नई दिल्ली: जब तन्वी दो साल की थी, तब उसके पिता मुकेश पारियानी पहली बार उसे जन्म से हुई दिल की बीमारी के इलाज के लिए ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) दिल्ली लेकर गए थे. इसके बाद एक दशक से ज्यादा समय तक अस्पताल के चक्कर, टेस्ट और सर्जरी को लेकर बातचीत चलती रही.
जहां उसके परिवार ने आरोप लगाया है कि इन सालों में सुधार के लिए होने वाली सर्जरी को बार-बार टाला गया, वहीं AIIMS का कहना है कि तन्वी का इलाज कर रही टीम ने 2017 में यह निष्कर्ष निकाला था कि उसके दिल की बनावट बहुत जटिल होने की वजह से सुधार वाली सर्जरी संभव नहीं थी.
तन्वी की मौत के बाद न्यूज एजेंसी ANI से बात करते हुए उसके पिता मुकेश पारियानी ने कहा कि वह पहली बार 10 अक्टूबर, 2012 को AIIMS गए थे और अलग-अलग टेस्ट के लिए उन्हें अलग-अलग विभागों में भेजा गया. उन्होंने आरोप लगाया कि सर्जरी पर चर्चा हुई और बाद में तारीखें भी दी गईं, लेकिन सर्जरी कभी नहीं हुई.
उन्होंने कहा, “वे टेस्ट पर टेस्ट करते रहे, लेकिन ऑपरेशन कभी नहीं हुआ. वे बस टेस्ट करते रहे…मेरी बच्ची की मौत हो गई. इसके लिए कौन जिम्मेदार है?…अगर मेरी बेटी का 2015, 2016 या 2017 में ऑपरेशन करके इलाज किया जा सकता था, तो उन्होंने ऑपरेशन क्यों नहीं किया?”

हालांकि, AIIMS ने इससे अलग जानकारी दी है.
AIIMS ने कहा कि 2013 में तन्वी के दिल से जुड़े कई जांच किए गए थे, जिनमें CT एंजियोग्राफी, सामान्य एंजियोग्राफी और कार्डियक कैथेटराइजेशन शामिल थे.
AIIMS के मुताबिक, इलाज कर रही टीम ने 2017 में यह निष्कर्ष निकाला कि उसके दिल की बनावट बहुत जटिल होने के कारण सुधार वाली सर्जरी संभव नहीं थी. उसे मेडिकल मैनेजमेंट यानी बिना सर्जरी के इलाज की सलाह दी गई थी. AIIMS ने कहा कि परिवार इसके बाद भी यह पता लगाने के लिए अलग-अलग जगह राय लेता रहा कि सर्जरी संभव है या नहीं.
31 जनवरी, 2014 के AIIMS के एक अनुमान में उसकी बीमारी का नाम “VSD + pulmonary atresia” (पल्मोनरी एट्रेसिया) दर्ज किया गया था और “यूनिफोकलाइज़ेशन और कंड्यूट” को प्रस्तावित सर्जरी बताया गया था. इसकी अनुमानित लागत करीब 1.2 लाख रुपये बताई गई थी. इसमें चार ब्लड डोनर की जरूरत का भी जिक्र था.
2 सितंबर को AIIMS ने मामले की विस्तार से जांच करने के लिए एक कमेटी बनाई.
संस्थान ने 2 सितंबर को जारी एक बयान में कहा, “AIIMS, नई दिल्ली के डायरेक्टर ने मामले की विस्तार से जांच करने, घटनाओं के पूरे क्रम की समीक्षा करने और तथ्यों को सामने लाने के लिए एक कमेटी बनाई है.”
AIIMS New Delhi Constitutes Committee to Review Clinical Course and Circumstances in Case of Patient Tanvi. pic.twitter.com/RUGRrrzFf9
— AIIMS, New Delhi 🇮🇳 (@aiims_newdelhi) September 2, 2026
बयान में कहा गया कि कमेटी “घटनाओं के पूरे क्रम, क्लिनिकल रिकॉर्ड, जांच, दिए गए इलाज, विशेषज्ञों की राय और मरीज की मौत से जुड़ी परिस्थितियों” की जांच करेगी. AIIMS ने कहा कि पोस्टमार्टम भी किया जा रहा है.
एक जटिल और दुर्लभ बीमारी
तन्वी जिस बीमारी से जूझ रही थी, वह जटिल और दुर्लभ है. दिल्ली के द्वारका स्थित आकाश हेल्थकेयर सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के कार्डियोलॉजी विभाग के डायरेक्टर और यूनिट हेड डॉ. संजय कुमार चुग के मुताबिक, इस बीमारी का इलाज करना ऐसी लड़ाई जीतने की कोशिश जैसा है, जिसमें जीत की उम्मीद बहुत कम हो.
उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “ये बहुत जटिल स्थितियां होती हैं और उस समय डॉक्टरों को यह देखकर सबसे सही फैसला लेना होता है कि बच्चे की फेफड़ों की धमनियां कैसे बढ़ रही हैं, फेफड़ों का दबाव कितना बढ़ रहा है और खून का सर्कुलेशन कितना अच्छा है.”
VSD यानी वेंट्रिकुलर सेप्टल डिफेक्ट, दिल के निचले दो हिस्सों, जिन्हें वेंट्रिकल कहा जाता है, के बीच की दीवार में एक छेद होता है.
आमतौर पर दिल का दायां हिस्सा शरीर से ऑक्सीजन की कमी वाला खून लेता है और उसे फेफड़ों तक पहुंचाता है. फेफड़े खून में ऑक्सीजन मिलाते हैं, जिसके बाद यह खून दिल के बाएं हिस्से में वापस आता है और वहां से शरीर के बाकी हिस्सों में भेजा जाता है.
पल्मोनरी आर्टरी वह मुख्य ब्लड वेसल है, जो दिल के दाएं हिस्से से फेफड़ों तक खून ले जाती है.
पल्मोनरी एट्रेसिया में खून के दाएं वेंट्रिकल से फेफड़ों तक जाने का सामान्य रास्ता बंद होता है या ठीक से विकसित नहीं हुआ होता है.
डॉ. चुग ने बताया कि इस वजह से फेफड़ों तक खून पहुंचाना बड़ी चुनौती बन सकता है. उन्होंने कहा, “जब खून सामान्य तरीके से फेफड़ों तक नहीं पहुंच पाता, तो उसे पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती. इससे सायनोसिस हो सकता है, यानी त्वचा और होंठ नीले पड़ सकते हैं.”
और जब पल्मोनरी एट्रेसिया के साथ VSD भी हो, तो दिल की बनावट सिर्फ एक छेद होने के मुकाबले कहीं ज्यादा जटिल हो जाती है.
एक से ज्यादा ऑपरेशन की जरूरत हो सकती है
पल्मोनरी एट्रेसिया वाले नवजात बच्चे में डॉक्टरों को सबसे पहले यह सुनिश्चित करना होता है कि फेफड़ों तक पर्याप्त खून पहुंच रहा है.
इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल्स, नई दिल्ली के कार्डियोथोरेसिक और वैस्कुलर सर्जरी के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. वरुण बंसल ने बताया कि पल्मोनरी एट्रेसिया वाले कुछ नवजात बच्चों में डॉक्टर प्रोस्टाग्लैंडिन दवाओं का इस्तेमाल करते हैं. इससे यह ब्लड वेसल कुछ समय के लिए खुली रहती है और फेफड़ों तक खून का बहाव बना रहता है.
उन्होंने कहा कि बच्चे की हालत स्थिर होने के बाद सर्जन शंट के जरिए फेफड़ों तक खून पहुंचाने का एक दूसरा रास्ता बना सकते हैं. डॉ. बंसल ने कहा, “जैसे ही बच्चा थोड़ा बेहतर और स्थिर होता है, तब किसी तरह की शंट प्रक्रिया करनी पड़ती है… इससे बच्चे को बढ़ने का समय मिल जाता है और जब बच्चा थोड़ा बड़ा हो जाता है… तब स्थायी सुधार के लिए सर्जरी की जा सकती है.”
हालांकि, आगे का इलाज दिल की बनावट पर निर्भर करता है.
कुछ बच्चों में पल्मोनरी आर्टरीज, यानी फेफड़ों तक खून ले जाने वाली धमनियां, बहुत छोटी होती हैं.
डॉ. बंसल ने बताया कि जब खून का सामान्य रास्ता बंद होता है, तो शरीर फेफड़ों तक खून पहुंचाने के लिए एओर्टा यानी शरीर की मुख्य धमनी से अतिरिक्त ब्लड वेसल बना सकता है. इन्हें मेजर एओर्टोपल्मोनरी कोलैटरल आर्टरीज या MAPCAs कहा जाता है.
अगर ऐसी एक से ज्यादा ब्लड वेसल हों, तो सर्जनों को फेफड़ों तक बेहतर तरीके से खून पहुंचाने के लिए उन्हें एक साथ जोड़ना पड़ सकता है. इसे यूनिफोकलाइजेशन नाम की प्रक्रिया कहा जाता है.
इसके बाद वे एक कंड्यूट यानी ट्यूब का इस्तेमाल करके दिल के दाएं हिस्से को फेफड़ों से जोड़ सकते हैं और VSD को बंद कर सकते हैं. डॉ. बंसल ने कहा, “इस सर्जरी में सिर्फ छेद को बंद करना नहीं होता, बल्कि कई समस्याओं को ठीक करना होता है.”
दिप्रिंट से बात करने वाले मेडिकल एक्सपर्ट्स ने कहा कि जिन बच्चों का स्थायी इलाज किए बिना किशोरावस्था तक पहुंचने का मामला होता है, उनमें दिल की बनावट को संभालना और मुश्किल हो सकता है. हालांकि, हर मरीज का नतीजा अलग-अलग होता है.
समय के साथ, जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, पल्मोनरी आर्टरीज छोटी रह सकती हैं, जबकि अतिरिक्त ब्लड वेसल विकसित हो सकती हैं. इससे फेफड़ों में दबाव बढ़ सकता है और दिल पर दबाव पड़ सकता है. डॉ. चुग ने कहा, “बाद में आप कंड्यूट लगा सकते हैं, लेकिन तब आपको पता चल सकता है कि फेफड़ों में दबाव ज्यादा है और अब आपका दिल उस दबाव को संभाल नहीं पा रहा है…इसलिए यह बहुत जटिल स्थिति होती है.”
डॉ. बंसल ने कहा कि अगर बीमारी का पता बाद के चरण में चलता है, तो ये बदलाव बच्चों में सर्जरी को और मुश्किल बना सकते हैं.
अगर दोनों वेंट्रिकल से इलाज संभव न हो तो क्या?
अगर दायां वेंट्रिकल पर्याप्त विकसित और सामान्य है, तो डॉक्टर बाइवेंट्रिकुलर सर्कुलेशन बना सकते हैं. इसमें दिल के दोनों हिस्सों का सामान्य तरीके से इस्तेमाल होता है. दायां हिस्सा खून को फेफड़ों तक पंप करता है और बायां हिस्सा खून को शरीर तक पंप करता है.
लेकिन अगर दायां वेंट्रिकल बहुत छोटा है, तो कुछ मरीजों को सिंगल-वेंट्रिकल पाथवे की जरूरत पड़ सकती है. इसमें खून को फेफड़ों तक पहुंचाने के लिए एक अलग रास्ता बनाया जाता है. यह तभी संभव है जब फेफड़ों की ब्लड वेसल इस खून के बहाव को संभाल सकें.
डॉ. चुग ने कहा, “सबसे गंभीर मामलों में, जब इलाज के दूसरे तरीके संभव नहीं होते हैं, तो डॉक्टर हार्ट-लंग ट्रांसप्लांट पर विचार कर सकते हैं.”
24 अगस्त को तन्वी की हालत बिगड़ने के बाद उसे AIIMS में भर्ती कराया गया था और संभावित हार्ट-लंग ट्रांसप्लांट के लिए उसकी जांच की जा रही थी. AIIMS के मुताबिक, 1 सितंबर को करीब 2.50 बजे उसकी हालत में गंभीर सायनोसिस हो गया. उसके खून में ऑक्सीजन का स्तर बहुत गिर गया था, जिससे उसकी त्वचा और होंठ नीले पड़ गए थे. उसकी ऑक्सीजन सैचुरेशन करीब 48 प्रतिशत तक गिर गई थी.
इसके बाद उसे हाइपॉक्सिक स्पेल हुआ, यानी उसके शरीर तक पहुंचने वाली ऑक्सीजन की मात्रा अचानक और बहुत ज्यादा कम हो गई. इसके बाद उसे कार्डियक अरेस्ट हुआ.
AIIMS ने कहा, “करीब 3.30 बजे ऑक्सीजन सपोर्ट शुरू किया गया…इलाज कर रही मेडिकल टीम की ओर से तुरंत और लगातार बचाने की कोशिशों के बावजूद बच्चे को बचाया नहीं जा सका और सुबह 5.06 बजे उसे मृत घोषित कर दिया गया.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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