नई दिल्ली: राष्ट्रीय सांस्कृतिक संपदा संरक्षण प्रयोगशाला (एनआरएलसी) द्वारा दरभंगा की दुर्लभ हाथीदांत और लकड़ी की कलाकृतियों के संरक्षण में लगभग सात साल की देरी के बाद, इस लापरवाही को उजागर करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र भेजा गया है, दिप्रिंट को यह पता चला है.
हाथी दांत की ये वस्तुएं बिहार के दरभंगा स्थित महाराजाधिराज लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय में रखी और प्रदर्शित हैं और इन्हें दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वस्तुओं में गिना जाता है.
मोदी को लिखे एक पत्र में, म्यूज़ियम के पूर्व क्यूरेटर और INTACH के बिहार चैप्टर के सह-संयोजक शिव कुमार मिश्रा ने कहा कि केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के तहत काम करने वाले एनआरएलसी लखनऊ के अधिकारियों की लापरवाही के कारण म्यूज़ियम की दुर्लभ चीज़ें खराब हो रही हैं.
लगभग सात साल बीत चुके हैं और हाथीदांत और लकड़ी की कलाकृतियों के संरक्षण के लिए एनआरएलसी को दर्जनों पत्र लिखे गए हैं.
2019 में, दरभंगा म्यूज़ियम और एनआरएलसी लखनऊ ने 155 प्राचीन वस्तुओं के संरक्षण के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए. इनमें महिषासुरमर्दिनी की आकृति, हाथी का हौदा, पालकी, शाही सिंहासन, वैनिटी बॉक्स, कुर्सियां, मेज़ और घोड़े पर सवार छत्रपति शिवाजी महाराज की मूर्ति शामिल हैं.
म्यूज़ियम की लकड़ी की वस्तुओं में भगवान बुद्ध के जन्म की आकृति, मंदिर के मॉडल, सोफा, मगरमच्छ, मछली और कछुओं की नक्काशी और दरबार हॉल की मेज़ शामिल हैं. महाराजा रामेश्वर सिंह ने 1900 और 1929 के बीच हाथीदांत की कई कलाकृतियां बनाने के लिए मुर्शिदाबाद के कारीगरों को काम पर रखा था.

चूंकि, ये वस्तुएं एक सदी से भी ज़्यादा पुरानी हैं, इसलिए ये खराब होने लगी हैं. समझौते के अनुसार, यह काम तीन साल के भीतर पूरा किया जाना था.
बिहार सरकार के कला, संस्कृति और युवा मामलों के विभाग के तहत काम करने वाले दरभंगा म्यूज़ियम ने संरक्षण कार्य के लिए 1.65 करोड़ रुपए मंज़ूर किए.
मिश्रा ने दिप्रिंट को बताया, “समझौते के अनुसार, म्यूज़ियम ने एनआरएलसी को आधी रकम, यानी 82.5 लाख रुपये, एडवांस में दे दी थी. लेकिन सालों बाद भी, एनआरएलसी अधिकारियों की सुस्ती के कारण संरक्षण का काम अधूरा पड़ा है, जिससे इस सांस्कृतिक धरोहर के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल छा गए हैं.”
दरभंगा के शाही परिवार ने हाथीदांत का यह दुर्लभ संग्रह म्यूज़ियम को दान किया था.
मिश्रा ने कहा, “इस संग्रह में हाथीदांत की कलाकृतियों की एक बेजोड़ संख्या है—इतनी बड़ी संख्या देश में कहीं और नहीं है.”

काफी देरी
मिश्रा को याद है कि 2019 में वे एनआरएलसी के तत्कालीन डायरेक्टर जनरल मैनेजर सिंह के साथ समझौते पर दस्तखत करने के लिए लखनऊ गए थे.
2019 के समझौते के बाद, एनआरएलसी लखनऊ की पांच सदस्यों वाली एक टीम ने संरक्षण का काम करने के लिए दरभंगा म्यूज़ियम का दौरा किया. टीम एक साल तक वहां रही और लगभग 100 दुर्लभ चीज़ों का संरक्षण किया, जो सभी छोटी कलाकृतियां थीं.
मिश्रा ने बताया कि पालकी, हौदा और शाही सिंहासन जैसी बड़ी चीज़ों को ऐसे ही छोड़ दिया गया.
मिश्रा ने कहा, “एनआरएलसी की टीम ने सिर्फ़ छोटी चीज़ों पर काम किया. उन्होंने अच्छा काम किया क्योंकि हाथीदांत से बनी चीज़ें टूट और बिखर रही थीं.” मिश्रा 2017 से 2022 तक म्यूज़ियम में क्यूरेटर थे. संरक्षित चीज़ों को म्यूज़ियम में प्रदर्शित किया गया है.
इसके बाद एनआरएलसी के अधिकारी लखनऊ लौट गए और कभी वापस नहीं आए. डायरेक्टर जनरल को कई पत्र भेजे गए, लेकिन काम कभी दोबारा शुरू नहीं हुआ.
संरक्षण करने वालों ने नाज़ुक, पीली पड़ चुकी हाथीदांत की इनले वाली चीज़ों के लिए एक खास तरीका अपनाया.
एनआरएलसी के वैज्ञानिक संजय प्रसाद गुप्ता और आर्ट कंज़र्वेटर इलियास अहमद के 2024 के एक पेपर, जिसका शीर्षक ‘महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह म्यूज़ियम, दरभंगा की चीज़ों के संदर्भ में हाथीदांत और हाथीदांत की इनले वाली चीज़ों के रेस्टोरेशन के लिए एक नया तरीका’ था, में सटीक सफाई, गैप-फिलिंग और स्ट्रक्चरल मज़बूती देने वाली तकनीकों पर ज़ोर दिया गया. इन तकनीकों को नमी से नुकसान पहुंचाए बिना उन्हें स्थिर करने के लिए डिज़ाइन किया गया था.


लेखकों ने दाग हटाने के लिए तेज़ रसायनों के बजाय नियंत्रित, पर्यावरण के अनुकूल सॉल्वैंट्स के इस्तेमाल और ढीले इनले टुकड़ों को सेट करने के लिए रिवर्सिबल एडहेसिव (ऐसे गोंद जिन्हें हटाया जा सके) के इस्तेमाल पर ज़ोर दिया.
मिश्रा को याद है कि उन्होंने दो साल तक काम किया और कई बातचीत के बाद, एनआरएलसी आखिरकार हाथीदांत की चीज़ों के संरक्षण का काम करने के लिए सहमत हो गया.
2017 में, बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दरभंगा में म्यूज़ियम का दौरा किया. मिश्रा ने उन्हें एनआरएलसी के साथ हुई बातचीत के बारे में बताया. कुमार ने अधिकारियों को संरक्षण का काम तेज़ी से करने और यह पक्का करने का निर्देश दिया कि काम ठीक से हो.
2022 में, एएसआई के पूर्व एडिशनल डायरेक्टर जनरल आलोक त्रिपाठी एनआरएलसी के डायरेक्टर जनरल के पद पर थे. त्रिपाठी के बाद, एएसआई में उनके सहयोगी और एडिशनल डायरेक्टर जनरल जान्हवीज शर्मा को एनआरएलसी के महानिदेशक का अतिरिक्त प्रभार दिया गया.
एनआरएलसी के आर्ट कंज़र्वेटर इलियास अहमद ने कहा., “एनआरएलसी में स्टाफ की भारी कमी है और नियुक्तियां रुकी हुई हैं. दरभंगा में संरक्षण के काम में देरी की वजह प्रशासनिक कमियां हैं. हमने लगभग 65 प्रतिशत काम पूरा कर लिया है. इसमें कोई शक नहीं कि ये कलाकृतियां अनोखी हैं.”
अहमद ने कहा कि अभी एनआरएलसी के पास इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए पर्याप्त रेगुलर स्टाफ नहीं है. हालांकि, उन्होंने कहा कि नियुक्ति की प्रक्रिया अभी चल रही है.
अहमद ने कहा, “उम्मीद है कि एक-दो महीने में हमारे पास एनआरएलसी में बचा हुआ काम पूरा करने के लिए ज़रूरी स्टाफ होगा और काम फिर से शुरू हो जाएगा.”

कार्रवाई की मांग
मिश्रा ने मोदी को लिखे एक पत्र में उनसे आग्रह किया कि वे संस्कृति मंत्रालय को भारत की दुर्लभ सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के लिए तत्काल कदम उठाने का निर्देश दें.
दिप्रिंट’ द्वारा देखे गए पत्र में कहा गया है, “इस लापरवाही और ढिलाई के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई करने की आवश्यकता है.”
मिश्रा ने कहा कि यह पहली बार था जब बिहार की किसी वस्तु को एनआरएलसी द्वारा संरक्षित किया जा रहा था, जिसकी स्थापना 1976 में हुई थी.
2021 और 2026 के बीच, मोदी सरकार ने एनआरएलसी को 28.2 करोड़ रुपये आवंटित किए, जिसमें से उसने 24.17 करोड़ रुपये खर्च किए गए.
हालांकि, संस्कृति मंत्रालय ने अपनी 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट में दरभंगा में संरक्षण कार्य का उल्लेख किया.
रिपोर्ट में कहा गया है, “महाराजाधिराज लक्ष्मेश्वर सिंह संग्रहालय, दरभंगा में हाथी दांत की जड़ाई, लकड़ी और धातु की वस्तुओं को संरक्षित किया गया.”
हालांकि, पिछले पांच वर्षों में सरकार भारत के प्रमुख संरक्षण संस्थान एनआरएलसी में स्थायी महानिदेशक नियुक्त करने में विफल रही है.
मिश्रा ने कहा, “या तो एएसआई का कोई वरिष्ठ अधिकारी या संस्कृति मंत्रालय का कोई अधिकारी संस्थान का नेतृत्व कर रहा है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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