नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी में वीकेंड के दौरान एसआईआर के विरोध में हुए प्रदर्शनों के बीच दिल्ली पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों पर पत्रकारों को हिरासत में लेने और उनके साथ मारपीट करने का आरोप लगा है. मीडिया जगत में ऐसे कम से कम तीन दर्जन मामले सामने आए हैं.
प्रेस की आज़ादी पर हमले की निंदा करते हुए प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने मंगलवार को अपने आसपास के इलाके में सड़कों पर उतरकर शांतिपूर्ण मार्च निकाला.
सुरक्षा बलों पर कार्रवाई करने का आरोप है, जबकि इन पत्रकारों के पास प्रेस पहचान पत्र और कई मामलों में पीआईबी (प्रेस सूचना ब्यूरो) कार्ड भी थे. इससे पहले दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए साफ किया था कि 10 अक्टूबर के प्रदर्शन को कवर करने वाले पत्रकार हर समय अपना पहचान पत्र पहने रहें, ताकि किसी तरह की गलतफहमी न हो.
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की अध्यक्ष संगीता बरुआ पिशारोटी ने कहा, “हम प्रेस क्लब के आसपास शांतिपूर्ण मौन मार्च निकाल रहे हैं, ताकि अपना विरोध दर्ज करा सकें और यह बता सकें कि सड़कों पर हमारा भी अधिकार है. हर उम्र के पत्रकारों को, चाहे उनके पास पीआईबी कार्ड हो या नहीं, काम करने की अनुमति है और पुलिस उन्हें मनमाने तरीके से हिरासत में नहीं ले सकती.”
डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म न्यूजलॉन्ड्री के पत्रकार अश्विन ने दिप्रिंट को बताया कि अपना प्रेस आईडी कार्ड और पीआईबी कार्ड की तस्वीर दिखाने के बावजूद दिल्ली पुलिस ने उन्हें उनके तीन अन्य साथियों के साथ हिरासत में ले लिया.
उन्होंने कहा, “मेरे साथी अनमोल को फोटो पत्रकार के साथ रात करीब 11:30 बजे दिल्ली पुलिस ने पहले हिरासत में लिया. मेरे साथी आस्था और मैं उन्हें छुड़ाने के लिए बस के पास गए, लेकिन पुलिस ने हमारे पहचान पत्रों को मानने से इनकार कर दिया और हमें बस के अंदर धकेल दिया. एक अधिकारी ने मेरा फोन भी छीन लिया.”
उन्होंने बताया कि बस लंबे समय तक कनॉट प्लेस (सीपी) के पास खड़ी रही. इसके बाद उसे छत्रसाल स्टेडियम ले जाया गया. उन्होंने कहा, “वहां एक महिला अधिकारी बस में चढ़ी और गिनती की कि कितने लोग हैं. इसके बाद बस आदर्श नगर पुलिस स्टेशन गई, जहां उन्होंने हमें दोपहर 1:30 बजे तक रखा.”
चारों पत्रकारों को दिल्ली पुलिस की जनसंपर्क टीम के एसीपी स्तर के एक अधिकारी से संपर्क करने के बाद ही जाने दिया गया. अश्विन ने फोन पर कहा, “हम चारों ने पुलिस को अपना प्रेस पहचान पत्र दिखाया, लेकिन उन्होंने हमें जाने नहीं दिया.”
दिप्रिंट ने पत्रकारों की ओर से लगाए गए आरोपों को लेकर दिल्ली पुलिस से फोन और संदेशों के जरिए संपर्क किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.
उसी दिन वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता को जंतर मंतर के पास एक जगह से दिल्ली पुलिस ने हिरासत में ले लिया. उन्हें एक अन्य पत्रकार से बातचीत करते हुए देखा गया था.
उन्होंने फोन पर दिप्रिंट को बताया, “करीब 12:45 बजे मैं एक रिपोर्टर से बात कर रहा था, तभी एक इंस्पेक्टर ने अपनी टीम के पुलिसकर्मियों को मुझे पुलिस वाहन के अंदर ले जाने का आदेश दिया. उन्होंने मुझे अपना मोबाइल लेने दिया, जो मेरे बेटे के पास था और फिर मुझे पुलिस वैन में हिरासत में ले लिया.”
जब पुलिस ने गुहा ठाकुरता का हाथ पकड़ा और उन्हें वाहन के अंदर डाला, तब उनका इंटरव्यू कर रहा पत्रकार बार-बार पुलिस को बता रहा था कि वह वरिष्ठ पत्रकार हैं.
उन्होंने बताया कि करीब 20 मिनट तक इधर-उधर ले जाने के बाद वैन ने उन्हें उस जगह से करीब आधा किलोमीटर दूर छोड़ दिया, जहां से उन्हें उठाया गया था. उन्होंने कहा, “मैंने पुलिसकर्मी को यह कहते हुए सुना कि ‘गलतफहमी’ हुई है.”
एक दिन बाद, जब सीपी के आसपास रुक-रुककर प्रदर्शन जारी रहे, तो और भी पत्रकारों ने हिरासत में लिए जाने और मारपीट के आरोप लगाए. इस दौरान कई वीडियो भी वायरल हुए, जिनमें ऐसी घटनाएं दिखाई गईं.
अखिल भारतीय छात्र संघ (आइसा) की अध्यक्ष नेहा बोरा के प्रदर्शन के आह्वान के बाद आर.के. आश्रम में जब प्रदर्शनकारियों और वहां मौजूद लोगों को बड़ी संख्या में हिरासत में लिया जा रहा था, तब यूसी न्यूज की पत्रकार प्रज्ञा मिश्रा को सड़क पर घसीटकर बस में हिरासत में लिया गया.
मिश्रा ने कहा, “पुलिस प्रदर्शनकारियों को धक्का दे रही थी और उन्हें मार रही थी, उन्हें बोरियों की तरह उठाकर ले जा रही थी. जब मैंने उनसे सवाल करना शुरू किया और मेरा कैमरा पर्सन उनकी रिकॉर्डिंग कर रहा था, तो उन्होंने अचानक मेरे कैमरा पर्सन को बाल पकड़कर घसीटना शुरू कर दिया.”
उन्होंने कहा, “जब मैंने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो कई सुरक्षा कर्मियों ने मुझे उठाया और पुलिस बस के अंदर धकेल दिया. मैंने अपना पहचान पत्र पहन रखा था, मेरे हाथ में माइक था और मैं लगातार उन्हें बता रही थी कि हम पत्रकार हैं.”
उन्होंने आरोप लगाया कि सुरक्षा बलों ने उनकी ओर इशारा करते हुए कहा, “बहुत रिपोर्टिंग कर रही है, इसको पकड़ो.” मिश्रा ने दिप्रिंट को बताया कि उन्हें करीब तीन घंटे तक हिरासत में रखा गया, जिसके बाद उन्हें सीपी में छोड़ दिया गया.
उसी दिन न्यूज़ मैगजीन कारवां के पत्रकार रयान थॉमस ने आरोप लगाया कि सीपी के पास प्रदर्शन को कवर करने के दौरान सुरक्षा बलों ने उनके साथ मारपीट की और उन्हें हिरासत में लिया.
थॉमस ने कहा, “शाम करीब 6 बजे पुलिस का एक समूह प्रदर्शनकारियों का पीछा कर रहा था और मैं उनसे दूरी बनाकर इसकी रिकॉर्डिंग कर रहा था. एक पुलिसकर्मी आया और मुझसे आक्रामक तरीके से सवाल करने लगा. इसके बाद कई पुलिसकर्मी आए और मुझे पुलिस जीप में धकेल दिया.” उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस ने उन्हें थप्पड़ मारा और बंदूक दिखाकर डराया.
उन्होंने कहा, “मैं लगातार अपना पहचान पत्र दिखाता रहा और उनसे मुझे जाने देने की अपील करता रहा. करीब 30 मिनट तक मुझे पुलिस वैन में बंद रखने के बाद आखिरकार उन्होंने मुझे सीपी के आसपास एक जगह पर छोड़ दिया.”
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