैं.

ट्यूमर के टिशू को सुरक्षित रखने से लेकर उसके आनुवंशिक बनावट को समझने तक

कैंसर के टिशू इकट्ठा करना सिर्फ पहला कदम है. शोधकर्ताओं को इन सैंपल को सुरक्षित रखना होता है, उनसे आनुवंशिक सामग्री निकालनी होती है, उसकी सीक्वेंसिंग करनी होती है और फिर उससे मिले आंकड़ों का विश्लेषण करना होता है. इससे उन बदलावों की पहचान करने में मदद मिल सकती है, जो यह समझने में मदद करते हैं कि ट्यूमर कैसे बनता है या इलाज का उस पर क्या असर होता है.

NCTB में ट्यूमर के टिशू को भविष्य में होने वाली रिसर्च के लिए सुरक्षित रखने के लिए लिक्विड नाइट्रोजन के टैंकों में करीब माइनस 196 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखा जाता है. यहां ऐसे सात टैंक हैं और हर टैंक में करीब 13,000 शीशियों को रखने की क्षमता है. शोधकर्ता खून के अलग-अलग हिस्सों को रखने के लिए माइनस 80 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखे जाने वाले फ्रीजर का भी इस्तेमाल करते हैं. इनमें प्लाज्मा और खून की मोनोन्यूक्लियर कोशिकाओं (PBMCs) के साथ-साथ ट्यूमर के टिशू से निकाले गए DNA और RNA को भी रखा जाता है.

NCTB के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. जॉन पीटर ने बताया कि टिशू को तैयार करने और उससे आनुवंशिक सामग्री निकालने का काम बायोबैंक की लैब में किया जाता है. इससे निकाली गई सामग्री को जांच के लिए सीक्वेंसिंग लैब में भेजने से पहले उसमें बाहरी चीजों के मिलने यानी दूषित होने की आशंका कम करने में मदद मिलती है.

NCTB के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. जॉन पीटर उन बड़े सर्वरों के पास खड़े हैं, जिनमें सीक्वेंसिंग से मिले आंकड़े रखे और प्रोसेस किए जाते हैं. सीक्वेंसिंग की एक प्रक्रिया से 1.5 से 3 टेराबाइट तक आंकड़े मिल सकते हैं | फोटो: स्नेहा रिछारिया/दिप्रिंट
NCTB के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. जॉन पीटर उन बड़े सर्वरों के पास खड़े हैं, जिनमें सीक्वेंसिंग से मिले आंकड़े रखे और प्रोसेस किए जाते हैं. सीक्वेंसिंग की एक प्रक्रिया से 1.5 से 3 टेराबाइट तक आंकड़े मिल सकते हैं | फोटो: स्नेहा रिछारिया/दिप्रिंट

अगला कदम आनुवंशिक सामग्री की जांच करना है. पूरे जीनोम की सीक्वेंसिंग में जीनोम में मौजूद आनुवंशिक जानकारी को पढ़ा जाता है. वहीं, पूरे एक्सोम की सीक्वेंसिंग में DNA के उन हिस्सों पर ध्यान दिया जाता है, जिनमें प्रोटीन बनाने के निर्देश होते हैं. RNA की सीक्वेंसिंग से शोधकर्ताओं को यह पता लगाने में मदद मिलती है कि किसी सैंपल में कौन-से जीन सक्रिय हैं.

डॉ. पीटर ने बताया कि सीक्वेंसिंग की एक प्रक्रिया से 1.5 से 3 टेराबाइट तक आंकड़े मिल सकते हैं. उन्होंने कहा, “आनुवंशिक बदलावों की पहचान करने और अलग-अलग मरीजों के सैंपल में उनकी तुलना करने से पहले इस जानकारी को बड़े कंप्यूटर सिस्टम की मदद से सुरक्षित रखना और प्रोसेस करना जरूरी है.”

किसी मरीज के ट्यूमर के सैंपल की तुलना उसी मरीज के सामान्य टिशू या खून से करने पर शोधकर्ताओं को उन म्यूटेशन की पहचान करने में मदद मिल सकती है, जो कैंसर कोशिकाओं में बाद में आए हैं. इससे उन्हें उन आनुवंशिक बदलावों से अलग पहचाना जा सकता है, जिनके साथ कोई व्यक्ति पैदा हुआ था. खून के सैंपल से शोधकर्ता उन आनुवंशिक बदलावों की भी स्टडी कर सकते हैं, जो माता-पिता से मिले हों और कैंसर के खतरे से जुड़े हो सकते हैं.

कुछ तरह के कैंसर में शोधकर्ता इलाज के अलग-अलग चरणों में इकट्ठा किए गए सैंपल की जांच करते हैं. उदाहरण के लिए, ल्यूकेमिया में समय के साथ लिए गए सैंपल की तुलना करके वे कैंसर की आनुवंशिक बनावट में होने वाले बदलावों पर नज़र रख सकते हैं. इससे यह भी समझने में मदद मिल सकती है कि कोई इलाज कुछ मरीजों पर असर क्यों करता है, जबकि दूसरों पर नहीं.

ऐसी रिसर्च से आगे चलकर शोधकर्ताओं को उन आनुवंशिक बदलावों की पहचान करने में मदद मिल सकती है, जिनका संबंध इस बात से है कि मरीज किसी खास कैंसर की दवा पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं. प्रोफेसर महालिंगम ने कहा कि अगर बार-बार की गई रिसर्च से पता चलता है कि किसी खास आनुवंशिक बदलाव वाले मरीजों पर किसी दवा का असर होने की संभावना कम है, तो शोधकर्ता यह जांच कर सकते हैं कि क्या इस बदलाव की मदद से उन मरीजों की पहचान की जा सकती है, जिन्हें उस इलाज से फायदा नहीं मिलने की आशंका है.

हालांकि, किसी एक मरीज पर इलाज का क्या असर होगा, इसका अनुमान लगाने के लिए इस्तेमाल करने से पहले इस संबंध की और जांच करके इसकी पुष्टि करनी होगी.

बायोबैंक में सुरक्षित रखे गए टिशू के सैंपल कैंसर के आनुवंशिक स्वरूप से जुड़ी डिजिटल जानकारी तैयार करने की एक बड़ी कोशिश का भी हिस्सा हैं. स्वास्थ्य सेवा कंपनी कार्किनोस हेल्थकेयर के साथ मिलकर तैयार किया गया और 2024 में शुरू किया गया भारत कैंसर जीनोम एटलस (BCGA), अलग-अलग तरह के कैंसर से जुड़ी जीनोम की जानकारी को एक जगह लाता है.

प्रोफेसर महालिंगम ने बताया कि इस एटलस में ब्रेस्ट कैंसर, ल्यूकेमिया, पैंक्रियाटिक कैंसर और कोलन कैंसर से जुड़े करीब 2,000 जीनोम प्रोफाइल हैं. उन्होंने कहा कि टीम 3,000 से ज्यादा सैंपल की सीक्वेंसिंग कर चुकी है, जबकि उनसे मिले कुछ और आंकड़े अभी जोड़े जाने बाकी हैं.

इस जानकारी तक हर किसी की पहुंच नहीं है. शोधकर्ता म्यूटेशन प्रोफाइल से जुड़ी जानकारी देख सकते हैं, लेकिन जीनोम के मूल आंकड़ों और लोगों की निजी जानकारी तक पहुंच सीमित है. महालिंगम ने बताया कि जो लोग टिशू के असली सैंपल लेना चाहते हैं, उन्हें जरूरी नैतिक मंजूरियां भी लेनी होती हैं.

सबूत बनाने का खर्च

बायोबैंक और जीनोम एटलस इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर करते हैं, जिसे बनाना और मेंटेन करना महंगा है.

IIT मद्रास में नेशनल कैंसर टिशू बायोबैंक को डिपार्टमेंट ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी से 27.81 करोड़ रुपये की फंडिंग और IIT मद्रास से 3.9 करोड़ रुपये की एक्स्ट्रा फंडिंग से बनाया गया था, जिससे कुल स्थापना फंडिंग 31.71 करोड़ रुपये हो गई. 25,000 तक कैंसर टिशू सैंपल स्टोर करने के लिए डिज़ाइन की गई इस फैसिलिटी को सैंपल स्टोरेज और एनालिसिस के लिए खास इंफ्रास्ट्रक्चर और इक्विपमेंट की ज़रूरत होती है.

IIT मद्रास में नेशनल कैंसर टिशू बायोबैंक का एंट्रेंस. 2015 में बनाया गया, इस बायोबैंक ने चेन्नई के 12 से ज़्यादा हॉस्पिटल से लगभग 10,000 कैंसर टिशू सैंपल इकट्ठा किए हैं | फोटो: स्नेहा रिछारिया/दिप्रिंट

लॉजिस्टिक्स मुश्किल हैं. कुछ टिशू सैंपल लिक्विड नाइट्रोजन में लगभग माइनस 80 डिग्री सेल्सियस पर स्टोर किए जाते हैं, जबकि दूसरे फॉर्मेलिन, जो एक प्रिजर्विंग लिक्विड है, में प्रिजर्व किए जाते हैं और पैराफिन, जो एक सॉलिड वैक्स है, में एम्बेड किए जाते हैं. पैराफिन को पतले सेक्शन में काटकर माइक्रोस्कोप से जांचा जा सकता है.

सीक्वेंसिंग से खर्च और बढ़ जाता है. इससे मिलने वाले डेटा के लिए खास स्टोरेज और कंप्यूटिंग सिस्टम की ज़रूरत होती है, साथ ही ऐसे रिसर्चर भी चाहिए होते हैं जो जानकारी को एनालाइज़ कर सकें.

प्रोफ़ेसर महालिंगम ने अंदाज़ा लगाया कि पूरे जीनोम सीक्वेंसिंग में हर सैंपल पर करीब 1 लाख रुपये का खर्च आता है.

टीम मरीज़ से मिलने वाले ट्यूमर ऑर्गेनॉइड भी बना रही है, जो मरीज़ के कैंसर टिशू से बनाए गए 3D मॉडल हैं. उन्होंने कहा कि टीम ने लिवर कैंसर के लिए मॉडल बनाए हैं और ब्रेस्ट और पैंक्रियाटिक कैंसर मॉडल पर काम कर रही है.

उन्होंने बताया कि इन ऑर्गेनॉइड से यह टेस्ट किया जा सकता है कि मरीज़ के ट्यूमर से मिला टिशू लैब में अलग-अलग दवाओं पर कैसे रिस्पॉन्स करता है. महालिंगम ने कहा, “आप एक ही मरीज़ के टिशू पर इन विट्रो में सब कुछ टेस्ट कर सकते हैं. फिर आप इलाज शुरू कर सकते हैं. इसे पर्सनलाइज़्ड मेडिसिन कहते हैं.”

अभी के लिए यह एक रिसर्च गोल है. उन्होंने कहा कि टीम और सैंपल का एनालिसिस कर रही है और जैसे-जैसे ज़्यादा डेटा मिलेगा, जीनोमिक डेटाबेस को बढ़ाने का प्लान है.

भारत में हर लाख आबादी पर लगभग 60 लोग कैंसर से प्रभावित हैं, क्योंकि देश में कैंसर का बोझ लगातार बढ़ रहा है. इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (ICMR) के अनुसार, 2023 में भारत में कैंसर के मामलों की अनुमानित संख्या 14 लाख से ज़्यादा थी.

उन्होंने कहा, “समस्या का पैमाना निश्चित रूप से बहुत बड़ा है.”

उन्होंने आगे कहा कि भारत भर में और ज़्यादा संस्थानों को बायोबैंक और सीक्वेंसिंग सुविधाएं स्थापित करने की ज़रूरत है ताकि रिसर्चर देश की अलग-अलग आबादी में कैंसर की एक बड़ी तस्वीर बना सकें.

एक ही इलाके से ज़्यादा जानकारी लेने वाला कोई रिपॉजिटरी, अपने आप यह पता नहीं लगा सकता कि पूरे भारत में कोई जेनेटिक बदलाव कितना आम है. अभी, भारत में 10 से भी कम कैंसर-स्पेसिफिक बायोबैंक हैं. यह कमी इसलिए हो रही है क्योंकि भारत में कैंसर का बोझ लगातार बढ़ रहा है. ग्लोबल बर्डन ऑफ डिज़ीज़ स्टडी के अनुसार, देश में उम्र के हिसाब से कैंसर के मामले 1990 में हर 100,000 लोगों पर 84.8 मामलों से बढ़कर 2023 में हर 100,000 पर 107.2 हो गए, जो 26.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी है.

महालिंगम ने कहा कि इस काम के लिए अस्पतालों, रिसर्च संस्थानों और इंजीनियरिंग संस्थानों के बीच सहयोग ज़रूरी है. “इसमें और ज़्यादा सरकारी निवेश होना चाहिए.”

उन्हें याद आया कि जब उन्होंने पहली बार बायोबैंक बनाने का प्रस्ताव रखा था, तो उनके साथियों ने उन्हें सावधान किया था, और चेतावनी दी थी कि इस प्रोजेक्ट को बनाना और बनाए रखना मुश्किल होगा. “लेकिन किसी को तो यह करना ही होगा…”

उन्होंने कहा. “मैं क्यों नहीं?”

रिपोर्टर ने इंस्टीट्यूशन के बुलावे पर IIT मद्रास का दौरा किया था.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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