ढाका: बांग्लादेश की राजधानी ढाका में इंदिरा गांधी सांस्कृतिक केंद्र में भीड़ की ओर से तोड़फोड़ किए जाने के दो साल बाद भी यह इमारत बंद है. बांग्लादेश के धनमंडी इलाके में स्थित यह राजनयिक इमारत चारों ओर से बन रही व्यावसायिक इमारतों से घिरी हुई है.
1970 के दशक में भारतीय उच्चायोग धनमंडी से काम करता था. बाद में उसका कार्यालय गुलशन-2 और हाल के वर्षों में बरिधारा में चला गया. इंदिरा गांधी सांस्कृतिक केंद्र भारत के धनमंडी परिसर में बनाया गया था. यह इमारत बांग्लादेश सरकार से किराये पर ली गई थी. सांस्कृतिक केंद्र की दूसरी शाखा 2021 में गुलशन-2 में खोली गई थी. इसके लिए पुराने इंडिया हाउस का इस्तेमाल किया गया, क्योंकि उच्चायोग का कार्यालय बरिधारा में चला गया था.
लोहे की चादरों से बनी घेराबंदी के पीछे छिपी इस इमारत की दीवारें खराब हालत में हैं. सड़क से इसके होने का कोई निशान दिखाई नहीं देता. कभी इस इमारत में करीब 30,000 किताबों वाली लाइब्रेरी थी. बगल की इमारत में चल रहे निर्माण स्थल से देखने पर ही इस इमारत के बचे हुए हिस्से नज़र आते हैं.

अब इस संपत्ति में सिर्फ एक चेतावनी वाला बोर्ड बचा है. बांग्लादेश सरकार ने इसे लोहे की चादरों से बनी घेराबंदी पर लगाया है. इस पर लिखा है कि बिना अनुमति अंदर आने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी. इमारत के सामने फुटपाथ पर चाय की एक छोटी-सी दुकान अब भी खुलती है. जब कई राहगीरों से इस इमारत के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि यह “मानसून क्रांति” के दौरान बंद हो गई थी और कहीं दूसरी जगह चली गई.

भारत ने बांग्लादेश की पिछली अंतरिम सरकार के सामने कई बार आधिकारिक तौर पर यह मुद्दा उठाया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ. अब तक ढाका की ओर से न तो इस घटना को स्वीकार किया गया है और न ही राजनयिक इमारत को हुए नुकसान के लिए माफी मांगी गई है.
इस सांस्कृतिक केंद्र का भविष्य अब भी साफ नहीं है. भारत ने गुलशन-2 में अपने पुराने उच्चायोग परिसर से सांस्कृतिक गतिविधियां जारी रखी हैं. ऐसा तब है, जब केंद्र को ऐसी इमारत में काम करना पड़ रहा है, जिसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए बनाया ही नहीं गया था.
सूत्रों ने पुष्टि की कि यह मुद्दा मौजूदा तारिक रहमान के नेतृत्व वाली सरकार के सामने नहीं उठाया गया है. धनमंडी में स्थित इंदिरा गांधी सांस्कृतिक केंद्र के भविष्य को लेकर भी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है.
इंदिरा गांधी सांस्कृतिक केंद्र की औपचारिक शुरुआत 2010 में हुई थी और यह धनमंडी इलाके से काम करता था. 5 अगस्त 2024 को भीड़ ने केंद्र पर हमला कर दिया. इसके बाद वहां बचे कर्मचारियों को पिछले दरवाजे से भागना पड़ा, जबकि परिसर में आग लगा दी गई. केंद्र में रखे पारंपरिक संगीत वाद्ययंत्र और लाइब्रेरी पूरी तरह नष्ट हो गए.
गुलशन-2 वाला परिसर अब भी खुला है. सितंबर 2024 में केंद्र की सभी गतिविधियां औपचारिक रूप से इसी परिसर में स्थानांतरित कर दी गई थीं. हालांकि, धनमंडी में स्थित केंद्र के खोने का दुख अब भी महसूस किया जाता है. यह इमारत कई दूसरे देशों के सांस्कृतिक केंद्रों के पास थी. इसी इलाके में अलायंस फ्रांसेज़, गोएथे-इंस्टीट्यूट और रूसी सांस्कृतिक भवन स्थित हैं.
1970 के दशक में धनमंडी में कई देशों के राजनयिक मिशन थे. उस समय यह ढाका में संस्कृति का भी एक प्रमुख केंद्र था. शेख मुजीबुर रहमान का घर धनमंडी 32 में था. पिछले कुछ साल में भीड़ ने उस घर को भी नुकसान पहुंचाया था. पूर्वी पाकिस्तान में भारत के राजनयिक मिशन और बांग्लादेश की आज़ादी के शुरुआती दिनों में भारत के राजनयिक कार्यालय भी इसी इलाके में थे.
इसके बाद के वर्षों में ज्यादातर देशों के राजनयिक मिशन गुलशन और हाल के वर्षों में बरिधारा चले गए. हालांकि, सांस्कृतिक केंद्र धनमंडी में ही काम करते रहे, क्योंकि यह ढाका के बीचोंबीच स्थित है.
धनमंडी परिसर के खोने का असर
धनमंडी में अपने 14 साल के कामकाज के दौरान भारतीय केंद्र में योग और पारंपरिक संगीत की कक्षाएं लगती थीं. यहां फिल्मों की स्क्रीनिंग और प्रदर्शनियां भी आयोजित की जाती थीं. धीरे-धीरे यह भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देने का एक प्रमुख केंद्र बन गया, जहां ढाका के लोगों को भारतीय संस्कृति से जुड़ने के ज्यादा मौके मिलते थे.


नई जगह दूर होने के कारण वहां लोगों की दिलचस्पी धीरे-धीरे कम हुई है. पहले इस सांस्कृतिक केंद्र में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) की ओर से नियुक्त एक स्थायी निदेशक होता था, लेकिन परिसर पर हमले और उसके बाद भारत-बांग्लादेश के संबंधों में आए बदलावों के बाद अब यहां के कामकाज की जिम्मेदारी एक भारतीय राजनयिक संभाल रहा है.
5 अगस्त 2024 को पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद भारत और बांग्लादेश के संबंध बहुत खराब हो गए. हसीना ढाका छोड़कर नई दिल्ली आ गई थीं और यहीं रहीं. उन्हें सत्ता से हटाए जाने की घटना को बांग्लादेश में “जुलाई विद्रोह” या “मानसून क्रांति” कहा जाता है. इसे आप किससे पूछते हैं, इस पर इसका नाम निर्भर करता है. इस आंदोलन की अगुवाई मुख्य रूप से छात्रों ने की थी.
दोनों देशों के संबंध अब तक मुश्किल से ही सुधरे हैं. भारत से हसीना के लगातार दिए जा रहे प्रेस बयानों और उनकी गतिविधियों को लेकर ढाका नाराज है. विदेश राज्य मंत्री हुमायूं कबीर ने सोमवार को कहा था कि ढाका भारत के किसी भी ऐसे आतंकवादी को बांग्लादेश की जमीन का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं करने देगा, जिसकी भारत को तलाश है. उन्होंने कहा कि बांग्लादेश को नई दिल्ली से भी ऐसी ही उम्मीद है.
जुलाई-अगस्त 2024 में सड़कों पर फैला गुस्सा भारत के खिलाफ भी देखने को मिला. इसकी एक वजह नई दिल्ली और हसीना के बीच करीबी संबंधों की धारणा थी. अगस्त 2024 के आखिर में भारत ने पहली बार मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के सामने धनमंडी स्थित अपने केंद्र पर भीड़ की हिंसा का मुद्दा आधिकारिक तौर पर उठाया था.
हालांकि, भारत को न तो कोई आधिकारिक माफी मिली और न ही संपत्ति को हुए नुकसान को स्वीकार किया गया. पिछले दो साल में यह मुद्दा कई बार उठाया गया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. फरवरी में तारिक रहमान के चुनाव जीतने और प्रधानमंत्री बनने के बाद से दोनों सरकारें संबंधों को स्थिर करने के तरीकों पर विचार कर रही हैं.
अलग-अलग स्तरों पर बातचीत से लेकर रहमान के नई दिल्ली दौरे की नई उम्मीद तक, धनमंडी के सांस्कृतिक केंद्र का मुद्दा बातचीत से जैसे गायब ही हो गया है.
इस परिसर का भविष्य नई दिल्ली और ढाका के संबंधों के सामने मौजूद चुनौतियों की लंबी सूची में एक और मुद्दा है. इमारत के भविष्य पर बातचीत भी अटकी हुई है. दोनों सरकारें संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए राजनीतिक रूप से स्वीकार्य रास्ता तलाश रही हैं, जबकि कई दूसरे मुद्दे भी अब तक लंबित हैं.
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