नई दिल्ली: नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) जिस रिवाइज्ड प्लान पर विचार कर रहा है, उसके तहत मेडिकल कॉलेजों के हेड्स ऑफ डिपार्टमेंट्स (HoDs) को तीन साल के पहले के प्रपोज़ल के बजाय पांच साल का टेन्योर मिल सकता है. दिप्रिंट को पता चला है कि रिवाइज्ड प्रपोज़ल में HoD पद पर सिर्फ प्रोफेसर ही रहेंगे और ओरिजिनल ड्राफ्ट के तहत जिन एसोसिएट प्रोफेसर्स के लिए एलिजिबल थे, वे इसमें शामिल नहीं होंगे.
NMC के मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड यानी MARB के अध्यक्ष एम.के. रमेश ने दिप्रिंट को बताया कि मूल प्रस्ताव पर मिली प्रतिक्रिया के बाद आयोग 3 साल के कार्यकाल की योजना पर दोबारा विचार कर रहा है. उन्होंने कहा कि नए प्रस्ताव के तहत सबसे वरिष्ठ प्रोफेसर 5 साल तक विभाग का प्रमुख रहेगा. इसके बाद वरिष्ठता के हिसाब से अगले प्रोफेसर को यह जिम्मेदारी दी जाएगी.
पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन रेगुलेशंस, 2023 में बदलाव का मूल मसौदा मई 2025 में प्रकाशित हुआ था. इसमें वरिष्ठता के आधार पर योग्य प्रोफेसरों और एसोसिएट प्रोफेसरों के बीच हर 3 साल में HoD का पद बदलने का प्रस्ताव था. करीब डेढ़ साल बाद भी इस प्रस्ताव पर फैसला नहीं हो पाया है.
रोटेशन के आधार पर विभागाध्यक्ष बनाने का मतलब है कि तय समय के बाद योग्य शिक्षकों के बीच HoD का पद बदलता रहे. इसका मकसद यह था कि दूसरे शिक्षकों को भी नेतृत्व का मौका मिले, बजाय इसके कि एक ही व्यक्ति रिटायर होने या पद छोड़ने तक कई सालों तक इस पद पर बना रहे. हालांकि, इस पर यह सवाल उठाए गए कि नियुक्तियां सिर्फ वरिष्ठता के आधार पर होनी चाहिए या इसमें शैक्षणिक प्रदर्शन, रिसर्च से जुड़ी जिम्मेदारियों और विभाग की प्रशासनिक जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए.
रमेश ने कहा कि NMC को इस प्रक्रिया को नए प्रस्ताव के साथ फिर से शुरू करना होगा. यह प्रस्ताव जल्द लाया जाएगा और प्रक्रिया शुरू होने के बाद इसमें छह हफ्ते से ज्यादा समय नहीं लगेगा.
मौजूदा व्यवस्था के तहत आम तौर पर सबसे वरिष्ठ योग्य प्रोफेसर रिटायरमेंट तक या खुद पद छोड़ने तक HoD बने रहते हैं. रोटेशन वाली व्यवस्था में इस पद के लिए एक तय कार्यकाल होता, जिससे दूसरे योग्य शिक्षकों को भी यह जिम्मेदारी संभालने का मौका मिलता.
सिलेक्शन के नियमों को लेकर चिंताएं
पांच साल के कार्यकाल के प्रस्ताव से पहले की बातचीत के दौरान उठी एक बड़ी चिंता दूर नहीं होती है. सवाल यह है कि क्या विभागाध्यक्ष यानी HoD को अपने आप वरिष्ठता के आधार पर चुना जाना चाहिए या कॉलेजों को उम्मीदवारों की योग्यता और प्रशासनिक क्षमता का आकलन करना चाहिए?
कर्नाटक इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (KIMS), हुबली में फार्माकोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. अंचे नारायण राव दत्तात्री ने कहा कि नियुक्तियां अपने आप पद बदलने के बजाय एक चयन प्रक्रिया के जरिए होनी चाहिए.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “मुझे सच में लगता है कि यह एक चयन प्रक्रिया होनी चाहिए, न कि बिना सोचे-समझे एक समूह के विभागाध्यक्षों को हटाकर उनकी जगह दूसरे समूह के विभागाध्यक्षों को लाने की प्रक्रिया.”
दत्तात्री ने कहा कि लंबे कार्यकाल से विभागों को काम में निरंतरता बनाए रखने में मदद मिल सकती है, लेकिन विभागाध्यक्ष चुनने का तरीका भी जरूरी है. वह पहले भी योग्यता और वरिष्ठता, दोनों को ध्यान में रखकर चयन करने का समर्थन कर चुके हैं. हालांकि, इसके लिए जरूरी है कि चयन के नियम पहले ही बता दिए जाएं और शिक्षकों को उन नियमों को पूरा करने के लिए समय दिया जाए.
केंद्र सरकार के एक अस्पताल के वरिष्ठ डॉक्टर ने नाम नहीं बताने की शर्त पर सवाल उठाया कि क्या सभी सरकारी मेडिकल संस्थानों में विभागाध्यक्षों को बारी-बारी से नियुक्त करने की एक जैसी नीति लागू की जा सकती है, जबकि इन संस्थानों में प्रशासन की अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं.
डॉक्टर ने दिप्रिंट से कहा, “दिल्ली में भी MAMC, जीबी पंत अस्पताल, UCMS और AIIMS समेत ज्यादातर मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में विभागाध्यक्षों को बारी-बारी से नियुक्त करने की व्यवस्था नहीं है. यह व्यवस्था केवल कुछ संस्थानों में लागू है. NMC नियम बनाने वाली संस्था है, प्रशासन चलाने वाली संस्था नहीं. सरकारी संस्थान अपने-अपने सेवा नियमों के तहत चलते हैं.”
डॉक्टर ने कहा, “अगर NMC का आदेश जारी भी हो जाता है, तो भी यह अपने आप उन राज्य या केंद्र सरकार के संस्थानों पर लागू नहीं होगा, जो अपने सेवा नियमों के तहत चलते हैं. इसके लिए या तो उन नियमों में बदलाव करना होगा या आदेश को अदालत में चुनौती मिलने के बाद भी कानूनी रूप से सही ठहरना होगा.”
NMC के पहले के विचार-विमर्श में भी हर हाल में पद बदलने के प्रस्ताव को लेकर विरोध सामने आया था. जून में दिप्रिंट की रिपोर्ट में बताए गए पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड (PGMEB) के समीक्षा नोट के मुताबिक, प्रस्तावित नियम पर मिली 421 प्रतिक्रियाओं में से 249 ने इसका विरोध किया था, जबकि 172 ने समर्थन किया था. बोर्ड ने सिफारिश की थी कि अपने आप पद बदलने की व्यवस्था पर दोबारा विचार किया जाए और नियुक्तियां योग्यता व वरिष्ठता के आधार पर की जाएं. साथ ही, संस्थानों को कुछ फैसले खुद लेने की छूट भी दी जाए.
16 सितंबर को मिले RTI के जवाब से पता चलता है कि NMC ने संबंधित पक्षों की राय पर PGMEB का नोट देने से इनकार कर दिया. इसके लिए सूचना का अधिकार कानून की धारा 8(1)(i) का हवाला दिया गया. यह आवेदन दत्तात्री ने दिया था. उन्होंने विभागाध्यक्षों को बारी-बारी से नियुक्त करने के प्रस्ताव पर हुई बातचीत की जानकारी मांगी थी. NMC ने कहा कि प्रस्ताव पर अभी विचार किया जा रहा है.
अनिवार्य रूप से विभागाध्यक्षों का पद बदलने का विरोध करने वालों का कहना है कि कार्यकाल तय करने से चल रहे शोध और शैक्षणिक कार्यक्रमों में रुकावट आ सकती है, प्रशासनिक कामकाज में टकराव बढ़ सकता है और कॉलेज अपनी जरूरतों के हिसाब से विभागाध्यक्ष नहीं चुन पाएंगे. इसका समर्थन करने वालों का कहना है कि इस व्यवस्था से ज्यादा शिक्षकों को नेतृत्व करने का मौका मिलेगा और प्रशासनिक अधिकार दशकों तक एक ही व्यक्ति के पास बने रहने से रोका जा सकेगा.
कार्यकाल और लागू करने को लेकर बहस
AIIMS के फैकल्टी एसोसिएशन (FAIMS) के अध्यक्ष और नई दिल्ली स्थित AIIMS के रेडियोडायग्नोसिस एवं इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी विभाग के शिक्षक डॉ. अमरिंदर सिंह मल्ही के मुताबिक, तीन साल का कार्यकाल काम में निरंतरता बनाए रखने और दूसरे शिक्षकों को मौका देने के बीच बेहतर संतुलन बनाएगा.
उन्होंने कहा, “विभागाध्यक्षों को बारी-बारी से नियुक्त करने के लिए प्रस्तावित तीन साल का कार्यकाल भारत के मेडिकल संस्थानों के लिए सबसे संतुलित और व्यावहारिक तरीका है. निष्पक्षता, पारदर्शिता और सभी को बराबर मौके देने के लिए बनाई गई व्यवस्था में पांच साल का समय बहुत ज्यादा है.”
उन्होंने आगे कहा कि पांच साल का कार्यकाल दूसरे योग्य शिक्षकों को मौका मिलने में देरी कर सकता है. खासकर उन संस्थानों में, जहां नियमित रूप से भर्ती और पदोन्नति होती है. उन्होंने कहा कि विभागाध्यक्ष का पद डीन, निदेशक और कुलपति जैसे बड़े शैक्षणिक और प्रशासनिक पदों तक पहुंचने की दिशा में एक अहम कदम भी हो सकता है.
उन्होंने कहा, “अगर एक ही व्यक्ति एक बार में पांच साल तक HoD बना रहता है, तो नेतृत्व के लिए आगे बढ़ने का रास्ता संकरा हो जाता है, मौके मिलने में देरी होती है और संस्थान में नए नेतृत्व के आने की संभावना सीमित हो जाती है. व्यावहारिक रूप से पांच साल के कार्यकाल में पद बदलने की व्यवस्था सिर्फ नाम की रह जाने का खतरा है, उसका असली मकसद पूरा नहीं होगा.”
मल्ही ने वी.के. पॉल समिति के निष्कर्षों का हवाला देते हुए कहा कि नई दिल्ली के AIIMS और चंडीगढ़ के पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER) के 78 प्रतिशत शिक्षक विभागाध्यक्षों को बारी-बारी से नियुक्त करने की व्यवस्था के समर्थन में थे. सभी स्तरों के शिक्षकों में इसका समर्थन देखा गया. इनमें 95 प्रतिशत असिस्टेंट प्रोफेसर, 89 प्रतिशत एडिशनल प्रोफेसर, 82 प्रतिशत प्रोफेसर और 78 प्रतिशत एसोसिएट प्रोफेसर शामिल थे.
उन्होंने कहा कि समिति ने नई दिल्ली के AIIMS, चंडीगढ़ के PGIMER और AIIMS के दूसरे संस्थानों में विभागाध्यक्षों को बारी-बारी से नियुक्त करने की व्यवस्था की जांच की थी. उन्होंने आगे कहा कि 13 अप्रैल 2023 को रिपोर्ट सौंपे जाने के बावजूद नई दिल्ली के AIIMS और PGIMER में यह व्यवस्था लागू नहीं हुई. इसके बजाय, एक साल के लिए अंतरिम व्यवस्था के तौर पर कॉलेजियम प्रणाली शुरू की गई.
मल्ही ने दिप्रिंट से कहा, “स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को अब समय-सीमा तय करके साफ फैसला लेना चाहिए और इस व्यवस्था को लागू करना सुनिश्चित करना चाहिए, न कि इस मामले को अनिश्चित समय तक लंबित रहने देना चाहिए.”
उन्होंने तीन साल की ऐसी व्यवस्था लागू करने की मांग की, जिसमें योग्यता के साफ नियम हों, चयन योग्यता और वरिष्ठता के आधार पर हो, जवाबदेही तय हो और जिम्मेदारी सौंपने की प्रक्रिया निष्पक्ष हो. उन्होंने कहा कि इसका मकसद शैक्षणिक काम में रुकावट डाले बिना ज्यादा शिक्षकों को नेतृत्व का मौका देना होना चाहिए.
यह प्रस्ताव कर्नाटक की उस नीति से जुड़े कानूनी विवाद से भी जुड़ा है, जिसके तहत हर तीन साल में विभागाध्यक्ष बदले जाते थे. सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2024 में राज्य की इस नीति पर रोक लगा दी थी. इस मामले में प्रशासनिक नियुक्तियों और शैक्षणिक नेतृत्व के बीच अंतर के साथ-साथ ऐसे फैसले लेने में NMC के अधिकारों की सीमा पर भी सवाल उठे थे.
NMC के पांच साल के संशोधित प्रस्ताव पर अभी विचार किया जा रहा है. अब तक इस बारे में कोई औपचारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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