जयपुर: हर हफ्ते 92-साल के कुशल चंद सुराना व्हीलचेयर पर बैठकर राजमंदिर सिनेमा आते हैं, ताकि यह देख सकें कि सब कुछ ठीक से चल रहा है या नहीं. यह दिन खास है—जुरासिक वर्ल्ड रीबर्थ का पहला हिंदी-डब प्रीमियर. सफेद कुर्ता-पायजामा पहने थिएटर के मालिक सुराना मुस्कुराते हैं, जब वॉर्नर ब्रदर्स के अधिकारी इस इनवाइट-ओनली इवेंट में उनका स्वागत करते हैं.
एक डिस्ट्रीब्यूटर ने मुस्कुराते हुए कहा, “सुराना सर को नमस्ते करना ज़रूरी है. हमारे लंबे और मजबूत रिश्ते की वजह से हमें प्रीमियर यहीं करना था.”
सुराना के लिए यह सब बिल्कुल नॉर्मल है.
उन्होंने कहा, “जयपुर में सिनेमा का मतलब राजमंदिर है.”
देश भर में जहां कई सिंगल-स्क्रीन थिएटर यादों में सिमटते जा रहे हैं, वहीं राजमंदिर मुश्किल हालात को चुनौती देता हुआ खड़ा है. मल्टीप्लेक्स और स्ट्रीमिंग के दौर में यह एक ‘यूनिकॉर्न’ है.
1990 के दशक में जहां 25,000 सिंगल-स्क्रीन थिएटर थे, अब उनकी संख्या घटकर करीब 6,000 रह गई है. भविष्य को लेकर दुख भरे कयास लगाए जाते हैं, लेकिन गुलाबी रंग की यह पहचान आज भी हाउसफुल शो करती है, ट्रेलर लॉन्च होस्ट करती है और अब हॉलीवुड प्रीमियर भी दिखाती है.

यह शायद बॉलीवुड का सबसे पसंदीदा सिंगल-स्क्रीन थिएटर है.
1970 के दशक में राज कपूर से लेकर 80 के दशक में अमिताभ बच्चन और आज के रणबीर कपूर जैसे कलाकारों तक, पिछले 50 सालों से राजमंदिर सितारों को अपनी ओर खींचता रहा है. हाल के महीनों में राजकुमार राव और विक्की कौशल संकरी घुमावदार सीढ़ियां चढ़कर छोटी सी बालकनी में पहुंचे और नीचे मौजूद फैन्स को हाथ हिलाया—अपनी फिल्मों के पोस्टरों के सामने पोज़ देते हुए.
2023 में “भूल भुलैया 3” के मेकर्स ने ट्रेलर लॉन्च के लिए मुंबई की बजाय जयपुर को चुना. बाद में जब कार्तिक आर्यन ने आईफा बेस्ट एक्टर अवॉर्ड जीता, तो उन्होंने इस हॉल का शुक्रिया अदा किया. इस साल, रमेश सिप्पी “शोले” की 50वीं सालगिरह पर खास स्क्रीनिंग के लिए आए, जो राजमंदिर के गोल्डन जुबली साल से भी मेल खाती थी. मार्च में सनी देओल “जाट” का ट्रेलर लॉन्च करने आए, इसके बाद राजकुमार राव और वामिका गब्बी “भूल चूक माफ” के लिए पहुंचे. यहां के हर स्टाफ मेंबर के पास यहां आए सितारों की कोई न कोई कहानी है.
राज कपूर कहा करते थे, अगर हर थिएटर खुद को राजमंदिर की तरह संभाले, तो फिल्में फ्लॉप ही न हों—लोग बार-बार आते रहेंगे
— कुशल चंद सुराना, मालिक, राजमंदिर सिनेमा
थिएटर का रोज़मर्रा का काम देखने वाले अंकुर खंडेलवाल ने कहा, “विक्की कौशल “ज़रा हटके ज़रा बचके” के प्रमोशन के लिए यहां आए थे, जो हिट रही. वे इस जगह को अपना लकी चार्म मानते हैं. वे “सैम बहादुर” के लिए फिर आए और फिर “छावा” के लिए भी.”
राजमंदिर की सफलता सिर्फ पुरानी यादों पर नहीं, बल्कि खुद को बदलने पर टिकी है. यहां आज भी 100 रुपये से कम में ब्रेड पकौड़ा जैसे स्नैक्स मिल जाते हैं, लेकिन साथ ही डॉल्बी एटमॉस साउंड भी है. यह पुराने जमाने की खूबसूरती और बड़े तमाशे के बिज़नेस का मेल है.
सुराना के लिए यह ग्लैमर नया नहीं है. वे लंबे समय से एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के बड़े लोगों के संपर्क में रहे हैं—सिर्फ थिएटर की वजह से नहीं, बल्कि अपने सफल ज्वेलरी कारोबार की वजह से भी. उनकी पारिवारिक कंपनी भूरामल राजमल सुराना, जो कुंदन और मीनाकारी के लिए जानी जाती है, के ग्राहकों में गायत्री देवी, रेखा और दिलीप कुमार जैसे नाम शामिल रहे हैं, लेकिन सुराना का सबसे कीमती रत्न उनका प्यारा राजमंदिर है.
उन्होंने गर्व से कहा, “मैं फिल्मों का बहुत बड़ा शौकीन नहीं हूं, लेकिन मुझे उस विरासत से प्यार है जो मुझे मिली है और जो हमेशा इस शहर का हिस्सा रहेगी. हम यह पैसे के लिए नहीं, विरासत के लिए करते हैं.”
और इस विरासत को ज़िंदा रखे हुए हैं वे दर्शक, जो आज भी राजमंदिर की ओर खिंचे चले आते हैं.

‘रॉयल एक्सपीरियंस’—हर बजट के लिए
बुधवार दोपहर का वक्त राजमंदिर में ऐसे बीतता है, जैसे शो में दर्शक ही मुख्य कलाकार हों. शो की शुरुआत फोयर से होती है, जहां पर्यटक और स्थानीय लोग—सबके हाथ में मोबाइल होते हैं. कोई कॉलेज का छात्र रील बना रहा है, तो कोई घूंघट में गृहिणी जल्दी से सेल्फी ले रही है.
गुलाबी रंग का यह थिएटर नीले जयपुर के आसमान के सामने किसी मिठाई जैसा लगता है, लेकिन बाहर से ज़्यादा खूबसूरत है अंदर का नज़ारा—बड़े-बड़े झूमर, स्टुको की दीवारें, सितारों से भरी छत और रोशनी से नहाई चौड़ी सीढ़ियां. यहां तक कि वॉशरूम भी रॉयल थीम वाले हैं—पुरुषों के लिए किंग और महिलाओं के लिए क्वीन.
मल्टीप्लेक्स में गोल्ड क्लास होती है, जहां खास ट्रीटमेंट मिलता है. यहां हर आर्थिक वर्ग के लोग एक ही सोफे पर बैठते हैं, समोसे या पिज़्ज़ा खाते हुए. सिनेमा की बात करें, तो क्या यही वो चीज़ नहीं है जो कहीं खो गई थी—समाज के हर तरह के लोगों के साथ फिल्म देखने की खुशी
—कनिका अग्रवाल, रेगुलर दर्शक
कुछ लोग शीशे की अलमारी में रखी ट्रॉफियां देखते हैं, कुछ थिएटर की लकड़ी की छोटी नकल को निहारते हैं और कई लोग फूलों के गमलों और लैम्प्स से अलग-अलग किए गए लेदर सोफों पर बैठकर बस माहौल का आनंद लेते हैं.

पूरे एक्सपीरियंस में एक ड्रामाटिक टच है. हर शो से पहले लॉबी में सफेद लाइटिंग फैल जाती है; इंटरवल में वह ब्लू हो जाती है और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की शहनाई की धुन गूंजने लगती है. भारी मखमली परदा उठता है और बड़ी स्क्रीन दिखती है. दर्शक रत्नों के नाम वाली सीटों—रूबी, एमराल्ड, डायमंड—पर बैठते हैं, जो सुराना परिवार की ज्वेलरी विरासत की ओर इशारा है. यह हर किसी के लिए एक शानदार एक्सपीरियंस है, जिसकी कीमत 150 रुपये (आगे की रो) से शुरू होकर 500 रुपये (प्रीमियम बॉक्स) तक जाती है.

यही “रॉयल फीलिंग” पायल कुशवाहा, उनके टूरिस्ट ड्राइवर पति ससिकांत और उत्तर प्रदेश से आए उनके रिश्तेदारों को यहां खींच लाई.
तीन महीने की बेटी को गोद में लिए पायल ने कहा, “हमें यहां अच्छा लगता है, और यहां तक कि गार्ड भी हमें सम्मान से बात करते हैं. हम रूबी में 150 रुपये की टिकट लेते हैं.” वे हाउसफुल 5 देखने आए हैं, लेकिन यह एक तरह की सैर भी है.
पायल ने मुस्कुराते हुए कहा, “हमारे रिश्तेदार यूपी से आए हैं और अगर जयपुर आए हो तो राजमंदिर आकर फिल्म देखना ज़रूरी है.”
जैसे ही अक्षय कुमार नरगिस फाखरी के साथ स्क्रीन पर आते हैं, हॉल तालियों और सीटियों से गूंज उठता है. एक किशोरी पॉपकॉर्न के बड़े डिब्बे लेकर दौड़ती है और भाई-बहन फुसफुसाते हैं, “फिल्म मिस हो जाएगी!”
इंटरवल तक दर्शक 73×33 फुट की विशाल स्क्रीन पर चल रही मस्ती में पूरी तरह डूबे रहते हैं—जो छोटे मल्टीप्लेक्स हॉल्स में बहुत कम देखने को मिलती है, जहां स्क्रीन आमतौर पर 45 से 50 फुट चौड़ी होती है.

दर्शकों में 23 साल के गुरचरण सिंह और उनकी गर्लफ्रेंड भी हैं, जो चंडीगढ़ से “सीक्रेट गेटअवे” पर आए हैं.
तस्वीरें खींचते हुए सिंह ने कहा, “हमारे ऑटोवाले ने हमें इस थिएटर के बारे में बताया.”
दोपहर 12 बजे, 3 बजे, 6 बजे और 9 बजे के चारों शो में रोज़ आने वालों में पर्यटकों की संख्या काफी होती है.
खंडेलवाल ने कहा, “विदेशी और देशी पर्यटकों का टिकट खरीदकर अंदर आना और फिल्म देखना बहुत नॉर्मल है. कुछ विदेशी सिर्फ यह अनुभव लेना चाहते हैं कि भारत में फिल्म देखना कैसा होता है. वे पॉपकॉर्न या कॉफी लेते हैं और कुछ देर बैठकर माहौल को महसूस करते हैं.”
उन्होंने दावा किया कि राजमंदिर की कमाई शहर के ज़्यादातर मल्टीप्लेक्स से ज़्यादा है, व्हाट्सऐप पर कुछ आंकड़े दिखाते हुए, लेकिन डिटेल्स शेयर करने से इनकार कर दिया.

यह सब कैसे शुरू हुआ
पीली पड़ चुकी विज़िटर्स बुक राजमंदिर के इतिहास की कहानी बताती है. “हम आपके हैं कौन” 75 हफ्ते चली, “राम तेरी गंगा मैली” 74 हफ्ते. दोनों फिल्मों के निर्देशकों ने बाद में इसकी पन्नों पर दिल से लिखे संदेश छोड़े.
उस फिल्म के शानदार प्रदर्शन को याद करते हुए सूरज बड़जात्या ने लिखा, “मुझे खुशी है कि विवाह को राजमंदिर मिला.” कपूर ने भी 16 अक्टूबर 1985 को अपने विचार लिखे: “मैं चाहता हूं कि भारत के दूसरे एग्ज़िबिटर राजमंदिर से सीखें कि फिल्म कैसे दिखाई जाती है.”
2011 में उनके पोते रणबीर कपूर ने जोड़ा: “इतिहास का हिस्सा बनकर बहुत अच्छा लग रहा है…”
इस थिएटर की यात्रा इसके खुलने से करीब दस साल पहले शुरू हो गई थी. यह सुराना के साले मेहताब चंद्र गोलचा का सपना था.

सुराना ने कहा, “उन्होंने पहले ही मुंबई में मिनर्वा थिएटर और दिल्ली में गोलचा सिनेमा बना लिया था. एक बार तत्कालीन (राजस्थान) मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया ने उनसे पूछा कि आपने जयपुर में कुछ क्यों नहीं बनाया, जबकि आप यहीं के हैं. वहीं से प्लानिंग शुरू हुई.”
शोले को पांच साल तक दिखाने वाला मिनर्वा 2006 में बंद हो गया. गोलचा करीब दस साल बाद बंद हुआ. तीनों में से सिर्फ राजमंदिर ही लंबे समय तक चलने के लिए बना था.
उन दिनों, पास के पुलिस स्टेशन से घुड़सवार सिपाही भेजे जाते थे, ताकि कानून-व्यवस्था बनी रहे, क्योंकि ओपनिंग वीकेंड पर भीड़ सड़कों तक फैल जाती थी
— किशोर कुमार काला, अकाउंट्स मैनेजर
1966 में सुखाड़िया ने इसकी नींव रखी और आर्किटेक्ट डब्ल्यू.एम. नामजोशी—जिन्होंने मिनर्वा और गोलचा दोनों डिजाइन किए थे—को जयपुर के इस आर्ट मॉडर्न हॉल को डिजाइन करने के लिए लाया गया.
सुराना ने कहा, “यह गोलचा का विज़न था, जिसे नामजोशी ने कागज़ और निर्माण में उतारा.”
शुरुआत में कई रुकावटें आईं. पड़ोसियों ने सेंट ज़ेवियर्स स्कूल और सूरज अस्पताल के पास थिएटर होने पर आपत्ति जताई. फिर मुकदमे भी हुए. एक समय ऐसा लगने लगा कि जयपुर को अपना आर्ट डेको हॉल नहीं मिल पाएगा.
तभी कुशल चंद के पिता, राजमल सुराना, आगे आए और निर्माण पूरा कराया, ताकि यह परिवार के पास ही रहे.
आखिरकार थिएटर शुरू हुआ. तत्कालीन मुख्यमंत्री हरिदेव जोशी ने इसका उद्घाटन किया. पुरानी ब्लैक-एंड-व्हाइट तस्वीरों में वे अपनी सुरक्षा टीम के साथ दिखाई देते हैं और उनके पास खड़े हैं सुराना, जो तब चालीस की उम्र में थे.
यहां दिखाई जाने वाली पहली फिल्म चरस थी, जिसमें धर्मेंद्र और हेमा मालिनी थे.
शुरुआत से ही यहां अकाउंट्स संभालने वाले 83 साल के किशोर कुमार काला ने कहा, “उन दिनों, पास के पुलिस स्टेशन से घुड़सवार सिपाही भेजे जाते थे, ताकि कानून-व्यवस्था बनी रहे, क्योंकि ओपनिंग वीकेंड पर भीड़ सड़कों तक फैल जाती थी.”

शुरुआत में राजमंदिर को भीड़ पास की एक गुजराती धर्मशाला से मिलती थी. वहां ठहरे व्यापारी फिल्म देखने आ जाते थे और धीरे-धीरे यह एक रिवाज़ बन गया कि बाहर से आए कारोबारी अपने परिवार के साथ यहां फिल्म देखने आएं. नागौर से अजमेर तक, जयपुर के आसपास के कस्बों के लोग राजमंदिर आना ज़रूरी समझते थे.
काला ने कहा, “जब भी कोई बड़ी फिल्म लगती थी, तो लोगों का सैलाब उमड़ पड़ता था. थिएटर के अंदर 1,200 लोग होते थे, फोयर में अगले शो का इंतज़ार करते 1,200, और सड़क पर अंदर जाने के लिए खड़े 1,200.”
लेकिन राजमंदिर को तुरंत मुनाफा नहीं हुआ.
दशकों तक हाउसफुल
जब पैसों का ज़्यादा बहाव नहीं था, तब शुभचिंतकों ने सुराना परिवार को थिएटर के इंटीरियर पर ज़्यादा खर्च न करने की सलाह दी. उन्होंने उल्टा किया.
सुराना ने कहा, “हमने एक स्थानीय विक्रेता से बहुत अच्छी क्वालिटी की कारपेटिंग करवाई, जो खास हमारे लिए बनाई गई थी. बाद में हुआ यह कि जयपुर के लोग खुद ही ध्यान रखने लगे कि अंदर थूकें या धूम्रपान न करें, क्योंकि इंटीरियर इतना अच्छा था.”

सबसे बड़े बेटे के तौर पर, उन्होंने अपने पिता से जिम्मेदारी संभाली और उसी प्यार और अनुशासन के साथ हॉल चलाया.
जब ज़्यादातर थिएटर ठंडक के लिए बड़े पंखों का इस्तेमाल करते थे, तब सुराना ने सेंट्रल एयर-कंडीशनिंग और आधुनिक साउंड सिस्टम लगाया. पहले हॉल में 1,200 सीटें थीं, लेकिन पिछले साल पुश-बैक कुर्सियां लगाने के बाद यह संख्या घटाकर 800 कर दी गई.
जो नहीं बदला, वह है पुरानी शान-शौकत.
सुराना ने कहा, “मुझे फिल्म देखने से ज़्यादा दर्शकों की प्रतिक्रियाएं देखना अच्छा लगता था. कुछ लोग रोशनी या बड़ी स्क्रीन देखकर पूरी तरह हैरान हो जाते थे. लोग एक-दूसरे से कहते थे कि कारपेट गंदी मत करो, क्योंकि वह इतनी शाही लगती थी.”

हर सुबह आठ बजे कर्मचारी आते हैं और थिएटर के हर कोने की सफाई और पॉलिश करते हैं. दोपहर तक जगह चमकने लगती है और मेहमानों के लिए तैयार हो जाती है. रिसेप्शन में ताज़े समोसे, कचौड़ी, पॉपकॉर्न और कॉफी की खुशबू फैल जाती है.
सुराना दशकों तक यह सब देखते रहे हैं, अपने ऑफिस से हॉल पर नज़र रखते हुए. कभी-कभी उनकी पत्नी और बच्चे भी नई फिल्म देखने उनके साथ आते थे.
मुझे फिल्म देखने से ज़्यादा दर्शकों की प्रतिक्रियाएं देखना अच्छा लगता था…
— कुशल चंद सुराना, मालिक, राजमंदिर सिनेमा
उन्होंने अपनी बेटी दीप्ति को उमराव जान दिखाने की प्यारी यादें भी साझा कीं.
सुराना ने हंसते हुए कहा, “उसे डांस बहुत पसंद था, और उन दिनों उमराव जान लगी हुई थी. वह मेरे साथ आती थी और समय देखकर चुपके से अंदर जाकर ‘इन आंखों की मस्ती में’ पर रेखा जी का डांस देखती थी.”

इन नरम कारपेटेड फर्शों पर देश-विदेश से आए बड़े सितारों और नेताओं के कदम पड़े हैं—पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर 1980 में सोवियत वित्त मंत्री विक्टर डिमेंटजेव तक और 2007 में पाकिस्तानी पत्रकार खालिद हुसैन तक.
राजस्थान की उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी ने विज़िटर्स बुक में लिखा, “यहां आकर बहुत अच्छा लगा. बचपन की कई यादें ताज़ा हो गईं!”
सहेजकर रखे गए फोटो एलबम वक्त में ठहरे पल दिखाते हैं—जैसे 1980 में इंसाफ का तराज़ू के प्रमोशन के दौरान युवा राज बब्बर भीड़ को संबोधित करते हुए और अमिताभ बच्चन सुराना के साथ ताज़े बने समोसे खाते हुए.

सुराना के लिए गर्व की बड़ी वजह यह है कि कितने ही खास मेहमानों ने राजमंदिर की “बेहतरीन देखरेख” की तारीफ की है. राज कपूर ने एक बार कहा था कि यही वजह है कि यहां फिल्में इतना अच्छा चलती थीं.
सुराना ने कहा, “वे कहा करते थे, अगर हर थिएटर खुद को राजमंदिर की तरह संभाले, तो फिल्में फ्लॉप ही न हों—लोग बार-बार आते रहेंगे.”
काला ने यह भी बताया कि कपूर इस बात से भी प्रभावित थे कि इतने शो के बाद भी प्रिंट्स कितनी अच्छी हालत में रखे जाते थे.
काला ने कहा, “जब राज कपूर हॉल आए, तो वे इस बात से बहुत प्रभावित हुए कि मैंने प्रिंट्स को कैसे संभाला है. उन्होंने कहा कि मुंबई लौटकर वे मुझे इनाम भेजेंगे.” लेकिन यह भी बताया कि उससे पहले ही अभिनेता का निधन हो गया.

फिल्मों और ऐसे पुराने हॉल्स के बीच एक-दूसरे पर निर्भर रिश्ता है. छोटे शहरों में सिनेमा का असली जुनून यहीं पनपा. आज भी, पुराने ढांचे, ज्यादा खर्च और मल्टीप्लेक्स की प्रतिस्पर्धा के बावजूद, सिंगल-स्क्रीन थिएटर पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं. पठान, जवान, एनिमल और हाल ही में असम में ज़ुबीन गर्ग की रोई रोई बिनाले जैसी फिल्मों से कुछ जगहों पर फिर से जान आई है.
पिछले साल उत्तर प्रदेश सरकार ने सिंगल-स्क्रीन थिएटरों को अपग्रेड करने के लिए प्रोत्साहन देने की घोषणा भी की. महाराष्ट्र में उनकी समस्याओं पर स्टडी करने के लिए एक पैनल बना और एनसीपी नेता अजित पवार ने भी उनके हालात को लेकर प्रदर्शन किया.
लेकिन राजमंदिर के लिए इसकी प्रासंगिकता अपने आप बनी रही है—आगे की सोच और कुछ समझदारी भरे फैसलों की वजह से. परिवार इसे गर्व की चीज़ मानता है, पैसे कमाने की मशीन नहीं, इसलिए टिकट के दाम कम रखे गए हैं. साथ ही, पिछले पांच-छह सालों में प्रमोशनल इवेंट्स पर भी ध्यान दिया गया, जिससे इसकी पहचान और बढ़ी है.
अब भी शो जारी
राजमंदिर से कुछ किलोमीटर दूर सुराना एन्क्लेव है, जहां एक आलीशान बंगले में कुशल सुराना, उनके भाई-बहन और आने वाली पीढ़ियां रहती हैं. एक ही परिसर में अलग-अलग बंगले हैं और हर एक पर परिवार के मुखिया का नाम लिखा है.
अधिकतर, सुराना अपने कमरे से ही राजमंदिर पर नज़र रखते हैं—चारों ओर फाइलों के ढेर, स्नैक्स के जार, ट्रॉफियां और फ्रेम की गई तस्वीरें होती हैं. दो गोल्डन रिट्रीवर इधर-उधर घूमते रहते हैं और स्टाफ के लोग लॉन से लेकर ड्राइववे में खड़ी गाड़ियों और लंच तक सब कुछ संभालते रहते हैं.
सुराना ने कहा, “हम घर पर ज़्यादातर राजस्थानी खाना खाते हैं, हालांकि, मुझे साउथ इंडियन खाना भी पसंद है. जब राज कपूर आए थे, तो उनके लिए खास राजस्थानी लंच रखा गया था.”

उनका पोता और उनका परिवार जयपुर और विदेश के बीच आता-जाता रहता है और सुराना धीरे-धीरे परिवार का कारोबार अगली पीढ़ी को सौंप रहे हैं. वे कहते हैं कि उनके पोते ने सिनेमा हॉल की विरासत को आगे बढ़ाने में सबसे ज़्यादा रुचि दिखाई है.
बड़े और जुड़े हुए परिवार के निशान हर जगह दिखते हैं—एक फोटो में सुराना और उनके चार भाई-बहन शादी में काले बंदगला और लाल पगड़ी पहने दिखते हैं, दूसरी में परिवार की महिलाएं पूरे राजस्थानी साज-सज्जा में हैं. बच्चों की शादियों और पोतों की तस्वीरें भी हैं, लेकिन सुराना के दिमाग में अब भी काम सबसे ऊपर है.
किशोर काला, जो राजमंदिर खुलने से पहले ही चीफ टेक्निकल ऑफिसर थे, ने कहा, “अगर सुराना जी हॉल न जाएं तो उन्हें नींद नहीं आती. आजकल बस एक फोन आता है—सब ठीक है या नहीं.”
आज भी, खास मौकों पर और प्रमोशन डील फाइनल करने के लिए सुराना खुद थिएटर पहुंचते हैं.
जहां कई सिंगल-स्क्रीन सीटें भरने के लिए जूझते हैं, वहीं राजमंदिर जयपुर में सितारों और प्रीमियर को लगातार लाता रहता है. समय के साथ कदम मिलाते हुए थिएटर ने खुद को अपग्रेड किया है, लेकिन इतिहास को छोड़े बिना. अब थिएटर का अपना इंस्टाग्राम पेज भी है, जहां स्टार विज़िट, प्रमोशनल इवेंट्स और बाकी अपडेट्स डाले जाते हैं.
अंकुर खंडेलवाल ने कहा, “हमने 2019 के आसपास पेड प्रमोशनल इवेंट्स शुरू किए और अब प्रोड्यूसर खुद हमारे पास गाने या ट्रेलर लॉन्च के लिए आते हैं, जैसे भूल भुलैया 3.” वे 2014 में बीस की उम्र में जुड़े थे और अब मेंटेनेंस से लेकर सुराना के कॉल तक सब संभालते हैं. उनका फोन लगातार बजता रहता है—कभी खराब ताले को बदलते हुए, तो कभी सुराना के सवालों का जवाब देते हुए.
खंडेलवाल प्रोडक्शन हाउस से बातचीत भी करते हैं, जो राजमंदिर से जुड़ना चाहते हैं.
उन्होंने कहा, “हमने जुरासिक पार्क का पहला हिंदी प्रीमियर होस्ट किया और दक्षिण भारत के एक प्रोडक्शन हाउस से यहां ट्रेलर रिलीज़ को लेकर बात चल रही है.”
यह इनवाइट-ओनली इवेंट थिएटर के लिए एक और मील का पत्थर होगा, जिसने भूल भुलैया 3 के साथ मुंबई के बाहर ट्रेलर लॉन्च की परंपरा शुरू की थी और बाद में जाट जैसे इवेंट किए.
जुरासिक पार्क की रिलीज़ से पहले वॉर्नर ब्रदर्स ने एक बयान जारी किया: “राजमंदिर जैसे प्रतिष्ठित हॉल को चुनकर—जो सिंगल-स्क्रीन सिनेमा का ताज है और हिंदी फिल्मों के ऐतिहासिक प्रदर्शन से जुड़ा है—हम इस विरासत का सम्मान करना चाहते हैं और हिंदी डब वर्ज़न के हमारे उत्साही दर्शकों से जुड़ना चाहते हैं.”
सुराना, हालांकि, सिनेमा के नए दौर से ज़्यादा प्रभावित नहीं हैं.
उन्होंने प्रीमियर की मीटिंग के लिए पीआर और इवेंट टीम का इंतज़ार करते हुए कहा, “मैं अब फिल्में नहीं देखता. न कहानी होती है, न संगीत. मैं बस चाहता हूं कि लोग अंदर आएं, एक अच्छी फिल्म देखें और ऐसा महसूस करें जैसे यह हॉल कल ही खुला हो.”
(यह भारत में सिंगल-स्क्रीन थिएटरों पर तीन हिस्सों की सीरीज़ की पहली रिपोर्ट है.)
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