नई दिल्ली: चुनाव अधिकारियों ने जिन 16 लाख वोटरों को मतदाता सूची में शामिल करने के खिलाफ अपील दायर की थी, वे इस साल की शुरुआत में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वोट देने के हकदार थे. चुनाव आयोग (EC) ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक हलफनामे में यह सफाई दी है.
EC ने सुप्रीम कोर्ट को बताया, “…रिट याचिका में एक और बात यह कही गई है कि पश्चिम बंगाल में आवेदकों/मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में शामिल करने के आदेशों के खिलाफ अपील दायर की गई हैं. यह कहा गया है कि यह साफ नहीं है कि इन सभी अपीलों को दायर करने की अनुमति किस अधिकारी ने दी थी.”
EC ने कहा, “यह बताया जाता है कि इन मतदाताओं के नाम पहले से ही मतदाता सूची में हैं और इसलिए वे हाल में हुए विधानसभा चुनाव में वोट देने के हकदार थे. उनके दस्तावेज पोर्टल पर उपलब्ध हैं और उनके पक्ष में संबंधित न्यायिक अधिकारी का फैसला भी है.”
यह सफाई SIR प्रक्रिया से जुड़े फैसले लेने के तरीके को चुनौती देने वाली एक याचिका पर आई है. यह याचिका EC के कामकाज पर इंडियन एक्सप्रेस की जांच के बाद दायर की गई थी.
याचिका में दूसरी बातों के अलावा मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने और यह घोषित करने की मांग की गई थी कि चुनाव आयोग के फैसले CEC अकेले नहीं ले सकते.
इंडियन एक्सप्रेस की जांच के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीने में कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति जताई थी कि फैसले उन्हें जानकारी दिए बिना लिए जा रहे हैं.
इस जांच में फॉर्म 6 में किए गए बदलावों को लेकर भी कई सवाल उठाए गए थे. नए वोटरों को यह फॉर्म भरना होता है. रिपोर्ट में कहा गया था कि ये बदलाव पर्याप्त अधिकार के बिना किए गए. जांच में ECINet प्लेटफॉर्म में भी कई कमियां सामने आई थीं. जांच के मुताबिक, चुनाव आयुक्तों ने वोटर सॉफ्टवेयर की विश्वसनीयता को लेकर कैबिनेट सचिव से भी संपर्क किया था.
बंगाल में वोटरों के नाम शामिल किए जाने के खिलाफ दायर अपीलों को लेकर भी सवाल उठे थे.
इस साल की शुरुआत में EC ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर किया था. इसमें कहा गया था कि SIR के दौरान वोटरों के नाम शामिल करने, हटाने या डिलीट करने से जुड़े मामलों की अपील सुनने के लिए बंगाल में ट्रिब्यूनल के सामने 38 लाख अपील लंबित थीं.
EC ने कहा था कि इनमें 22.21 लाख अपील उन हटाए गए वोटरों ने दायर की थीं, जो अपना नाम फिर से जुड़वाना चाहते थे. बाकी 16.10 लाख अपील उन वोटरों के खिलाफ दायर की गई थीं, जिन्हें न्यायिक अधिकारियों ने मतदाता सूची में शामिल किया था और जिनके नाम हटाने की मांग की गई थी.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, संधू ने अगस्त में आयोग के अधिकारियों को पत्र लिखकर पूछा था, “EC की ओर से ये अपील दायर करने के लिए किसे अधिकार दिया गया था और किसने दिया?” और “ECI की ओर से वास्तव में ये अपील किसने दायर कीं?”
उन्होंने यह भी दर्ज किया था कि न तो उन्हें, न जोशी को और न ही पश्चिम बंगाल के मुख्य चुनाव अधिकारी को इन अपीलों को दायर करने के आधार या प्रक्रिया के बारे में बताया गया था.
अब EC की ओर से उप चुनाव आयुक्त भानु प्रकाश येतुरु ने EC, CEC और दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से जवाब दाखिल किया है. इसमें अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट के दिए एक आदेश का हवाला दिया गया है. उस समय अदालत पश्चिम बंगाल SIR के दौरान न्यायिक अधिकारियों द्वारा लिए गए फैसलों के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनवाई कर रही थी.
1 अप्रैल के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने EC की उस दलील पर ध्यान दिया था कि ट्रिब्यूनल के पास दोनों तरह की अपीलों में जरूरी रिकॉर्ड उपलब्ध होंगे. इनमें वे अपीलें शामिल थीं जो वोटरों ने अपना नाम हटाए जाने के खिलाफ दायर की थीं और वे अपीलें भी जो EC के अधिकारियों ने कुछ वोटरों के नाम शामिल किए जाने पर आपत्ति जताते हुए दायर की थीं. 6 अप्रैल को दिए एक और आदेश में अदालत ने साफ किया था कि अपील उन वोटरों की ओर से दायर की जा सकती है जिनके नाम हटा दिए गए थे, “या ऐसे आपत्तिकर्ताओं/EC के अधिकारियों की ओर से, जो मतदाता सूची में कुछ नाम शामिल किए जाने से असंतुष्ट हो सकते हैं.”
इन टिप्पणियों का हवाला देते हुए ECI ने अब अपने हलफनामे में कहा है, “RP Act (रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट) के प्रावधानों के अनुसार, CEO/DEO/ERO/AERO मतदाता सूची से जुड़े अधिकारी हैं.” (यहां CEO का मतलब मुख्य चुनाव अधिकारी, DEO का जिला चुनाव अधिकारी, ERO का चुनाव पंजीकरण अधिकारी और AERO का सहायक चुनाव पंजीकरण अधिकारी है.)
इसके बाद हलफनामे में कहा गया है कि पश्चिम बंगाल के CEO कार्यालय से एक सूचना मिली थी. इसमें बताया गया था कि ये अपील CEO कार्यालय के अधिकारियों ने “RP Act के तहत अधिकारियों के तौर पर अपनी क्षमता में” दायर की थीं.
इसमें कहा गया, “अधिकारियों के पास इस माननीय अदालत के आदेशों के अनुसार अपील दायर करने का अधिकार था और इन मामलों को आयोग के सामने नहीं लाया गया था.”
फैसला लेने का प्रोसेस
इलेक्शन कमिश्नरों और CEC के बीच असहमति के दूसरे पॉइंट्स पर, एफिडेविट में कहा गया है कि SIR से जुड़े ऑर्डर “भारत के इलेक्शन कमीशन के फैसले के अनुसार जारी किए गए थे, जो एकमत से लिया गया था और भारत के संविधान के आर्टिकल 324 के साथ चीफ इलेक्शन कमिश्नर और दूसरे इलेक्शन कमिश्नर (अपॉइंटमेंट, सर्विस की शर्तें और टर्म ऑफ ऑफिस) एक्ट 2023 के सेक्शन 18 का पालन करते हुए लिया गया था.”
ऊपर बताया गया आर्टिकल पूरे इलेक्शन प्रोसेस की देखरेख, डायरेक्शन और कंट्रोल इलेक्शन कमीशन को देता है.
EC की दलील में कहा गया है कि चेन ऑफ़ कमांड में किसी भी अधिकारी के किसी भी फैसले लेने के प्रोसेस, सुझाव, ऑब्ज़र्वेशन, अलग-अलग विचार या सवालों को सही अथॉरिटी के फैसले पर पहुंचने के लिए ध्यान में रखा जाता है.
एफिडेविट में कमीशन के अंदर फैसले लेने के प्रोसेस के बारे में भी डिटेल में बताया गया है, जिसमें कहा गया है कि मुद्दों पर सोच-विचार और चर्चा होती है.
“संबंधित डिवीज़न संबंधित फ़ाइल को संबंधित डॉक्यूमेंट्स के साथ, और नियमों, रेगुलेशन वगैरह के अनुसार ऐसे मुद्दों पर कमीशन द्वारा अप्रूवल के लिए रखते हैं. संबंधित डिवीज़न द्वारा रखी गई फाइलें पहले एक इलेक्शन कमिश्नर को और उसके बाद दूसरे इलेक्शन कमिश्नर को और फिर आखिर में चीफ इलेक्शन कमिश्नर को भेजी जाती हैं.
“कमीशन के ऐसे अप्रूव्ड फैसलों को इलेक्शन कमीशन की संबंधित फ़ाइलों में ठीक से नोट किया जाता है और उन पर ECs और CEC के साइन होते हैं” इसमें कहा गया है और यह भी कहा गया है कि इसके बाद ही EC सेक्रेटेरिएट द्वारा फैसले को नोटिफाई और लागू किया जाता है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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