11 अक्टूबर को फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के रास्ते का आखिरी कांटा हटा दिया गया. इसके साथ ही पाकिस्तान के लोकतंत्र के उस गुलाब में बचा आखिरी कांटा भी निकाल दिया गया, जो लंबे समय से मुरझाया हुआ है. यह कांटा खैबर पख्तूनख्वा की चुनी हुई पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) सरकार थी. यह सरकार हर तरफ अपनी ताकत बढ़ाने की मुनीर की कोशिशों में रुकावट बन रही थी. अब मुनीर ने गुलाब को कांटे समेत तोड़कर अलग कर दिया है और उसे फेंक दिया है. खैबर पख्तूनख्वा में राज्यपाल शासन लागू कर दिया गया है और आपातकाल भी लगा दिया गया है. इसके लिए यह वजह बताई गई है कि मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी उग्रवाद पर काबू पाने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहे थे.
अगर सच में उग्रवाद चिंता की वजह था, तो बलूचिस्तान में भी यही कदम उठाए जाते. इस प्रांत में शायद आतंकवाद का असर सबसे ज्यादा है. ताज़ा आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं. इस्लामाबाद स्थित सेंटर फॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज (CRSS) के मुताबिक, 2026 की तीसरी तिमाही में बलूचिस्तान ने खैबर पख्तूनख्वा को पीछे छोड़ दिया और आतंकवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित प्रांत बन गया. देश में हिंसा से जुड़ी कुल मौतों में से 98 प्रतिशत मौतें बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में हुईं. इनमें से 59 प्रतिशत मौतें बलूचिस्तान और 39 प्रतिशत खैबर पख्तूनख्वा में हुईं, लेकिन दोनों प्रांतों में फर्क सिर्फ इतना है कि बलूचिस्तान की कमान ऐसे मुख्यमंत्री सरफराज बुगती के हाथ में है, जो सत्ता में बैठे लोगों के इशारे पर चलने को तैयार हैं और उनके सामने दूसरे नंबर पर रहने में भी उन्हें कोई परेशानी नहीं है.
इसलिए, असली वजह राजनीतिक थी. सत्ता में बैठे लोगों को डर था कि अफरीदी इस्लामाबाद की ओर बढ़ते हुए सड़कों पर कितनी बड़ी भीड़ जुटा सकते हैं. उन्होंने चार अक्टूबर को एक लंबे मार्च की शुरुआत की थी. इस मार्च का मकसद जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री और PTI के संस्थापक इमरान खान की रिहाई की मांग करना था. आपातकाल सिर्फ इस मार्च को रोकने का बहाना था, ताकि हर किलोमीटर आगे बढ़ने के साथ इसे जनता का समर्थन न मिलता जाए. सेना ने तब कार्रवाई की, जब सड़कों पर उतरने वाली भीड़ उसकी ताकत की सीमाएं दिखा पाती. सेना ने ऐसा होने से पहले ही कदम उठा लिया. वह मई 2023 जैसी घटनाओं को दोहराने से रोकना चाहती थी. उस समय खान की गिरफ्तारी के बाद उनके समर्थकों ने सेना के कई ठिकानों और सरकारी इमारतों को निशाना बनाया था.
नवंबर 2024 में PTI के देशव्यापी “आखिरी आह्वान” मार्च को अपने समर्थकों पर बड़े पैमाने पर कार्रवाई के बाद रद्द कर दिया गया था. इस बार भी सत्ता में बैठे लोगों ने मार्च को आगे बढ़ने से पहले ही रोक दिया. इसके बाद मार्च का असर खत्म होता चला गया. मार्च के दो मुख्य आयोजकों-अफरीदी और PTI के प्रांतीय अध्यक्ष जुनैद अकबर-को कई पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ हिरासत में ले लिया गया.
सरकारों को बर्खास्त करने का इतिहास
यह कोई नई बात नहीं है. यह पाकिस्तान की पुरानी रणनीति का हिस्सा है. जब भी सत्ता में बैठे लोगों को किसी प्रांतीय मुख्यमंत्री की ताकत से खतरा महसूस हुआ है या किसी प्रांत ने अपने अधिकारों के मुताबिक खुद फैसले लेने की कोशिश की है, तो उन्होंने उस सरकार को बर्खास्त करने के लिए कोई न कोई बहाना ढूंढ लिया है. यह बहाना कानून-व्यवस्था से जुड़ा हो सकता है या कुछ और.
सत्ताधारी पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) और उसकी गठबंधन सहयोगी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) इस बात से खुश होंगी कि अब उनका साझा विरोधी सत्ता में नहीं है. PML-N के नेता शहबाज शरीफ ने यह कदम उठाने की सलाह दी थी और PPP के आसिफ अली जरदारी ने इस पर हस्ताक्षर किए थे. हालांकि, इसे दोनों पार्टियों के बीच एकता नहीं समझना चाहिए.
अतीत में PPP की सरकारें PML-N के नेतृत्व वाली प्रांतीय सरकारों को बर्खास्त कर चुकी हैं. उदाहरण के लिए, फरवरी 1994 में तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने राष्ट्रपति फारूक लेघारी को निर्देश दिया था कि वह पीर साबिर शाह के नेतृत्व वाली प्रांतीय सरकार को निलंबित कर दें. इस सरकार को PML-N का समर्थन था. खैबर पख्तूनख्वा से जुड़ा नहीं होने के बावजूद, एक और बड़ा उदाहरण 2009 का है. उस समय राष्ट्रपति के तौर पर जरदारी ने पंजाब की प्रांतीय सरकार को बर्खास्त कर दिया था. उस सरकार का नेतृत्व शहबाज़ शरीफ कर रहे थे.
दरअसल, हाल ही में दोनों पार्टियों के बीच संभावित 28वें संविधान संशोधन को लेकर मतभेद थे. इस संशोधन के जरिए मौजूदा प्रांतों को बांटकर नए प्रांत बनाए जा सकते हैं. PPP को डर था कि इससे सिंध पर असर पड़ेगा, जो लंबे समय से उसका मजबूत गढ़ रहा है.
PTI को कमजोर करना और इमरान खान के समर्थकों को अलग-अलग हिस्सों में बांटना, दोनों पार्टियों के बीच एकजुटता की वजह रहा है, लेकिन अगर PPP को लगता है कि PML-N और सत्ता में बैठे लोगों का साथ देने से उसकी अपनी शिकायतें दूर हो जाएंगी, तो वह गलत है. वे PPP के खिलाफ भी हो सकते हैं. इसी तरह, अगर PPP को अपने हित में लगे, तो वह गठबंधन से अपना समर्थन वापस ले सकती है.
इतिहास बताता है कि जब केंद्र सरकार विपक्ष के नेतृत्व वाली किसी प्रांतीय सरकार को बर्खास्त करती है, तो उसके बाद क्या हो सकता है. 1973 में जुल्फिकार अली भुट्टो ने बलूचिस्तान की नेशनल अवामी पार्टी के नेतृत्व वाली प्रांतीय सरकार को बर्खास्त कर दिया था. इसके बाद बलूच विद्रोह तेजी से फैल गया था.
विद्रोह का यह दौर 1977 तक चला. इस दौरान करीब 55,000 बलूच लोगों के खिलाफ अनुमानित 80,000 या उससे ज्यादा सैनिक तैनात किए गए थे. इन 55,000 बलूच लोगों में से 11,500 संगठित लड़ाके थे.
आज खैबर पख्तूनख्वा पहले से ही उग्रवाद के खिलाफ लड़ाई में सबसे आगे है. अब इस प्रांत का क्या होगा?
KP को घाव भरने वाले कदम की ज़रूरत
हालांकि, पाकिस्तान के सभी प्रांतों में राज्यपाल शासन या आपातकाल लगाया जा चुका है, लेकिन खैबर पख्तूनख्वा को खास तौर पर पाकिस्तान बनने के समय से ही अपनी सरकारों को बर्खास्त किए जाने की विरासत मिली है. 22 अगस्त 1947 को, उस समय नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रांत कहे जाने वाले इलाके में खान साहब की सरकार को खुद मुहम्मद अली जिन्ना के निर्देश पर बर्खास्त कर दिया गया था. जिन्ना वहां मुस्लिम लीग की सरकार बनाना चाहते थे. तब से इस प्रांत में तीन बार राज्यपाल शासन लगा है-1975, 1994 और 1999 में. अब 2026 में चौथी बार राज्यपाल शासन लगाया गया है.
आलोचकों का कहना है कि PTI सरकार दो-तिहाई बहुमत से चुनी गई थी और उसे ऐसी केंद्र सरकार से ज्यादा मजबूत जनादेश मिला था, जो खुद चुनाव के जरिए नहीं चुनी गई थी. PTI समर्थकों का मानना है कि फरवरी 2024 के आम चुनावों के बाद खैबर पख्तूनख्वा में उनकी सरकार ही ऐसी एकमात्र सरकार थी, जिसे असली जनादेश मिला था और जिसके चुनावी नतीजे ‘फॉर्म 45’ से साबित होते थे. इसलिए उनका कहना है कि सिर्फ प्रांत के मतदाताओं को ही इस सरकार को सत्ता से हटाने का अधिकार था. वजह चाहे जो भी रही हो, लेकिन सत्ता में बैठे लोगों ने सुरक्षा को लेकर जो चिंताएं बताई हैं, वे पूरी तरह बेबुनियाद नहीं हैं. केंद्र और प्रांत के बीच टकराव की वजह से इस बात पर तालमेल नहीं बन पा रहा था कि प्रांत में उग्रवाद से सबसे अच्छे तरीके से कैसे निपटा जाए. उग्रवादी इस दूरी का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे थे.
अब जब सत्ता में बैठे लोगों के हाथ में पूरी ताकत आ गई है, तो वे PTI के विरोध के बिना आतंकवाद के खिलाफ जितने चाहें, उतने सैन्य अभियान चला सकते हैं. PTI अक्सर ऐसे अभियानों का विरोध करती रही है क्योंकि इनसे बड़े पैमाने पर लोगों को अपना घर छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ सकता है. असल में, यह प्रांत पर्दे के पीछे से सैन्य शासन के तहत है. आयशा सिद्दीका इसे “संवैधानिक सैन्यवाद” बताती हैं. इसका मतलब है कि संविधान, संसद और कानूनी प्रक्रियाओं का दिखावा करते हुए सेना का नियंत्रण चलाया जाता है. पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद-245 के तहत सेना नागरिक अधिकारियों की मदद के लिए आगे आ सकेगी. पेशावर में स्थित 11वीं कोर प्रांत में आतंकवाद विरोधी कदम तय करने में बड़ी भूमिका निभा सकती है.
इसके अलावा, सत्ता में बैठे लोग पाकिस्तान की अफगानिस्तान नीति पर ज्यादा सख्त नियंत्रण रख सकते हैं और इस मुद्दे पर प्रांत को अपनी अलग नीति बनाने से रोक सकते हैं. PTI के नेता तालिबान पर दबाव डालकर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) को काबू में करने की सत्ता में बैठे लोगों की रणनीति का विरोध करते रहे थे. पूर्व मुख्यमंत्री अली अमीन गंडापुर ने खुले तौर पर कहा था कि वह तालिबान से बातचीत करना चाहते हैं. उस समय सत्ता में बैठे लोग बातचीत के बजाय सैन्य कार्रवाई को प्राथमिकता दे रहे थे.
लेकिन सेना के सैन्य अभियान शुरू करने के बाद क्या होगा? वह प्रांत से उग्रवादियों को हटा सकती है. कुछ समय तक किसी इलाके पर अपना नियंत्रण भी बनाए रख सकती है, लेकिन इसके बाद वह बैरक में लौट जाएगी. इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या सेना वहां हालात को बेहतर बनाने के लिए ज़रूरी काम कर सकती है? लंबे समय तक, यहां तक कि जब यह साफ हो गया था कि देश में “पाकिस्तानी तालिबान” ने अपनी जड़ें जमा ली हैं, तब भी सेना उग्रवाद से निपटने की रणनीति अपनाने से बचती रही. ज्यादा से ज्यादा, वह किसी इलाके से उग्रवादियों को हटाने में सफल रही है, लेकिन उस इलाके पर लंबे समय तक नियंत्रण बनाए रखने में उतनी सफल नहीं रही.
किसी इलाके पर प्रभावी तरीके से नियंत्रण बनाए रखने और वहां हालात सुधारने के लिए मजबूत अधिकारों वाले नागरिक प्रशासन और कानून लागू करने वाली एजेंसियों की ज़रूरत होगी. आखिरकार, प्रांतीय पुलिस ही उग्रवादियों के खिलाफ रक्षा की पहली पंक्ति होती है. विशेषज्ञ अक्सर पुलिस और सेना के बीच बेहतर तालमेल बनाने की सलाह देते रहे हैं. लेकिन ऐसे प्रांत में यह काम होता हुआ देखना मुश्किल है, जहां राजनीतिक हालात अब भी अस्थिर हैं.
PTI भी पूरी तरह दोषमुक्त नहीं है. वह खैबर पख्तूनख्वा में 13 साल तक सत्ता में रही है. पार्टी का दावा है कि आतंकवाद बढ़ने की वजह केंद्र सरकार की नीतियां हैं, लेकिन वह खुद को पूरी तरह जिम्मेदारी से अलग नहीं कर सकती. 2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने और उसके बाद TTP के फिर से मजबूत होने के बाद इमरान खान की सरकार ने ही TTP से बातचीत की थी. इस बातचीत के बाद TTP के सैकड़ों कैदियों को रिहा किया गया था. खान ने अफगानिस्तान में मौजूद TTP के हजारों लड़ाकों को पाकिस्तान में बसाने का प्रस्ताव भी दिया था.
एक बात की आशंका है. TTP खैबर पख्तूनख्वा के उन लोगों पर नजर रखेगा, जिनका अपनी शिकायतों को दूर करने के लिए संवैधानिक व्यवस्था से भरोसा उठ गया है. इनमें वे लोग भी शामिल हैं, जो PTI के साथ खड़े थे. TTP उन्हें यह समझाने की कोशिश करेगा कि वे अपने अधिकारों के लिए राज्य के खिलाफ हथियार उठाएं. वह अपनी भर्ती बढ़ाने के लिए इस तर्क का इस्तेमाल करने की भी कोशिश करेगा. अगर विरोध जताने के लिए वैध राजनीतिक रास्ता बंद कर दिया जाता है, तो उग्रवादी एक अवैध रास्ता देने के लिए तैयार रहते हैं- ऐसा रास्ता, जिसमें हिंसा का सहारा लिया जाता है.
किसी भी पार्टी का दामन पूरी तरह साफ नहीं है. इसकी कीमत प्रांत और वहां के लोगों ने चुकाई है. अब तक खैबर पख्तूनख्वा के लोग अपनी चुनी हुई बहुमत वाली सरकार को बर्खास्त किए जाने के खिलाफ सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करने नहीं आए हैं. क्या यह आने वाले तूफान से पहले की शांति है, या फिर यह दिखाता है कि लोग सैन्य नियंत्रण के आदी हो चुके हैं?
बंटीरानी पात्रो दिप्रिंट में स्टाफ राइटर हैं. उनका एक्स हैंडल @bantirani_patro है. यह लेख उनके निजी विचार हैं.
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