नोएडा: पिछले दो महीनों से सेक्टर 50 स्थित महागुन मेपल सोसाइटी दो गुटों में बंट गई है—एक वे जो सोसाइटी के कॉमन एरिया में मंदिर निर्माण का समर्थन कर रहे हैं, और दूसरे वे जो इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं.
विवाद का केंद्र सोसाइटी पार्क के पास स्थित खुला आंगन है. कभी यह जगह समुदाय की आत्मा हुआ करती थी—जहां बच्चे शाम तक खेलते थे, जहां लोग बैठकर बातचीत करते थे, और जहां छोटे-छोटे समारोह खुले आसमान के नीचे होते थे. आज वही स्थान मंदिर के मुद्दे पर सोसाइटी और आरडब्ल्यूए (RWA) को बांट रहा है.
नोएडा, गुरुग्राम और गाजियाबाद जैसे दिल्ली-एनसीआर के इलाकों में अब कई आरडब्ल्यूए एक नए और संवेदनशील विवाद का सामना कर रहे हैं—क्या सोसाइटी में मंदिर होना चाहिए या पार्क. छोटा मंदिर बने या बड़ा. क्या अन्य धर्मस्थलों की भी अनुमति होनी चाहिए. क्या मंदिर समिति बनाई जाए और चंदा इकट्ठा किया जाए.
महागुन मेपल के आंगन में अब राधा-कृष्ण की मूर्ति स्थापित है, जिसे फूलों और चढ़ावे से सजाया गया है. फरवरी में कुछ निवासियों ने इस अस्थायी व्यवस्था को एक बड़े और स्थायी मंदिर में बदलने का प्रस्ताव रखा था.
आरडब्ल्यूए की बैठकों में बातचीत जल्द ही टकराव में बदल गई. स्थानीय प्रशासन भी सक्रिय हुआ और नायब तहसीलदार प्रज्ञा शर्मा ने सोसाइटी का दौरा किया.
एक 60 वर्षीय निवासी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “हर हाउसिंग सोसाइटी में मंदिर बनाना हाल की प्रवृत्ति है. अचानक लोग इतने धार्मिक हो गए हैं कि उन्हें अपने परिसर में मंदिर चाहिए. लेकिन इसे धर्म के नाम पर काम करने वाले कट्टर समूहों द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है, और इसमें राजनीतिक समर्थन भी शामिल है.”
गौरतलब है कि 2024 में गुरुग्राम के सेक्टर 50 और 51 की कई सोसाइटियों, जैसे मयफील्ड गार्डन स्थित शीतल एन्क्लेव में, हरियाणा शहरी क्षेत्र विकास एवं विनियमन अधिनियम, 1975 के तहत हरे क्षेत्र में अतिक्रमण कर मंदिर निर्माण को लेकर कारण बताओ नोटिस जारी किए गए थे. हालांकि, सख्त कार्रवाई के मामले सामने नहीं आए हैं.
जिला नगर योजनाकार (प्रवर्तन), गुरुग्राम द्वारा जारी नोटिस में कहा गया, “आपने शीतल एन्क्लेव (मयफील्ड गार्डन), गुरुग्राम में हरे क्षेत्र में मंदिर बनाकर अतिक्रमण किया है.” इसके बावजूद मंदिर अब भी मौजूद है.
कई सोसाइटिज़ में निवासी दो समूहों में बंट गए हैं—एक मंदिर निर्माण के पक्ष में, और दूसरा जो धर्म के खिलाफ नहीं है, लेकिन साझा या मनोरंजन के स्थानों पर अवैध निर्माण का विरोध करता है.
महागुन मेपल के निवासी अमित कुमार सिंह ने कहा, “हम किसी धर्म या मंदिर के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इसे कॉमन एरिया या पार्क में नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि यह बच्चों के खेलने की जगह है—अक्सर यही उनका एकमात्र खुला स्थान होता है.”

कानूनी रूप से यह मामला स्पष्ट है. उत्तर प्रदेश अपार्टमेंट अधिनियम 2010 के अनुसार, “कॉमन एरिया में किसी भी तरह का बदलाव सभी फ्लैट मालिकों की लिखित सहमति और सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के बिना नहीं किया जा सकता.”
कुछ सोसाइटियों में बिल्डर शुरुआत से ही मंदिर को नक्शे में शामिल करते हैं. ऐसे मामलों में आरडब्ल्यूए की भूमिका नहीं होती और निवासियों के पास निर्णय का अधिकार भी नहीं होता. लेकिन जहां एओए (AOA) सक्रिय नहीं है, वहां कुछ निवासी खुद ही निर्माण शुरू कर देते हैं.
मयफील्ड गार्डन, गुरुग्राम के निवासी और अधिवक्ता संजय गुप्ता ने कहा, “सिर्फ इसलिए कि मंदिर घर के पास हो, क्या हमें इतनी संख्या में मंदिरों की जरूरत है? अगर दूरी ही समस्या है, तो अपने घर के अंदर ही मंदिर क्यों नहीं बनाया जाता.”
मयफील्ड गार्डन में मंदिर पहले से बने हुए हैं, लेकिन अब वहां चंदे के उपयोग, आजीवन ट्रस्टी की भूमिका और जवाबदेही, और मंदिर के विस्तार को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
मंदिर से बढ़ता विवाद
महागुन मेपल का विवाद सोसाइटी से निकलकर जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय तक पहुंच गया, जहां मार्च में औपचारिक शिकायतें दर्ज की गईं. बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के सदस्य भी सोसाइटी पहुंचे, जिससे स्थिति और तनावपूर्ण हो गई.
एक निवासी ने कहा, “मंदिर बनाया जा सकता है, लेकिन उस जगह पर जिस पर सभी सहमत हों—ऐसा नहीं कि कहीं मूर्ति रख दी जाए और बाद में उसे मंदिर घोषित कर दिया जाए. अगर अन्य धर्मों के लोग भी ऐसा करने लगें तो क्या होगा.”
दो विकल्प दिए गए, मगर दोनों पक्ष किसी समझौते पर नहीं पहुंच पाए.
एक अन्य निवासी ने कहा, “वे आंगन में ही मंदिर बनाना चाहते हैं, और हम इसके खिलाफ हैं. अब बजरंग दल और अन्य राजनीतिक समूहों के लोग बार-बार आ रहे हैं. ऐसा लगता है कि हम दबाव में जी रहे हैं. अब हम खुलकर अपनी बात भी नहीं रख सकते.”
सोसाइटी प्रबंधन ने इस मुद्दे पर टिप्पणी करने से इनकार किया. अध्यक्ष और मंदिर निर्माण का समर्थन करने वाले कुछ निवासियों ने इसे आंतरिक मामला बताया.
सार्वजनिक स्थानों तक पहुंचा विवाद
इसी तरह का विवाद इस साल की शुरुआत में नोएडा के सेक्टर 15 में भी देखने को मिला, जहां निवासियों ने एक पार्क की नीलामी के प्रस्ताव का विरोध किया. उन्हें आशंका थी कि इस हरे-भरे क्षेत्र को मंदिर में बदला जा सकता है.
फरवरी में पार्क के प्रवेश द्वार पर “धार्मिक उपयोग के लिए प्रस्तावित स्थल” का बोर्ड लगाया गया, जो लगभग 301 वर्ग मीटर क्षेत्र को दर्शाता था.
सेक्टर 15A के सैकड़ों निवासी विरोध के लिए एकत्र हुए. उन्होंने “Let the parks be” लिखी टी-शर्ट पहन रखी थी और पोस्टर लिए हुए थे, जिन पर लिखा था—“प्रिय पेड़ों, हमें ऑक्सीजन के लिए बिल न भेजने के लिए धन्यवाद.”

42 वर्षीय निवासी कल्पना मिश्रा ने कहा, “वे हमारे 40 साल पुराने पार्क को खत्म कर धार्मिक स्थल बना रहे हैं. जमीन की नीलामी की जा रही है.”
मामला अदालत तक पहुंच गया. लगभग 59 निवासियों ने इस योजना के खिलाफ याचिका दायर की. 27 फरवरी को इलाहाबाद हाई कोर्ट की खंडपीठ—न्यायमूर्ति महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति कुणाल रवि सिंह—ने नोएडा प्राधिकरण को सभी संबंधित दस्तावेज अदालत में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया. अगली सुनवाई शुक्रवार को निर्धारित है.
मामले के वकील और निवासी संजय सरीन ने कहा, “हम इस हरित क्षेत्र को बचाने के लिए जितनी जरूरत होगी, उतनी याचिकाएं दायर करेंगे. यह बच्चों और बुजुर्गों के लिए है, इसे किसी और चीज में नहीं बदला जाना चाहिए.”
मंदिर, पैसा और सत्ता
गाजियाबाद की फॉर्च्यून रेजिडेंसी सोसाइटी में 2021 से शिव और दुर्गा मंदिर मौजूद है. यहां मंदिर समिति भी बनी हुई है—जिसमें अध्यक्ष, सचिव और ट्रस्टी शामिल हैं. अब यहां विवाद इस बात को लेकर है कि मंदिर का संचालन कौन करेगा.
हाल ही में मंदिर समिति के लिए चुनाव हुआ, जो केवल मौजूदा सदस्यों और आजीवन सदस्यों के बीच आयोजित किया गया. इससे अन्य निवासियों में असंतोष फैल गया, क्योंकि उन्हें इसकी जानकारी पहले नहीं दी गई थी.
एक निवासी ने कहा, “वे नए लोगों को सदस्य बनने का मौका नहीं देते और आपस में ही चुनाव कर लेते हैं.”
मंदिर समिति के नवनिर्वाचित अध्यक्ष राजकुमार भाटी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि सभी निवासियों को व्हाट्सएप के माध्यम से सूचना दी गई थी और 8 मार्च तक कोई नामांकन नहीं मिला.
विरोधी समूह ने मार्च में जिला मजिस्ट्रेट को पत्र लिखकर पुनः चुनाव और पारदर्शी प्रक्रिया की मांग की है.
पत्र में कहा गया, “मंदिर समिति की सदस्यता प्रक्रिया को पारदर्शी और समावेशी बनाने के बजाय इसे सीमित रखा गया है… कई निवासियों के अनुरोध के बावजूद सदस्यता सभी के लिए नहीं खोली गई… इस पर स्वतंत्र जांच होनी चाहिए.”
कई निवासियों का मानना है कि यह विवाद धर्म से ज्यादा आंतरिक राजनीति से जुड़ा है.

एक निवासी ने कहा, “यह धर्म या मंदिर का मुद्दा नहीं है, बल्कि एओए और आरडब्ल्यूए की राजनीति का मामला है. यहां पदों के साथ प्रभाव और नियंत्रण जुड़ा होता है—फंड, फैसले और कॉमन एरिया पर. कई बार यह कुछ लोगों तक सीमित हो जाता है.”
वित्तीय पारदर्शिता पर सवाल
गुरुग्राम के मयफील्ड गार्डन स्थित सी-ब्लॉक के श्री बालाजी महादेव मंदिर में भी आजीवन सदस्यों और ट्रस्टियों के खिलाफ विरोध देखा जा रहा है.
एक निवासी ने कहा, “वही लोग आरडब्ल्यूए और मंदिर समिति दोनों में शक्ति रखते हैं. वे नए लोगों को शामिल नहीं होने देते, और अगर कोई आवाज उठाता है तो उसे धर्म विरोधी बताकर दबाव बनाया जाता है.”
निवासियों ने चंदे और दान के उपयोग में पारदर्शिता की कमी पर भी सवाल उठाए. उनका कहना है कि वित्तीय विवरण और ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जातीं.
एक निवासी ने कहा, “इन सोसाइटियों में मंदिर अब शक्ति का नया केंद्र बन गए हैं. हम सिर्फ पारदर्शिता चाहते हैं, चाहे कोई भी इसे चलाए.”
‘मंदिर अब दुकान बन गए हैं’
मयफील्ड गार्डन के एन-ब्लॉक में कुछ लोगों पर बिना एनओसी के बिल्डर की जमीन पर मंदिर बनाने का आरोप है. 2019 में मंदिर ट्रस्ट का पंजीकरण भी किया गया, जबकि आरडब्ल्यूए पहले से मौजूद था.
अधिवक्ता संजय गुप्ता ने आरोप लगाया कि दान और खर्च का कोई सार्वजनिक लेखा-जोखा नहीं है, जबकि वार्षिक ऑडिट अनिवार्य है. इस मामले की जांच जिला प्रशासन द्वारा की जा रही है.
अब ये विवाद सोशल मीडिया तक भी पहुंच गए हैं.
एक यूजर ने लिखा, “यह बीमारी नोएडा की एक के बाद एक सोसाइटी में फैल रही है. सरकार पानी और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं देने में विफल है, और लोगों को इन मुद्दों में उलझाकर असली सवालों से भटकाया जा रहा है.”
एक अन्य यूजर ने लिखा, “जब चीन विकास कर रहा है, तब यहां लोग नोएडा में 128 मंदिर बनाने की बात कर रहे हैं.”
गाजियाबाद के एक निवासी ने ऑनलाइन मंच पर सवाल उठाया, “क्या आरडब्ल्यूए बहुमत की सहमति से बिना मूल नक्शे में शामिल मंदिर का निर्माण कर सकता है. इसे कैसे रोका जा सकता है.”
अंत में, अधिवक्ता संजय गुप्ता ने कहा, “मंदिर अब दुकान बन गए हैं. लोग उन्हें हर जगह खोल रहे हैं—बस अपने घर के पास एक मंदिर चाहते हैं.”
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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