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Wednesday, 4 November, 2026
होमहेल्थखसरे से 1,257 मौतें: जिस बीमारी पर बांग्लादेश ने लगभग काबू पा लिया था, वही अब कैसे बन गई बड़ा संकट?

खसरे से 1,257 मौतें: जिस बीमारी पर बांग्लादेश ने लगभग काबू पा लिया था, वही अब कैसे बन गई बड़ा संकट?

बांग्लादेश दुनिया के सबसे बड़े खसरे के प्रकोप से जूझ रहा है; मार्च से अक्टूबर के बीच यहां खसरे के 202,000 संदिग्ध मामले सामने आए हैं और 1,257 लोगों की मौत हुई है.

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नई दिल्ली: बांग्लादेश को कभी बचपन के टीकाकरण के क्षेत्र में दुनिया की एक बड़ी सफलता के तौर पर देखा जाता था. गरीबी और घनी आबादी के बावजूद देश ने इस दिशा में काफी प्रगति की थी. कई सालों तक वहां के टीकाकरण कार्यक्रम ने खसरे को काफी हद तक काबू में रखा. टीकाकरण की दर अक्सर अमीर देशों के बराबर रही.

लेकिन मार्च में शुरू हुए खसरे के प्रकोप ने दिखा दिया है कि यह उपलब्धि कितनी जल्दी खत्म हो सकती है.

बांग्लादेश इस समय खसरे के ऐसे प्रकोप से जूझ रहा है, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इस साल संदिग्ध मामलों की संख्या के लिहाज से दुनिया का सबसे बड़ा प्रकोप बताया है. मार्च के मध्य में प्रकोप शुरू होने से लेकर 9 अक्टूबर तक देश में खसरे के 2.02 लाख संदिग्ध मामले सामने आए. इनमें से 22,000 मामलों की लैब जांच में पुष्टि हुई. इस साल किसी दूसरे देश में संदिग्ध मामलों की संख्या इतनी ज्यादा नहीं रही है.

जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करना चाहिए.

बांग्लादेश की खसरा और रूबेला उन्मूलन के लिए बनी राष्ट्रीय सत्यापन समिति के अध्यक्ष प्रोफेसर महमूदुर रहमान ने दिप्रिंट से कहा, “सरकार को इस प्रकोप को गंभीरता से लेना चाहिए और इसे जन स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करना चाहिए, जो अब तक नहीं किया गया है. एक महामारी विशेषज्ञ के तौर पर, जिसे 40 साल का फील्ड अनुभव है, मुझे नहीं लगता कि अगर मौजूदा तरीका जारी रहा तो इस प्रकोप पर काबू पाया जा सकता है.”

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 16 मार्च से अब तक खसरे और खसरे जैसे लक्षणों के कारण 1,257 लोगों की मौत हुई है. इनमें से 1,152 लोगों की मौत खसरे जैसे लक्षणों के साथ हुई, जबकि 105 मौतों की पुष्टि खसरे के कारण हुई है.

ढाका डिवीजन में खसरे जैसे लक्षणों से सबसे ज्यादा 511 मौतें दर्ज की गईं. इसके बाद सिलहट में 203, चट्टोग्राम में 112, राजशाही में 93, मैमनसिंह में 89, बरिशाल में 69, खुलना में 57 और रंगपुर में 18 लोगों की मौत हुई.

सोमवार को स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (DGHS) ने बताया कि पिछले 24 घंटों में खसरे जैसे लक्षणों के 1,492 नए मामले सामने आए और 1,385 लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया.

स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस प्रकोप के पीछे टीकाकरण की घटती दर, टीकों की आपूर्ति में रुकावट, कमजोर स्वास्थ्य ढांचे और उन बच्चों की पहचान करने और उन तक पहुंचने में नाकामी को जिम्मेदार मानते हैं, जिन्हें टीके की खुराक नहीं मिल पाई है.

जून में प्रकाशित संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक स्थिति रिपोर्ट के मुताबिक, यह प्रकोप देश के सभी 64 जिलों में फैल चुका है. पांच साल से कम उम्र के बच्चे कुल संक्रमितों में 80 फीसदी से ज्यादा हैं. वहीं, नौ महीने से कम उम्र के शिशुओं की संख्या सामने आए मामलों में करीब एक तिहाई है. इनमें से कई बच्चे नियमित खसरा टीकाकरण के लिए तय उम्र तक नहीं पहुंचे हैं.

जिस देश ने इस बीमारी को लगभग काबू में कर लिया था, वहां ये आंकड़े हालात में बड़ी गिरावट दिखाते हैं. साथ ही, ये सवाल भी खड़े करते हैं कि आखिर क्या गलत हुआ, आपातकालीन टीकाकरण अभियान इस प्रकोप को रोकने में क्यों नाकाम रहे और क्या बांग्लादेश का स्वास्थ्य तंत्र ऐसे एक और संकट को रोकने के लिए तैयार है.

टीकाकरण कार्यक्रम कमजोर पड़ा

खसरा दुनिया की सबसे तेजी से फैलने वाली संक्रामक बीमारियों में से एक है. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के ग्रीन टेम्पलटन कॉलेज के फेलो और अशोका यूनिवर्सिटी के विजिटिंग प्रोफेसर डॉ. शाहिद जमील ने कहा कि इस बीमारी का बेसिक रिप्रोडक्शन नंबर (R0) 12 से 18 के बीच है. इसका मतलब है कि जिस आबादी में किसी को भी इस बीमारी से बचाव की इम्युनिटी नहीं है, वहां एक संक्रमित व्यक्ति औसतन 12 से 18 अन्य लोगों तक वायरस फैला सकता है.

इसके मुकाबले, कोविड-19 का R0 1.5 से 6.7 के बीच था और इसका वैश्विक औसत 3.3 था.

WHO की सलाह है कि हर जिले में टीका लगाने की तय उम्र वाले कम से कम 95 फीसदी बच्चों को खसरे के टीके की दोनों खुराक दी जानी चाहिए. इससे संक्रमण का फैलाव रोका जा सकता है और बीमारी के प्रकोप से बचा जा सकता है.

जमील ने कहा, “जब टीकाकरण की दर इस स्तर से नीचे गिर जाती है, तो आबादी में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ जाती है, जिनमें बीमारी से बचाव की इम्युनिटी नहीं होती.”

बांग्लादेश WHO के इस लक्ष्य को हासिल करने के काफी करीब पहुंच गया था. WHO और यूनिसेफ के 2024 के अनुमान के मुताबिक, देश में 96 फीसदी बच्चों को खसरे के टीके की पहली खुराक और 93 फीसदी को दूसरी खुराक मिल चुकी थी. दूसरी खुराक उन थोड़े से बच्चों को भी सुरक्षा देने के लिए दी जाती है, जिनके शरीर में पहली खुराक के बाद इम्युनिटी नहीं बन पाती.

यह उपलब्धि कई दशकों की मेहनत से हासिल हुई थी. इसके लिए विस्तारित टीकाकरण कार्यक्रम (EPI) के तहत देशभर में टीकाकरण केंद्रों और घर-घर जाकर लोगों तक पहुंचने वाले स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं का नेटवर्क तैयार किया गया था. WHO के आंकड़ों के मुताबिक, 2021 से 2025 के बीच बांग्लादेश में हर साल खसरे के करीब 100 से 300 मामले ही सामने आए.

लेकिन राजनीतिक उथल-पुथल और टीके खरीदने की प्रक्रिया में बदलाव के बीच यह व्यवस्था कमजोर पड़ने लगी.

2024 में छात्रों के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद शेख हसीना का 15 साल का प्रधानमंत्री कार्यकाल खत्म हो गया. सत्ता परिवर्तन के बाद सरकारी प्रशासन के कई हिस्सों में कामकाज प्रभावित हुआ. स्वास्थ्यकर्मी हड़ताल पर चले गए, टीकों के ऑर्डर में देरी हुई और नियमित टीकाकरण से जुड़ी फॉलो-अप प्रक्रिया भी बाधित हुई.

जुलाई में प्रकाशित WHO-यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में बांग्लादेश में खसरे के टीके की पहली खुराक लेने वाले बच्चों की अनुमानित संख्या घटकर 90 फीसदी और दूसरी खुराक लेने वाले बच्चों की संख्या 86 फीसदी रह गई.

रिपोर्ट में 2023 से 2025 के बीच बांग्लादेश के टीकाकरण आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए गए. कुछ मामलों में शुरुआती आंकड़ों से पता चला कि टीका लगवाने वाले बच्चों की संख्या तय लक्ष्य से 100 फीसदी से भी ज्यादा थी. इससे संकेत मिलता है कि टीके की खुराकों या टीका लगवाने की उम्र वाले बच्चों की गिनती में गलतियां हो सकती हैं.

रहमान ने कहा कि समस्या की एक वजह वह संख्या है, जिसके आधार पर टीकाकरण की दर निकाली जाती है. यानी टीका लगवाने के योग्य बच्चों की अनुमानित संख्या. उन्होंने कहा, “इस संख्या की गलत गणना के कारण सालों से ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ती गई, जिन्हें बीमारी से बचाव के लिए जरूरी टीके नहीं मिले. यही इस प्रकोप की एक बड़ी वजह है.”

उन्होंने EPI मुख्यालय में अनुभवी अधिकारियों की कमी और कुछ पदों को खत्म किए जाने की ओर भी इशारा किया. इन पदों की जगह नए लोगों की नियुक्ति के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं की गई. उनके मुताबिक, फील्ड स्तर पर निगरानी भी कमजोर थी और जवाबदेही की भी कमी थी.

उन्होंने कहा, “इसका नतीजा यह हुआ कि ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ती गई, जिन्हें टीके की एक या उससे ज्यादा खुराक नहीं मिली थी और जो संक्रमण की चपेट में आने के खतरे में थे.”

रहमान ने बताया कि उन्होंने और दूसरे जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने 2025 के मध्य में ही वरिष्ठ अधिकारियों के सामने इन कमियों को लेकर चिंता जताई थी. उन्होंने कम टीकाकरण वाले इलाकों में निगरानी बढ़ाने और टीकाकरण की दर सुधारने के लिए ज्यादा प्रयास करने की सलाह दी थी. उन्होंने कहा, “इन चेतावनियों पर उतनी तेजी से कार्रवाई नहीं की गई, जितनी जरूरी थी.”

टीकाकरण कार्यक्रम की ये कमजोरियां उसी समय सामने आईं, जब देश में टीके खरीदने के तरीके में बदलाव किया जा रहा था.

टीकों की खरीद में रुकावट

बांग्लादेश पहले EPI के लिए टीके खरीदने का काम यूनिसेफ के जरिए करता था. इसके लिए सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से पैसा मिलता था. इनमें खास तौर पर गावी (Gavi), यानी वैक्सीन अलायंस शामिल था, जो खसरे के टीकाकरण के लिए आर्थिक मदद देता था.

हालांकि, 2025 के आखिर तक मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने टीकों की खरीद के लिए खुली प्रतिस्पर्धी बोली की प्रक्रिया अपनाने का फैसला किया.

सरकार ने इस बदलाव को ज्यादा पारदर्शी और नियमों पर आधारित व्यवस्था बनाने की कोशिश बताया. इसका मकसद पक्षपात की आशंकाओं को कम करना और टीकों की खरीद को राष्ट्रीय बजट प्रक्रिया के तहत लाना था. अधिकारियों का तर्क था कि इससे संस्थागत जवाबदेही बढ़ेगी और बाहरी एजेंसियों पर निर्भरता कम होगी.

लेकिन इस बदलाव के साथ ही टीकों की खरीद में देरी होने लगी.

बांग्लादेश को हर साल आमतौर पर करीब सात करोड़ टीकों की खुराक की जरूरत होती है. लेकिन 2025 में यूनिसेफ की प्री-फाइनेंसिंग व्यवस्था के जरिए सिर्फ 1.78 करोड़ खुराक ही हासिल की जा सकीं.

द इकोनॉमिक एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यूनिसेफ ने 2024 से इस साल मई तक टीकों की खरीद प्रक्रिया में बदलाव के नतीजों को लेकर सरकार को कई बार चेतावनी दी. उसने अधिकारियों को कई पत्र लिखे और कम से कम 10 बैठकें कीं. इन बैठकों में सरकार से पुरानी व्यवस्था पर लौटने की अपील की गई.

एक और समस्या कोविड-19 के टीकों के लिए तय किए गए फंड के इस्तेमाल में बदलाव से जुड़ी थी.

बांग्लादेश के पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन के सलाहकार और सिंगापुर के ड्यूक-एनयूएस मेडिकल स्कूल में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. तौफीक जोआर्डर ने दिप्रिंट को बताया कि रिपोर्टों के मुताबिक, एशियाई विकास बैंक (ADB) के पास कोविड टीकाकरण के लिए रखे गए पैसे को पहले वापस करना जरूरी था. इसके बाद ही उसे खसरे के टीकों के लिए इस्तेमाल करने की नई मंजूरी मांगी जा सकती थी.

उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में कई महीने लग गए, क्योंकि फंड देने वाली संस्था ने नई मांग पर विचार करने से पहले पुरानी रकम लौटाने की शर्त रखी थी.

उन्होंने कहा, “आखिर इसके लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए? ADB अपना बचाव कर सकता है. यह प्रक्रिया का हिस्सा है, क्योंकि कोविड-19 के लिए रखे गए पैसे का इस्तेमाल बजट की किसी दूसरी मद के लिए नहीं किया जा सकता. इसके लिए संस्थागत नियम हैं. लेकिन फिर भी, यह एक आपात स्थिति थी.”

इन सभी वजहों से खसरे के टीकों की कमी हुई. 2024-2025 के लिए देशभर में टीकाकरण अभियान की योजना बनाई गई थी, लेकिन इसे पहले टाल दिया गया और बाद में रद्द कर दिया गया. इसके चलते लाखों बच्चे उस अतिरिक्त सुरक्षा से वंचित रह गए, जो इस अभियान से उन्हें मिल सकती थी.

हालांकि, जोआर्डर ने आगाह किया कि टीकों की कमी को लेकर अलग-अलग तरह की जानकारी सामने आई है. कुछ रिपोर्टों में टीकों के आयात में देरी और टीकाकरण की दर में भारी गिरावट की बात कही गई. वहीं, पिछली सरकार के अधिकारियों का कहना था कि देश में टीकों का पर्याप्त स्टॉक मौजूद था. उन्होंने अपनी बात के समर्थन में यूनिसेफ की वेबसाइट पर उपलब्ध स्टॉक के आंकड़ों का हवाला दिया.

आपातकालीन टीकाकरण अभियान और छूट गए बच्चे

इस साल फरवरी में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की सरकार सत्ता में आई. जून में उसने टीकों की आपूर्ति स्थिर करने के लिए यूनिसेफ के जरिए सीधे खरीद की पुरानी व्यवस्था फिर से शुरू करने को मंजूरी दी.

इस बीच, 16 मार्च को खसरे से पहली मौत की पहचान होने के बाद 5 अप्रैल को खसरा-रूबेला का आपातकालीन टीकाकरण अभियान शुरू किया गया. शुरुआत में इसके तहत सबसे ज्यादा जोखिम वाले 30 उप-जिलों को शामिल किया गया. बाद में इसे चार बड़े महानगरों तक बढ़ाया गया और फिर 20 अप्रैल से देशभर में लागू कर दिया गया.

इस अभियान का लक्ष्य छह महीने से पांच साल तक की उम्र के करीब 1.8 करोड़ बच्चों को टीका लगाना था. अधिकारियों ने कहा कि अप्रैल-मई के अभियान के दौरान करीब दो करोड़ बच्चों को टीके की खुराक दी गई. उन्होंने दावा किया कि इस उम्र वर्ग के सभी बच्चों को टीका लगा दिया गया.

कुछ समय तक यह अभियान असरदार होता दिखा. बड़े पैमाने पर टीकाकरण के बाद नए मामलों की संख्या में शुरुआती गिरावट आई.

लेकिन इसके बाद स्वास्थ्य विभाग के एक दूसरे अभियान से यह सवाल उठा कि आखिर पहले अभियान में कितने बच्चों तक वास्तव में पहुंचा गया था.

जून में विटामिन A की खुराक देने के लिए चलाए गए अभियान में इसी उम्र वर्ग के करीब 40 लाख और बच्चों की पहचान हुई. यह संख्या खसरा टीकाकरण अभियान में शामिल बच्चों की संख्या से ज्यादा थी. इससे संकेत मिला कि आपातकालीन अभियान के दौरान बड़ी संख्या में बच्चे छूट गए थे.

जमील ने कहा कि यह अंतर दिखाता है कि टीकाकरण अभियान सिर्फ टीकों की उपलब्धता के भरोसे नहीं चलाए जा सकते. इनके लिए एक मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था भी जरूरी है.

उन्होंने कहा, “टीकाकरण कार्यक्रम के लिए सिर्फ टीके होना काफी नहीं है. इसके लिए एक मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था की जरूरत होती है, जो टीकों को सुरक्षित तरीके से स्टोर कर सके, लोगों तक पहुंचा सके और हर समुदाय में उनकी निगरानी कर सके. इसमें सप्लाई चेन और कोल्ड चेन की व्यवस्था शामिल है, क्योंकि ज्यादातर टीके गर्मी के प्रति संवेदनशील होते हैं. इसके अलावा टीके पहुंचाने का नेटवर्क, टीकाकरण केंद्र, निगरानी और आंकड़ों की व्यवस्था और टीका लगाने के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों की जरूरत होती है.”

उन्होंने कहा कि प्रभावी टीकाकरण के लिए बेहतर प्रशासन, नेतृत्व, स्थिर आर्थिक मदद और लोगों का भरोसा भी जरूरी है. उन्होंने कहा, “जब इनमें से कोई भी चीज कमजोर पड़ती है, भले ही कुछ समय के लिए, तो टीकाकरण की दर गिर जाती है.”

सरकार ने कहा कि इस कमी को दूर करने के लिए उसने छूट गए बच्चों तक पहुंचने के लिए दूसरा आपातकालीन अभियान शुरू किया.

प्रधानमंत्री तारिक रहमान के स्वास्थ्य मामलों के विशेष सहायक जियाउद्दीन हैदर ने दिप्रिंट से कहा, “विटामिन A की खुराक लेने वाले करीब 40 लाख बच्चों को खसरे का टीका नहीं लगा था. इसके तुरंत बाद सरकार ने उन बच्चों तक पहुंचने के लिए दूसरा आपातकालीन अभियान शुरू किया, जो पहले छूट गए थे.”

हैदर ने कहा कि सरकार ने अब टीकों का पर्याप्त स्टॉक सुनिश्चित करने, घर-घर जाकर बच्चों तक पहुंचने वाली टीमों को तैनात करने और उपजिला स्वास्थ्य केंद्रों तथा अस्पतालों में टीके उपलब्ध कराने के कदम उठाए हैं. उन्होंने कहा कि माता-पिता अपने बच्चों को इन केंद्रों पर टीका लगवाने के लिए ला सकते हैं. साथ ही, लोगों को खसरे के लक्षण पहचानने और समय पर इलाज कराने के लिए जागरूकता अभियान भी चलाए गए हैं.

सरकार ने माता-पिता को यह सलाह भी दी है कि जिन बच्चों में खसरे के लक्षण दिखें, उन्हें उनके भाई-बहनों और दूसरे बच्चों से अलग रखें और तुरंत इलाज कराएं.

हैदर ने माना कि पहला आपातकालीन अभियान शुरुआत में देशभर में एक साथ शुरू करने के बजाय सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों पर केंद्रित था. उन्होंने कहा कि इसे धीरे-धीरे दूसरे इलाकों तक बढ़ाया गया. उन्होंने यह भी कहा कि सरकार अपने टीकाकरण अभियान में शहरी और ग्रामीण इलाकों के बीच कोई भेदभाव नहीं कर रही है और सभी को बराबर पहुंच देने की कोशिश कर रही है.

सरकार टीका लगवाने की तय उम्र बढ़ाने पर भी विचार कर रही है. राष्ट्रीय टीकाकरण तकनीकी कार्य समूह ने छह महीने से पांच साल तक के बच्चों को टीका लगाने की सिफारिश की थी. लेकिन हैदर ने कहा कि अधिकतम उम्र सीमा बढ़ाकर 10 साल की जा सकती है.

WHO ने भी बड़े बच्चों में संक्रमण को लेकर चिंता जताई है. पांच साल से ज्यादा उम्र के बच्चों में करीब एक तिहाई मामले सामने आए हैं. इससे पता चलता है कि अगर टीकाकरण अभियान सिर्फ छोटे बच्चों तक सीमित रहा, तो बड़ी संख्या में ऐसे बच्चे सुरक्षा से वंचित रह सकते हैं, जिनमें बीमारी से बचाव की इम्युनिटी नहीं है.

इसके अलावा एक बड़ी समस्या यह भी है कि टीका लगवाने के योग्य हर बच्चे की पहचान करना आसान नहीं है.

यूनिसेफ और बांग्लादेश ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स का अनुमान है कि देश में 40 फीसदी तक बच्चों का रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ है. इस वजह से स्वास्थ्य अधिकारियों के लिए टीका लगवाने के योग्य बच्चों की पहचान करना, छूटी हुई खुराकों का पता लगाना और टीकाकरण अभियान की सही योजना बनाना मुश्किल हो जाता है.

रहमान ने कहा कि बच्चों की कम गिनती के कारण टीकाकरण की दर असल से ज्यादा दिखाई दे सकती है. उन्होंने कहा, “जब अभियान में 100 या 103 फीसदी टीकाकरण का दावा किया जाता है, तो जरूरी नहीं कि यह असली स्थिति हो. वास्तव में टीकाकरण की दर बताई गई संख्या से काफी कम हो सकती है.”

जोआर्डर ने भी इस बात से सहमति जताई. उन्होंने कहा, “कागजों पर यह 100 फीसदी है. लेकिन असल में यह 80 फीसदी है. खसरे जैसी बीमारी के मामले में यह बेहद खतरनाक है.”

उन्होंने कहा कि जनगणना के आंकड़ों और आबादी के अनुमानों में कुछ इलाकों के बच्चों की संख्या कम आंकी गई हो सकती है. इससे अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति व्यवस्था के तहत बांग्लादेश को मिलने वाले टीकों की संख्या भी प्रभावित हुई होगी.

उन्होंने कहा कि सरकार को टीका लगवाने के योग्य बच्चों की संख्या दोबारा तय करनी चाहिए और टीकाकरण टीमों की माइक्रो-प्लानिंग प्रक्रिया मजबूत करनी चाहिए. इस प्रक्रिया में अभियान शुरू होने से पहले हर इलाके में बच्चों की पहचान करना और यह सुनिश्चित करना शामिल है कि टीकाकरण टीमें उन तक पहुंच सकें.

रहमान ने कहा कि आपातकालीन अभियान काफी दबाव में चलाया गया था. इस वजह से इतनी विस्तृत योजना बनाने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिला. उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के पास घर-घर जाकर और सैटेलाइट क्लीनिक के जरिए बच्चों तक पहुंचने का बुनियादी ढांचा अब भी मौजूद है. लेकिन स्वास्थ्य सहायकों के खाली पदों ने इस व्यवस्था को कमजोर कर दिया है.

खसरे के मामले अब भी क्यों बढ़ रहे हैं?

टीकाकरण की घटती दर ही इस प्रकोप के बड़े पैमाने की पूरी वजह नहीं है.

WHO के मुताबिक, खसरे से आमतौर पर हर 1,000 संक्रमित लोगों में से दो या तीन की मौत होती है. लेकिन गरीब देशों में यह बीमारी ज्यादा जानलेवा हो सकती है, क्योंकि वहां बच्चे पहले से ही कुपोषण या दूसरी बीमारियों से जूझ रहे हो सकते हैं.

जोआर्डर ने कहा कि बांग्लादेश में बच्चों में कुपोषण की ऊंची दर ने इस प्रकोप के असर को और गंभीर बना दिया होगा. उनके मुताबिक, देश में पांच साल से कम उम्र के करीब 26 फीसदी बच्चों का शारीरिक विकास उम्र के हिसाब से नहीं हो पाया है. कुपोषण से बच्चों की संक्रमण से लड़ने की क्षमता कमजोर हो जाती है और गंभीर रूप से बीमार पड़ने का खतरा बढ़ जाता है. खसरे के साथ निमोनिया जैसे सांस से जुड़े संक्रमण होने पर स्थिति और बिगड़ सकती है.

उन्होंने यह आशंका भी जताई कि कुछ मामलों की गलत पहचान हुई हो सकती है. खासकर उन बच्चों के मामले में, जिन्हें दूसरी बीमारियां थीं और उनके लक्षण खसरे जैसे थे.

इस प्रकोप ने अस्पतालों पर पहले से मौजूद एक और संक्रामक बीमारी का दबाव भी बढ़ा दिया है. यह बीमारी डेंगू है, जिसका प्रकोप साल के मध्य में तेज हो गया था.

जोआर्डर ने कहा कि खसरे और डेंगू के एक साथ फैलने से अस्पतालों पर दबाव बढ़ गया है. कम समय में बड़ी संख्या में मरीजों के पहुंचने से उन्हें पर्याप्त इलाज देना मुश्किल हो गया है.

उन्होंने कहा, “स्वास्थ्य व्यवस्था पहले से ही दबाव में है. जब पहले से चल रही महामारी के बीच एक और बीमारी फैलती है, तो अस्पतालों में इतने सारे मरीजों के इलाज के लिए पर्याप्त सुविधाएं नहीं होतीं.”

एक और चिंता उन शिशुओं में संक्रमण की है, जो खसरे का नियमित टीका लगवाने की उम्र तक नहीं पहुंचे हैं.

आमतौर पर माना जाता है कि छह महीने से कम उम्र के बच्चों को अपनी मां से मिले एंटीबॉडी के जरिए कुछ हद तक सुरक्षा मिलती है. इसके बावजूद स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने ऐसे बच्चों में भी संक्रमण की जानकारी दी है, जो नियमित टीकाकरण शुरू होने की उम्र से छोटे हैं.

हैदर ने इस कमजोरी की कुछ वजह मां और बच्चे में कुपोषण को बताया. उन्होंने कहा कि मां में कुपोषण होने से स्तनपान और शिशु तक एंटीबॉडी पहुंचने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. वहीं, बच्चे में कुपोषण होने से संक्रमण गंभीर हो सकता है.

रहमान ने भी कहा कि छह महीने से कम उम्र के बच्चों में संक्रमण के मामले उम्मीद से ज्यादा हैं. उन्होंने मां से मिलने वाले एंटीबॉडी को प्रभावित करने वाले जैविक कारणों और शिशुओं में उनसे मिलने वाली सुरक्षा कितने समय तक रहती है, इस पर और शोध करने की जरूरत बताई.

जोआर्डर ने कहा कि बांग्लादेश को इस मुद्दे की और गहराई से जांच करनी चाहिए. खासकर इसलिए, क्योंकि छोटे बच्चों में संक्रमण के मामलों का भविष्य की टीकाकरण नीति पर असर पड़ सकता है.

गलत जानकारी ने भी इस संकट को और बढ़ाया है.

जोआर्डर ने कहा कि प्रकोप के शुरुआती दिनों में फेसबुक पर बड़ी संख्या में फॉलोअर्स वाले एक धर्मगुरु ने खसरे के संकट को झूठा बताया था. उन्होंने दावा किया था कि टीकों की खरीद को बढ़ावा देने के लिए बीमारी के प्रकोप को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है. जोआर्डर के मुताबिक, इन दावों को लाखों बार देखा गया. इससे ऐसे अहम समय में टीकाकरण पर लोगों का भरोसा कमजोर हो सकता था.

दबाव में बांग्लादेश की जन स्वास्थ्य व्यवस्था

स्वास्थ्यकर्मियों की कमी भी इस प्रकोप को रोकने में एक बड़ी बाधा है.

रहमान ने कहा कि हड़तालों के कारण टीकाकरण और लोगों तक पहुंचने से जुड़ी गतिविधियां प्रभावित हुईं. स्वास्थ्य सहायकों की जिम्मेदारी है कि वे घर-घर जाकर बच्चों की पहचान करें और सैटेलाइट क्लीनिक के जरिए उन्हें टीके लगाएं. जब ये पद खाली रहते हैं या कर्मचारी अपनी कामकाजी स्थितियों से संतुष्ट नहीं होते, तो टीकाकरण कार्यक्रम की पहुंच प्रभावित होती है.

लेकिन समस्या सिर्फ कर्मचारियों की कमी तक सीमित नहीं है. यह जन स्वास्थ्य कार्यक्रमों के प्रबंधन से भी जुड़ी है.

रहमान का कहना है कि बांग्लादेश की जन स्वास्थ्य व्यवस्था चलाने के लिए जिम्मेदार कई अधिकारियों की ट्रेनिंग मुख्य रूप से डॉक्टर के तौर पर हुई है, न कि जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ के तौर पर. उनके मुताबिक, इस वजह से टीकों की खरीद, भंडारण, वितरण, निगरानी और मूल्यांकन जैसे कामों के लिए जरूरी विशेषज्ञता की कमी है.

जोआर्डर ने भी यही बात कही. उन्होंने प्रशिक्षित जन स्वास्थ्य प्रबंधकों की कमी को व्यवस्था से जुड़ी एक बड़ी समस्या बताया. उनके मुताबिक, फील्ड स्तर पर बच्चों की कम गिनती और गलत रिपोर्टिंग किसी भी देश में हो सकती है. लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि व्यवस्था ऐसी गलतियों की पहचान करके उन्हें ठीक क्यों नहीं कर पाती.

बांग्लादेश में बांग्लादेश सिविल सर्विस हेल्थ कैडर के तहत भर्ती होने वाले अधिकारी आमतौर पर मेडिकल डॉक्टर होते हैं. वहीं, व्यवस्था में जन स्वास्थ्य की विशेष डिग्री और ट्रेनिंग वाले लोगों को उन पदों पर लगातार भर्ती करने या नियुक्त करने की व्यवस्था नहीं है, जहां उनकी जरूरत है.

उन्होंने कहा, “जब नई सरकार आती है, तो नए लोगों का एक समूह व्यवस्था में आता है. भले ही पहले वाले समूह को पूरी ट्रेनिंग नहीं मिली हो, लेकिन सालों तक काम करने से उनके पास अनुभव जमा हो गया था. नए लोग डॉक्टर हो सकते हैं, लेकिन उनके पास जन स्वास्थ्य कार्यक्रमों को संभालने के लिए जरूरी ट्रेनिंग नहीं हो सकती.”

जोआर्डर ने कहा कि बांग्लादेश को अपनी प्रतिक्रिया ज्यादा लक्षित और आंकड़ों पर आधारित बनानी चाहिए. अस्पतालों के रिकॉर्ड, सिविल सर्जन कार्यालयों की जानकारी और जिला स्वास्थ्य सूचना प्रणाली (DHIS2) का इस्तेमाल करके उन इलाकों की पहचान की जानी चाहिए, जहां संक्रमण सबसे ज्यादा फैल रहा है. इसके बाद संक्रमण को आगे फैलने से रोकने के लिए उन्हीं इलाकों में टीकाकरण और मरीजों को अलग रखने के प्रयास तेज किए जा सकते हैं.

उन्होंने कहा कि कोविड महामारी के दौरान बांग्लादेश को सभी जगह एक जैसे कदम उठाने में मुश्किल हुई थी. इसलिए अब उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर ज्यादा लक्षित कदम उठाने चाहिए.

उन्होंने कहा कि लंबे समय में देश को बीमारी से बचाव के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और जन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए अलग करियर व्यवस्था बनाने की जरूरत है. श्रीलंका में इस तरह की व्यवस्था मौजूद है.

जमील ने कहा कि बांग्लादेश के इस प्रकोप से भारत को भी सीखने की जरूरत है, भले ही भारत टीका बनाने के मामले में कहीं ज्यादा आत्मनिर्भर है. उन्होंने कहा, “बांग्लादेश के उलट, जो बच्चों के लिए अपने सभी टीके दूसरे देशों से खरीदता है, भारत अपनी वैक्सीन कंपनियों की वजह से आत्मनिर्भर है. सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया दुनिया में खसरा-रूबेला के टीकों की करीब 80 फीसदी खुराक की आपूर्ति करता है.”

हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि सिर्फ देश में टीके बनाने की क्षमता होने से बीमारी के प्रकोप को रोकने की गारंटी नहीं मिलती.

उन्होंने कहा, “खसरे जैसी तेजी से फैलने वाली बीमारी के मामले में पूरी व्यवस्था की हर कड़ी अहम होती है. इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि हम लापरवाह न हों और लोगों का टीकों पर भरोसा बनाए रखें.”

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