नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने जिन छात्र प्रदर्शनकारियों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई पर रोक लगाई और उन्हें जेल से रिहा किया. लेकिन बिहार, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में गिरफ्तार हुए छात्र और कार्यकर्ता कह रहे हैं कि उनका डर अब भी खत्म नहीं हुआ है. उनका आरोप है कि उनके साथ बेरहमी से लाठीचार्ज किया गया, बिना कानूनी प्रक्रिया का पालन किए हिरासत में लिया गया, धमकियां दी गईं, और अब भी यह साफ नहीं है कि उनके खिलाफ दर्ज FIR आखिरकार रद्द होगी या नहीं.
पटना यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के दूसरे साल के छात्र आशीष कुमार ने कहा, “25 जुलाई को हम गांधी मैदान के गेट नंबर 10 के पास बैठे थे. तभी बिहार पुलिस हमारी तरफ दौड़ी और लाठीचार्ज शुरू कर दिया. पुरुष पुलिसकर्मियों ने यह भी नहीं देखा कि प्रदर्शनकारी लड़के हैं या लड़कियां.”
कुमार उन कई छात्रों में शामिल थे, जिन पर 20 जुलाई को दिल्ली में छात्रों पर हुई कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर लाठीचार्ज किया गया और बाद में बिहार पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया.
कुमार ने कहा, “बिहार पुलिस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि छात्र शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर सकते हैं. लेकिन जैसे ही दो-तीन छात्र इकट्ठा हुए, उन्होंने लाठीचार्ज शुरू कर दिया. इस व्यवहार से परेशान होकर हममें से कुछ लोग गांधी मैदान के पास बैठ गए और वहां से जाने से मना कर दिया. तभी पुलिस ने लाठीचार्ज किया और हमें हिरासत में ले लिया.”
छात्र के मुताबिक, उसके साथ कम से कम 22 लोगों को हिरासत में लिया गया, जिनमें कई नाबालिग भी थे.
कुमार ने दिप्रिंट से कहा, “पुलिस वाले बोले, ‘बहुत नशा है प्रदर्शन करने का, करियर बर्बाद कर देंगे.'”
उन्होंने आरोप लगाया कि उनका फोन छीन लिया गया और 26 जुलाई की रात तक उन्हें किसी दोस्त या परिवार के सदस्य से बात करने नहीं दी गई.
कुमार ने कहा, “हमें खाना नहीं दिया गया और किसी से संपर्क करने की भी इजाजत नहीं मिली. पहले तो हमें गिरफ्तारी की वजह नहीं बताई गई, फिर खाली गिरफ्तारी मेमो पर जबरन हस्ताक्षर कराए गए.”
इसके बाद उन्हें बेउर जेल भेज दिया गया, जहां वे 29 जुलाई की देर रात तक रहे.
अब जेल से बाहर आने के बाद भी कुमार को डर है कि पुलिस उनका पीछा नहीं छोड़ेगी.
उन्होंने कहा, “हमें भरोसा दिया गया है कि कोई FIR नहीं होगी, लेकिन पुलिस की तरफ से अभी तक कोई आधिकारिक जानकारी नहीं मिली है.”
कुमार को FIR की कॉपी भी नहीं दी गई है. उन्हें यह भी नहीं पता कि उनका नाम अलग से दर्ज है या सिर्फ एक समूह के सदस्य के तौर पर.
बिहार में कुमार को रिहा किया गया. इसी तरह महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और असम में भी कई लोगों को रिहा किया गया, जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन छात्र प्रदर्शनकारियों का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है, उनके खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई न की जाए.
बिहार पुलिस की ADG (लॉ एंड ऑर्डर) कैसी सुहिता अनुपम ने दिप्रिंट से कहा कि नाबालिगों के मामले में पुलिस ने पूरी संवेदनशीलता दिखाई.
उन्होंने कहा, “सभी नाबालिगों को ऑब्जर्वेशन होम भेजा गया था. उन्हें वयस्कों के साथ नहीं रखा गया. माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद हमने लगभग सभी गिरफ्तार वयस्कों को रिहा करने की प्रक्रिया पूरी कर ली है और सभी नाबालिगों को भी छोड़ दिया गया है.”
उन्होंने यह भी कहा कि आरोपियों से जुड़ी सभी जानकारी राज्य के वकील को सौंप दी गई है और FIR रद्द करने का फैसला अदालत करेगी.
उधर पश्चिम बंगाल में गिरफ्तार किए गए 16 लोगों में शामिल अरशद अली भी अपने खिलाफ दर्ज FIR को लेकर चिंतित हैं.
उन्होंने बताया कि उनकी पहचान फेस रिकग्निशन तकनीक से की गई, उन्हें गिरफ्तार किया गया और बाद में “क्राइम सीन दोबारा बनाने” के नाम पर सड़क पर घुमाया गया.
अली ने कहा, “मैं सिर्फ 30 मिनट प्रदर्शन में था. अगले ही दिन मेरे खिलाफ कई धाराएं लगा दी गईं और मैं जेल में था. क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना अपराध है?”
कोलकाता के एमहर्स्ट स्ट्रीट के रहने वाले और एक छात्र के अभिभावक अरशद अली मेट्रो सिनेमा से निकली प्रदर्शन रैली में शामिल हुए थे.
उन्होंने कहा, “मैं थोड़ी दूर तक प्रदर्शनकारियों के साथ चला और फिर घर लौट आया. अगले दिन कुछ स्थानीय BJP नेता मेरे घर आए और प्रदर्शन में शामिल होने पर मुझे धमकाने लगे.”
अली ने बताया कि वे अपने स्थानीय थाने गए, जहां उन्हें कहा गया कि मामला लालबाजार पुलिस मुख्यालय में देखा जाएगा.
उन्होंने कहा, “जब मैं वहां पहुंचा तो मुझे ऑफिस में बैठाकर इंतिजार कराया गया और फिर हिरासत में ले लिया गया. इसके बाद मुझे गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन किस बात के लिए?”
पश्चिम बंगाल में CJP के प्रदर्शन से जुड़े कुल 7 FIR दर्ज हुए. इनमें 4 राज्य सरकार की ओर से, 2 पुलिस ने खुद संज्ञान लेकर और 1 एक पत्रकार की शिकायत पर दर्ज हुई, जिसने आरोप लगाया कि प्रदर्शन में शामिल असामाजिक तत्वों ने उसके साथ बदसलूकी की.
दिप्रिंट को मिली जानकारी के मुताबिक, जिन 16 लोगों को बाद में गिरफ्तार किया गया, उनके नाम शुरुआत में FIR में नहीं थे.
एक सूत्र ने बताया, “FIR अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज हुई थी. बाद में पुलिस ने फेस रिकग्निशन तकनीक से पहचान कर उनके नाम जोड़े.”
अरशद अली और बाकी 15 लोगों को 28 जुलाई को रिहा कर दिया गया. वरिष्ठ वकील सैयद नफिरुल इस्लाम ने कोलकाता में गिरफ्तार इन 16 लोगों की ओर से पैरवी की.
इस्लाम ने कहा, “अरशद अली और कई अन्य लोगों को राज्य पुलिस ने झूठे मामले में फंसाया. पुलिस अदालत में अपनी बात साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सकी.”
उन्होंने कहा कि अदालत ने जांच अधिकारी की रिपोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के आदेश को देखते हुए सभी 16 लोगों को जमानत दे दी.
अदालत ने कहा, “पहली नजर में ऐसा कोई रिकॉर्ड नहीं है जिससे पता चले कि किसी भी आरोपी का कोई आपराधिक इतिहास है. माननीय सुप्रीम कोर्ट के आदेश और जांच अधिकारी की रिपोर्ट को देखते हुए अदालत सभी आरोपियों को जमानत देने के पक्ष में है.”
कोलकाता पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दिप्रिंट से कहा कि आरोपियों की पहचान CCTV फुटेज के जरिए की गई.
उन्होंने कहा, “हमने अदालत में सभी जरूरी सबूत पेश कर दिए हैं. FIR जारी रहेगी या रद्द होगी, इसका फैसला अदालत करेगी. हिंसा में शामिल किसी भी व्यक्ति को नहीं छोड़ा जाएगा.”
मुंबई में तबरेज अली सैय्यद अब भी अपने खिलाफ दर्ज FIR रद्द होने की पुष्टि का इंतजार कर रहे हैं.
उन्होंने कहा, “मुंबई पुलिस ने मेरे खिलाफ चार अलग-अलग FIR दर्ज की हैं.”
ये FIR माहिम, शिवाजी पार्क और आजाद मैदान थानों में दर्ज हुई हैं.
सैय्यद ने कहा, “हमने पहले 10 जुलाई को मुंबई यूनिवर्सिटी के बाहर प्रदर्शन किया था, जहां मुझे पहली बार हिरासत में लिया गया. फिर जब सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से जबरन हटाया गया, तो हमने दोबारा प्रदर्शन किया. उसके बाद पुलिस ने पांच लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की, जिसमें मेरा नाम भी था.”
उन्होंने बताया कि उन पांच लोगों में सुधीर धवाले का नाम भी था, जो भीमा कोरेगांव और एल्गार परिषद मामले के आरोपी हैं, जबकि वे उस प्रदर्शन में शामिल ही नहीं थे.
सैय्यद ने कहा, “19 जुलाई को UBT ने छात्रों के मुद्दे पर प्रदर्शन बुलाया था. मैं सिद्धांत रूप से उसके समर्थन में था, लेकिन प्रदर्शन स्थल तक गया ही नहीं. इसके बावजूद उस दिन भी मेरा नाम FIR में डाल दिया गया.”
उन्होंने दिप्रिंट से कहा कि 20 जुलाई के प्रदर्शन के बाद एक पुलिस वैन उनके परिवार के लोगों पर नजर रख रही थी और उनकी पत्नी और मां को धमकाया गया.
उन्होंने कहा, “इसके बाद मैंने पवई में भूख हड़ताल का ऐलान किया. तभी पुलिस ने मुझे हिरासत में लिया, मुझे तड़ीपार कहा और मेरी मां और पत्नी के लिए गालियां दीं.”
सैय्यद का कहना है कि लगातार प्रदर्शनकारियों के दबाव के बाद उन्हें 22 जुलाई की रात करीब 11.30 बजे रिहा किया गया.
उन्हें चार नोटिस मिले हैं, जिनमें बताया गया है कि उनके खिलाफ किन धाराओं में मामला दर्ज है. लेकिन FIR की स्थिति क्या है, इसकी कोई पुष्टि नहीं मिली है.
मुंबई पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “किसी भी प्रदर्शनकारी का नाम बिना पर्याप्त सबूत के FIR में नहीं जोड़ा गया है. जिन प्रदर्शनकारियों के नाम FIR में हैं, उनसे जुड़ी सारी जानकारी राज्य के वकील को दे दी गई है.”
फिलहाल मुंबई में 1,000 से ज्यादा लोगों के खिलाफ कम से कम 20 FIR दर्ज की गई हैं.
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