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Thursday, 2 July, 2026
होमफीचरविनोद रंगनाथ चाहते हैं कि स्क्रीनराइटर्स को रॉयल्टी मिले. पहली चुनौती है—उन्हें एक मंच पर लाना

विनोद रंगनाथ चाहते हैं कि स्क्रीनराइटर्स को रॉयल्टी मिले. पहली चुनौती है—उन्हें एक मंच पर लाना

फिल्म इंडस्ट्री में, जो सिर्फ़ बड़े स्टार्स को मोटी रकम देने और बाकी सभी ज़रूरी लोगों को नज़रअंदाज़ करने के लिए बदनाम है, विनोद रंगनाथ की लड़ाई लंबे समय से चल रही है.

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नई दिल्ली: एक नए कॉपीराइट कानून को लागू हुए 14 साल बाद, जिसने स्क्रीनप्ले लेखकों को उनके काम का सिनेमा हॉल से बाहर इस्तेमाल होने पर रॉयल्टी का कानूनी अधिकार दिया था, आखिरकार एक चेक आया. वह भी चिली से. अब अगला नंबर उरुग्वे का है.

लेकिन पैसा लेखकों तक पहुंचने से पहले, उन्हें नई बनी और महत्वाकांक्षी कॉपीराइट सोसायटी स्क्रीनराइटर्स राइट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SRAI) का सदस्य बनना होगा. और सभी लेखक ऐसा नहीं करना चाहते.

यही अभी इस सोसायटी के सीईओ विनोद रंगनाथ की सबसे बड़ी समस्या है. जिन्हें आम तौर पर स्वाभिमान, महेश भट्ट के निर्देशन में बने उस दोपहर के डेली सोप के लिए याद किया जाता है, जो 1990 के दशक में दूरदर्शन के सबसे यादगार शोज में से एक बना था. आज उनका काम सीन लिखने से ज्यादा लेखकों के लिए सिस्टम बनाना है.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “मैं अकेला व्यक्ति काम कर रहा हूं. मैंने अपनी 33 साल की लेखन करियर रोक दी है, और मैं इसे बना रहा हूं.”

उनकी यह लड़ाई ज्यादातर अदृश्य और अक्सर बिना सराहना वाली है. लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में, जहां सिर्फ बड़े सितारों को ही अच्छी तरह भुगतान मिलता है और बाकी सभी को नजरअंदाज किया जाता है, रंगनाथ की यह लड़ाई लंबे समय से जरूरी थी. यह फिल्म के स्क्रिप्ट लेखक की गुमनामी खत्म करने की कोशिश है. यह मांग नई नहीं है. लेखकों के समूह और वरिष्ठ पटकथा लेखकों ने 2012 के कॉपीराइट संशोधन के दौरान रॉयल्टी अधिकारों के लिए दबाव बनाया था. SRAI का गठन 2013 में हुआ था, लेकिन इसे कॉपीराइट सोसायटी के रूप में रजिस्ट्रेशन दिसंबर 2024 में मिला.

SRAI से पहले स्क्रीनराइटर्स के लिए कोई रजिस्टर्ड कॉपीराइट सोसायटी नहीं थी, और यही कारण था कि रॉयल्टी का सिस्टम लंबे समय तक काम नहीं कर पाया.

“स्क्रीनराइटर्स के लिए कोई रजिस्टर्ड कॉपीराइट सोसायटी नहीं थी, और यही अनुपस्थिति इस बात का मुख्य कारण थी कि रॉयल्टी का ढांचा इतने समय तक प्रभावी नहीं हो सका.”

— मीडिया और एंटरटेनमेंट वकील अनामिका झा

दशकों तक भारतीय पटकथा लेखकों को एक बार पैसे दिए जाते थे, भले ही उनका काम बाद में टीवी, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म, विदेश के बाजारों या री-रन में इस्तेमाल होता रहे. 2012 के कॉपीराइट एक्ट संशोधन ने इसे कुछ हद तक बदला. SRAI का 30 दिसंबर 2024 को कॉपीराइट सोसायटी के रूप में रजिस्ट्रेशन होने से पहली बार लेखकों के पास एक ऐसा सामूहिक संगठन आया है जो टैरिफ पर बातचीत कर सकता है, रॉयल्टी वसूल सकता है, विदेशी कॉपीराइट सोसायटी से पैसा ले सकता है, और उसे लेखकों और उनके कानूनी वारिसों में बांट सकता है.

इस सिस्टम का एक हिस्सा पहले ही चलना शुरू हो गया है. उरुग्वे, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया की कॉपीराइट सोसायटी ने SRAI को उन भारतीय फिल्मों और शोज की सूची भेजी है जो वहां देखे गए हैं, और उनके साथ जुड़ी संभावित रॉयल्टी का रिकॉर्ड भी दिया है.

ये सूची अब इस कानूनी बदलाव को काफी कागजी काम में बदल चुकी हैं.

Reciprocal agreement signed between SRAI and the Pan-African Alliance of Screenwriters and Filmmakers | Photo: Vinod Ranganath
SRAI और पैन-अफ्रीकन एलायंस ऑफ स्क्रीनराइटर्स एंड फिल्ममेकर्स के बीच पारस्परिक समझौता साइन हुआ | फोटो: विनोद रंगनाथ

सिस्टम बनाने वाला लेखक

रंगनाथ के लिए सब कुछ एक सवाल से शुरू होता है. वह कितने सदस्यों को जोड़ सकते हैं. यह उनकी सबसे बड़ी चुनौती है. विडंबना यह है कि जिन लोगों के लिए वह यह काम कर रहे हैं, उन्हें ही जोड़ना सबसे मुश्किल हो रहा है.

SRAI के पास अभी लगभग 680 सदस्य हैं. विदेशी सोसायटी से मिली सूची के आधार पर रंगनाथ का अनुमान है कि लगभग 500-600 लेखक और 10 कानूनी वारिस अभी भी सदस्य नहीं हैं, जिन्हें रॉयल्टी मिल सकती है.

सदस्य बनने के लिए लेखक को लगभग 6,600 रुपये एक बार फीस देनी होती है, जिसमें GST, ई-KYC, ई-साइनिंग और डीड से जुड़े खर्च शामिल हैं. जिस सोसायटी को यह समझाना है कि रॉयल्टी अब सच में मिलने लगी है, उसी के लिए यह रकम भी झिझक का कारण बन गई है.

कुछ लोग रजिस्ट्रेशन से पहले ही पूछ रहे हैं कि उन्हें कितना पैसा मिलेगा.

“सवाल यह नहीं है कि मुझे कितना मिलेगा. बात यह है कि आपको आपके किए हुए काम के लिए एक बोनस मिलने वाला है, जब वह दूसरे माध्यमों में कमाया जाता है. लोग इसकी अहमियत समझ नहीं पा रहे हैं या भरोसा नहीं कर पा रहे हैं,” रंगनाथ ने कहा.

यह एक अजीब स्थिति है. पहली रॉयल्टी पेमेंट आ चुकी है, लेकिन रंगनाथ को अभी भी लेखकों को यह भरोसा दिलाना है कि सिस्टम असली है.

उनके लिए यह वह जगह है जहां कानूनी जीत रोजमर्रा के काम में बदल जाती है. कॉपीराइट सोसायटी अभी शुरुआती चरण में है, लेकिन यह पहले से ही विदेशी सोसायटी, मेंबरशिप फॉर्म, टाइटल लिस्ट, कानूनी वारिस, क्रेडिट और क्लेम संभाल रही है.

हर सूची का मतलब है कि पैसा मिलने से पहले कई दिनों का काम. किसी टाइटल की पहचान करनी होती है. लेखक का क्रेडिट जांचना होता है. अगर फिल्म में स्टोरी, स्क्रीनप्ले और डायलॉग के अलग लेखक हैं, तो हिस्सेदारी तय करनी होती है. अगर लेखक मर चुका है, तो वारिस को ढूंढना होता है. लेकिन यह सब तब तक बेकार है जब तक लेखक या वारिस सदस्य न बने हों. बिना सदस्यता के SRAI उनके लिए रॉयल्टी क्लेम या रिसीव नहीं कर सकती.

“यह पूरा काम डेटा का है. डेटा इकट्ठा करना, डेटा वेरिफाई करना, और उसे अलग-अलग प्रक्रिया से प्रोसेस करना. यह पूरा नंबरों का काम है,” उन्होंने कहा.

विदेशी लिस्ट दिखाती हैं कि भारतीय फिल्मों और शोज की कितनी लंबी लाइफ आगे भी चल रही है. लेकिन SRAI के लिए यह यह भी दिखाती हैं कि कितना बड़ा गैप अभी भी है.

Reciprocal agreement signed between SRAI and the Australian Writer's Guild Authorship Collecting Society | Photo: Vinod Ranganath
SARAI और ऑस्ट्रेलियन राइटर्स गिल्ड ऑथरशिप कलेक्टिंग सोसाइटी के बीच आपसी समझौते पर साइन | फ़ोटो: विनोद रंगनाथ

चिली की सूची में 11 टाइटल हैं. फ्रांस की सूची में लगभग 100 टाइटल हैं. उरुग्वे में लगभग 6,000 टाइटल हैं. ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में लगभग 40.

इसी वजह से रंगनाथ की पहली लड़ाई कोर्ट या बातचीत की टेबल पर नहीं है. यह रिकॉर्ड, मेंबरशिप फॉर्म, क्रेडिट और उन लेखकों को कॉल करने की लड़ाई है जिनके लिए पैसा इंतिजार कर रहा है लेकिन जिन्होंने अभी साइन नहीं किया है.

और यह कॉल ही अकेली लड़ाई नहीं है. SRAI को भारतीय बाजार को भी यह स्वीकार कराना है कि स्क्रीनराइटिंग रॉयल्टी अब फिल्मों और शोज के इस्तेमाल की लागत का हिस्सा है.

कानूनी अधिकार से काम करने वाले सिस्टम तक

भारतीय फिल्मों में म्यूजिक इंडस्ट्री का काम करने का तरीका एक ऐसा मॉडल है जिसे रंगनाथ लेखन उद्योग में दोहराना चाहते हैं. इंडियन परफॉर्मिंग राइट सोसायटी (IPRS), जो गीतकारों, संगीतकारों और म्यूजिक पब्लिशर्स का प्रतिनिधित्व करती है, 2018 में कॉपीराइट सोसायटी के रूप में रजिस्ट्रेशन के बाद से गानों, गीतों और संगीत के इस्तेमाल के लिए लाइसेंसिंग को बिजनेस का हिस्सा बना चुकी है.

ब्रॉडकास्टर, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म, इवेंट ऑर्गनाइजर और अन्य यूजर्स अब म्यूजिक इस्तेमाल करने की लागत के रूप में रॉयल्टी देते हैं. और पैसा लगातार आ रहा है. आंकड़े सफलता की कहानी बताते हैं.

IPRS की 2022-23 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, इसका राजस्व 2017-18 में 45.7 करोड़ रुपये से बढ़कर 2021-22 में 313.8 करोड़ रुपये हुआ, और फिर FY2022-23 में 564 करोड़ रुपये तक पहुंच गया.

SRAI यही सिद्धांत कहानियों, स्क्रीनप्ले और डायलॉग पर लागू करना चाहता है. अगर कोई फिल्म, टीवी शो या स्ट्रीमिंग टाइटल आगे भी ब्रॉडकास्ट, स्ट्रीमिंग या अन्य कमर्शियल इस्तेमाल से पैसा कमा रहा है, तो लेखक को उस रेवेन्यू चेन से बाहर नहीं रखा जा सकता.

मीडिया और एंटरटेनमेंट वकील अनामिका झा ने कहा कि 2012 के बाद समस्या कानूनी नहीं बल्कि संस्थागत थी.

“स्क्रीनराइटर्स के लिए कोई रजिस्टर्ड कॉपीराइट सोसायटी नहीं थी, और यही अनुपस्थिति इस बात का मुख्य कारण थी कि रॉयल्टी का ढांचा इतने समय तक प्रभावी नहीं हो सका.”

भारत में SRAI को अब उन कंपनियों से निपटना है जो काम का व्यावसायिक उपयोग करती हैं. इनमें प्रोड्यूसर, ब्रॉडकास्टर, OTT प्लेटफॉर्म और मूवी चैनल आदि शामिल हैं.

पैसा कैसे चलता है

जब इस सिद्धांत को स्वीकार कर लिया जाता है, तो अगला सवाल होता है कि आखिर किस चीज पर रॉयल्टी मिलती है. रंगनाथ ने कहा कि फिल्मों के लिए सीमा बॉक्स ऑफिस तक है. थिएटर में होने वाली कमाई पर स्क्रीनराइटर्स को रॉयल्टी नहीं मिलती. रॉयल्टी का अधिकार तब शुरू होता है जब वही फिल्म सिनेमा हॉल के बाहर इस्तेमाल होती है.

रंगनाथ ने कहा, “कानून के अनुसार बॉक्स ऑफिस से होने वाली कमाई पर रॉयल्टी नहीं मिलती. लेकिन जैसे ही किसी फिल्म का लाइसेंस नेटफ्लिक्स या अमेजन को दिया जाता है, उस लाइसेंस फीस पर SRAI रॉयल्टी ले सकती है.”

यही सिद्धांत तब भी लागू होगा जब कोई फिल्म टीवी पर दिखाई जाए या किसी स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर दिखाई जाए. टीवी और OTT शोज अलग तरीके से इस सिस्टम में आते हैं क्योंकि वे शुरू से ही प्रसारण या स्ट्रीमिंग के लिए बनाए जाते हैं. वहां SRAI का काम कमाई, इस्तेमाल और क्रेडिट को आपस में जोड़ना होता है.

अगर कोई ब्रॉडकास्टर, प्लेटफॉर्म या दूसरा उपयोगकर्ता SRAI को रॉयल्टी का एक फंड देता है, तो सोसायटी को उस रकम को हर फिल्म या शो के हिसाब से बांटना होता है. इसके लिए उसे:

  • जिस फिल्म या शो का इस्तेमाल हुआ है उसकी पहचान करनी होगी.
  • क्रेडिट में दिए गए स्टोरी, स्क्रीनप्ले और डायलॉग लेखकों की पुष्टि करनी होगी.
  • यह तय करना होगा कि वे लेखक SRAI के सदस्य हैं या नहीं.
  • अगर किसी लेखक की मृत्यु हो चुकी है, तो यह देखना होगा कि उसका कानूनी वारिस सोसायटी का सदस्य बना है या नहीं.

टीवी चैनलों के लिए गणना विज्ञापन से होने वाली कमाई और टेलीविजन रेटिंग पॉइंट्स के आधार पर होगी. स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के लिए यह व्यूअरशिप डेटा पर निर्भर करेगी. जितना ज्यादा और सटीक डेटा होगा, SRAI उतनी ही सही तरीके से रॉयल्टी बांट सकेगी.

रंगनाथ ने कहा, “व्यूअरशिप डेटा के आधार पर हमने एक फॉर्मूला बनाया है, जिससे फिल्म या OTT शो को कितने लोगों ने देखा, उसके हिसाब से पैसा बांटा जाता है.”

विदेश से मिलने वाली रॉयल्टी अलग रास्ते से आती है. SRAI ने फ्रांस, इटली, ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड, चिली, उरुग्वे, अर्जेंटीना और दक्षिण कोरिया सहित 10 विदेशी कॉपीराइट सोसायटी के साथ द्विपक्षीय समझौते किए हैं. ये सोसायटी अपने-अपने देशों में रॉयल्टी इकट्ठा कर सकती हैं या उसकी पहचान कर सकती हैं और फिर उसे SRAI को भेज सकती हैं. इसके बाद भारतीय सोसायटी वही पैसा केवल उन लेखकों या उनके कानूनी वारिसों को दे सकती है जो उसके सदस्य हैं.

यही वह सिस्टम है जिसे SRAI बनाने की कोशिश कर रही है. लाइसेंस, हर टाइटल का डेटा, सही क्रेडिट, सदस्यता का रिकॉर्ड और रॉयल्टी का वितरण. लेकिन भारत में मिलने वाली रॉयल्टी के लिए यह सिस्टम तब तक शुरू नहीं हो सकता जब तक भारतीय उपयोगकर्ता इसमें पैसा देने के लिए तैयार न हों. यहीं SRAI को विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

इंडस्ट्री को अभी भी बातचीत करनी होगी

भारत ऐसे सिस्टम को अपनाने में देर कर चुका है, जो दूसरे देशों में अलग-अलग रूप में पहले से मौजूद है. अमेरिका में राइटर्स गिल्ड ऑफ अमेरिका का रेजिडुअल्स सिस्टम उन लेखकों को भुगतान करता है जिनका काम दोबारा इस्तेमाल होता है. फ्रांस में 1777 में बनी सोसाइटी दे ऑथर्स ए कॉम्पोजिटर्स ड्रामाटिक्स नाम की संस्था लेखकों और निर्देशकों का प्रतिनिधित्व करती है. इंटरनेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ सोसायटीज ऑफ ऑथर्स एंड कंपोजर्स के अनुसार उरुग्वे, चिली और कोलंबिया जैसे देशों ने स्क्रीनराइटर्स और निर्देशकों सहित ऑडियोविजुअल क्रिएटर्स के लिए भुगतान के अधिकार को मान्यता दी है.

भारत में लड़ाई की शुरुआत इस बात से होती है कि उपयोगकर्ता बातचीत करने के लिए तैयार हों.

Anjum Rajabali, chairperson of SRAI | Photo: By special arrangement
अंजुम राजाबली, SRAI के अध्यक्ष | फोटो: विशेष व्यवस्था

SRAI के चेयरपर्सन अंजुम राजाबली ने इस विरोध की तुलना उन देशों से की है जहां दुनिया की बड़ी स्ट्रीमिंग कंपनियां पहले से लेखकों को भुगतान करती हैं. 2025 में उन्होंने भारतीय स्क्रीनराइटर्स के साथ अलग व्यवहार को “आज के दौर का उपनिवेशवाद” कहा था. उन्होंने कहा कि जो वैश्विक कंपनियां दूसरे देशों में रॉयल्टी देती हैं, उन्होंने भारत में भी यही व्यवस्था लागू करने की SRAI की मांग का जवाब नहीं दिया.

उन्होंने कहा, “अगर उन्हें ये अधिकार मिल सकते हैं, तो हमें भी मिलने चाहिए. वही कंपनियां जो वहां कानून के अनुसार उन्हें रेजिडुअल्स देती हैं, यहां कानून के अनुसार हमें रॉयल्टी देने का विरोध कर रही हैं.”

रंगनाथ के अनुसार भारतीय उपयोगकर्ताओं का विरोध किसी नए खर्च को स्वीकार करने वाले सिस्टम में सामान्य बात है. उन्होंने कहा कि SRAI द्वारा जारी टैरिफ अंतिम दर नहीं है. यह सिर्फ बातचीत की शुरुआत है.

SRAI ने जुलाई 2025 में जियोहॉटस्टार से संपर्क किया और सितंबर 2025 में सोनी के प्रतिनिधियों से मुलाकात की. उनके अनुसार अभी तक किसी भी कंपनी ने SRAI के साथ रॉयल्टी पर बातचीत शुरू करने की सहमति नहीं दी है.

दिप्रिंट ने रंगनाथ के दावे की स्वतंत्र पुष्टि के लिए सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स इंडिया और जियोहॉटस्टार से संपर्क किया. खबर प्रकाशित होने तक कोई जवाब नहीं मिला था.

रंगनाथ ने कहा, “हम उनकी बात सुनने के लिए तैयार हैं. हम अपना पक्ष भी रखेंगे. हम समझदार लोग हैं और वे भी. हम हमेशा किसी साझा रास्ते पर पहुंच सकते हैं.”

लेकिन इसके लिए जरूरी है कि उपयोगकर्ता SRAI के साथ बातचीत की मेज पर बैठें.

“जो फिल्में ज्यादा सफल नहीं होतीं, उनसे भी कुछ न कुछ पैसा आता रहेगा. लेकिन जो फिल्में बहुत सफल होती हैं, उनमें सभी जुड़े लोगों को बड़ा फायदा होता है. फिर लेखक को उसका हिस्सा क्यों नहीं मिलना चाहिए.”

— आर. बाल्की, SRAI बोर्ड के सदस्य, लेखक-निर्देशक और फिल्म निर्माता 

अगर बातचीत सफल नहीं होती, तब भी कानून उपयोगकर्ताओं को टैरिफ को चुनौती देने का अधिकार देता है. अनामिका झा ने कहा कि कॉपीराइट एक्ट के अनुसार अगर किसी उपयोगकर्ता को रेट उचित नहीं लगता, तो वह कमर्शियल कोर्ट में इसकी समीक्षा की मांग कर सकता है.

उन्होंने कहा, “महत्वपूर्ण बात यह है कि कानून किसी उपयोगकर्ता को सिर्फ इसलिए भुगतान रोकने की अनुमति नहीं देता क्योंकि विवाद शुरू हो गया है. जब तक मामला चल रहा हो, तब भी रॉयल्टी का भुगतान जारी रखना होगा.”

झा ने कहा कि अगर कोई उपयोगकर्ता लाइसेंस लेने या रॉयल्टी देने से पूरी तरह इनकार करता है, तो SRAI कॉपीराइट एक्ट के तहत कानूनी कार्रवाई कर सकती है, जिसमें उल्लंघन का मामला, रोक लगाने का आदेश और हर्जाना मांगना शामिल है.

हालांकि उपयोगकर्ताओं ने अभी तक बातचीत शुरू नहीं की है, लेकिन उनकी झिझक का कारण समझना मुश्किल नहीं है. SRAI की मांग कारोबार करने की लागत बदल देती है. लेकिन लेखकों के लिए पहली रॉयल्टी सिर्फ पैसे का मामला नहीं है.

यह सिर्फ पैसे की बात नहीं है

लेखक-निर्देशक और SRAI बोर्ड के निदेशक विजय कृष्ण आचार्य को पहली रॉयल्टी भारत से नहीं मिली थी. कई साल पहले ब्रिटेन की एक संस्था ने उनसे संपर्क किया क्योंकि उसने उनकी फिल्म गुरु, जिसे उन्होंने लिखा था और जो 2007 में मणिरत्नम की फिल्म थी, के जर्मन टीवी पर प्रसारण के लिए उनके नाम 257 पाउंड जमा किए थे. रकम ज्यादा नहीं थी, लेकिन उसका महत्व बहुत बड़ा था.

आचार्य के लिए यह इस बात का सबूत था कि कहीं न कहीं एक ऐसा सिस्टम मौजूद था जिसने फिल्म को उसके लेखक तक पहुंचाया.

उन्होंने कहा, “जब भी वह फिल्म देखी जाएगी, और फिल्मों के अधिकार हर पांच साल, तीन साल या दस साल में फिर से बेचे जाते हैं, तो लेखक को इससे बाहर क्यों रखा जाए?”

Vijay Krishna Acharya, board director at SRAI | Photo: SRAI website
विजय कृष्ण आचार्य, SRAI के बोर्ड निदेशक | फोटो: SRAI वेबसाइट

उन्होंने स्क्रीनराइटर्स की एक और ऐसी समस्या की बात की जिसे वे अच्छी तरह जानते हैं. उन्हें पता होता है कि किस सीन पर दर्शकों ने तालियां बजाईं या कौन-सा डायलॉग लोगों को याद रह गया. लेकिन इंडस्ट्री उस याद को आर्थिक अधिकार नहीं मानती.

SRAI बोर्ड के निदेशक, लेखक-निर्देशक और फिल्म निर्माता आर. बाल्की ने इसे रचनात्मक अधिकार का मामला बताया. उन्होंने कहा कि जब किसी लेखक का काम अलग-अलग माध्यमों और कमाई के स्रोतों में इस्तेमाल होता है, तो लेखक को भी “उसमें से थोड़ा-बहुत, चाहे जितना छोटा हिस्सा हो, मिलना चाहिए.” उनके अनुसार पूरी दुनिया में रचनात्मक काम के लिए यही व्यवस्था है, इसलिए मनोरंजन उद्योग अलग नहीं होना चाहिए.

उन्होंने कहा, “जो फिल्में ज्यादा सफल नहीं होतीं, उनसे भी कुछ न कुछ पैसा आता रहेगा. लेकिन जो फिल्में बहुत सफल होती हैं, उनमें सभी जुड़े लोगों को बड़ा फायदा होता है. फिर लेखक को उसका हिस्सा क्यों नहीं मिलना चाहिए?”

‘स्वाभिमान’ से SRAI तक

यही सिद्धांत है जिसकी वजह से SRAI में रंगनाथ का काम उनके लिए निजी मायने रखता है. आज वह लेखकों से मेंबरशिप फॉर्म भरवाने और कंपनियों को बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन इससे पहले वह खुद एक लेखक थे, जिन्होंने भारतीय टेलीविजन को बदलते हुए देखा.

रंगनाथ जनवरी 1993 में, दूरदर्शन के दौर में, पूरे समय के लेखक बने. दो साल बाद वह स्वाभिमान लिख रहे थे. यह शो 1995 में प्रसारित हुआ, इसके सैकड़ों एपिसोड बने, और आज भी यही काम उनके नाम से सबसे ज्यादा जुड़ा हुआ है.

उन्होंने कहा, “मैंने और भी कई मशहूर और हिट शो लिखे हैं, और आठ फिल्में भी लिखी हैं. लेकिन किसी तरह स्वाभिमान के लेखक का टैग आज भी मेरे साथ जुड़ा हुआ है.”

Vinod Ranganath (first row, extreme right), Mahesh Bhatt (first row, second from left), outside the set of 'Swabhimaan' with the cast and crew | Photo: Vinod Ranganath
स्वाभिमान के सेट के बाहर विनोद रंगनाथ (पहली पंक्ति में सबसे दाएं), महेश भट्ट (पहली पंक्ति में बाएं से दूसरे), कलाकारों और टीम के साथ. | फोटो: विनोद रंगनाथ
A still from 'Swabhimaan', for which Ranganath wrote 800 episodes | Photo: YouTube
स्वाभिमान का एक दृश्य, जिसके 800 एपिसोड रंगनाथ ने लिखे. | फोटो: यूट्यूब

इस पहचान के पीछे बहुत कठिन मेहनत थी. रंगनाथ ने कहा कि उन्होंने स्वाभिमान के 800 एपिसोड और इतिहास (1996), जो एकता कपूर का शुरुआती दूरदर्शन शो था, उसके पहले 200 एपिसोड लिखे. उन्होंने बिना किसी सहायक या राइटर्स रूम के काम किया. 1995 में वह कंप्यूटर खरीदने की स्थिति में नहीं थे, इसलिए हाथ से लिखते थे. इन धारावाहिकों के अलावा उन्होंने किट्टी पार्टी (2002), जस्सी जैसी कोई नहीं (2003), सरकार (2005), और कितू सब जानती है (2005) भी लिखे.

वह समय ऐसा था जब टीवी के लिए लिखना लोगों तक सीधे पहुंचता था. स्वाभिमान देखने वाली कई महिलाओं ने उन्हें चिट्ठियां लिखीं कि इस शो ने उन्हें मजबूत महसूस कराया. उनके काम की पहुंच थी, लोग उसे याद रखते थे और उसका समाज पर असर था.

लेकिन लोगों तक पहुंचने का मतलब आर्थिक सुरक्षा नहीं था. 2000 के शुरुआती वर्षों तक लेखकों को ज्यादातर समय पर भुगतान मिल जाता था. इसके बाद निजी चैनलों का विस्तार हुआ, कार्यक्रमों की संख्या बढ़ी और टीवी एक बड़े पैमाने का कारोबार बन गया, जहां भुगतान में ज्यादा समय लगने लगा और प्रक्रिया जटिल हो गई. रंगनाथ ने कहा कि जहां भी संभव हुआ, उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट, भुगतान की शर्तें और अपना क्रेडिट तय करवाया. लेकिन फिर भी इस पेशे में भुगतान में देरी, क्रेडिट को लेकर अनिश्चितता और अपने ही पैसे के लिए बार-बार याद दिलाने की परेशानी बनी रही.

उन्होंने कहा, “इतनी मेहनत करने के बाद जब अकाउंटेंट मेरा फोन तक नहीं उठाता, तो यह बहुत अपमानजनक लगता है. मुझे अपने ही पैसे के लिए क्यों गिड़गिड़ाना पड़े?”

यह सवाल उनके मन में बना रहा. 2008 में, जब अंजुम राजाबली से जुड़े प्रगतिशील लेखकों के समूह ने SWA का चुनाव जीता, तब रंगनाथ विवाद निपटान समिति का हिस्सा बने. 2019 तक उन्होंने इस समिति का काम संभाला, जहां वह क्रेडिट, कॉपीराइट उल्लंघन और भुगतान से जुड़े विवाद सुलझाते रहे.

उस समय विवाद रॉयल्टी को लेकर नहीं थे. लेकिन असली समस्या वही थी. एक लेखक क्या साबित कर सकता है, वह किस बात का दावा कर सकता है, और जब उसका काम उसके हाथ से निकल जाता है तो उसका दावा कितना कमजोर हो जाता है.

SWA में शिकायतें तब आती थीं जब नुकसान पहले ही हो चुका होता था. किसी लेखक को क्रेडिट नहीं मिला होता था. भुगतान नहीं आया होता था. कोई निर्माता या चैनल जवाब देना बंद कर देता था. एसोसिएशन केवल बीच-बचाव कर सकती थी, पत्र लिख सकती थी और दबाव बना सकती थी. लेकिन लेखक फिर भी बाहर से ही लड़ रहा होता था.

SRAI ने रंगनाथ को एक अलग साधन दिया है. एक कॉपीराइट सोसायटी के रूप में इसका उद्देश्य यह है कि जब किसी लेखक का काम दोबारा इस्तेमाल हो, तो उसका रॉयल्टी का अधिकार कॉपीराइट के जरिए बना रहे. इसका वादा यह नहीं है कि हर चेक बहुत बड़ा होगा. इसका वादा यह है कि पहला कॉन्ट्रैक्ट, पहला भुगतान या पहला प्रसारण होने के बाद भी लेखक का अधिकार खत्म नहीं होगा.

इसी वजह से चिली से आया चेक उनके लिए इतना महत्वपूर्ण है. उस सूची में मेरा नाम जोकर (1970), गोल माल (1979), लावारिस (1981) और पार (1984) जैसी कई दशक पुरानी फिल्में शामिल हैं. अब ये भारतीय स्क्रीनराइटर्स के लिए आने वाली पहली अंतरराष्ट्रीय रॉयल्टी का हिस्सा हैं. यह सिर्फ दूसरे देश से आया पैसा नहीं है. यह पहली बार साबित करता है कि जिस सिस्टम को रंगनाथ बनाने की कोशिश कर रहे हैं, वह लेखक को उसके बनाए हुए काम की आगे की आर्थिक कमाई में भी हिस्सेदार बना सकता है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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