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Wednesday, 12 August, 2026
होमहेल्थअस्पताल मनमानी फीस न वसूलें, जरूरी इलाज की कीमत तय करने वाली संस्था बने: संसदीय समिति की सिफारिश

अस्पताल मनमानी फीस न वसूलें, जरूरी इलाज की कीमत तय करने वाली संस्था बने: संसदीय समिति की सिफारिश

राज्यसभा में पेश की गई पैनल की रिपोर्ट में कहा गया है कि कीमतों के लिए कोई एक जैसा ढांचा न होने के कारण लोगों को अपनी जेब से ज़्यादा पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं, खासकर कम और मध्यम आय वाले परिवारों को.

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नई दिल्ली: एक संसदीय समिति ने सरकार से जरूरी मेडिकल प्रक्रियाओं और डायग्नोस्टिक टेस्ट के लिए शुल्क की अधिकतम सीमा तय करने वाली एक वैधानिक संस्था बनाने की सिफारिश की है. समिति ने यह भी कहा है कि सभी अस्पताल शुल्क की एक समान सूची जारी करें. समिति ने सरकारी और निजी अस्पतालों में इलाज की लागत में बड़े अंतर को लेकर चिंता जताई है.

पिछले शुक्रवार को राज्यसभा में पेश की गई ‘सरकारी और निजी क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाओं की वहनीयता और पहुंच’ पर रिपोर्ट में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग से जुड़ी संसदीय स्थायी समिति ने कहा कि कीमत तय करने के लिए एक समान व्यवस्था नहीं होने से लोगों का अपनी जेब से होने वाला खर्च बढ़ रहा है. इसका असर खासकर कम और मध्यम आय वाले परिवारों पर पड़ रहा है.

समिति ने कहा कि सरकारी और निजी संस्थानों में स्वास्थ्य सेवाओं की लागत में “बड़ा अंतर” मरीजों के हितों को गंभीर रूप से प्रभावित करता है और गरीब तथा मध्यम आय वाले परिवारों के लिए अपनी जेब से होने वाला खर्च “बहुत ज्यादा” बना हुआ है.

समिति ने सिफारिश की कि स्वास्थ्य मंत्रालय जरूरी प्रक्रियाओं और डायग्नोस्टिक टेस्ट की फीस की अधिकतम सीमा तय करने और उसे लागू कराने के लिए एक राष्ट्रीय वैधानिक संस्था बनाए. उसने सरकार से यह भी कहा कि सभी स्वास्थ्य संस्थानों के लिए एक समान और पारदर्शी ‘शुल्क सूची’ जारी करना जरूरी किया जाए. इसके लिए मुंबई के टाटा मेमोरियल सेंटर (TMC) में अपनाई जाने वाली व्यवस्था को मॉडल बनाया जा सकता है.

ये सिफारिशें समिति की ओर से स्वास्थ्य सेवाओं की लागत और पहुंच की समीक्षा करने के बाद आई हैं. समिति ने स्वास्थ्य नियामकों, अस्पतालों की मान्यता देने वाली संस्थाओं, नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी और देश के दवा नियामक से भी जानकारी ली.

समिति समान कीमतों वाली व्यवस्था क्यों चाहती है?

समिति ने कहा कि मरीजों को अक्सर एक ही इलाज की कीमत में बड़ा अंतर देखने को मिलता है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि वे सरकारी अस्पताल जाते हैं या निजी अस्पताल.

समिति ने सेकेंडरी और टर्शियरी केयर वाले अस्पतालों में इलाज के लिए एक समान और सबूतों पर आधारित प्रोटोकॉल की सिफारिश की. प्रस्तावित वैधानिक संस्था जरूरी प्रक्रियाओं और डायग्नोस्टिक टेस्ट के लिए तय की जा सकने वाली फीस निर्धारित करेगी.

समिति ने कहा कि एक समान शुल्क सूची अस्पतालों की वेबसाइट और दूसरे प्लेटफॉर्म पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होनी चाहिए. उसके अनुसार, इससे “मनमाने तरीके से कीमत तय करने और बिना जरूरत की मेडिकल जांच” को रोकने में मदद मिलेगी.

इस सिफारिश का मकसद मरीजों को किसी प्रक्रिया या टेस्ट के लिए सहमति देने से पहले इलाज की लागत का साफ अंदाजा देना है.

कमरे का किराया तीन सितारा होटल से ज्यादा नहीं होना चाहिए

समिति ने अस्पताल के कमरों के ज्यादा किराए पर भी चिंता जताई, खासकर बड़े महानगरों में. उसने कहा कि कुछ निजी अस्पताल “अस्पताल में रहने के लिए बड़ी रकम लेते हैं” और कमरे के किराए को तुरंत तर्कसंगत बनाने की जरूरत है.

समिति ने माना कि अस्पतालों में कमरे का किराया अलग-अलग हो सकता है क्योंकि उनके इंफ्रास्ट्रक्चर, सेवाओं और संचालन की लागत अलग होती है. लेकिन उसने सिफारिश की कि बड़े शहरों के निजी अस्पतालों में सामान्य कमरे का किराया उस अस्पताल के आसपास मौजूद तीन सितारा होटलों के औसत कमरे के किराए से ज्यादा नहीं होना चाहिए.

समिति ने कहा कि इस नियम को अनिवार्य किया जाना चाहिए.

रेजिडेंट डॉक्टर, नर्सिंग, डिस्पोजेबल सामान, खाना और कपड़े धोने जैसी लागत को सामान्य कमरे के किराए के अलावा अलग से जोड़ा जा सकता है, ताकि कुल खर्च साफ रहे.

‘मरीजों को इलाज की लागत पहले से पता होनी चाहिए’

समिति ने यह भी सिफारिश की कि मरीजों के जटिल या लंबे समय तक चलने वाले इलाज से पहले इलाज की लागत का कानूनी रूप से बाध्यकारी अनुमान दिया जाए. समिति ने कहा कि कैंसर जैसी बीमारियों में यह खास तौर पर जरूरी है, क्योंकि इलाज कई चरणों में होता है और परिवारों के लिए अंतिम लागत का अनुमान लगाना मुश्किल हो सकता है.

समिति ने कहा कि मरीजों को “पैसों को लेकर अनिश्चितता और इलाज के बीच अचानक आने वाले ज्यादा बिल” से बचाया जाना चाहिए.

इसलिए समिति ने सिफारिश की कि सभी टर्शियरी केयर अस्पताल जटिल या लंबे इलाज की शुरुआत से पहले इलाज की पूरी लागत का कानूनी रूप से बाध्यकारी अनुमान दें.

अस्पतालों को ऐसे वित्तीय नेविगेटर भी नियुक्त करने चाहिए, जो विशेष काउंसलर हों और मरीजों को इलाज के अनुमानित खर्च, बीमा की सीमा और उपलब्ध चैरिटी मदद को समझने में मदद कर सकें.

समिति ने कहा कि इससे परिवार इलाज शुरू होने से पहले अपने पैसों की योजना बना सकेंगे, भले ही मरीज की स्थिति के हिसाब से अंतिम खर्च बदल सकता हो.

बीमा वाले मरीजों से अलग शुल्क नहीं लिया जाना चाहिए

समिति ने दो तरह की कीमत तय करने की व्यवस्था पर भी चिंता जताई. इसमें अस्पताल इस बात के आधार पर एक ही इलाज के लिए अलग-अलग शुल्क लेते हैं कि मरीज बीमित है या अपनी जेब से भुगतान कर रहा है.

समिति ने कहा कि निजी अस्पतालों को सिर्फ इसलिए शुल्क बढ़ाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि मरीज के पास हेल्थ इंश्योरेंस है. इससे बीमा कंपनियों और मरीजों दोनों के लिए इलाज की लागत बढ़ सकती है.

समिति ने ऐसी व्यवस्था को रोकने में नाकामी को नियामक चिंता बताया और सिफारिश की कि बीमा क्षेत्र को नियंत्रित करने वाली संस्था भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) एक स्पष्ट नीति बनाए, जिसमें दो तरह की कीमत तय करने पर साफ तौर पर रोक हो.

समिति ने अस्पतालों के बिलिंग सिस्टम को नेशनल हेल्थ क्लेम्स एक्सचेंज (NHCX) के साथ जोड़ना भी अनिवार्य करने की सिफारिश की. NHCX एक डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसका मकसद अस्पतालों और बीमा कंपनियों के बीच क्लेम और बिलिंग की जानकारी के आदान-प्रदान को आसान बनाना है.

समिति ने कहा कि IRDAI को अस्पतालों को अपने बिलिंग सिस्टम को NHCX से जोड़ने के लिए सख्त निर्देश देने चाहिए और देरी होने पर जुर्माना लगाना चाहिए.

आयुष्मान की दरों पर भी दोबारा विचार की जरूरत

समिति ने आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (AB-PMJAY) के तहत इलाज की दरें तय करने के तरीके पर भी सवाल उठाए. यह पात्र परिवारों के लिए सरकार की हेल्थ इंश्योरेंस योजना है.

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की 2023 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए समिति ने कहा कि नेशनल हेल्थ अथॉरिटी ने कुछ इलाज की दरें तय करते समय स्थानीय स्तर पर लागत का विस्तृत अध्ययन करने के बजाय मौजूदा केंद्रीय योजनाओं और राज्यों की औसत दरों का इस्तेमाल किया.

समिति ने कहा कि इलाज की वास्तविक लागत से कम दरों के कारण कुछ बड़े निजी अस्पतालों के लिए PM-JAY नेटवर्क में बने रहना मुश्किल हो गया है.

समिति ने नई और स्थानीय स्तर पर लागत की स्टडी कराने और दरों को बदलने की सिफारिश की, ताकि वे इलाज की मौजूदा लागत के हिसाब से तय की जा सकें.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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