कुलगाम: 1994 में इस गांव में आधी रात को जल्दबाजी और चुपचाप दो लोगों को दफन किया गया, कश्मीर की हिंसा की एक अनकही, अनस्वीकृत और बिना शोक मनाई गई कहानी छुपाए हुए हैं.
इस दक्षिण कश्मीर के कुलगाम जिले के गांव में दो घरों के आंगन में बनी कब्रों पर अब घास उग आई है. और इसके साथ ही वहां एक चुप्पी की चादर भी बिछ गई है. दो युवा—अली मोहम्मद भट और मोहम्मद मकबूल भट, जिन्हें ‘मुखबिर’ होने के आरोप में मार दिया गया—उन्हें गांव के आम कब्रिस्तान में जगह नहीं दी गई.
अगले बत्तीस सालों में उनकी बिना निशान वाली कब्रों पर न कोई रस्म हुई और न ही सामूहिक शोक मनाया गया. न कोई शहादत मार्च हुआ और न ही उनकी कहानियां सुनाई गईं. उन्हें कश्मीरी आजादी के मकसद का दुश्मन और हिज्बुल मुजाहिदीन का दुश्मन माना गया. उनकी कहानियां कश्मीर के आधिकारिक दुख का हिस्सा नहीं हैं.
19 जून 1994 को 26 साल के अली, जो पुलिस कांस्टेबल थे, रोज की तरह बस से काम पर जा रहे थे. तभी चार हथियारबंद हिज्बुल मुजाहिदीन आतंकियों ने बस रोक ली, उन्हें बाहर खींचा और अगवा कर लिया. एक हफ्ते बाद, गोली लगे दो शव सड़क के बीच में फेंक दिए गए—अली और उनके दोस्त मकबूल, जो एक दुकानदार थे.
अली को ‘मुखबिर’ होने के शक में मारा गया, जबकि मकबूल पर आरोप था कि वह अपनी दुकान से सेना को कालीन सप्लाई करता था. बाद में पता चला कि यह आरोप गलत था.
उनके सबसे छोटे भाई, जो 1994 में छठी कक्षा में पढ़ते थे, ने कहा, “एक हिज्बुल मुजाहिदीन आतंकी ने खुद हमें बताया कि मेरा भाई मुखबिर नहीं था, लेकिन उन्हें आदेश मिले थे.” उन्होंने कहा, “ये आदेश ज्यादातर हमारे गांव के जमात-ए-इस्लामी नेताओं से आते थे.”
तीन दशक बाद भी यह कलंक बरकरार है. अली के परिवार को मोहल्ले में भेदभाव का सामना करना पड़ता है और उनका कहना है कि जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने भी उदासीनता दिखाई. अली की पत्नी ने पहले जिला प्रशासन से किसी तरह के मुआवजे के लिए संपर्क किया था. लेकिन उन्हें कभी कोई जवाब नहीं मिला.
श्रीनगर के एक राजनीतिक विश्लेषक ने गुमनाम रहने की शर्त पर दिप्रिंट से कहा, “उस समय सरकारी योजनाएं पूरी तरह लागू नहीं हो पाती थीं क्योंकि सिस्टम में भ्रष्टाचार और अक्षमता थी.” उन्होंने कहा, “कभी-कभी इन योजनाओं में आतंकियों के परिवारों को पीड़ितों से ज्यादा तरजीह दी जाती थी. यह एक अजीब विडंबना थी.”
एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने दिप्रिंट से कहा, “उस समय कश्मीरी मुस्लिम होना सबसे पहले आता था, यहां तक कि वर्दी से भी पहले.” उन्होंने कहा, “जमात के सदस्य भी सरकारी कर्मचारी थे. कुछ शिक्षक थे, तो कुछ पीडब्ल्यूडी और अन्य विभागों में काम करते थे. उन पर शक नहीं किया जाता था क्योंकि वे खुद को पहले कश्मीरी मुस्लिम मानते थे.”
अतीत को दफना दिया गया है, बिल्कुल उन शवों की तरह, ताकि सामान्य स्थिति बनी रहे. लेकिन यह परिवार की खामोशी में और आंगन की खाली नजरों में आज भी मौजूद है.
एक खामोश दफन
उस दिन एक पड़ोसी ने हिज्बुल मुजाहिदीन आतंकियों को अली के बारे में जानकारी दी थी. लगभग एक हफ्ते की कैद के बाद आतंकियों ने दोनों को छोड़ दिया. जैसे ही अली और मकबूल कुछ मीटर चले, उन्हें पीछे से सिर में गोली मार दी गई.
इसके बाद दफन का सिलसिला शुरू हुआ.
अली और मकबूल के शवों को गांव के कब्रिस्तान में दफनाने की अनुमति नहीं दी गई. जमात के नेताओं ने लाउडस्पीकर से घोषणा की कि कोई भी उन्हें कफन न दे. परिवार ने बहुत विनती की कि उन्हें गांव के कब्रिस्तान में दफनाने दिया जाए, लेकिन उनकी कोई बात नहीं मानी गई.
मस्जिद के लाउडस्पीकर से ऐलान हुआ, “कोई भी इस परिवार से बात नहीं करेगा, न चाय पिएगा और न ही कोई संबंध रखेगा. कोई उन्हें कफन नहीं देगा और कब्रिस्तान के दरवाजे इस परिवार के लिए बंद हैं.”
अली का परिवार घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं कर पाया. वे अपने घरों के अंदर ही चुप रहे—एक ऐसी चुप्पी जिसमें उम्मीद भी थी और गहरा दुख भी छुपा था.
अली की मां ने कहा, “कई दिनों तक मुझे समझ नहीं आया कि हमारे परिवार के साथ क्या हुआ. हमें समाज से अलग कर दिया गया, जैसे हम यहां के ही नहीं हैं. हम घर के अंदर धीरे-धीरे चलते और धीमी आवाज में बात करते थे ताकि कोई और परेशानी न हो.”

अली मोहम्मद भट की मां अब 80 साल की हैं. बेटे की हत्या के तीन दशक बाद भी वह डर के कारण मीडिया के सामने अपना चेहरा दिखाने से इनकार करती हैं.
उनके दुखी परिवार ने गांव वालों से बार-बार गुहार लगाई, लेकिन आखिरकार हार मान ली. उन्होंने अपने आंगन में कब्र खोदी, चुपचाप कफन का इंतजाम किया और बिना जनाजा नमाज के उन्हें दफना दिया. कोई पड़ोसी या रिश्तेदार नहीं आया.
उस समय दक्षिण कश्मीर आतंकवाद का गढ़ था और अब प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी का समाज पर गहरा असर था. वही अंतिम फैसला लेते थे और अली और मकबूल के मामले में उनका प्रभाव बहुत बड़ा था.
जैसे ही हिज्बुल मुजाहिदीन बना, जमात ने नियंत्रण संभाल लिया. एक संगठन आतंकी था और दूसरा सामाजिक-धार्मिक समूह के रूप में सामने आता था, जो अक्सर सरकारी कामों में भी शामिल रहता था.
पुलिस अधिकारी ने कहा, “हिज्बुल मुजाहिदीन जमात की सैन्य शाखा थी, इसलिए नियंत्रण स्वाभाविक था. इसके ज्यादातर सदस्य और कमांडर जमात-ए-इस्लामी से थे, जैसे अहसान डार, सैयद सलाहुद्दीन, शम्स-उल-हक, रियाज रसूल आदि.” उन्होंने कहा कि इस संगठन का हर मुख्य कमांडर जमात से जुड़ा रहा है.
27 जून 1994 को अली के घर के आंगन में दुख का माहौल था. आधी रात में दफन के लिए जमीन खोदी गई. परिवार और रिश्तेदारों ने अपनी चीखों को दबा लिया ताकि उनकी आवाज बाहर न जाए. उनकी आंखों से आंसू चुपचाप बहते रहे.
कफन, जिसे एक रिश्तेदार ने चुपचाप लाया था, शव पर लपेटा गया. मां और पत्नी ने आखिरी बार उसके पीले पड़े माथे को चूमा. फिर शव को जल्दी से गड्ढे में उतार दिया गया. आखिरत के लिए दुआ धीरे-धीरे पढ़ी गई और कब्र को मिट्टी से भर दिया गया.
अगली सुबह, आंगन में शव गायब थे और वहां कोई निशान या कब्र का पत्थर नहीं था.
‘17,000 मुसलमानों को आतंकियों ने मारा’
विद्रोह के शुरुआती सालों में सिर्फ कश्मीरी पंडित ही नहीं थे जिन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा. कश्मीरी मुसलमानों का एक हिस्सा, जिन्हें राज्य के साथ जुड़ा हुआ माना जाता था, उन्हें भी निशाना बनाया गया. कुछ लोग रातों-रात भाग गए, और जो वहीं रहे, उन्होंने हिंसा, शक और सामाजिक बहिष्कार झेला.
आज भी ऐसे कई परिवारों की कहानियां—जिन्हें आतंकवाद के पीड़ितों में गिना जाता है—बड़ी राजनीतिक कहानी, फिल्मों, किताबों या ऑनलाइन रिकॉर्ड में जगह नहीं पातीं. कोई मानवाधिकार संगठन उनकी बात नहीं उठाता, कोई राजनीतिक पार्टी उनके परिवारों को आवाज नहीं देती. उस समय उन्हें कश्मीर में भारतीय राज्य का चेहरा माना जाता था, जब पाकिस्तान आतंकवाद को समर्थन दे रहा था.
दशकों बाद भी, इनमें से कई परिवार बोलने से डरते हैं, क्योंकि उन्हें फिर से प्रतिक्रिया का डर है. जम्मू-कश्मीर के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि आतंकियों द्वारा मारे गए “गैर-लड़ाकू” मुसलमानों की संख्या 17,000 है.
अधिकारी ने कहा, “भारत के लिए मरने वाले मुसलमान, देश के खिलाफ मरने वालों से ज्यादा थे.”
कश्मीरी पंडितों के पलायन और कश्मीरी मुसलमानों के दुख की बड़ी कहानियों के बीच, इन परिवारों की कहानियां कहीं खो गईं और किनारे कर दी गईं. इन्हें नजरअंदाज किया गया और उनकी बात को महत्व नहीं दिया गया. उनकी कहानियां 1990 और 2000 के शुरुआती सालों के कश्मीरी समाज की जटिलता दिखाती हैं, जहां आतंकी समूह आपस में भी लड़ने लगे थे, पड़ोसी या तो राज्य के साथ थे या आतंकियों के साथ, और गहरा अविश्वास फैल गया था.
पत्रकार और लेखक डेविड देवदास ने कहा, “आतंक का अभियान 1989 में शुरू हुआ था, जब नेशनल कॉन्फ्रेंस और अन्य राजनीतिक दलों के कई नेताओं की हत्या की गई.” उन्होंने कहा, “1992 से 1994 के बीच, कई गांव वालों को तथाकथित अदालतों में निशाना बनाया गया, जिन्हें कट्टरपंथियों ने चलाया और आतंकियों का समर्थन था.”
उन्होंने कहा कि कई कश्मीरी लोगों को ‘मुखबिर’ होने के आरोप में मारा गया और बहुत बुरी तरह यातना दी गई, जबकि अक्सर ये आरोप गलत होते थे.
पिछले साल 22 जुलाई को, उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने आतंकवाद के पीड़ित परिवारों के लिए एक ‘पहली बार’ पोर्टल शुरू किया.
इस पहल का पीड़ित परिवारों ने स्वागत किया, क्योंकि उन्हें लगा कि दशकों की अनदेखी अब खत्म होगी. कुछ ही दिनों में सैकड़ों शिकायतें दर्ज हुईं. इससे पहले इन परिवारों को भुला दिया गया था और उन्हें इस बड़े संघर्ष में कभी आवाज नहीं मिली.
एलजी ने कहा, “यह पहल राहत देने, सहानुभूति के आधार पर नौकरी देने और अन्य सहायता की प्रक्रिया को आसान और तेज बनाएगी.”
जम्मू-कश्मीर सरकार आतंकवाद के पीड़ितों के परिवारों को आर्थिक मदद देने के लिए SRO-43 और पुनर्वास योजना के तहत उनके परिजनों को सरकारी नौकरी देती रही है. मार्च में, सिन्हा ने ऐसे 27 लोगों को नियुक्ति पत्र दिए. लेकिन अली का बेटा, जो उसकी मौत के कुछ महीनों बाद पैदा हुआ था, उस सूची में शामिल नहीं था.
अली के छोटे भाई ने कहा, “हमने कई बार SRO में आवेदन किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. हमारे परिवारों ने सबसे ज्यादा सहा है और अभी भी सह रहे हैं. हम सिर्फ बंदूक के नहीं, बल्कि कट्टर इस्लाम के भी शिकार थे. आज भी झगड़ों में हमारा अतीत उठाकर हमें अलग किया जाता है.”
यह शांत गांव, जहां घरों के बीच से पानी बहता है और बगीचों में भेड़ें चरती हैं, अपने अतीत को ऐसे छुपाए हुए है जैसे कुछ हुआ ही नहीं. यह इलाके की एक लोकप्रिय जगह है और पहले आतंकियों के समर्थन और गतिविधियों के लिए बदनाम थी. गांव के लड़के करीब 150 किलोमीटर दूर कुपवाड़ा के रास्ते पाकिस्तान जाते थे और वहां मुजाहिद बनकर ट्रेनिंग लेते थे. जमात के समर्थन से ये आतंकी गांव पर अपना नियंत्रण रखते थे.
दूसरे गांवों के लोगों के अनुसार, आतंकी बिना बताए घरों में आ जाते थे, जहां लोगों को उन्हें खाना देना पड़ता था और वे कभी-कभी रात भर रुकते थे.
एक स्थानीय व्यक्ति ने कहा, “उन्हें जो समर्थन मिलता था, वह ज्यादातर डर की वजह से होता था, इच्छा से नहीं.”
अली का आखिरी खत
आतंकियों और सुरक्षा बलों के बीच मुठभेड़ के बाद अली चर्चा में आ गया. मुठभेड़ के बाद सेना ने आतंकियों के शव, जो कथित तौर पर पाकिस्तान से थे, गांव में घसीटे. सैनिक पूछ रहे थे कि क्या कोई उन्हें पहचानता है. जब किसी ने जवाब नहीं दिया, तो उन्होंने अली की ओर देखा.
अली की मां ने कहा, “सेना ने अली से कहा कि वह पुलिस में है, इसलिए उसे पता लगाना चाहिए कि इन पाकिस्तानी आतंकियों की मदद कौन कर रहा है.” उन्होंने कहा, “उसने कुछ नहीं बताया, लेकिन उसी पल से वह सबकी नजर में आ गया.”
80 साल की मां के हाथ मेहनत से सख्त और फटे हुए थे. घर के काम से लेकर खेतों में काम तक, उन्होंने सब किया था.
लंबा, अच्छे कपड़े पहनने वाला और ब्रांडेड जूते पसंद करने वाला अली नहीं जानता था कि यह घटना उसकी किस्मत तय कर देगी. कुछ दिनों बाद उसका अपहरण हो गया. उसकी मां एक से दूसरे जमात नेता के पास गई, बेटे की बेगुनाही की कसम खाई और उसे छोड़ने की गुहार लगाई.
उन्होंने कहा, “मैंने अपनी शॉल उनके पैरों में रख दी और कहा कि मेरा बेटा निर्दोष है. वह सिर्फ पुलिस में होने की वजह से गलत समझा जा रहा है.” उन्होंने कहा, “हर बार उन्होंने मुझे वापस भेज दिया और कहा कि वह ठीक रहेगा.”
उन्होंने कहा कि गांव में कई जमात सदस्य थे और सरकारी कर्मचारी होने के बावजूद उनसे कभी सवाल नहीं किया गया.
एक और स्थानीय व्यक्ति ने कहा कि अली की गलती सिर्फ इतनी थी कि उसने आतंकियों का साथ नहीं दिया. उसने कहा, “जो लोग उनके साथ थे, उन्हें कुछ नहीं कहा गया, भले ही वे सरकार में काम करते थे. अली ने ऐसा नहीं किया.”
मारे जाने से पहले अली ने अपने परिवार को एक खत लिखा था, जिसमें खास तौर पर अपने भाइयों का जिक्र किया. “मेरे भाइयों को नए कपड़े या जूते मत पहनाना. पड़ोसी जलते हैं.” उस समय उसका छोटा भाई 11 साल का था. आज भी उसे नए कपड़े पहनना पसंद नहीं है.
अली की मौत के कुछ दिनों बाद उसका शव गांव में तनाव का कारण बन गया.
लगातार धमकियां और सामाजिक बहिष्कार
शव मिलने के बाद परिवार ने उसे घर के एकमात्र बिस्तर पर रखा. जल्द ही भीड़ ने घर को घेर लिया, खिड़कियां तोड़ीं और गेट पर पत्थर मारे, गालियां दीं और शव मांगने लगे.
अली के मंझले भाई ने कहा, “हमें शोक मनाने तक नहीं दिया गया. भीड़ का नेतृत्व गांव के जमात सदस्य कर रहे थे. वे बहुत आक्रामक थे. हमारे चाचा और रिश्तेदारों ने उन्हें रोका.”
सामाजिक बहिष्कार और बढ़ गया. अली के छोटे भाइयों को लगातार परेशान किया गया.
उन्होंने कहा, “हमें मुखबिर कहा जाता था. कोई हमसे बात नहीं करता था. मैं स्कूल जाते समय रोता था. स्कूल न जाने के बहाने ढूंढता था.”
अली के पिता, जो कसाई थे, को आतंकियों से काम बंद करने की धमकियां मिलने लगीं, क्योंकि कोई ‘मुखबिर’ के परिवार से मांस नहीं खरीदना चाहता था. जब उनका बेटा पैसे लेने गया, तो उसे भगा दिया गया और काम बंद करने को कहा गया. जल्द ही परिवार को हिज्बुल मुजाहिदीन की तरफ से दुकान बंद करने के खत मिलने लगे.
मंझले भाई ने कहा, “हमारे पास कमाई का कोई और जरिया नहीं था. हम खतों को नजरअंदाज करते रहे, जब तक एक ऐसा खत नहीं आया जिसने हमें हिला दिया.” उसमें लिखा था कि अगर उन्होंने बात नहीं मानी, तो उनके दूसरे बेटे को उठा लिया जाएगा.

और फिर बेटों को उठा लिया गया और घर में आग लगा दी गई. इसके बाद ही परिवार ने अधिकारियों से मदद मांगी, जिसके बाद जमात नेताओं के घर भी जला दिए गए. बेटे आतंकियों की पकड़ से भाग निकले और सेना ने उन्हें एक खाली पड़े कश्मीरी पंडित के घर में रखा.
अली की मां ने कहा, “हम उस घर में एक साल रहे. अपने घर से हम कुछ भी नहीं निकाल पाए, सिर्फ एक फोटो एल्बम.” उस एल्बम की एक फीकी तस्वीर आज भी फ्रेम में है, जिसमें अली दूल्हे के रूप में अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ है. अली की पत्नी गांव छोड़कर अपने मायके चली गई.
उन्होंने कहा, “उसने कहा कि वह उसी आंगन में नहीं रह सकती जहां उसके पति की कब्र है.” उसने दोबारा शादी नहीं की और अपने बच्चों को पालने में ही जिंदगी लगा दी. वह अतीत के बारे में बहुत कम बात करती है.
उसके भाई ने कहा, “उसने सब कुछ अपने दिल के सबसे गहरे हिस्से में दफना दिया है.” एक भाई बाद में गांव का पहला फौजी बना. दूसरा भाई इखवान में शामिल हुआ, जो 1990 के दशक में सरकार समर्थक मिलिशिया थी, जिसमें ज्यादातर सरेंडर किए हुए आतंकी थे. यह 1994 में बना था, जब स्थानीय आतंकियों को हिज्बुल मुजाहिदीन ने किनारे कर दिया था, जिसे पाकिस्तान का समर्थन था.
मकबूल का परिवार भी गांव छोड़कर चला गया और चुप्पी अपना ली.
सालों बाद पुलिस ने बताया कि अली मुखबिर नहीं था. परिवार वापस गांव लौटा और उसी जमीन पर घर बनाया जहां पहले घर जला दिया गया था. नया घर बना, लेकिन पुराने जख्म वहीं रह गए. 1998 में एक कमरे से शुरू हुआ यह घर 2010 तक दो मंजिला इमारत बन गया.
‘जमात के निशान’
अली की मां आज भी अपने बेटे के बारे में खुलकर बात नहीं करतीं. उसकी पुण्यतिथि घर के अंदर ही मनाई जाती है. उन्हें सबसे ज्यादा दर्द इस बात का है कि उसकी कब्र घर के सामने ही है, लेकिन वे वहां जाकर शोक नहीं मना सकते.
हालांकि जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध है, लेकिन परिवार का कहना है कि उसकी सोच के निशान आज भी मौजूद हैं.
उसका भाई कहता है, “हम कभी-कभी चुप बैठकर सोचते हैं कि हमने ऐसा क्या किया था जो हमारे साथ यह हुआ. फिर मैं अपने भाई के बारे में सोचता हूं. वह आज कितना बड़ा होता, उसकी जिंदगी कैसी होती…” और उसकी बात चुप्पी में खत्म हो जाती है.
ड्राइंग रूम के एक कोने में, फीकी हरी दीवारों के बीच, 80 साल की मां फोटो फ्रेम में बेटे के चेहरे को छूती हैं और कांच पर अपने होंठ रखती हैं, उनकी आंखों से आंसू बहता है.
कमरे में अली की कोई फोटो खुलकर नहीं रखी है. उसे एक संदूक में छुपाकर रखा गया है. एक कोने में कंबलों का ढेर लगा है. कालीन पर, एक खिड़की के पास जो छोटे से सब्जी के बगीचे की तरफ खुलती है, अली का छोटा भाई बैठा है, अपने हाथों से खेलते हुए. वह कहता है, “मुझे उसकी याद आती है.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
यह भी पढ़ें: ‘नारी को नारा बनाना चाहती है बीजेपी’: महिला आरक्षण कानून पर लोकसभा में मोदी सरकार पर अखिलेश का हमला