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Saturday, 29 November, 2025
होमफीचरमिलिट्री कोचिंग सेंटर अब हैं नया UPSC, छोटे शहर ‘सर्वोच्च बलिदान’ की तैयारी में जुटे

मिलिट्री कोचिंग सेंटर अब हैं नया UPSC, छोटे शहर ‘सर्वोच्च बलिदान’ की तैयारी में जुटे

भारत के ‘आर्मी ड्रीम’ ने मेरठ, सीकर और रोहतक जैसे टियर-2 और टियर-3 शहरों में एक नया संगठित मिलिट्री कोचिंग सेक्टर खड़ा कर दिया है. यहां डिफेंस लाइफस्टाइल, ‘ऑफिसर जैसी खूबियां’ और एनडीए, सीडीएस, एएफसीएटी में सिलेक्शन का वादा किया जाता है.

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मेरठ: जैसे ही ठीक सुबह के 5 बजे अलार्म बजता है, छात्र एक झटके में अपने बंक बेड से नीचे कूद जाते हैं. आधे घंटे के अंदर ही वे खाकी यूनिफॉर्म में होते हैं—दौड़ लगाते हुए, सेल्फ-डिफेंस ड्रिल करते हुए, पुश-अप्स करते हुए और शहीद सैनिकों के नाम पर बनी गलियों में मार्च करते हुए. यह कोई कैंटोनमेंट एरिया नहीं, बल्कि दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे के पास परतापुर में बनी एक प्राइवेट कोचिंग अकादमी है, जो मेरठ कैंट से कुछ किलोमीटर दूर है.

250-एकड़ के कैंपस में कंधे से कंधा मिलाकर मार्च करते हुए, हरी कैप पहने छात्र दृढ़ आवाज़ में कहते हैं, “जय हिंद”. इन्हें ध्यान से देखते हैं अकादमी के डायरेक्टर कर्नल (रिटायर्ड) राजेश त्यागी.

त्यागी ने कहा, “सेना में जाने के बाद इन्हें यही माहौल मिलेगा. हम सिर्फ पढ़ा नहीं रहे, हम सुनिश्चित कर रहे हैं कि ये डिफेंस की रूटीन को जीएं.”

पिछले एक दशक में “आर्मी ड्रीम” ने मेरठ, सीकर और रोहतक जैसे टियर-2 और टियर-3 शहरों में एक बड़ा, संगठित मिलिट्री कोचिंग सेक्टर खड़ा कर दिया है. ये नई अकादमियां उन छोटे, अनौपचारिक सेटअप्स से कई पायदान ऊपर हैं, जिन्हें पहले पूर्व-सैनिक चलाते थे, खासकर राजस्थान, यूपी और हरियाणा जैसे फौज-प्रेमी राज्यों में. ये सिर्फ भविष्य के जवान नहीं, बल्कि अधिकारी बनने वाले छात्रों को भी ट्रेन कर रहे हैं. नई कोचिंग सुविधाएं पूरी तरह विकसित अकादमियां हैं—होस्टल, ग्राउंड, पर्सनैलिटी डेवलपमेंट सेशन और एनडीए, सीडीएस, एएफसीएटी जैसी परीक्षाओं की तैयारी के लिए क्लासें.

ग्राफिक: मनाली घोष/दिप्रिंट
ग्राफिक: मनाली घोष/दिप्रिंट

अगर यूपीएससी की तैयारी करने वालों के पास Byju’s और Drishti IAS हैं, तो मिलिट्री ऑफिसर एंट्री की तैयारी करने वालों के लिए Subharti, Baalnoi Academy और Georgians Academy जैसे नाम हैं. प्रतियोगिता उतनी ही कड़ी है.

यूपीएससी हर साल एनडीए और सीडीएस की परीक्षा दो बार आयोजित करता है. लिखित परीक्षा पास करने वालों को उसके बाद कठिन पांच दिन की एसएसबी प्रक्रिया से गुज़रना पड़ता है, जो जांचती है कि उम्मीदवार ऑफिसर बनने की क्षमता रखते हैं या नहीं. इसमें साइकोलॉजिकल टेस्ट, ग्रुप डिस्कशन और फील्ड टास्क शामिल होते हैं, जो देश भर के 14 केंद्रों में आयोजित होते हैं. सिर्फ 0.2-0.3% उम्मीदवार ही इसे पार कर पाते हैं.

UPSC या दूसरी कोर्सों में लोग पैसे के लिए आते हैं. यहां, लोग देश के लिए भाव लेकर आते हैं. हम सिर्फ राष्ट्रवाद और देशभक्ति की भावना देते हैं. हम उन्हें ‘सुप्रीम सैक्रीफाइस’ (सर्वोच्च बलिदान) के लिए तैयार करते हैं

— कर्नल (रिटायर्ड) राजेश त्यागी, डायरेक्टर, शुभार्ती डिफेंस अकादमी

देहरादून की भारतीय रक्षा अकादमी की वेबसाइट के अनुसार, एनडीए की हर परीक्षा के लिए लगभग 5-6 लाख लोग आवेदन करते हैं. इनमें से 2-2.5 लाख उम्मीदवार लिखित परीक्षा देते हैं, जिनमें से सिर्फ 8,000-9,000 SSB राउंड तक पहुंचते हैं. आखिर में कुछ सौ ही चुने जाते हैं, पिछले साल एनडीए-II परीक्षा में 792 एस्पिरेंट्स चुने गए.

शुभार्ती का दावा है कि 2021 में स्थापना के बाद से अब तक 450 से ज्यादा छात्र एनडीए और सीडीएस परीक्षा क्लियर कर चुके हैं. अकादमी में एनडीए और सीडीएस की अलग-अलग बैचें होती हैं और गणित, फिजिक्स और अन्य कॉमन विषयों की संयुक्त लिखित क्लास होती हैं. यहां अग्निवीर और स्टेट-पुलिस परीक्षाओं की तैयारी भी कराई जाती है.

रोहतक की सांगवान डिफेंस अकादमी में ट्रेनिंग करते छात्र. ज़्यादातर रेज़िडेंशियल कोचिंग स्कूल कड़े रूटीन का पालन करते हैं—फिजिकल ड्रिल्स, लिखित परीक्षा की तैयारी और एसएसबी के ग्रुप एक्सरसाइज़ शामिल हैं | फोटो: इंस्टाग्राम/@sangwan_defence_academy
रोहतक की सांगवान डिफेंस अकादमी में ट्रेनिंग करते छात्र. ज़्यादातर रेज़िडेंशियल कोचिंग स्कूल कड़े रूटीन का पालन करते हैं—फिजिकल ड्रिल्स, लिखित परीक्षा की तैयारी और एसएसबी के ग्रुप एक्सरसाइज़ शामिल हैं | फोटो: इंस्टाग्राम/@sangwan_defence_academy

यह बिजनेस काफी प्रतिस्पर्धी है और चयन दर ही इसकी सबसे बड़ी करंसी है. शुभार्ती छह महीने के रेजिडेंशियल कोर्स के लिए 10,000 से 60,000 रुपये तक लेता है. लंबे समय से चल रही Baalnoi Academy (दिल्ली और जयपुर में शाखाएं) दो से तीन हफ्ते के छोटे, गहन एसएसबी ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाती है—7 घंटे रोज, हफ्ते में 7 दिन और इसकी फीस 21,000 से 28,000 रुपये के बीच है.

सोशल मीडिया पर विज्ञापन तेज़ और लगातार चलते रहते हैं, हर जगह ‘कमांडो’, ‘योद्धा’ जैसे शब्द दिखाई देते हैं. अकादमियां स्थानीय सफल उम्मीदवारों की फोटो लगातार शेयर करती हैं, चाहे उन्होंने कोई एंट्रेंस टेस्ट क्लियर किया हो या कैडेट बने हों.

नौसेना से रिटायर्ड कैप्टन, और Defence Institute of Psychological Research में भी सेवा दे चुके संजय पाठक ने कहा, “भारत की मिलिट्री कोचिंग इंडस्ट्री अब सिर्फ महानगरों तक सीमित नहीं रही. मेरठ, नागपुर और कोल्हापुर जैसे शहर अब गंभीर और तैयार उम्मीदवार दे रहे हैं.” वे 13 साल से ज्यादा वक्त तक एसएसबी बोर्ड में उम्मीदवारों का इंटरव्यू लेते रहे हैं. उन्होंने कहा, “पहले कोचिंग हब सिर्फ दिल्ली, चंडीगढ़ और देहरादून थे, लेकिन अब छोटे शहरों ने भी अपनी मजबूत कोचिंग इकोसिस्टम बना ली है, जिन्हें विज्ञापनों और शुरुआती सफलता की कहानियों ने और आगे बढ़ाया है.”

सैनिक बनने की तैयारी

सुबह 8 बजे शुभार्ती कैंपस ड्रिल मोड से क्लासरूम मोड में बदल जाता है. जल्दी से नहाकर और नाश्ता करके, एस्पिरेंट्स आठ घंटे की क्लास के लिए बैठ जाते हैं.

एकेडमिक दिन की शुरुआत “पर्सनैलिटी डेवलपमेंट” से होती है. यह एक अहम विषय है, खासकर उन छात्रों के लिए जो ग्रामीण इलाकों से आते हैं और जिन्हें इंग्लिश, पब्लिक स्पीकिंग और सोशल कॉन्फिडेंस में दिक्कत होती है.

त्यागी ने कहा, “पर्सनैलिटी रातों-रात नहीं बनती. हम उनका आत्मविश्वास बढ़ाते हैं, वे छह महीने में हिंदी से अंग्रेज़ी की ओर बढ़ते हैं. हमारा लक्ष्य उन्हें स्पॉटलाइट में डालना नहीं, बल्कि उसका डर हटाना है.”

शुभार्ती डिफेंस अकादमी में एक एस्पिरेंट कारगिल युद्ध के बारे में अपना ज्ञान तेज़ी से बताता हुआ | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
शुभार्ती डिफेंस अकादमी में एक एस्पिरेंट कारगिल युद्ध के बारे में अपना ज्ञान तेज़ी से बताता हुआ | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

यह ‘पर्सनैलिटी डेवलपमेंट’ एसएसबी इंटरव्यू में आंकी जाने वाली Officer-Like Qualities (OLQs) के लिए होती है, जिसमें 15 तरह के व्यक्तित्व गुण शामिल हैं, जैसे प्लानिंग, सोशल एडजस्टमेंट, सोशल इफेक्टिवनेस और डायनामिज़्म. इन गुणों को निखारना अकादमी की दिन-प्रतिदिन की दिनचर्या का हिस्सा है. यहां सिर्फ मेरठ से नहीं, बल्कि बुलंदशहर, शामली, हापुड़, सहारनपुर और आसपास के जिलों से भी छात्र आते हैं. अभी यहां करीब एनडीए और सीडीएस के 100 एस्पिरेंट्स पढ़ रहे हैं.

छात्र मैस में खाना खाते हैं, जहां उन्हें फोर्क-नाइफ इस्तेमाल करने जैसे डायनिंग एटीकेट सिखाए जाते हैं. शिक्षकों ने बताया कि असली तैयारी भाषा पर होती है; जब छात्र अंग्रेज़ी से सहज होते हैं, तो आत्मविश्वास बढ़ता है और बाकी सब अपने-आप हो जाता है. पुराने एसएसबी इंटरव्यू लेने वाले अधिकारी भी आकर ट्रेनिंग और असेसमेंट देते हैं.

लिखित परीक्षा के लिए सब्जेक्ट इंस्ट्रक्टर और प्रोफेशनल ट्रेनर जिम्मेदारी लेते हैं.

एक क्लासरूम के अंदर विज्ञान की क्लास चल रही है. पंद्रह छात्र सीधे बैठकर ध्यान से सुन रहे हैं. ट्रेनर व्हाइटबोर्ड पर शब्द लिख रहा है, ग्रामोफोन, टेलीस्कोप, स्टीम इंजन, टेलीविज़न, रेडियम. वह एक-एक करके पूछता है कि किसका आविष्कार किसने किया. हाथ तेज़ी से ऊपर उठते हैं. कुछ सही जवाब देते हैं, कुछ गलत. सब नोट्स लेते हैं.

लोग कहते हैं कि लड़कियों के लिए यह सुरक्षित नहीं है, लेकिन मुझे पता है कि सिर्फ यही नौकरी मुझे सम्मान और अनुशासन देगी. यह मेरे पिता का सपना था कि वे आर्मी ऑफिसर बनें, लेकिन वह परीक्षा पास नहीं कर पाए

— नंदिनी राघव, सीडीएस परीक्षा एस्पिरेंट

इन छात्रों में तीन-चार लड़कियां भी हैं, जिनमें से एक है 21-वर्षीय नंदिनी राघव, जिन्होंने जूलॉजी, बॉटनी और केमिस्ट्री में ग्रेजुएशन की है, वे सीडीएस परीक्षा की तैयारी के लिए छह महीने पहले अकादमी में शामिल हुईं.

शामली की रहने वालीं नंदिनी ने कहा, “यह मेरे पिता का सपना था कि वे आर्मी ऑफिसर बनें, लेकिन वह परीक्षा पास नहीं कर पाए.”

शुभार्ती डिफेंस अकादमी में क्लास के बाद बाहर निकलते कैडेट्स | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
शुभार्ती डिफेंस अकादमी में क्लास के बाद बाहर निकलते कैडेट्स | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

महिलाओं को एनडीए में शामिल होने की अनुमति पहली बार 2022 में मिली, सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद. 2025 बैच में 17 महिला कैडेट्स ने 300 से ज़्यादा पुरुष कैडेट्स के साथ ग्रेजुएशन किया. इस समय एनडीए में 121 महिला कैडेट्स हैं.

अकादमियां भी अब लड़कियों को आकर्षित करने के लिए ऐसे नारे इस्तेमाल करती हैं— “लड़कियों की हुई जीत, एनडीए हम आ रहे हैं” और महिला सैनिकों की परेड की तस्वीरें भी दिखाती हैं.

उनका अपना सपना तब शुरू हुआ जब वह चार साल की थीं और उन्होंने हिंदी टीवी सीरियल दीया और बाती हम देखा था, जिसमें मुख्य किरदार आर्मी ऑफिसर थी.

नंदिनी ने कहा, “तभी से मैं ऑफिसर बनना चाहती थी. लोग कहते हैं लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं है, लेकिन मुझे पता है कि सिर्फ यही नौकरी मुझे सम्मान और अनुशासन देगी.”

राजेश त्यागी, डायरेक्टर, शुभार्ती डिफेंस अकादमी, फाइलिंग रूम में छात्र फॉर्म देखते हुए. वह पर्सनैलिटी डेवलपमेंट क्लासेस के बड़े समर्थक हैं, जहां एस्पिरेंट्स को अंग्रेज़ी में आत्मविश्वास से बोलना सिखाया जाता है | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
राजेश त्यागी, डायरेक्टर, शुभार्ती डिफेंस अकादमी, फाइलिंग रूम में छात्र फॉर्म देखते हुए. वह पर्सनैलिटी डेवलपमेंट क्लासेस के बड़े समर्थक हैं, जहां एस्पिरेंट्स को अंग्रेज़ी में आत्मविश्वास से बोलना सिखाया जाता है | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

डायरेक्टर त्यागी, जिन्होंने 2023 में शुभार्ती यूनिवर्सिटी के अंदर यह संस्थान शुरू किया, देशभर में छात्रों को भर्ती करने के लिए यात्रा करते हैं—शहरों के स्कूलों से लेकर ग्रामीण इलाकों की मीटिंग्स तक. वह मोटिवेशनल टॉक्स देते हैं, बताते हैं कि युद्ध कैसे लड़े गए और ऑफिसर्स को मिलने वाले फायदे— स्टाइपेंड, कैंटीन, एडवेंचर स्पोर्ट्स और लगभग 1 लाख की शुरुआती सैलरी.

उन्होंने कहा, “हमारा लक्ष्य देश को कुछ वापस देना है.”

त्यागी का कहना है कि डिफेंस कोचिंग बाकी सब से अलग है.

उन्होंने कहा, “यूपीएससी या दूसरे कोर्स में लोग पैसे के लिए आते हैं. यहां वे राष्ट्रभाव लेकर आते हैं. नेशनलिज़्म और पैट्रिऑटिज़्म ही भावनाएं हैं जो हम उनमें डालते हैं. हम उन्हें सर्वोच्च बलिदान के लिए तैयार करते हैं.”

इन मूल्यों को मजबूत करने के लिए एसएसबी तैयारी दौर में कमीशंड ऑफिसर्स की विज़िट होती है और नियमित मोटिवेशनल टॉक्स भी. हिंदी की मशहूर मिलिट्री फिल्में— लक्ष्य, बॉर्डर, ऊरी— होमवर्क में दी जाती हैं. छात्रों से इन पर सवाल नहीं पूछे जाते; ये फिल्में सिर्फ देशभक्ति की भावना जगाने के लिए होती हैं.

त्यागी ने कहा, “ये फिल्में छात्रों को याद दिलाती हैं कि यूनिफॉर्म के क्या मायने हैं. जब वे दूसरे एस्पिरेंट्स के साथ बैठते हैं, तो यह भावना और बढ़ जाती है.”

शुभार्ती डिफेंस अकादमी में प्रोग्रेसिव ग्रुप टास्क का ऑब्स्टेकल कोर्स. एस्पिरेंट्स इसे एसएसबी की टीमवर्क और प्रॉब्लम-सॉल्विंग ड्रिल्स के रूप में पार करते हैं | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
शुभार्ती डिफेंस अकादमी में प्रोग्रेसिव ग्रुप टास्क का ऑब्स्टेकल कोर्स. एस्पिरेंट्स इसे एसएसबी की टीमवर्क और प्रॉब्लम-सॉल्विंग ड्रिल्स के रूप में पार करते हैं | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

तेज़ी से ‘अधिकारी जैसे गुण’ देना

हर मिलिट्री कोचिंग अकादमी के पास पूरा कैंपस होने की सुविधा नहीं होती. दिल्ली के पश्चिमी हिस्से द्वारका में Georgians Defence Academy एक बाइक शो-रूम के ऊपर दो मंज़िलों में चलती है. जगह कम है, लेकिन ब्रांडिंग आक्रामक है.

चार-पांच कांच की दीवारों वाली क्लासरूम्स में अलग-अलग परीक्षाओं की तैयारी करने वाले बैच भरे हुए हैं. चुने गए छात्रों के फ्लेक्स बैनर, पासपोर्ट फोटो की ग्रिड, इंस्टीट्यूट की पहचान और उपलब्धि की गैलरी जैसी दिखती है.

यह अकादमी, जिसे 2013 में एक्स-आर्मी अफसरों और राष्‍ट्रीय मिलिट्री स्कूल (पहले King George’s Royal Indian Military College) के ग्रेजुएट्स ने शुरू किया था, एनडीए और सीडीएस की लिखित परीक्षा और एसएसबी तैयारी, दोनों में स्पेशलाइज्ड है.

इसका एसएसबी इंटरव्यू कोर्स 15–25 दिन के लिए 15,000 रुपये का है. दो साल का एनडीए फाउंडेशन (सीबीएसए+एनडीए) 2.6 लाख रुपये का. चार या छह महीने का एनडीए कम्प्रिहेंसिव प्रोग्राम 30,000 रुपये का है.

कुवंर प्रताप सिंह, संस्थापक, Georgians Defence Academy, ग्रुप डिस्कशन से पहले एस्पिरेंट्स को समझाते हुए | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
कुवंर प्रताप सिंह, संस्थापक, Georgians Defence Academy, ग्रुप डिस्कशन से पहले एस्पिरेंट्स को समझाते हुए | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

शुक्रवार सुबह, एक ग्रुप डिस्कशन शुरू होने वाला है. सात छात्र गोल घेरा बनाकर बैठे हैं—पोश्चर परफेक्ट, हाथ टेबल पर. टॉपिक है—सोशल मीडिया, धर्म और राजनीति. जैसे ही संस्थापक कुवंर प्रताप सिंह इशारा करते हैं, सबके भीतर का बहस करने वाला भारतीय सक्रिय हो जाता है. कुछ धाराप्रवाह बोलते हैं, कुछ अटकते हैं. वे मानते हैं, बहस करते हैं, बीच में बोलते हैं, तर्क देते हैं.

एक छात्र ने कहा, “डीपफेक बढ़ गए हैं, दूसरे ने फौरन कहा, लेकिन धार्मिक प्रोपेगैंडा भी बढ़ा है.”. जब एक छात्र कहता है कि राजनीति और धर्म जुड़े होते हैं और “राजनीतिक नेता युवाओं को चरम तक जाने को कहते हैं”, माहौल कुछ तीखा हो जाता है, लेकिन फिर समूह बातचीत को वापस सुरक्षित ग्राउंड, सोशल मीडिया पर ले आता है.

हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड जैसे राज्यों ने सबसे ज़्यादा जवान भेजे हैं. यहां एक परंपरा है और इतिहास से ही युद्ध की संस्कृति रही है

— कुवंर प्रताप सिंह, संस्थापक, Georgians Defence Academy

यह शोर-शराबा प्लान के अनुसार है. यह एसएसबी के ग्रुप टास्क ऑफिसर (जीटीओ) राउंड की प्रैक्टिस है.

सिंह ने कहा, “यह सिलेक्शन मनसा, वाचा और कर्मणा [सोच, बोलना और करना] पर आधारित है.” परीक्षक उम्मीदवार की पूरी पर्सनैलिटी आंकते हैं, भले ही एसएसबी में कोई सही या गलत जवाब नहीं होता.

डिस्कशन खत्म होने के बाद सिंह सभी को फीडबैक देते हैं. उन्होंने एक छात्र से कहा, “जब क्रिटिसाइज़ करो, शब्द सोच-समझकर चुनो. आपका टोन आपके कैरेक्टर को दिखाता है. बोलने से पहले रुकना मत. याद रखो, राजनीति हमेशा नेगेटिव शब्द नहीं है. यह एक प्रोफेशन भी है.”

कुवंर प्रताप सिंह छात्रों को व्यवहार पर मोटिवेशनल बात करते हुए, “यह सिर्फ ज्ञान की बात नहीं है. वे आपकी मानसिकता, नेतृत्व क्षमता और दबाव में फैसले लेने की योग्यता जांचते हैं. यही आर्मी लाइफ की मांग है” | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
कुवंर प्रताप सिंह छात्रों को व्यवहार पर मोटिवेशनल बात करते हुए, “यह सिर्फ ज्ञान की बात नहीं है. वे आपकी मानसिकता, नेतृत्व क्षमता और दबाव में फैसले लेने की योग्यता जांचते हैं. यही आर्मी लाइफ की मांग है” | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

इस राउंड में तैयारी के लिए वक्त नहीं मिलता. उम्मीदवारों से उम्मीद होती है कि वही समय पर सोचें—साफ और शांत दिमाग से.

सिंह ने कहा, “यह सिर्फ नॉलेज की बात नहीं. वे आपकी साइक, नेतृत्व क्षमता और दबाव में फैसले लेने की क्षमता जांचते हैं. यही आर्मी लाइफ की मांग है.”

शहर के दूसरी तरफ जनकपुरी में, Baalnoi Academy भी इसी तरह की सेशन चलाती है. एक मकान को कई क्लासरूम्स में बांटकर बनाया गया है. छत पर, प्रोग्रेसिव ग्रुप टास्क चल रहा है.

ट्रैक पैंट और स्नीकर्स पहने बीस छात्र एक अस्थायी ऑब्स्टेकल कोर्स के आसपास जमा हैं. लकड़ी के तख्ते, रस्सियां और रॉड बिखरी हुई हैं. मिशन है—एक प्लेटफॉर्म से दूसरे पर जाना, बिना ज़मीन को छुए.

कैप्टेन तरनजीत सिंह कालसी, Baalnoi Academy में एसएसबी ऑब्स्टेकल सेशन के दौरान सख्त ट्रेनर. कभी-कभी याद दिलाते हैं: ‘मैं आपका दुश्मन नहीं’ | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
कैप्टेन तरनजीत सिंह कालसी, Baalnoi Academy में एसएसबी ऑब्स्टेकल सेशन के दौरान सख्त ट्रेनर. कभी-कभी याद दिलाते हैं: ‘मैं आपका दुश्मन नहीं’ | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

ट्रेनर कैप्टन तरनजीत सिंह कालसी हाथ में छड़ी लिए निर्देश चिल्लाते हैं.

उन्होंने कहा, “फट्टा फंसा दे. रस्सी टाइट बांध.” छात्र हड़बड़ाकर रस्सी बांधते हैं, सांसें फूलती हैं, रणनीति बनाने की कोशिश करते हैं. कालसी लगातार तनाव बढ़ाते जाते हैं.

“उसकी ज़िंदगी तुम तीनों पर निर्भर है” वह कहते हैं, जब एक लड़की पतले तख्ते पर संतुलन बनाने की कोशिश करती है. कोई गलती करे तो वह तुरंत टोकते हैं: “Got the idea? I am not your dushman!”

यह कार्य आधा लॉजिक, आधा लीडरशिप है. यह टीमवर्क और हिम्मत को परखता है.

एक छात्र जब शॉर्टकट सुझाता है, वे मज़ाक में कहते हैं, “फौज में कभी आइडियाज मत दो.” हंसी से तनाव कम हो जाता है.

शिवानी तोमर, एयरनी बनने की चाहत में Baalnoi में दाखिल हुईं—‘डिसिप्लिन, रिस्पेक्ट और स्टेबिलिटी के लिए’ | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
शिवानी तोमर, एयरनी बनने की चाहत में Baalnoi में दाखिल हुईं—‘डिसिप्लिन, रिस्पेक्ट और स्टेबिलिटी के लिए’ | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

कमरे के एक किनारे पर 16-वर्षीय जतिन कौशिक आराम कर रहे हैं. हरियाणा के महेंद्रगढ़ से, उन्होंने कुछ महीने पहले पहली कोशिश में एनडीए की लिखित परीक्षा पास की.

उन्होंने कहा, “मेरे दादा के भाई ऑफिसर थे. उनके लाइफस्टाइल ने मुझे प्रभावित किया, वे वक्त के पाबंद और सम्मानित थे.”

अब कौशिक एसएसबी राउंड की तैयारी कर रहा है.

उन्होंने कहा, “कोचिंग ज़रूरी है. यह मानसिक रूप से तैयार करती है. हमें समझ आता है कि मुकाबला कितना है. इसके बिना लोग घबरा जाते हैं.”

एक अन्य बैच में, 21-वर्षीय शिवानी तोमर पेपर I का मॉक टेस्ट लिख रही हैं. उनकी आर्मी की इच्छा तब शुरू हुई जब उनकी मां दिल्ली कैंट इलाके में घरेलू कामगार थीं. वहां के ऑफिसर्स की लाइफस्टाइल और यूनिफॉर्म ने उसे प्रेरित किया.

मिरांडा कॉलेज की छात्रा तोमर ने परिवार की मदद के लिए प्राइवेट सेक्टर में नौकरी की थी, लेकिन नौकरी छूटते ही उन्होंने अकादमी में दाखिला ले लिया.

उन्होंने कहा, “प्राइवेट सेक्टर में ले-ऑफ आम बात हो गई है. लंबे घंटे, कम सैलरी, लगातार प्रेशर, फिर मैंने आर्मी का रास्ता चुना. वहां डिसिप्लिन है, सम्मान है, स्थिरता है. मुझे इसकी ज़रूरत है.”

कौन चला रहा है यह इंडस्ट्री?

भारत की मिलिट्री-कोचिंग इंडस्ट्री 1990 के दशक के अंत में बननी शुरू हुई, जब कुछ रिटायर्ड अफसरों ने अपने अनुभव को मेंटरशिप में बदलना शुरू किया.

सबसे पहले में से एक थे मेजर एच. एस. कल्सी, 9 राजपूताना राइफल्स के 1981 बैच के दूसरे-जनरेशन के अफसर और पूर्व SSB ग्रुप टेस्टिंग ऑफिसर. उन्होंने 1997 में बालनोई अकादमी शुरू की.

उन्होंने कहा, “हमने इसलिए शुरू किया क्योंकि ज़रूरत थी. 1997 में दिल्ली में सिर्फ एक कोचिंग सेंटर था, और अब कई हैं. एक छात्र जिसे मैंने एसएसबी में फेल किया था, उसने मुझसे कहा, ‘सर, कोचिंग शुरू करें, दूसरों को पता होना चाहिए कि असली टेस्ट क्या है’.”

जनकपुरी में इस आकस्मिक शुरुआत से, बालनोई अब जयपुर और ईस्ट दिल्ली तक फैल चुका है. इसने 1.5 लाख से ज्यादा एस्पिरेंट्स को ट्रेन किया है और 14,000 अफसरों को फोर्सेज में पहुंचने में मदद की है.

1997 में दिल्ली में सिर्फ एक कोचिंग सेंटर था और अब कई हैं. एक छात्र जिसे मैंने एसएसबी में फेल किया था, उसने कहा, ‘सर, कोचिंग शुरू करें, दूसरों को पता होना चाहिए कि असली टेस्ट क्या है’

— मेजर एच. एस. कल्सी, संस्थापक, बालनोई अकादमी

इनमें से ज्यादातर कोचिंग अकादमियों का सफर लगभग एक जैसा रहा है. इन्हें एक्स-सर्विसमेन ने शुरू किया, जो पब्लिक सर्विस की भावना और मार्केट लॉजिक, दोनों से प्रेरित थे.

लेकिन Georgians Defence Academy के संस्थापक कुवंर प्रताप सिंह के लिए उनकी अपनी असफलता ही प्रेरणा बनी.

एक आर्मी अफसर के बेटे होने के नाते, उन्होंने राश्ट्रीय मिलिट्री स्कूल में पढ़ाई की और उनकी ज़िंदगी की दिशा तय थी, जब तक कि उन्होंने सीडीएस की परीक्षा नहीं दी और कुछ अंकों से चूक गए. उन्होंने कहा, एजुकेशन सेक्टर में आना उनका तरीका है यह सुनिश्चित करने का कि दूसरे एस्पिरेंट बेहतर तरीके से तैयार हों.

दिल्ली में बालनोई अकादमी की रूफटॉप ट्रेनिंग सेंटर में एसएसबी की एक क्लास | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
दिल्ली में बालनोई अकादमी की रूफटॉप ट्रेनिंग सेंटर में एसएसबी की एक क्लास | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

उनके अनुसार, पारंपरिक मिलिट्री कोचिंग हब जैसे दिल्ली, देहरादून और चंडीगढ़ में भी करीब एक दशक पहले तक सिर्फ कुछ ही संस्थान थे. सिंह कहते हैं कि बूम तब आया जब यूपीएससी, सीएलएटी और जेईई जैसे एग्ज़ाम्स के साथ ‘प्रतियोगी परीक्षा कल्चर’ बढ़ा.

अब वे दिल्ली से बाहर जयपुर और पठानकोट तक विस्तार कर रहे हैं, क्योंकि टियर-2 और टियर-3 शहरों में मांग तेज़ी से बढ़ रही है—खासकर उन राज्यों में जहां युवाओं के फौज में जाने की मजबूत परंपरा है.

सिंह ने कहा, “हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड जैसे राज्यों ने सबसे ज्यादा जवान भेजे हैं. यहां एक परंपरा है और ऐतिहासिक रूप से युद्ध की संस्कृति रही है.”

छोटे शहरों में कोचिंग बूम

उत्तर भारत के मिलिट्री-दीवाने इलाके में कोचिंग हर जगह है—पब्लिक ग्राउंड पर ड्रिल करवाने वाले ‘सेल्फ-स्टाइल्ड आर्मी ट्रेनर्स’ से लेकर त्रिशूल जैसी बड़ी अकादमियों की ब्रांच तक और ठोस इंफ्रास्ट्रक्चर वाली नई लोकल संस्थानों तक.

जैसे-जैसे मांग बढ़ी, प्रोफेशनलिज़्म भी बढ़ा. अब इन संस्थानों में मनोवैज्ञानिक, एसएसबी असेसर्स और कम्युनिकेशन ट्रेनर्स काम करते हैं. कुछ में रेज़िडेंशियल कैंपस हैं और आठ घंटे का रूटीन. कुछ एडटेक का इस्तेमाल करते हैं—ऑनलाइन टेस्ट सीरीज़, टेलीग्राम ग्रुप और रिमोट मेंटोरिंग.

लखनऊ में Target Defence Academy एक बड़ा नाम है. इसे 2020 में साईंनिक स्कूल के पूर्व छात्र सचिन यादव ने शुरू किया, जो अपनी वेबसाइट पर खुद को “SSB recommended” बताते हैं. यहां एक कैंट-स्टाइल रूटीन है—सभी एस्पिरेंट्स हल्की नीली यूनिफॉर्म पहनते हैं और पूरे दिन की तय टाइमटेबल का पालन करते हैं.

सिकर, राजस्थान में Govindam Defence Academy भी इसी तरह है. यह दावा करती है कि उसके पास 2,845 से अधिक डिफेंस सेलेक्शंस हैं और अलग-अलग सर्विसेज़ के लिए स्पेशल कोर्स. इसका रेज़िडेंशियल प्रोग्राम बेहद अनुशासित है—सुबह 5 बजे उठने से लेकर फिजिकल ट्रेनिंग, क्लास, सेल्फ-स्टडी और रात 10.30 बजे “नाइट रेस्ट” तक.

हरियाणा के रोहतक में Sangwans Defence Academy है—रिटायर्ड सबमरीनर दिनेश सांगवान द्वारा स्थापित. इसमें एसी क्लासरूम, ऑब्स्टेकल कोर्स और “पिछले 20 सालों में 13,500 से ज्यादा सेलेक्शंस” होने का दावा है.

सोशल मीडिया पर कोचिंग के विज्ञापन अक्सर नौसेना और वायु सेना की ग्लैमर दिखाकर एस्पिरेंट्स को आकर्षित करते हैं | फोटो: इंस्टाग्राम
सोशल मीडिया पर कोचिंग के विज्ञापन अक्सर नौसेना और वायु सेना की ग्लैमर दिखाकर एस्पिरेंट्स को आकर्षित करते हैं | फोटो: इंस्टाग्राम

मार्केट में संस्थान भरे पड़े हैं— Lakshya, Shaurya, Trishul जैसे नामों वाली अकादमियां, जिनके नाम भी मिलिट्री लोर या फिल्मों से प्रेरित हैं. सभी “सबसे ज्यादा सेलेक्शन रेट” होने का दावा करते हैं और इंस्टाग्राम व टेलीग्राम पर जमकर विज्ञापन करते हैं.

कुछ स्लोगन काफी संस्कारी टोन वाले होते हैं— “शिक्षा, सेवा, संस्कार, राष्ट्र्यता” या “Making an officer.” कुछ बिल्कुल सीधे— “Success for Army” या “Trishul जाओ, वर्दी पाओ.”

रील्स में सिर्फ भोर की दौड़ें, सलामी देते युवा, और बंदूक ताने सैनिकों की परछाइयां.

छोटे संस्थान भी प्रमोशन में पीछे नहीं—जैसे कानपुर के लोकप्रिय “आदित्य शुक्ला सर” जिनके 72,000 से ज्यादा फॉलोअर हैं और जो लगातार छात्रों की लॉन्ग जंप और फौजी पोज़ की रील्स डालते हैं.

शुभार्ती डिफेंस अकादमी का प्रवेश द्वार. हाल के सेलेक्शंस के पोस्टर ही सबसे असरदार विज्ञापन हैं | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
शुभार्ती डिफेंस अकादमी का प्रवेश द्वार. हाल के सेलेक्शंस के पोस्टर ही सबसे असरदार विज्ञापन हैं | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

छात्रों और परिवारों के लिए, ये संस्थान एक सम्मानजनक और स्थिर करियर की ओर एक गाइडेड रास्ता बनाते हैं— ऐसी नौकरी जिसमें अनिश्चितता कम है.

सिंह ने कहा, “प्राइवेट कोर्स और नौकरियां तो बहुत हैं, लेकिन कोई गारंटी नहीं. अगर पैसे कमाने हैं तो प्राइवेट जॉब कर लो, लेकिन यहां, छात्र कुर्बानी के लिए तैयार होकर आते हैं.”

शुभार्ती कैडेट नोट्स लेते हुए. कई एस्पिरेंट एनडीए और सीडीएस की परीक्षा कई बार देते हैं | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट
शुभार्ती कैडेट नोट्स लेते हुए. कई एस्पिरेंट एनडीए और सीडीएस की परीक्षा कई बार देते हैं | फोटो: समृद्धि तिवारी/दिप्रिंट

मेरठ में वापस, मनीष कुमार का वर्दी का सपना बचपन में ही शुरू हो गया था, जब वह मेरठ कैंट में बड़े हुए.

उन्होंने कहा, “यह मेरे पिता का सपना था. वे भी आर्मी में थे. उन्होंने 1985 से 2021 तक सेवा की.”

कुमार ने पहली बार एनडीए परीक्षा 2016 में 12वीं में दी थी, पर पास नहीं हुए. उन्होंने फिर कोशिशें जारी रखीं, BSc और फिर MSc किया, खुद से पढ़ाई की, ऑनलाइन टेस्ट दिए और आखिरकार शुभार्ती जॉइन कर लिया.

एनडीए और सीडीएस की कम-से-कम 14 कोशिशों के बाद, कुमार ने 2022 में आखिरकार अपनी स्टार्स हासिल कीं. दो साल बाद, उन्हें कमीशन लेटर मिला. वह आभारी हैं कि उनके पिता, जिनका एक महीने बाद निधन हो गया, वह यह देख सके.

मार्च 2024 में, जब लेटर आया, उनके पिता बिस्तर पर थे और आधे लकवाग्रस्त. खबर सुनकर, उन्होंने अपने बाएं हाथ से पेन उठाया और एक कागज़ पर तीन शब्द लिखे—“Lt Manish Kumar.”

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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