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Friday, 31 July, 2026
होमहेल्थपिछले 5 सालों में खाद्य सुरक्षा उल्लंघन के सिर्फ 3% मामलों में ही हुई सजा—संसद में सरकार

पिछले 5 सालों में खाद्य सुरक्षा उल्लंघन के सिर्फ 3% मामलों में ही हुई सजा—संसद में सरकार

डेटा से पता चलता है कि 1.85 लाख मामलों में से 75% में, जहां फ़ूड सेफ़्टी अधिकारियों ने मिलावट की बात साबित की, उल्लंघन के लिए पैसे का जुर्माना लगाया गया.

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नई दिल्ली: भारत में पिछले पांच साल में खाद्य सुरक्षा अधिकारियों ने देशभर से 8.86 लाख खाने-पीने की चीजों के सैंपल जांचे. इनमें से 20 प्रतिशत सैंपल मिलावटी थे या तय मानकों पर खरे नहीं उतरे. और जिन 1.85 लाख मामलों में मिलावट या गड़बड़ी पाई गई, उनमें से 75 प्रतिशत मामलों में सिर्फ जुर्माना लगाया गया. यह जानकारी मंगलवार को राज्यसभा में पेश किए गए आंकड़ों में दी गई.

आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि जिन सैंपलों में मिलावट या गड़बड़ी साबित हुई, उनमें से सिर्फ 3.3 प्रतिशत मामलों में ही दोषियों को सजा मिली.

ये आंकड़े स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने स्वास्थ्य राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव के लिखित जवाब में दिए. इनमें 2021-22 से 2025-26 तक खाद्य सुरक्षा कानून के लागू होने की स्थिति बताई गई है.

पिछले पांच साल में जांचे गए 1,85,780 मिलावटी या मानकों पर खरे न उतरने वाले खाद्य सैंपलों में से 1,39,507 मामलों यानी 75 प्रतिशत में जुर्माना लगाकर मामला निपटा दिया गया. जबकि सिर्फ 6,203 मामलों यानी 3.3 प्रतिशत में दोषसिद्धि हुई.

Infographic: Shruti Naithani/ThePrint

फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स (FSS) एक्ट 2006 के तहत ऐसे सैंपल, जो तय गुणवत्ता या सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरते, उन्हें मुख्य रूप से असुरक्षित, घटिया गुणवत्ता वाले या गलत लेबल वाले खाद्य पदार्थ माना जाता है.

FSSAI के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर दिप्रिंट को बताया, “कम गंभीर मामलों में सुधार का नोटिस दिया जा सकता है. जबकि घटिया गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थ, भ्रामक दावे करने वाले उत्पाद या स्वास्थ्य के लिए खतरनाक खाद्य पदार्थों के मामलों में आर्थिक जुर्माना लगाया जाता है.”

अधिकारी ने कहा कि ज्यादा गंभीर मामलों में, जहां फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट के तहत मुकदमा चलाने का प्रावधान है, वहां आपराधिक कार्रवाई की जाती है और दोषसिद्धि की कोशिश की जाती है.

उन्होंने कहा, “किसी मामले की श्रेणी मुख्य रूप से लैब रिपोर्ट के आधार पर तय होती है, जिससे उल्लंघन की प्रकृति का पता चलता है. इन निष्कर्षों के आधार पर फूड सेफ्टी कमिश्नर एक्ट के प्रावधानों के अनुसार आगे की कार्रवाई तय करते हैं.”

उल्लंघन लगातार ज्यादा, दोषसिद्धि अब भी कम

पिछले पांच सालों में, फ़ूड सेफ़्टी स्टैंडर्ड्स पर खरे न उतरने वाले फ़ूड सैंपल्स की संख्या लगातार ज़्यादा रही है. 2021-22 में ऐसे 32,935 सैंपल्स थे. 2022-23 में यह संख्या बढ़कर 44,626 हो गई, फिर 2023-24 में घटकर 33,808 और 2024-25 में 34,388 हो गई. 2025-26 में यह संख्या फिर से बढ़कर 40,023 हो गई.

पिछले पांच साल में दोषसिद्धि के मामलों में धीरे-धीरे बढ़ोतरी हुई है, लेकिन यह अब भी कुल मामलों का बहुत छोटा हिस्सा है.

2021-22 में 32,935 मामलों में से सिर्फ 671 मामलों में दोषसिद्धि हुई, जबकि 19,437 मामलों में जुर्माना लगाया गया. यानी दोषसिद्धि की दर करीब 2 प्रतिशत रही.

2022-23 में 44,626 मामलों में से 1,188 मामलों में दोषसिद्धि हुई और 28,464 मामलों में जुर्माना लगाया गया. इस दौरान दोषसिद्धि दर बढ़कर 2.7 प्रतिशत हो गई.

2024-25 में 34,388 मामलों में से 1,265 मामलों में दोषसिद्धि हुई, यानी 3.7 प्रतिशत. वहीं 30,142 मामलों में जुर्माना लगाया गया.

2025-26 में स्थिति और बेहतर हुई. 40,023 मामलों में से 1,918 मामलों में दोषसिद्धि हुई, जिससे दोषसिद्धि दर बढ़कर 4.8 प्रतिशत हो गई. इस साल 31,878 मामलों में जुर्माना लगाया गया.

सरकार ने कहा कि 2025-26 के आंकड़े शुरुआती हैं और लैब रिपोर्ट तथा अदालतों में मामलों के अंतिम निपटारे के बाद इनमें बदलाव हो सकता है.

यूपी और राजस्थान में सबसे ज्यादा उल्लंघन

राज्यवार आंकड़ों से कार्रवाई में बड़ा अंतर दिखाई देता है.

2025-26 में तमिलनाडु में सबसे ज्यादा दोषसिद्धि दर रही. वहां 3,984 खराब सैंपलों में से 857 मामलों में दोषसिद्धि हुई, यानी करीब 21.5 प्रतिशत. वहां 1,359 मामलों में जुर्माना लगाया गया. तमिलनाडु ने देश में सबसे ज्यादा 44,603 खाद्य सैंपलों की जांच भी की.

केरल दूसरे स्थान पर रहा. वहां 1,863 खराब सैंपलों में से 330 मामलों में दोषसिद्धि हुई, यानी करीब 17.7 प्रतिशत.

हरियाणा और दिल्ली में भी दोषसिद्धि दर क्रमशः करीब 16 प्रतिशत और 14.7 प्रतिशत रही.

उत्तर प्रदेश ने देश में दूसरे सबसे ज्यादा 39,519 खाद्य सैंपलों की जांच की. इनमें से 20,427 सैंपल मानकों पर खरे नहीं उतरे, जो पूरे देश में खराब पाए गए सैंपलों के आधे से भी ज्यादा हैं.

लेकिन राज्य में सिर्फ 342 मामलों में ही दोषसिद्धि हुई, यानी दोषसिद्धि दर 2 प्रतिशत से भी कम रही.

राजस्थान में 4,594 खराब सैंपल मिले, जो देश में दूसरी सबसे ज्यादा संख्या है. लेकिन वहां सिर्फ 31 मामलों में दोषसिद्धि हुई. यानी दोषसिद्धि दर 1 प्रतिशत से भी कम रही.

2025-26 में उत्तर प्रदेश और राजस्थान मिलकर देश के 62.5 प्रतिशत खराब खाद्य सैंपलों के लिए जिम्मेदार रहे, लेकिन कुल दोषसिद्धि में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ करीब 19 प्रतिशत रही.

गुजरात ने मानकों पर खरे न उतरने वाले लगभग आठ प्रतिशत मामलों में दोषियों को सज़ा दिलवाई, कर्नाटक ने छह प्रतिशत से कुछ ज़्यादा और मध्य प्रदेश ने लगभग चार प्रतिशत मामलों में.

पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, झारखंड, गोवा, असम, बिहार और पुडुचेरी समेत कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में खराब सैंपल मिलने के बावजूद एक भी दोषसिद्धि दर्ज नहीं हुई.

60 लाख से ज्यादा खाद्य कारोबार पंजीकृत

संसद में दिए गए जवाब में भारत के खाद्य कारोबार से जुड़ी जानकारी भी दी गई.

30 जून 2026 तक देश में 91,000 से ज्यादा सक्रिय केंद्रीय लाइसेंस, 11.63 लाख राज्य लाइसेंस और करीब 61.8 लाख रजिस्ट्रेशन फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स एक्ट के तहत दर्ज थे.

FSSAI के नियमों के अनुसार, कारोबार के आकार और सालाना कारोबार के आधार पर खाद्य व्यवसायों को रजिस्ट्रेशन या लाइसेंस लेना जरूरी होता है.

छोटे खाद्य कारोबार जैसे छोटे निर्माता, फेरी वाले और स्ट्रीट फूड विक्रेताओं के लिए रजिस्ट्रेशन होता है. जबकि बड़े कारोबारों के लिए राज्य या केंद्रीय लाइसेंस लेना जरूरी होता है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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