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Wednesday, 26 August, 2026
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एयर पॉल्यूशन दुनियाभर में लाखों कैंसर के मामलों से जुड़ा, सिर्फ फेफड़ों को नहीं और भी हैं नुकसान

एक ग्लोबल स्टडी में लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने और फेफड़ों के कैंसर के अलावा स्तन, थायरॉयड, प्रोस्टेट, आंत, किडनी और दूसरे अंगों के कैंसर के खतरे के बीच संबंध पाया गया है.

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नई दिल्ली: लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने का संबंध दुनियाभर में लाखों कैंसर के मामलों से हो सकता है. एक नई स्टडी के मुताबिक, इसका खतरा सिर्फ फेफड़ों के कैंसर तक सीमित नहीं है, बल्कि स्तन, थायरॉयड, प्रोस्टेट, आंत, किडनी और दूसरे अंगों के कैंसर से भी जुड़ा हो सकता है. यह स्टडी नेचर हेल्थ में प्रकाशित हुई है.

चीन की Chinese Academy of Sciences के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में की गई इस स्टडी में चीन की Fudan University, अमेरिका की बॉस्टन यूनिवर्सिटी और दूसरे संस्थानों के शोधकर्ता भी शामिल थे. शोधकर्ताओं ने 2000 से 2020 के बीच 34 देशों के 952 स्थानों पर कैंसर के 10.9 करोड़ मामलों का विश्लेषण किया.

शोधकर्ताओं ने वायु प्रदूषण में मौजूद तीन आम प्रदूषकों के संपर्क की जांच की. इनमें फाइन पार्टिकुलेट मैटर या PM2.5, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) और जमीन के पास मौजूद ओजोन शामिल हैं. इसके बाद अलग-अलग आबादी में इन प्रदूषकों और कैंसर की दर के बीच संबंध की तुलना की गई.

शोधकर्ताओं ने पाया कि PM2.5 में हर 10 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की बढ़ोतरी के साथ कुल कैंसर का खतरा 16 प्रतिशत ज्यादा था. NO2 में इतनी ही बढ़ोतरी के साथ कैंसर का खतरा 11.7 प्रतिशत ज्यादा था, जबकि ओजोन के साथ यह खतरा 4.23 प्रतिशत बढ़ा.

शोधकर्ताओं ने जोर देकर कहा कि ये आंकड़े बड़ी आबादी में ज्यादा प्रदूषण और कैंसर के ज्यादा मामलों के बीच संबंध दिखाते हैं. ये यह साबित नहीं करते कि हर व्यक्ति में कैंसर सीधे वायु प्रदूषण के कारण हुआ.

नई दिल्ली के सर गंगा राम हॉस्पिटल में मेडिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के चेयरपर्सन डॉ. श्याम अग्रवाल के मुताबिक, यह स्टडी इस बात के सबूतों को और मजबूत करती है कि प्रदूषित हवा का स्वास्थ्य पर असर फेफड़ों से आगे भी हो सकता है.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “बाहर की हवा के प्रदूषण को पहले से ही फेफड़ों के कैंसर का कारण माना जाता है, लेकिन यह रिसर्च बताती है कि इसका असर कुल मिलाकर कैंसर के मामलों पर भी ज्यादा व्यापक हो सकता है.”

शोधकर्ताओं को यह संबंध कैसे मिला?

शोधकर्ताओं ने इस बात को भी ध्यान में रखा कि कैंसर को विकसित होने में कई साल लग सकते हैं. इसलिए उन्होंने एक ही साल के प्रदूषण के स्तर और उसी साल के कैंसर के मामलों की तुलना करने के बजाय कई सालों तक प्रदूषण के संपर्क को देखा.

इन तुलनाओं के आधार पर उन्होंने अनुमान लगाया कि 20 साल की स्टडी अवधि में करीब 88.2 लाख कैंसर के मामले PM2.5, 66.7 लाख मामले NO2 और 25.9 लाख मामले ओजोन से जुड़े थे.

इस स्टडी की एक सीमा यह है कि प्रदूषण के संपर्क का अनुमान सैटेलाइट से मिले आंकड़ों समेत बड़े पर्यावरणीय डेटा के आधार पर लगाया गया था. शोधकर्ता कैंसर के खतरे को प्रभावित करने वाले दूसरे कारणों, जैसे धूम्रपान, काम का प्रकार, खान-पान, सामाजिक-आर्थिक स्थिति और जीवनशैली से जुड़े दूसरे कारणों को पूरी तरह से ध्यान में नहीं रख सके.

फिर भी, इस बड़े स्तर पर किए गए विश्लेषण से इस बात के बढ़ते सबूतों को बल मिलता है कि वायु प्रदूषण फेफड़ों के अलावा दूसरे अंगों के कैंसर में भी भूमिका निभा सकता है.

वायु प्रदूषण फेफड़ों के अलावा दूसरे अंगों के कैंसर को कैसे प्रभावित कर सकता है?

वायु प्रदूषण को लंबे समय से कैंसर पैदा करने वाले कारण के रूप में पहचाना जाता रहा है. अंतरराष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान संस्था ने बाहर की हवा के प्रदूषण और पार्टिकुलेट मैटर को कैंसर पैदा करने वाला माना है. इसके सबसे मजबूत सबूत फेफड़ों के कैंसर से जुड़े हैं.

हालांकि, नई स्टडी में लंबे समय तक PM2.5 के संपर्क और सांस से जुड़ी बीमारी के अलावा कई तरह के कैंसर के बीच संबंध पाया गया.

इनमें थायरॉयड, स्तन, प्रोस्टेट, आंत और मलाशय, अंडाशय, अंडकोष, किडनी, ब्लैडर और अग्न्याशय के कैंसर शामिल हैं. NO2 का संबंध लिम्फोमा से भी पाया गया. लिम्फोमा ऐसे कैंसर हैं जो शरीर के लिम्फैटिक सिस्टम में विकसित होते हैं. इसके अलावा NO2 का संबंध मल्टीपल मायलोमा से भी पाया गया, जो प्लाज्मा कोशिकाओं का कैंसर है. प्लाज्मा कोशिकाएं एक तरह की सफेद रक्त कोशिकाएं होती हैं, जो शरीर को संक्रमण से लड़ने में मदद करती हैं.

शोधकर्ताओं ने कहा कि प्रदूषण लंबे समय तक शरीर में सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और शरीर की इम्यून प्रतिक्रिया में बदलाव जैसी प्रक्रियाओं के जरिए कैंसर में योगदान दे सकता है.

दिल्ली राज्य कैंसर संस्थान (डीएससीआई) के क्लिनिकल ऑन्कोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. प्रज्ञा शुक्ला ने कहा कि वायु प्रदूषण का असर सांस से जुड़ी बीमारियों और फेफड़ों के कैंसर से काफी आगे तक है. उन्होंने इसे “हिमशैल का सिर्फ ऊपरी हिस्सा” बताया.

उन्होंने कहा कि दुनियाभर के कैंसर के आंकड़े बताते हैं कि वायु प्रदूषण से सांस की बीमारी के अलावा कई दूसरे कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है.

शुक्ला ने कहा, “पूरे शरीर में सूजन और गंभीर ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा करके हवा में मौजूद जहरीले पदार्थ कोलोरेक्टल, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल, अग्न्याशय, लिवर और स्तन कैंसर के विकास में सक्रिय रूप से योगदान करते हैं.”

उन्होंने कहा कि ये नतीजे “हम जिस हवा में सांस लेते हैं, उसकी असली कैंसर पैदा करने की क्षमता” को दिखाते हैं और प्रदूषण कम करने के लिए ज्यादा मजबूत कदम उठाने की जरूरत है.

क्या मौजूदा एयर क्वालिटी लिमिट पर्याप्त हैं?

स्टडी में पाया गया कि जहां प्रदूषण का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की 2021 की एयर क्वालिटी गाइडलाइंस के स्तर पर या उससे कम था, वहां कैंसर का खतरा काफी ज्यादा नहीं था.

WHO की सलाह है कि सालाना औसत PM2.5 की मात्रा 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए. NO2 और ओजोन के लिए यह सीमा क्रमशः 10 और 60 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर है.

लेकिन स्टडी में शामिल जगहों पर आबादी के हिसाब से PM2.5 का औसत स्तर 17.6 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था, जो WHO की गाइडलाइन से तीन गुना से भी ज्यादा है.

इसका मतलब है कि स्टडी में शामिल कई लोग ऐसे इलाकों में रह रहे थे, जहां लंबे समय तक PM2.5 का स्तर तय सीमा से ज्यादा था.

हालांकि, यह स्टडी खास तौर पर भारत पर केंद्रित नहीं है, लेकिन इसके नतीजे भारत जैसे देशों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं. भारत के कई शहरों में PM2.5 का स्तर अक्सर WHO की गाइडलाइन से काफी ज्यादा दर्ज किया जाता है.

महिलाओं में खतरा ज्यादा दिखा

स्टडी में यह भी पाया गया कि आम तौर पर पुरुषों की तुलना में महिलाओं में प्रदूषण से जुड़े कैंसर का खतरा ज्यादा था. खासकर PM2.5 और NO2 से जुड़े कैंसर में यह अंतर ज्यादा दिखा.

यह अंतर पाचन तंत्र और सांस से जुड़े अंगों के कैंसर और हार्मोन से जुड़े कैंसर, जैसे स्तन कैंसर, में खास तौर पर दिखाई दिया.

स्तन कैंसर के मामले में NO2 की मात्रा में प्रति घन मीटर 10 माइक्रोग्राम की बढ़ोतरी महिलाओं में करीब 20 प्रतिशत ज्यादा खतरे से जुड़ी थी. शोधकर्ताओं ने बताया कि 20 प्रतिशत का यह आंकड़ा पहले के अनुमान से काफी ज्यादा था. पहले के अनुमानों में यह बढ़ोतरी करीब 2 प्रतिशत मानी गई थी.

शोधकर्ताओं ने कहा कि पुरुषों और महिलाओं के शरीर में जैविक अंतर इस नतीजे की कुछ हद तक वजह हो सकते हैं. इसकी एक संभावित वजह एस्ट्रोजन, प्रदूषण से होने वाली सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस के बीच संबंध हो सकती है.

हालांकि, शोधकर्ताओं ने कहा कि इस अंतर के कारणों को समझने के लिए अभी और रिसर्च की ज़रूरत है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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