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Thursday, 13 June, 2024
होमफीचरन लाभ और न ही सवारी: जयपुर, आगरा, लखनऊ जैसे शहरों के लिए मेट्रो कैसे है सिर्फ एक स्टेटस सिंबल

न लाभ और न ही सवारी: जयपुर, आगरा, लखनऊ जैसे शहरों के लिए मेट्रो कैसे है सिर्फ एक स्टेटस सिंबल

जयपुर मेट्रो का यात्री संख्या डेटा बुनियादी सवाल उठाता है कि क्या भारत के छोटे शहरों को ऐसे महंगे परिवहन व्यवस्था की सच में ज़रूरत है.

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जयपुर: जयपुर मेट्रो में मनाएं कोई भी उत्सव, आकर्षक दरों पर संजोएं अपने यादगार पल — आप सोच रहे होंगे कि यह किसी रेस्तरां के लिए लगाए गए होर्डिंग विज्ञापन में टाइपो की गलती है लेकिन अफसोस ऐसा नहीं है, बल्कि यह जयपुर मेट्रो की हताश कोशिश है जो प्रासंगिक बने रहने के लिए संघर्ष कर रही है.

2015 में जब जयपुर में मेट्रो शुरू हुई तो हेरिटेज सिटी के ताज पर जैसे एक और हीरा जड़ गया हो. लगभग दो दशक पहले, नीति निर्माताओं ने इसे बड़ा मुद्दा बनाते हुए कहा था कि लोगों को इसकी ज़रूरत है, ठीक वैसे ही जैसे भारत के सत्ता केंद्र दिल्ली में रहने वाले लोगों को थी, लेकिन अस्तित्व में आने के 10 साल बाद, ये मेट्रो मानसरोवर से बड़ी चौपड़ के बीच बमुश्किल 12 किलोमीटर की दूरी को ही अब तक जोड़ पाई है, जिसमें प्रतिदिन औसतन 50,000 लोग सफर करते हैं. जन्मदिन की पार्टी या समारोहों के लिए चलती ट्रेनों को किराए पर देना, सामूहिक पारगमन प्रणाली को उचित ठहराने का इसका सबसे नया तरीका था, लेकिन कोचों के अंदर का संगीत खत्म हुए तीन साल बीत गए हैं. जयपुर मेट्रो, जो उद्घाटन के समय निवासियों के लिए प्रतिष्ठा का प्रतीक थी, आज भारी वित्तीय घाटे से गुज़र रही है और नौ साल की अवधि में इसके 12 से अधिक प्रमुख बदल चुके हैं.

और यह सिर्फ जयपुर ही नहीं, कई टियर 2 शहर आज मेट्रो प्रोजेक्ट्स से भरे हुए हैं जो विकास का प्रतीक बन गया है. आगरा भारत का 21वां मेट्रो शहर बनने वाला नवीनतम शहर है. इतने साल में मोदी सभी मेट्रो प्रोजेक्ट्स के ब्रांड एंबेसडर बन गए हैं — नींव रखने से लेकर ट्रेनों को हरी झंडी दिखाने तक. हाल ही में उन्होंने कोलकाता में देश की पहली अंडरवॉटर मेट्रो का उद्घाटन किया, लेकिन शहर के योजनाकारों और शहरी विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे शहरों को वास्तव में मेट्रो के इस जुनून की ज़रूरत नहीं है. भारत के टियर-2 और टियर-3 शहर पूरी तरह से शहरी नहीं हैं और अधिकांश विशेष रूप से घनी आबादी वाले नहीं हैं, जिसका मतलब है कि अधिकांश यात्रियों के लिए मेट्रो लाइनें पैदल दूरी के भीतर नहीं हैं.

दिल्ली स्थित एनाग्राम आर्किटेक्ट्स के वास्तुकार और सह-संस्थापक माधव रमन बताते हैं, “छोटे शहरों को इसकी ज़रूरत नहीं है लेकिन वहां भी इसे ज़बरदस्ती थोपा जा रहा है. यह केवल वहीं काम करता है जहां जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक है और कितने लोग शहर में यात्रा करते हैं.”

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2022 में आवास और शहरी मामलों पर संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट में बताया गया है कि लगभग सभी मेट्रो नेटवर्क घाटे में हैं और उनके पास पर्याप्त यात्री संख्या नहीं है. फिर भी नए प्रोजेक्ट लॉन्च हो रहे हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि मंत्रालय का 45 फीसदी बजट मेट्रो प्रोजेक्ट्स के लिए रखा गया है. 2018 नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 तक जयपुर में मेट्रो रेलवे की ज़रूरत नहीं थी.

भारत के टियर-2 और टियर-3 शहर पूरी तरह से शहरी नहीं हैं और अधिकांश घने भी नहीं हैं, जिसका मतलब है कि अधिकांश यात्रियों के लिए मेट्रो लाइनें पैदल दूरी के भीतर नहीं हैं | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट
भारत के टियर-2 और टियर-3 शहर पूरी तरह से शहरी नहीं हैं और अधिकांश घने भी नहीं हैं, जिसका मतलब है कि अधिकांश यात्रियों के लिए मेट्रो लाइनें पैदल दूरी के भीतर नहीं हैं | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

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जयपुर मेट्रो की शुरुआत

आगरा मेट्रो के काम के उद्घाटन के मौके पर पीएम मोदी ने कहा, “सरकार का ध्यान छोटे शहरों को आत्मनिर्भर भारत की धुरी बनाने पर है और आगरा में मेट्रो प्रोजेक्ट इसी मंशा को दर्शाता है.”

केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने 16वें अर्बन मोबिलिटी इंडिया (यूएमआई) सम्मेलन सह एक्सपो 2023 में पीएम के दृष्टिकोण को दोहराते हुए कहा कि तेज़ी से शहरीकरण को एक चुनौती के बजाय एक मौके की तरह अपनाया गया है और घोषणा की कि भारत का मेट्रो नेटवर्क यूएसए को पछाड़ देगा.

लेकिन जयपुर मेट्रो के सवारियों का डेटा बुनियादी सवाल उठाता है कि क्या भारत के छोटे शहरों को परिवहन के इस महंगे साधन की ज़रूरत है? 2014 तक, देश में 229 किलोमीटर का मेट्रो रेल नेटवर्क था जो अप्रैल 2023 तक 870 किलोमीटर तक विस्तारित हो गया.

नेताओं के लिए मतदाताओं से वादे करने के लिए मेट्रो आधुनिक भारत के बांध बन गए हैं. यह बुनियादी ढांचे का एक शानदार नमूना है जो एक छोटे शहर के नागरिकों की प्रतिष्ठा बढ़ाता है और लगता है नेताओं ने इस मनोविज्ञान को अच्छी तरह समझ लिया है. यह आसानी से उनके रिपोर्ट कार्ड की सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाती है, कुछ ऐसा जिसे वे “शब्द-श्रेणी” होने का दावा कर सकते हैं, भले ही वे स्थानीय अर्थव्यवस्था पर कोई वास्तविक प्रभाव न डालें.

छोटे शहरों को मेट्रो की ज़रूरत नहीं है, लेकिन इसे जबरदस्ती वहां लाया जा रहा है. यह केवल वहीं काम करता है जहां जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक है

— माधव रमन, वास्तुकार और दिल्ली स्थित एनाग्राम आर्किटेक्ट्स के सह-संस्थापक

जयपुर मेट्रो चलाने वाले इस सेवा को अपनी सुरक्षा में एक कल्याणकारी उपाय बताते हैं.

जयपुर मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (जेएमआरसी) के जनसंपर्क अधिकारी शरद कुमार ने कहा, “हम एक सर्विस प्रोवाइडर हैं, कमाई करने वाली संस्था नहीं. एक सेवा क्षेत्र के रूप में नुकसान तो होता ही है, लेकिन हमने अपनी राजस्व प्रणाली को बढ़ाने और नुकसान की भरपाई के लिए निजी खिलाड़ियों को विज्ञापन स्थान प्रदान करने जैसी कई पहल शुरू की हैं.”

और मेट्रो प्रोजेक्ट्स पर सभी राजनीतिक दलों की सहमति है.

एक मार्च को राजस्थान के सीएम भजनलाल शर्मा ने जयपुर मेट्रो के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ एक समीक्षा बैठक बुलाई और इसके नए चरण की घोषणा की. बैठक में मौजूद जेएमआरसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “मुख्यमंत्री सिटी मेट्रो को देश के लिए एक मॉडल की तरह तैयार करना चाहते हैं, जो जयपुर के सबसे ज्यादा ट्रैफिक वाले इलाकों को जोड़ेगी.” यह हाल ही में चुने गए सीएम की 100-दिवसीय कार्य योजना का भी हिस्सा है. दिप्रिंट को जानकारी मिली है कि जेएमआरसी का नाम बदलकर राजस्थान मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन करते हुए सरकार जोधपुर और कोटा जैसे अन्य शहरों में भी सेवाओं का विस्तार करने की योजना बना रही है.

लेकिन पूर्व आईएएस और वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के पूर्व सीईओ ओपी अग्रवाल मानते हैं कि कोई भी मेट्रो सिस्टम मुनाफा नहीं कमा सकता. उन्होंने कहा, “इसका एकमात्र सकारात्मक पहलू पर्यावरणीय लाभ है. यह सुरक्षा चिंताओं, वायु प्रदूषण को कम करती है, यह सब सार्वजनिक लाभ के बारे में है. सार्वजनिक परिवहन के लिए लाभप्रदता कोई उद्देश्य नहीं है.”

हाल ही में द इकोनॉमिस्ट के लेख जिसका शीर्षक था: Why are Indians shunning the country’s shiny new metro lines? यह भारत की जन पारगमन प्रणाली की योजना पर सवाल उठाता है.

मोदी सरकार के लिए बढ़ता मेट्रो रेल नेटवर्क तेज़ी से शहरीकरण कर रहे युवा भारत की उभरती आकांक्षाओं को दर्शाता है. एक सरकारी बयान जिसने इकोनॉमिस्ट के लेख को खारिज किया है, के मुताबिक, “हमारे शहरों के निरंतर विस्तार और अधिक प्रथम-मील और अंतिम-मील कनेक्टिविटी की प्राप्ति के साथ, भारत की मेट्रो प्रणालियों में यात्रियों की संख्या में वृद्धि देखी जाएगी. इसे अगले 100 साल के लिए भारत के शहरी क्षेत्रों की यातायात की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए योजनाबद्ध ढंग से क्रियान्वित किया गया है.”


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आखिरी मील तक पहुंच की समस्या

ललित गोयल, जिनकी उम्र लगभग 40 साल है, जयपुर के हवा महल के पास एक आभूषण की दुकान चलाते हैं. वह अपनी दुकान से करीब 12 किलोमीटर दूर मानसरोवर से मेट्रो से यहां पहुंचते हैं, लेकिन उनका दैनिक आवागमन काफी कठिन रहता है: मेट्रो स्टेशन तक पहुंचने के लिए उन्हें पहले अपने घर से ई-रिक्शा लेना पड़ता है.

गोयल बताते हैं, “इस मार्ग के लिए मेट्रो की ज़रूरत नहीं है. यह पूरे शहर को नहीं जोड़ता है. जयपुर का मुख्य यातायात टोंक रोड पर है, जो अभी तक मेट्रो से नहीं जुड़ा है.”

ऐसे समय में जब अधिकांश भारतीय शहर खुद को मेट्रो मानचित्र पर लाने की होड़ में हैं, शहरी योजनाकारों और शहर विशेषज्ञों का कहना है कि भारत गलत घोड़े पर सवार है और देश को बसों जैसी अपनी वैकल्पिक परिवहन सेवा को मजबूत करने की ज़रूरत है. उनके अनुसार, यह गलत प्राथमिकताओं का सवाल है — स्थानीय सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देने के बजाय ‘सफेद हाथी’ में निवेश करना.

पूर्व आईएएस और वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (डब्ल्यूआरआई) के पूर्व सीईओ ओपी अग्रवाल ने कहा, “बस छोटे शहरों के लिए बेहतर है, महानगरों के लिए नहीं. मेट्रो लोगों को लास्ट-माइल कनेक्टिविटी प्रदान नहीं करती है, लेकिन मेट्रो एक स्टेटस सिंबल लेकर आती है जो बसें नहीं देतीं. यह वर्ग भेद लाता है. हमें प्रीमियम बसों पर जोर देना चाहिए.”

केंद्र सरकार ने भारतीय शहरों में विभिन्न मेट्रो प्रोजेक्ट्स के लिए 2018-19 से 2022-23 तक पिछले 5 साल में 98,547.15 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं.

फरवरी में हवामहल विधानसभा सीट से बीजेपी विधायक बालमुकुंद आचार्य ने मेट्रो से सफर के दौरान लोगों को होने वाली दिक्कतों को उठाया. हालांकि, उनका कहना है कि जयपुर को मेट्रो की ज़रूरत है, लेकिन उन्होंने बताया कि परिवहन प्रणाली के बारे में लोगों में जागरूकता की कमी है.

उन्होंने कहा, “पूरे शहर को मेट्रो से जोड़ने की ज़रूरत है और मेट्रो अधिकारियों को इस पर योजना बनानी चाहिए कि कम लोग यात्रा क्यों कर रहे हैं. शुरुआत में योजना गलत बनाई गई थी.” उनका मानना है कि “जयपुर शहर का विस्तार 50 किलोमीटर हो गया है.”

जयपुरवासियों के बीच यह आम जिज्ञासा है कि पहले चरण के दौरान चुना गया मार्ग गलत था क्योंकि इस मार्ग पर पर्याप्त यात्री नहीं हैं और मेट्रो का रूट भी सर्पीला है. विभिन्न कारकों के कारण, 12 किलोमीटर की यात्रा करने में 35-40 मिनट लगते हैं और इसके रूट भी कम हैं. जिन इलाकों से ट्रेन गुज़रती है उनमें से कुछ — राम नगर और श्याम नगर — घनी आबादी वाले नहीं हैं. जयपुर मेट्रो के एक पूर्व कर्मचारी के मुताबिक, इन स्टेशनों पर दिन में सबसे कम टिकटें बिकती हैं. इस रूट पर न तो बड़े अस्पताल हैं, न बड़े कॉलेज और न ही बड़े कोचिंग सेंटर.

ऐसे समय में जब अधिकांश भारतीय शहर खुद को मेट्रो मानचित्र पर लाने के लिए दौड़ रहे हैं, शहरी योजनाकारों और शहर विशेषज्ञों का कहना है कि भारत गलत घोड़े पर सवार है और देश को बसों जैसी अपनी वैकल्पिक परिवहन सेवा को मजबूत करने की ज़रूरत है. उनके अनुसार, यह गलत प्राथमिकताओं का सवाल है

आईआईटी दिल्ली की प्रोफेसर गीतम तिवारी का कहना है, “सड़क-आधारित प्रणाली बुनियादी प्रणाली है, लंबी यात्राओं के लिए मेट्रो एक आकर्षक विकल्प है लेकिन अगर यह एकीकृत नहीं है और सारा पैसा मेट्रो प्रणाली बनाने में ही जा रहा है, तो यह एक निर्माण परियोजना है, न कि सार्वजनिक परिवहन परियोजना.”

शहरी विशेषज्ञों का कहना है कि परिवहन के सस्ते साधन उपलब्ध हैं और सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए. “शहर में मेट्रो का होना अच्छा और ग्लैमरस लगता है लेकिन बसें कहीं बेहतर विकल्प हैं, अधिक अनुकूल और सस्ती. Traffic in the Era of Climate Change के लेखक और आमची मुंबई, आमची बेस्ट के संयोजक विद्याधर दाते बताते हैं, “मेट्रो महंगी है और ट्रैफिक को कम करने का समाधान नहीं है क्योंकि यह बहुत महंगा है.”


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जयपुर मेट्रो की राजनीति

जयपुर में यह सब 2003 में शुरू हुआ जब कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणापत्र में मेट्रो रेल का वादा किया, लेकिन यह 2010 से पहले नहीं था जब अशोक गहलोत ने अपने पसंदीदा प्रोजेक्ट की आधारशिला रखी थी. वर्षों से मेट्रो गोवा से मध्य प्रदेश तक राजनीतिक दलों के घोषणापत्र का हिस्सा रही है.

2015 में बीजेपी की वसुंधरा राजे ने मानसरोवर से चांदपोल के बीच पहली ट्रेन का उद्घाटन किया था और इसे ऐतिहासिक दिन बताया था. कोलकाता, दिल्ली, बेंगलुरू, गुरुग्राम और मुंबई के बाद जयपुर देश का पांचवां शहर बन गया जहां मेट्रो है और राज्य सरकार के स्वामित्व वाली एकमात्र मेट्रो सेवा है.

उस वक्त लोगों में जबरदस्त उत्साह था और मेट्रो स्टेशनों के बाहर लंबी कतारें देखी गईं. दिलचस्प बात यह है कि जब राजे विपक्ष में थीं, तब उन्होंने मेट्रो प्रोजेक्ट को जनता के पैसे की बर्बादी और घाटे का सौदा बताया था.

लेकिन अब विपक्षी दल भी मेट्रो प्रोजेक्ट के विरोध में नहीं हैं. यह सभी की पहली पसंद है.

राजस्थान के पूर्व शहरी विकास मंत्री शांति धारीवाल का कहना है कि जब हम (कांग्रेस सरकार) मेट्रो बना रहे थे तो बीजेपी इसका विरोध कर रही थी. धारीवाल ने कहा, “जब हम सरकार में थे तो केंद्र सरकार हमारी मदद नहीं कर रही थी और जब हमने मदद मांगी तो वे 20 फीसदी पैसा देकर मेट्रो में अपना एमडी बिठाना चाहती थी.”

उन्होंने कहा, “सार्वजनिक परिवहन हमेशा घाटे में चलता है. ये खर्च सरकार वहन करती है. इससे मुनाफा नहीं कमाया जाता है. जयपुर के बाद हमारी योजना जोधपुर और कोटा में मेट्रो बनाने की थी.”

मेट्रो रेल प्रणाली शहरी भारत के सार्वजनिक परिवहन में एक क्रांति है. इसके जनता के लिए कई मूल्यवर्धित फायदे हैं जैसे सुरक्षित, तेज़,
विश्वसनीय, पर्यावरण अनुकूल, ऊर्जा बचाने वाला

—यू.जे.एम राव, प्रबंध निदेशक, आंध्र प्रदेश मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड

विशेषज्ञ मेट्रो प्रणाली से होने वाले अप्रत्यक्ष लाभ की ओर इशारा करते हैं.

आंध्र प्रदेश मेट्रो रेल कार्पोरेशन लिमिटेड के निदेशक यू.जे.एम. राव कहते हैं, “मेट्रो रेल प्रणाली शहरी भारत के सार्वजनिक परिवहन में एक क्रांति है. इसके जनता के लिए सुरक्षित, तेज़, विश्वसनीय, पर्यावरण-अनुकूल, ऊर्जा बचतकर्ता जैसे कई मूल्यवर्धित फायदे हैं.”


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राइडरशिप और नुकसान

छोटे शहरों में मेट्रो बुनियादी ढांचे के निर्माण ने पिछले एक दशक में भारत की शहरी कल्पना पर कब्ज़ा किया है. 2000 के दशक की शुरुआत में हर शहर में मॉल बनाने की होड़ मची हुई थी. जल्द ही, यह मेट्रो का सपना था जिसका पीछा किया जा रहा था.

2002 में शुरू हुई दिल्ली मेट्रो कानपुर, लखनऊ, पटना, जयपुर, भोपाल जैसे शहरों के लिए नई शहरी आकांक्षा का एक बड़ा प्रतीक बन गई. इसमें नए मध्यवर्गीय शहर का वादा था जो लंबे समय से भारतीय शहरों से गायब है.

शीला दीक्षित ने 2018 में दिल्ली मेट्रो पर अटल बिहारी वाजपेयी के साथ अपनी बातचीत को याद करते हुए कहा था कि उन्होंने मुझसे एक वाक्य कहा था: कृपया इसे तुरंत शुरू करें. जब दिसंबर 2002 में शाहदरा और तीस हज़ारी के बीच सिटी मेट्रो शुरू हुई तो वह टिकट खरीदने वाले पहले व्यक्ति थे. वाजपेयी ने अपने चिर-परिचित काव्यात्मक अंदाज में कहा, “दिल्ली ने वर्षों तक एक सपना देखा था, आज वो सपना सच हो रहा है. मेट्रो दिल्ली की बड़ी ज़रूरत थी. दिल्ली की बढ़ती आबादी बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रही है.”

हालांकि, उस समय दिल्ली मेट्रो एक राजनीतिक मुद्दा भी बन गया था. दिल्ली के पूर्व सीएम साहिब सिंह वर्मा ने शीला दीक्षित के उन दावों को खारिज किया कि दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन उनकी सरकार की देन है.

लेकिन सवारियों के आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश महानगर सफेद हाथी की तरह हैं और प्रतिष्ठा के दायरे से परे, वास्तव में उन नागरिकों के लिए बहुत कुछ नहीं रखते हैं जिनकी दैनिक यात्राएं एक संघर्ष जैसी हैं.

आईआईटी-दिल्ली के हालिया अध्ययन के अनुसार, भारत में सभी मेट्रो रेल नेटवर्क पर सवारियों की संख्या उनकी अनुमानित सवारियों की संख्या से 50 प्रतिशत से भी कम है और सार्वजनिक परिवहन की लागत भी साधन के चुनाव को प्रभावित करती है. शिमला के पूर्व उप-महापौर और केरल शहरी आयोग के सदस्य टिकेंदर पवार ने कहा, “ज्यादातर भारतीय असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं और 5-7 किलोमीटर के दायरे में काम करना पसंद करते हैं और इसके लिए वे मेट्रो का उपयोग नहीं करते हैं.” उन्होंने कहा कि भारतीय टियर-2 और टियर-3 शहरों में औसत यात्रा कम है और लोगों की पहली पसंद निजी वाहन है.

जेएमआरसी की वार्षिक रिपोर्ट 2021-22 में कहा गया है कि कम सवारियों के कारण उसे भारी परिचालन घाटा हुआ और शुद्ध घाटा 8,324.27 करोड़ रुपये है | फोटो: कृष्ण मुरारी/दिप्रिंट

लगभग तीन करोड़ की आबादी वाली दिल्ली में रोजाना औसतन 65 लाख लोग मेट्रो से यात्रा करते हैं. यह डीएमआरसी है जो जयपुर मेट्रो को परामर्श देता है. नाम न छापने की शर्त पर डीएमआरसी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “पहले दिल्ली में भी सवारियों की संख्या कम थी, लेकिन जैसे-जैसे शहर में मेट्रो नेटवर्क का विस्तार हुआ, सवारियों की संख्या भी बढ़ी. दूसरे शहरों में भी यही होगा. मेट्रो विस्तार लोगों को आकर्षित करेगा.”

उदाहरण के लिए जेएमआरसी की वार्षिक रिपोर्ट 2022-23 में कहा गया है कि कम सवारियों के कारण उसे भारी परिचालन घाटा हुआ और शुद्ध घाटा पिछले वर्ष के 83.24 करोड़ रुपये के मुकाबले 143.29 करोड़ रुपये रहा. शरद कुमार बताते हैं, “औसत सवारियां प्रति दिन 50,000 हैं और 2023-24 के दौरान 1.72 करोड़ लोगों ने यात्रा की जिससे करीब 24 करोड़ रुपये कमाई हुई. हालांकि, हमें अपनी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) के अनुसार, अधिक यात्रियों की उम्मीद थी.”


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मेट्रो स्टेशनों को गोद लेना

जयपुर का सिंधी कैंप शहर के सबसे भीड़भाड़ वाले इलाकों में से एक है. बसें कतार में खड़ी रहती हैं और कंडक्टर यात्रियों को बुलाते रहते हैं. 28-वर्षीय अमित शांडिल्य अपनी पांच साल की बेटी के साथ खाटू श्याम से आई एक बस से उतरे. दोनों मेट्रो परिसर से लिफ्ट में चढ़ते हैं जो उन्हें प्लेटफॉर्म तक ले जाती है. पूरी तरह से पीले रंग में रंगे मेट्रो स्टेशन को जनवरी 2022 में उत्कर्ष क्लासेज़ ने गोद लिया था.

उत्कर्ष क्लासेज़ ने 2022 में जयपुर सिंधी कैंप मेट्रो स्टेशन के स्टेशन नामकरण और स्टेशन ब्रांडिंग अधिकार सुरक्षित कर लिए हैं. जयपुर मेट्रो राजस्व उत्पन्न करने के लिए गैर-टिकट किराए पर भी ध्यान केंद्रित करता है जैसे कि किराए पर जगह देना. हालांकि, जयपुर मेट्रो स्टेशनों पर बहुत कम आउटलेट्स हैं.

सिंधी कैंप के बाद जेएमआरसी ने दो और स्टेशनों के लिए ब्रांडिंग अधिकार दिए: मानसरोवर और रेलवे स्टेशन.

2002 में शुरू हुए उत्कर्ष कोचिंग इंस्टीट्यूट ने सबसे पहले जयपुर मेट्रो की स्टेशन पॉलिसी को अपनाया था, उनका कहना है, “हम अपनी कोचिंग को प्रमोट करना चाहते थे और उसी वक्त हमें जयपुर मेट्रो की इस पहल के बारे में पता चला. हमने इसके लिए कोशिश की और हमें ब्रांडिंग अधिकार मिल गए.” जयपुर में कोचिंग प्रबंधन में काम करने वाले एक अधिकारी ने कहा, “यह प्रचार का एक अलग तरीका था जिसके माध्यम से हम एक दिन में हज़ारों लोगों से जुड़ सकते थे.”

2021-22 के केंद्रीय बजट में सरकार ने सार्वजनिक बस परिवहन सेवाओं की वृद्धि का समर्थन करने के लिए 18,000 करोड़ रुपये के आवंटन की घोषणा की. हालांकि, मई 2022 की एक आरटीआई प्रतिक्रिया में जानकारी मिली कि वित्त वर्ष 22 के दौरान योजना के लिए कोई धनराशि स्वीकृत या उपयोग नहीं की गई थी.

रमन का कहना है कि मेट्रो बनाने से यह पता चलता है कि ये इलाके अब ग्रामीण नहीं रह गए हैं और यह एक आकांक्षा वाली चीज़ की तरह है, जिसका इस्तेमाल हमारे देश में चुनाव के लिए किया जाता है. उन्होंने कहा, “महानगरों के लिए वित्त एक बहुत बड़ा मुद्दा है और टियर-2 और टियर-3 शहर अभी तक बहुत अधिक आर्थिक गतिविधियों में शामिल नहीं हैं. मेट्रो एक परिवहन प्रोजेक्ट नहीं बल्कि एक गौरव प्रोजेक्ट बन गई है.”

छोटे शहरों में मेट्रो एक रोमांटिक विचार है. वे इसे बड़े शहरों की ज़िंदगी का एक हिस्सा मानते हैं जो उनकी ज़िंदगी में भी आ गई है. राजस्थान के एक जोड़े ने अपने सभी रिश्तेदारों के साथ चलती जयपुर मेट्रो ट्रेन के अंदर अपनी 25वीं शादी की सालगिरह मनाई. स्थानीय व्यवसायी 52-वर्षीय विजय कुमार बताते हैं, “हम कुछ अलग करना चाहते थे और यहां तक कि जयपुर मेट्रो भी एक नए विचार के साथ प्रयोग कर रहा था.”

जयपुर मेट्रो एक ऐसा प्रयोग बन गया है जिसके नतीजों का इंतज़ार है.

दंपति का कहना है कि 25 साल पूरे होने का जश्न मनाने के लिए इससे बेहतर जगह नहीं हो सकती थी. कुमार ने कहा, “हमने फिल्मों में मेट्रो में शूटिंग देखी थी लेकिन हमने कभी नहीं सोचा था कि हमारी ज़िंदगी की शूटिंग भी मेट्रो में होगी. हमने कभी सपने में भी इसकी कल्पना नहीं की थी.”

(संपादन : फाल्गुनी शर्मा)

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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