यरुशलम: 2014 में जब इज़रायल सरकार ने गादी आइज़नकोट को देश की सेना का प्रमुख बनाने की मंजूरी दी थी, तब बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा था, “सही जगह पर सही समय पर सही व्यक्ति. सभी क्षेत्रों में उनकी सफलता हमारी सफलता है.”
मंगलवार को, जब इज़रायल में मतदान हो रहा है, पूर्व इज़रायली सेना प्रमुख नेतन्याहू के मुख्य चुनौती देने वाले हैं. यह 7 अक्टूबर के आतंकी हमलों और उसके बाद कई साल चले युद्ध के बाद होने वाला पहला चुनाव है.
आइज़नकोट के चुनाव अभियान का मुख्य मुद्दा 7 अक्टूबर के आतंकी हमलों के लिए जवाबदेही तय करना रहा है.
स्थानीय समयानुसार सुबह 7 बजे (भारतीय समयानुसार सुबह 10:30 बजे) मतदान शुरू होने से कुछ मिनट पहले आइज़नकोट ने कहा, “आज हमारे पास बैलेट बॉक्स में ‘वे’ की पर्ची डालने, 7 अक्टूबर की सरकार और जिम्मेदारी से बचने वाली सरकार को बदलने और इजरायल को एक नई और बेहतर राह पर ले जाने का मौका है.”
आइज़नकोट की याशार पार्टी के लिए तय बैलेट पर्ची पर हिब्रू शब्द ‘डेरेख’ लिखा है, जिसका मतलब ‘रास्ता’ है. चुनाव के आधिकारिक नतीजे 4 नवंबर को औपचारिक रूप से घोषित किए जाएंगे.
2015 से 2019 तक चार साल इज़रायल डिफेंस फोर्सेज (IDF) की अगुवाई करने, 7 अक्टूबर के बाद बने वॉर कैबिनेट में काम करने, 2023 में गाज़ा युद्ध में अपने एक बेटे को खोने और राष्ट्रीय सुरक्षा पर मजबूती से अपना पक्ष रखने की वजह से उनका चुनावी अभियान और मजबूत हो जाता है.
इज़रायल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे नेतन्याहू की तुलना में आइज़नकोट राजनीति में नए हो सकते हैं, लेकिन इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि इज़रायल में सैन्य नेताओं को लंबे समय से राजनीतिक समर्थन मिलता रहा है. खुद नेतन्याहू भी IDF की विशेष सेना इकाई सायरेट मटकल में काम कर चुके हैं.
इज़रायली लोकतंत्र पर नई किताब ‘टू बी अ फ्री पीपल इन आवर लैंड: जियोनिज्म, लिबरल डेमोक्रेसी, एंड इजरायल्स हिंज इलेक्शन’ के लेखक पॉल ग्रॉस कहते हैं, “गादी आइज़नकोट हाल तक दुनिया के बाकी लोगों के बीच भले ही बहुत जाने-पहचाने नहीं रहे हों, लेकिन इज़रायल में वह लोकप्रिय रहे हैं. इस देश में प्रधानमंत्री के बाद सेना प्रमुख सबसे ताकतवर व्यक्ति होता है.”
रॉस ने दिप्रिंट से कहा, “आइज़नकोट ने अपना कैंपेन देश को सबसे ऊपर रखने के वादे के साथ बनाया है. नेतन्याहू को ऐसे व्यक्ति के तौर पर देखा जाता है जिसने देश से ऊपर अपने और अपने परिवार के हितों को रखा है. गादी आइज़नकोट ने अपनी पार्टी का नाम भी सही रखा है—‘याशार’. हिब्रू में इसका मतलब न तो वाम और न ही दक्षिण है.”

आइज़नकोट ने 16 सितंबर 2025 को याशार पार्टी शुरू की. यह सरकार छोड़ने के एक साल से ज्यादा समय बाद हुआ. वह 2022 में नेशनल यूनिटी गठबंधन में शामिल होने के बाद नेसेट के लिए चुने गए थे. 7 अक्टूबर के हमलों के बाद उनकी पार्टी के सरकार में शामिल होने पर अक्टूबर 2023 में उन्हें बिना डिपार्टमेंट वाला मंत्री बनाया गया. आइज़नकोट ने नेशनल यूनिटी के बाकी नेताओं के साथ जून 2024 में सरकार छोड़ दी.
एक साल बाद उन्होंने पार्टी भी छोड़ दी और नेसेट की अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया. अब वह इज़रायल के अगले प्रधानमंत्री बनने की कोशिश कर रहे हैं और नेतन्याहू विरोधी ‘चेंज ब्लॉक’ की अगुवाई कर रहे हैं. ज्यादातर सर्वे के मुताबिक, नेतन्याहू विरोधी गठबंधन को 52-55 सीटें मिल सकती हैं, जबकि नेतन्याहू के गठबंधन को 49-53 सीटें मिलने की संभावना है.
आइज़नकोट और नेतन्याहू एक-दूसरे से काफी अलग हैं. नेतन्याहू अपने बयानों की वजह से अक्सर सुर्खियों में रहते हैं और अपनी छवि को लेकर काफी सजग रहते हैं. वहीं 66 साल के आइज़नकोट अब तक विवादों से दूर रहे हैं.
विश्लेषकों का कहना है कि वह करिश्माई नहीं हैं, कद में छोटे हैं और उनकी छवि नेतन्याहू से बिल्कुल अलग है. तो फिर वह नेतन्याहू के मुख्य चुनौती देने वाले कैसे बन गए?
इज़रायली पत्रकार यारोन डेसेल ने कहा, “आइज़नकोट सुरक्षा को समझते हैं. उन्होंने 35 साल सेना में काम किया है. उन्हें पता है कि क्या करना है. वह प्राथमिकताओं को समझते हैं और इसी वजह से पूरे इज़रायल में उनकी लोकप्रियता बढ़ी है.”
इस साल के चुनाव में सुरक्षा सबसे बड़ी चर्चा का मुद्दा रही है. नेतन्याहू ने आइज़नकोट को ऐसे व्यक्ति के तौर पर दिखाने की कोशिश की है, जो अगर चुनाव जीतते हैं तो देश की राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर कर देंगे.
आइज़नकोट ने इंटरव्यू और चुनावी भाषणों में साफ किया है कि वह 18 महीने से ज्यादा समय में गाज़ा में हमास का शासन खत्म कर देंगे, लेकिन इज़रायल के दो और विवादित मुद्दों पर उन्होंने अलग रुख अपनाया है.
याशार पार्टी के नेता ने कहा है कि वह नेतन्याहू और उनके सहयोगियों द्वारा आगे बढ़ाए गए न्यायिक बदलाव को पलटेंगे. 7 अक्टूबर 2023 से पहले नेतन्याहू को न्यायिक बदलाव लाने की कोशिश को लेकर बड़े विरोध प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा था. आइज़नकोट ने अति-रूढ़िवादी यहूदियों को मिलने वाली सैन्य सेवा से छूट खत्म करने का भी वादा किया है.
मंगलवार का चुनाव और उसके बाद आने वाले नतीजे यह साबित करेंगे कि आइज़नकोट वास्तव में “सही जगह पर सही समय पर सही व्यक्ति” हैं या नहीं.
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