scorecardresearch
Saturday, 3 January, 2026
होमफीचरपुरानी दिल्ली का डिलाइट सिनेमा गोलचा, जुबिली और नोवेल्टी से ज्यादा समय तक कैसे टिका रहा

पुरानी दिल्ली का डिलाइट सिनेमा गोलचा, जुबिली और नोवेल्टी से ज्यादा समय तक कैसे टिका रहा

रायज़ादा परिवार ने नेहरू युग से ही पुरानी दिल्ली में सिंगल-स्क्रीन सिनेमा देखने के कल्चर को ज़िंदा रखा है. डिलाइट सिनेमा में आज भी कैश रजिस्टर बज रहे हैं.

Text Size:

नई दिल्ली: इस साल की शुरुआत में दिल्ली के डिलाइट सिनेमा में शशांक रायज़ादा दिन की लेजर एंट्री और मेंटेनेंस चेक कर रहे थे, तभी अचानक एक ईमेल नोटिफिकेशन आया. यह ऑस्ट्रियाई सिनेमैटोग्राफर मैथियास ग्रुन्स्की का मेल था, जो इंडिपेंडेंट सिनेमा में अपने काम के लिए जाने जाते हैं और वे डिलाइट को अपनी अगली फिल्म के सितारों में से एक बनाना चाहते थे.

पुरानी दिल्ली के दरियागंज में स्थित 71 साल पुराने डिलाइट सिनेमा के मैनेजिंग डायरेक्टर, 70 साल से ज्यादा उम्र के रायज़ादा ने कहा, “मुझे पूरा यकीन हो गया था कि यह कोई स्कैम है. मैं पहले भी एक स्कैम का शिकार हो चुका हूं, लेकिन फिर मैंने ईमेल का जवाब दे दिया.” इसके बाद उन्हें तुरंत एक बहुत उत्साह भरा जवाब मिला.

ग्रुन्स्की ने लिखा, “मेरे सहयोगी आंद्रेयास रेश और मैं, दोनों जर्मनी में रहते हैं और हम सिनेमा पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने की योजना बना रहे हैं और यह समझना चाहते हैं कि हम इसे इतना क्यों पसंद करते हैं. हम दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मूवी थिएटर फिल्माना चाहते हैं. अपनी रिसर्च के दौरान आपका खूबसूरत डिलाइट सिनेमा हमारी नज़र में आया.”

डिलाइट की पहचान दरियागंज से बहुत दूर तक फैली हुई है. भारत के आज़ादी के बाद बने शुरुआती सिनेमाघरों में से एक होने के कारण, इसने मनोरंजन के लिए तरस रहे दिल्लीवालों के लिए इस इलाके को खास बना दिया, लेकिन यह अतीत की कोई यादगार इमारत भर नहीं है. इसके आसपास के ज़्यादातर सिंगल-स्क्रीन थिएटर बंद हो गए, लेकिन डिलाइट समय के साथ खुद को ढालता रहा—चाहे 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान न्यूज़ अपडेट दिखाना हो, पंजाबी फिल्में चलाना हो, या मल्टीप्लेक्स से सीख लेकर दूसरी स्क्रीन जोड़ना हो. आज भी ज़्यादातर हफ्तों में यहां 30-40 प्रतिशत सीटें भर जाती हैं.

एक बरसाती शुक्रवार को, सैयारा की स्क्रीनिंग के लिए ज़्यादातर सीटें भरी हुई हैं, जिसे देखकर मालिक के चेहरे पर मुस्कान आ गई.

रायज़ादा ने कहा, “मैं यह देखने गया था कि लोग फिल्म पर कैसे रिएक्ट कर रहे हैं. मुझे लगता है कि गाना बहुत ही मधुर है.” वे फरीदाबाद में अपने दूसरे कारोबार भी देखते हैं, लेकिन हर सोमवार और शुक्रवार को सिनेमा हॉल का चक्कर लगाना नहीं भूलते.

डिलाइट सिनेमा की एक गलियारे में पुराने सितारों की तस्वीरों की ओर इशारा करते हुए मुस्कुराते शशांक रायज़ादा | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट
डिलाइट सिनेमा की एक गलियारे में पुराने सितारों की तस्वीरों की ओर इशारा करते हुए मुस्कुराते शशांक रायज़ादा | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट

डिलाइट के 40 साल के मालिकाना दौर में शशांक रायज़ादा ने सब कुछ देखा है. वीसीआर से लेकर पीवीआर तक, ओटीटी से स्मार्टफोन तक, स्टार सिस्टम के पतन से लेकर सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स तक—डिलाइट ने कई तूफान झेले हैं. देखने-सुनने की आदतें बदली हैं, मनोरंजन के तरीके तेज़ी से बदले हैं, लेकिन फिर भी टर्नस्टाइल घूमते रहे और कैश रजिस्टर की ‘क-चिंग’ की आवाज़ बंद नहीं हुई.

थिएटर की विरासत संभालने की अगली कड़ी रायज़ादा के बेटे शाश्वत ने कहा, “हमने वीसीआर और पाइरेसी के आने, मल्टीप्लेक्स के बढ़ने, कोविड और अब लाइव एंटरटेनमेंट जैसी चुनौतियों को झेला है. हम टिके हुए हैं क्योंकि हम समय के साथ बदलते रहते हैं.”

डिलाइट ही एकमात्र ए-ग्रेड सिनेमा हॉल था जिसने खुद को अपग्रेड किया. जब रीगल बंद हुआ तो यह तय ही था—स्क्रीन धुंधली थी, साउंड सिस्टम ऐसा था कि 2015 में भी फिल्म 1940 के दशक की लगती थी. रिवोली बहुत छोटा था और मुनाफा नहीं कमा पाया

—ज़िया उस सलाम, लेखक और सामाजिक टिप्पणीकार

1954 में खुला यह थिएटर एक मल्टी-एंटरटेनमेंट सेंटर था. पृथ्वीराज कपूर के नाटक, इंडो-रशियन फिल्म फेस्टिवल, गोगिया पाशा के जादू के शो और मुकेश के कॉन्सर्ट—सबको यहां मंच मिला. बंगाली और पंजाबी फिल्मों के शो भी हाउसफुल रहते थे. मंत्री, राजनयिक, सरकारी अफसर और अभिनेता यहां स्क्रीनिंग के लिए आते थे. आज भी यह वो चीज़ें देता है जो मल्टीप्लेक्स नहीं दे पाते—सस्ती टिकटें, मशीन की झागदार कॉफी, बड़े समोसे और नमकीन पॉपकॉर्न, जो किसी का महीने का बजट नहीं बिगाड़ते और पिता-पुत्र की जोड़ी ने आज भारतीय सिनेमा के सामने खड़े सबसे बड़े सवाल पर भी खूब सोचा है—क्या सिनेमा मर रहा है?

शशांक रायज़ादा के लिए, इसका जवाब रोमांस में छिपा है.

उन्होंने कहा, “समाधान है रोमांस की वापसी, जैसे सैयारा. कपल्स को भावनाओं के झूले पर झूलने का मौका मिलना चाहिए, वे गानों के साथ गुनगुनाएं, हाथ थामे बैठें. नहीं तो आप युवा पीढ़ी को आकर्षित नहीं कर सकते. वे आज भी अपनी पार्टियों में 90 और 2000 के दशक के गाने बजाते हैं.”

डिलाइट ने शुरुआती सालों में बंगाली और पंजाबी फिल्मों के साथ प्रयोग किया और जापानी फिल्म फेस्टिवल जैसे कार्यक्रम भी आयोजित किए | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट
डिलाइट ने शुरुआती सालों में बंगाली और पंजाबी फिल्मों के साथ प्रयोग किया और जापानी फिल्म फेस्टिवल जैसे कार्यक्रम भी आयोजित किए | फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट

पुरानी दिल्ली के मनोरंजन की कमी को पूरा करना

शुक्रवार को फोयर में बुर्का पहनी महिलाएं बच्चों को संभाले खड़ी हैं, पांच-दस लोगों के समूह में पुरुष हैं और बुजुर्ग जोड़े युवाओं को हल्की नापसंदगी और यादों के मिश्रण के साथ देख रहे हैं. हंसती-खिलखिलाती लड़कियों का एक झुंड अंदर घुसता है, जेन-ज़ेड की नई पसंद सैयारा के टिकट लेने के लिए.

ज़ाकिर हुसैन कॉलेज की सेकेंड-ईयर छात्रा त्रिना मेहता दो दोस्तों के साथ फिल्म देखने के लिए दोपहर की क्लास बंक कर आई हैं.

मेहता ने कहा, “हॉल वॉकिंग डिस्टेंस पर है. हम अक्सर क्लास और अटेंडेंस गिनकर हर दूसरे हफ्ते फिल्म देखने की कोशिश करते हैं. टिकट सस्ते हैं और इनके समोसे तो प्यार हैं.”

यह जगह सिर्फ पुराने प्राइड के सहारे नहीं चल रही. आने वाली फिल्मों के लगभग सभी प्रेस शो, भाषा चाहे जो भी हो, अब भी डिलाइट डायमंड में होते हैं, जो 2008 में मुख्य हॉल के साथ जोड़ा गया छोटा स्क्रीन है.

शशांक रायज़ादा ने कहा, “हमारे यहां सिर्फ पुरानी दिल्ली से ही नहीं, बल्कि मजनूं का टीला और लक्ष्मी नगर से भी लोग आते हैं.”

डिलाइट सिनेमा का लकड़ी की पैनलिंग वाला रेस्तरां अपने आप में एक आकर्षण है | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट
डिलाइट सिनेमा का लकड़ी की पैनलिंग वाला रेस्तरां अपने आप में एक आकर्षण है | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट

डिलाइट उन लोगों के लिए जगह है जो पहले दिन-पहला शो देखना चाहते हैं, बिना ज़्यादा पैसे खर्च किए.

टिकट 90 से 200 रुपये तक हैं और स्नैक्स 100 रुपये से कम में मिल जाते हैं—चेन मल्टीप्लेक्स की कीमत का एक छोटा हिस्सा.

पास में दुकान चलाने वाले अमर कुमार जो पत्नी और दो बच्चों के साथ आए थे, ने कहा, “मैं अपने पूरे परिवार को पीवीआर में फिल्म दिखाने नहीं ले जा सकता. हम यहां आते हैं, बाहर खाते हैं और सब खुश रहते हैं.”

मुझे मल्टीप्लेक्स से कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन समाज के हर वर्ग को सिनेमा तक पहुंच मिलनी चाहिए. यह क्लास का नहीं, मास का बिजनेस है

—शाश्वत रायज़ादा

दशकों से डिलाइट सेंट्रल और नॉर्थ दिल्ली के सिनेमा प्रेमियों की सेवा करता आ रहा है. यह दिल्ली का वह हिस्सा है जहां पर्यटन स्थल और ऐतिहासिक खाने-पीने की जगहें हैं, लेकिन बड़े सार्वजनिक मनोरंजन स्थल और सांस्कृतिक केंद्र कम हैं. चांदनी चौक का नया ओमैक्स मॉल अब 21वीं सदी का सार्वजनिक चौक बन रहा है, जिसकी यहां के लोगों को हमेशा ज़रूरत थी, लेकिन इसके अलावा डिलाइट ही मजबूत स्तंभ है. यह वहां टिका रहा जहां ऐतिहासिक गोलचा, नोवेल्टी और जुबिली सिंगल-स्क्रीन थिएटर नहीं टिक पाए.

शाश्वत ने कहा, “मुझे मल्टीप्लेक्स से कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन समाज के हर वर्ग को सिनेमा तक पहुंच मिलनी चाहिए. यह क्लास का नहीं, मास का बिजनेस है.” यही सोच उनके दादा बृज मोहन लाल रायज़ादा की भी थी.

एक अलग सोच वाला शख्स और एक प्रधानमंत्री

जब 30 अप्रैल 1954 को राज कपूर की ‘अंगारे’ के साथ डिलाइट खुला, वह रात यादगार थी. लाउडस्पीकर पर घोषणाएं हुईं और 1,100 की सभी सीटें भर गईं, देर से आने वालों को बाहर रहना पड़ा. जब दूसरे सिनेमा हॉल अभी बड़े-बड़े पंखों या डेज़र्ट कूलर पर निर्भर थे, डिलाइट में पूरी एयर-कंडीशनिंग थी. यह दिल्ली का अब तक का सबसे बड़ा और चमकदार सिनेमा हॉल था.

इसके पीछे थे बृज मोहन रायज़ादा, जो दीवारों से घिरे शहर में रहते थे और लग्ज़री आयातित कारों के डीलर थे. कुछ अलग सोच वाले, वे खूब घूमे थे और कोलकाता के ब्रिटिश दौर के थिएटरों, जैसे द ग्लोब, की फिल्म देखने की संस्कृति से प्रभावित थे. तभी उन्होंने अपना खुद का हॉल बनाने का सपना देखा. जवाहरलाल नेहरू वह वजह बने जिससे यह सपना पूरा हुआ.

शशांक ने कहा, “आज़ादी के बाद नेहरू चाहते थे कि राजधानी में ज़्यादा भारतीय पहचान वाले लैंडमार्क हों और इसी ने मेरे पिता को प्लॉट खरीदने का फैसला करने के लिए प्रेरित किया. बहुत प्रतिस्पर्धा थी और आखिर में यह 6 लाख रुपये में नीलाम हुआ, जबकि असली कीमत शायद 32,000 रुपये ही रही होगी. इतनी ऊंची कीमत और जोखिम के बावजूद मेरे पिता ने इसे खरीदा.”

जवाहरलाल नेहरू के साथ बृज मोहन लाल रायज़ादा की फ्रेम की हुई तस्वीर | फोटो: मोहम्मद हम्माद/दिप्रिंट
जवाहरलाल नेहरू के साथ बृज मोहन लाल रायज़ादा की फ्रेम की हुई तस्वीर | फोटो: मोहम्मद हम्माद/दिप्रिंट

इस विशाल थिएटर के लिए जगह बनाने के लिए दरियागंज की दीवार का एक हिस्सा तोड़ा गया और जल्द ही पूरी गली का रूप बदल गया. दिल्ली स्टॉक एक्सचेंज, हमदर्द, होएश्ट और गोदरेज, हीरो साइकिल्स, हिंदुस्तान यूनिलीवर और वोल्टास जैसी कंपनियों के क्षेत्रीय कार्यालय यहां खुले. होटल ब्रॉडवे 1956 में खुला और दो साल बाद प्रभात प्रकाशन आया.

इतिहासकार स्वप्ना लिडल ने अपनी किताब Chandni Chowk: The Mughal City of Old Delhi में लिखा है, “जब दीवार गिराने की ज़रूरत आखिरकार मानी गई, तो शर्त यह रखी गई कि सड़क की ओर सुंदर मुखौटे वाली इमारतों की एक कतार बने और अंदर की ‘झुग्गियों’ को हटाकर दोबारा विकसित किया जाए.”

जब डिलाइट खुला, तब पुरानी दिल्ली में पहले से ही रिट्ज़, मैजेस्टिक और मोती थिएटर थे, जबकि गोलचा कुछ महीनों बाद खुला. 2000 के दशक की शुरुआत तक ज़्यादातर या तो बंद हो चुके थे या जर्जर हालत में थे, लेकिन डिलाइट मजबूती से खड़ा रहा.

अभिनेता शशि कपूर के साथ बृज मोहन रायज़ादा
अभिनेता शशि कपूर के साथ बृज मोहन रायज़ादा

ज़िया उस सलाम ने Delhi 4 Shows में लिखा, “इसलिए, दूर-दराज़ से बहुत से लोग पहले दिन-पहला शो देखने डिलाइट आते थे. इनमें परदानशीं महिलाएं भी होती थीं, जो मैटिनी और शाम के शो के लिए यहां आती थीं. डिलाइट ने उन्हें निजता और आसानी—दोनों दीं.”

इन दर्शकों के लिए यह दिल्ली-1 के अनुभवी सिनेमाघरों—रीगल, प्लाज़ा, ओडियन और रिवोली—का बेहतर विकल्प था, जो कुछ किलोमीटर दूर थे.

शुरुआती दौर में डिलाइट सिनेमा में एक ग्लैमरस सभा
शुरुआती दौर में डिलाइट सिनेमा में एक ग्लैमरस सभा

शुरुआत में, डिलाइट अपनी शाही भव्यता के लिए जाना जाता था. खास आर्किटेक्चर फर्म कोठारी एसोसिएट्स द्वारा डिज़ाइन किया गया यह हॉल ऊंचे खंभों, टेराज़ो सीढ़ियों, सना हुआ कांच और ज्योमेट्रिक आर्ट डेको टच वाली लकड़ी की रेलिंग से सजा था. इसमें इंग्लैंड की वर्थिंगटन कंपनी की सेंट्रल एयर-कंडीशनिंग, वाचा एंड कंपनी के मोटराइज़्ड वेलवेट पर्दे, आरसीए प्रोजेक्टर और एक रेस्तरां व रिक्रिएशन एरिया था. यहां तक कि एक पूरा फ्लोर पार्टियों के लिए था, जहां बॉलीवुड की नामी हस्तियां आती थीं और वहां बेडरूम भी थे. बाथरूम भी शानदार थे—फर्श तक के शीशे और महिलाओं के लिए आरामदायक सोफे.

हालांकि, यही इसकी पहचान नहीं बनी, जहां एक और जीवित उदाहरण, जयपुर का राजमंदिर, अपनी पुरानी शाही भव्यता के दम पर भीड़ खींचता है, वहीं डिलाइट की असली ताकत ज़्यादा ज़मीनी आकर्षण थे.

कम यादें, ज्यादा फुर्ती

डिलाइट के तीसरे फ्लोर पर दो लोग फाइलें छांट रहे हैं, जबकि कोने में पुराना प्रोजेक्टर रखा है — जो डिजिटल दौर से पहले की ज़िंदगी की याद दिलाता है. दीवारों पर लगी तस्वीरों को छोड़ दें, तो कहीं से नहीं लगता कि कभी यही वह मंज़िल थी जहां बॉलीवुड सितारे पार्टी किया करते थे.

सिनेमा की विरासत अब ज़्यादातर एक लंबे कॉरिडोर में ज़िंदा है, जहां तस्वीरें लगी हैं और एक मॉडल की नकल रखी है. इन तस्वीरों में नेहरू एक फिल्म देखते हुए दिखते हैं, उनके साथ युवा संजय गांधी हैं, रायज़ादा परिवार के साथ डिनर पर मधुबाला हैं और चमकती आंखों वाला बच्चा शशांक राज कपूर के साथ पोज़ देता दिखता है.

डिलाइट सिनेमा में एक क्रिस्टी प्रोजेक्टर अच्छी हालत में रखा गया है | फोटो: मोहम्मद हम्माद/दिप्रिंट
डिलाइट सिनेमा में एक क्रिस्टी प्रोजेक्टर अच्छी हालत में रखा गया है | फोटो: मोहम्मद हम्माद/दिप्रिंट

थिएटर में हमेशा हर तरह की भीड़ आती थी. इसकी विविधता पार्किंग से ही दिख जाती थी. आयातित गाड़ियों में नेता और राजदूत आते थे, तो पास की कॉलोनियों से लोग रिक्शे में या पैदल भी आते थे. यह वह जगह थी जहां वीआईपी और आम लोग दोनों न सिर्फ फिल्में, बल्कि कॉन्सर्ट और थिएटर भी देखने आते थे.

वक्त के साथ, डिलाइट ने खुद को ज़्यादा आम दर्शकों की जगह के तौर पर ढाल लिया.

सलाम ने लिखा, “डिलाइट उस समय के ए-ग्रेड हॉल्स में फिट नहीं बैठता था. इसकी एक वजह यह भी थी कि यह न पूरी तरह पुरानी दिल्ली में था और न ही नई दिल्ली में.” यह वही जगह थी जहां उनके कहे अनुसार ‘मसाला’ फिल्मों की रिलीज़ होती थी.

हमारे पास फिल्मों में विविधता के लिए डिलाइट डायमंड है. हम मिक्स एंड मैच करते हैं. बिना स्टार वाली फिल्म के लिए डायमंड है और बड़े स्टार की मास फिल्म सिंगल स्क्रीन पर चलती है

— शशांक रायज़ादा

डिलाइट को चलाए रखने वाली चीज़ कोई जॉनर नहीं, बल्कि उसकी समझ थी. हॉल इस बात पर खास ध्यान देता था कि आसपास के लोग क्या देखना चाहते हैं. यह एकमात्र थिएटर था जो बंगाली फिल्में दिखाता था, इसी वजह से यह दरियागंज की बड़ी बंगाली आबादी का पसंदीदा बन गया.

शशांक रायज़ादा ने कहा, “मेरे कॉलेज के एक प्रोफेसर, जो दरियागंज में रहते थे, रेगुलर बंगाली फिल्में देखने आते थे.” सत्यजीत रे की फिल्में ज़रूरी होती थीं. सुचित्रा सेन की मेघ कालो (1970), जो पहले एक हफ्ते के लिए बुक हुई थी, आठ हफ्तों तक चली.

अव्यवस्थित पुरानी दिल्ली में, मुस्लिम महिलाओं समेत सिनेमा प्रेमियों के लिए डिलाइट सिनेमा एक सुकून की जगह बनकर उभरा | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट
अव्यवस्थित पुरानी दिल्ली में, मुस्लिम महिलाओं समेत सिनेमा प्रेमियों के लिए डिलाइट सिनेमा एक सुकून की जगह बनकर उभरा | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, यह एकमात्र थिएटर था जो फिल्म शुरू होने से पहले और इंटरवल में न्यूज़ बुलेटिन दिखाता था.

जब मल्टीप्लेक्स तेज़ी से बढ़े और दर्शक दूर होने लगे, तो आसपास के कई हॉल बंद होने लगे. डिलाइट को बचाए रखा रायज़ादा परिवार की यह इच्छा कि वे समय पर तकनीक में निवेश करें और ज़रूरत पड़ने पर हॉल का विस्तार करें. यादों से ज़्यादा, यही फुर्ती इसे आज तक चलाती रही.

शशांक रायज़ादा ने1983 में अपने पिता के निधन के बाद 23 साल की उम्र में हॉल का प्रबंधन संभाला.

उन्होंने कहा, “हम आज भी अपनी कहानी सुना पा रहे हैं क्योंकि हमने समय के साथ खुद को बदला और जल्दी ढल गए.”

एक उथल-पुथल भरा अधिग्रहण

बचपन में शशांक ने ज़्यादातर इस कारोबार की चमक-दमक देखी थी.

उन्होंने अपने पिता के ऑफिस में डिस्ट्रिब्यूटर्स और एग्ज़िबिटर्स को आते-जाते देखा, अगली फिल्म क्या दिखाई जाए — इस पर बैठकों की बातें सुनीं और कभी-कभार डायरेक्टरों और एक्टर्स को हालचाल पूछने आते देखा, लेकिन जब उन्होंने काम संभाला, तो यह ज़्यादा संघर्ष की कहानी थी. शुरुआत में सबसे बड़ी चुनौती वीडियो पाइरेसी थी.

उन्होंने कहा, “वाकई बहुत मुश्किल वक्त था, कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ था.” उनकी आवाज़ में आज भी दर्द झलकता है.

हॉल की ऑक्यूपेंसी 50 प्रतिशत तक गिर गई थी, फिल्में नहीं चल रही थीं और बाज़ार में वीसीआर भर गए थे. “फिल्म रिलीज़ होने के अगले ही दिन वीसीआर आ जाता था.”

बचपन में डिलाइट में अभिनेता प्रदीप कुमार के साथ शशांक रायज़ादा
बचपन में डिलाइट में अभिनेता प्रदीप कुमार के साथ शशांक रायज़ादा

हालात और बिगड़ गए, क्योंकि 90 के दशक के आखिर तक मल्टीप्लेक्स आ गए.

लेकिन निराश होने के बजाय, शशांक ने दोगुना ज़ोर लगाया. एक सच्चे एमबीए की तरह, उन्होंने तीन हिस्सों वाली रणनीति अपनाई: क्या गलत हो रहा है यह समझना, आय के नए स्रोत बनाना और फिर सारा पैसा वापस डिलाइट में लगाना.

उन्होंने सेंट स्टीफेंस कॉलेज से मिली इकोनॉमिक्स ऑनर्स डिग्री और एमबीए का इस्तेमाल किया और खुद हिसाब-किताब खंगाला. उनके ऑफिस की कांच की अलमारियों में आज भी कॉरपोरेट कानून और टैक्सेशन की किताबें रखी हैं और साथ में उनके पिता की एक बड़ी ब्लैक-एंड-व्हाइट तस्वीर है. उनकी डिग्रियां पास की दीवार पर टंगी हैं. पैसे जुटाने के लिए उन्होंने गोदामों में निवेश किया और एक धागा फैक्ट्री लगाई, जिससे अच्छा मुनाफा हुआ. इसका बड़ा हिस्सा थिएटर की मरम्मत और नए रूप में ढालने में लगाया गया.

उन्होंने कहा, “मैं हार नहीं मान सकता था, छोड़ नहीं सकता था. यह मेरे पिता की विरासत थी. मेरे पापा को अपना हॉल ठीक से चलता देखना पसंद था. उन्हें फिल्मों में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं थी. मेरी मां तो यह भी शिकायत करती थीं कि वे उन्हें फिल्म देखने नहीं ले जाते थे.”

हम चाहते हैं कि सिनेमा ऐसा बने कि लोग मजबूर हों थिएटर में वापस आकर फिल्म देखें. इसके लिए फिल्ममेकर्स को वैसी फिल्में बनानी होंगी. अब कॉपी-पेस्ट का दौर नहीं है. ओटीटी रहेगा, लेकिन अब हमें यह भी सुनिश्चित करना है कि सिनेमा ज़िंदा रहे

— शशांक रायज़ादा

सालों में उन्होंने साउंड, स्क्रीन और इंटीरियर को आधुनिक बनाने में 15 करोड़ रुपये से ज़्यादा लगाए. शशांक ने कभी समझौता नहीं किया. उन्होंने झूमर लगाए, रेस्टोरेंट में मार्बल-टॉप टेबल रखवाए और सबसे बेहतरीन साउंड और प्रोजेक्शन सिस्टम लगाया. फिल्म रील्स के डिजिटल होते ही पुराने प्रोजेक्टर की जगह फोटॉफॉन का चमचमाता नया प्रोजेक्टर लगा दिया गया.

पैसा 90 सीटों वाले रेस्टोरेंट में भी लगा, जो — जैसा कि सलाम कहते हैं, हॉल का कोई “अलग-थलग” हिस्सा नहीं था.

शशांक ने कहा, “मुझे यहां आना बहुत पसंद था क्योंकि हमारे रेस्टोरेंट में हमेशा ताज़ा नाश्ता मिलता था — डोसा-इडली से लेकर समोसे तक. पास के लोक नायक अस्पताल और जीबी पंत के डॉक्टर और नर्स कभी-कभी सिर्फ खाने के लिए आ जाते थे.” आज भी यह हॉल के लिए फायदेमंद है.

जैसे-जैसे अपग्रेड होते गए, उन्होंने डिलाइट की प्रोग्रामिंग भी बढ़ाई. हिंदी ब्लॉकबस्टर, अंग्रेज़ी फिल्में और यहां तक कि पंजाबी फिल्में भी दिखाई जाने लगीं, जिससे अलग-अलग तरह की भीड़ आने लगी.

ये बदलाव एक साथ नहीं, बल्कि चरणों में आए.

डिलाइट का नया लुक

सूरज बड़जात्या की हम आपके हैं कौन ने पहले बड़े बदलाव की वजह बनाई. 1994 की इस फिल्म ने परिवारों को वीसीआर छोड़कर फिर से हॉल की ओर लौटने का कारण दिया. पहले शो से पहले शशांक ने दीवारों और फर्श को तब तक धुलवाया जब तक वे चमक न उठें. फिल्म ने डिलाइट में जुबिली रन पूरा किया.

इस सफलता से प्रेरित होकर शशांक ने सीटें अपग्रेड कीं, संख्या 1,100 से घटाकर 900 की, एयर-कंडीशनिंग सुधारी और टिकट के दाम 20 रुपये बढ़ाए.

1994 में हम आपके हैं कौन के लिए डिलाइट सिनेमा में उमड़ी भीड़. फिल्म की सफलता ने शशांक रायज़ादा को हॉल के नवीनीकरण में निवेश के लिए प्रेरित किया | फोटो: इंस्टाग्राम/@puranidilliwaley
1994 में हम आपके हैं कौन के लिए डिलाइट सिनेमा में उमड़ी भीड़. फिल्म की सफलता ने शशांक रायज़ादा को हॉल के नवीनीकरण में निवेश के लिए प्रेरित किया | फोटो: इंस्टाग्राम/@puranidilliwaley

अगले साल एक और ब्लॉकबस्टर आई, जिसने लोगों को सड़क तक लाइन में खड़ा कर दिया.

करीब पांच दशकों से शशांक रायज़ादा के साथ काम कर रहे राज कुमार मेहरोत्रा ने कहा, “मुझे सुभाष घई की त्रिमूर्ति का प्रीमियर याद है, जिसमें शाहरुख खान और जैकी श्रॉफ थे. कड़ाके की ठंड थी और बारिश हो रही थी. लोग छह घंटे तक इंतज़ार करते रहे, बस सितारों को देखने और उनके लिए तालियां बजाने के लिए.” उस साल दिल्ली में इस ब्लॉकबस्टर की सिर्फ दो प्रिंट चलीं — एक डिलाइट में और दूसरी सपना में.

कमज़ोर दौर में भी, शशांक अपने दूसरे कारोबार से पैसा लगाते रहे, इंटीरियर सुधारते रहे और नई फिल्मों के लिए माहौल बनाने को छोटे-छोटे मुकाबले और क्विज़ चलाते रहे.

उन्होंने कहा, “यह जोखिम भरा था, क्योंकि ज़्यादातर लोग थिएटर बंद कर रहे थे, लेकिन बंद करना कभी विकल्प नहीं था.”

डिलाइट में हर बजट के लोगों के लिए पुरानी दुनिया का सलीकेदार आकर्षण मौजूद है | फोटो: मोहम्मद हम्माद/दिप्रिंट
डिलाइट में हर बजट के लोगों के लिए पुरानी दुनिया का सलीकेदार आकर्षण मौजूद है | फोटो: मोहम्मद हम्माद/दिप्रिंट

जब दूसरे सिंगल-स्क्रीन थिएटर जर्जर हो रहे थे, दीवारों पर पान के दाग थे और ‘उपद्रवी’ भीड़ के कारण परिवार उनसे दूरी बना रहे थे, तब डिलाइट एक सुकून भरी जगह बना रहा — संगमरमर का फर्श, बड़ा फोयर और इतना बड़ा कैंटीन कि इंटरवल की भीड़ संभाल सके. 2007 में लंदन ड्रीम्स के प्रमोशन के दौरान, सलमान खान ने एक घंटे तक टिकट काउंटर से खुद टिकट भी बेचे.

फिर 2008 में, डिलाइट ने अब तक का सबसे बड़ा कदम उठाया. 250 सीटों वाला डिलाइट डायमंड जोड़कर यह ‘मल्टीप्लेक्स-लाइट’ बन गया, जिसे स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर के मनोज माथुर ने डिजाइन किया. इसमें शशांक ने अपने बेटे शाश्वत के साथ साझेदारी की.

शशांक ने कहा, “हमारे पास फिल्मों में विविधता के लिए डिलाइट डायमंड है. हम मिक्स एंड मैच करते हैं. बिना स्टार वाली फिल्म के लिए डायमंड है और बड़े स्टार की मास फिल्म सिंगल स्क्रीन पर.”

डिलाइट सिनेमा की एक विंटेज तस्वीर ऑफिस पर नज़र डालती हुई | फोटो: मोहम्मद/दिप्रिंट
डिलाइट सिनेमा की एक विंटेज तस्वीर ऑफिस पर नज़र डालती हुई | फोटो: मोहम्मद/दिप्रिंट

सेमी-मल्टीप्लेक्स का एक्सपीरियंस

डिलाइट को अलग बनाता है उसका हाइब्रिड मॉडल. इसने अपनी सिंगल-स्क्रीन पहचान बनाए रखी, लेकिन साथ ही ‘मल्टीप्लेक्स वाली भीड़’ के लिए भी एक जगह तैयार की. दिल्ली में, जहां सिर्फ स्टार पावर से उतनी भीड़ नहीं आती जितनी आंध्र प्रदेश या तमिलनाडु में आती है, वहां लचीलापन और किफायत का यह मेल इसकी सबसे बड़ी ताकत रहा है.

148 सीटों वाले इस हॉल में बड़ा सा झूमर, रेड कार्पेट और आरामदायक पुशबैक कुर्सियां हैं, लेकिन टिकट की कीमत करीब 200 रुपये ही है. इसमें न तो बालकनी है और न ही गैलरी का बंटवारा और यहां आमतौर पर मेन स्क्रीन से ज़्यादा प्रयोगधर्मी फिल्में दिखाई जाती हैं.

शशांक ने कहा, “मैं सिंगल-स्क्रीन थिएटर की कीमत पर मल्टीप्लेक्स का अनुभव देना चाहता था.”

मैटिनी शो चल रहा है. मेन स्क्रीन पर टिकट 90 से 200 रुपये के बीच हैं और डिलाइट डायमंड में करीब 200 रुपये | फोटो: मोहम्मद हम्माद/दिप्रिंट
मैटिनी शो चल रहा है. मेन स्क्रीन पर टिकट 90 से 200 रुपये के बीच हैं और डिलाइट डायमंड में करीब 200 रुपये | फोटो: मोहम्मद हम्माद/दिप्रिंट

डिलाइट का टिके रहना सिर्फ दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे भारत में एक अपवाद है, जहां आज करीब 9,000 सिंगल-स्क्रीन थिएटर ही चल रहे हैं, जबकि 25 साल पहले इनकी संख्या 24,000 थी. ज़्यादातर थिएटर या तो ढहा दिए गए, किसी और काम में लगा दिए गए, या मल्टीप्लेक्स चेन में समा गए.

पुरानी दिल्ली, जो कभी सिनेमाघरों से भरी रहती थी, अब सिर्फ डिलाइट के साथ रह गई है. गोलचा बड़ी मुश्किल से टिका रहा, फिर 2016 में बंद हो गया. मोती सिनेमा ने भोजपुरी फिल्में दिखाने की राह पकड़ी, लेकिन 2013 में बंद हो गया. जुबिली 1990 के दशक में ढहा दी गई और नोवेल्टी — जहां शोले 73 हफ्तों तक चली थी, 2020 में गिरा दिया गया. यहां तक कि सेंट्रल दिल्ली में भी प्लाज़ा और रिवोली को बाद में पीवीआर ने संभाल लिया, जबकि ओडियन रिलायंस बिग सिनेमाज़ से आईनॉक्स के पास चला गया.

क्या नए रेस्टोरेंट और पब आ जाने से वेंगरज़ या बंगाली स्वीट्स बंद हो गए? डिलाइट की अपनी विरासत है और उसमें नॉस्टैल्जिया का भी तत्व है

— शाश्वत रायज़ादा

सलाम ने दिप्रिंट से कहा, “डिलाइट इकलौता ए-ग्रेड सिनेमा हॉल था जिसने खुद को अपग्रेड किया. जब रीगल बंद हुआ, तो वह तय था — स्क्रीन धुंधली थी, साउंड सिस्टम ऐसा था कि 2015 में भी फिल्म 1940 के दशक की लगती थी. रिवोली बहुत छोटा था और मुनाफा नहीं कमा पा रहा था.” अपग्रेड सिर्फ डायमंड तक ही नहीं रुके. 2016 में डिलाइट दिल्ली का पहला डॉल्बी एटमॉस थिएटर बना, मल्टीप्लेक्स चेन के इसे अपनाने से काफी पहले.

10 किलोमीटर के दायरे में अब यह इकलौता विकल्प है, जहां कामकाजी वर्ग के लोग भी अपने बजट में अच्छे माहौल में फिल्म देख सकते हैं. पूरे शहर में ऐसे दूसरे थिएटर बस शक्ति नगर का अंबा और करोल बाग का लिबर्टी ही हैं.

सलाम ने आगे कहा, “डिलाइट के पास हमेशा वफादार दर्शक रहे हैं, खासकर फ्रंट और मिडिल स्टॉल्स में, जो बार-बार आते रहते हैं. सिंगल स्क्रीन इन्हीं लोगों से चलती है, न कि बालकनी टिकट खरीदने वालों से.”

अगली पीढ़ी

शाश्वत रायज़ादा बहुत जल्दी सिनेमा बिज़नेस से जुड़ गए थे. दिल्ली यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में बीए पूरा करने के कुछ साल बाद, 1998 में वे डिलाइट के डायरेक्टर बन गए. वे परिवार के लॉजिस्टिक्स, सप्लाई-चेन, वेयरहाउसिंग और रिटेल बिज़नेस भी संभालते हैं, लेकिन हॉल उनकी सबसे बड़ी शान है.

दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ते वक्त, उनके दोस्त अक्सर उनसे नई फिल्म दिखाने ले जाने को कहते थे.

शाश्वत ने कहा, “यह एक तरह का विशेषाधिकार था, जैसे मान लीजिए आप ओबेरॉय होटल्स के मालिक हों. आज भी वे बस फोन करके कहते हैं — हम फिल्म देखने आ रहे हैं.”

डिलाइट का एक लंबा कॉरिडोर अलग-अलग दौर की भारतीय सिनेमा का गैलरी है | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट
डिलाइट का एक लंबा कॉरिडोर अलग-अलग दौर की भारतीय सिनेमा का गैलरी है | फोटो: टीना दास/दिप्रिंट

जैसे कभी शशांक ने बृज मोहन लाल रायज़ादा के साथ रहकर सब सीखा था, वैसे ही अब शाश्वत अपने पिता के साथ कर रहे हैं. थिएटर उनके डिनर टेबल की बातचीत और सबसे प्यारी यादों का हिस्सा है.

उन्होंने हंसते हुए कहा, “मुझे कैंपा कोला पीना याद है और यह भी कि परिवार का ड्राइवर सितारों को यहां से होटल या एयरपोर्ट ले जाते हुए कितना झुंझलाता थ.”

डिलाइट के शुरुआती, सितारों से भरे सालों को समर्पित एक बुलेटिन बोर्ड | फोटो: मोहम्मद हम्माद/दिप्रिंट
डिलाइट के शुरुआती, सितारों से भरे सालों को समर्पित एक बुलेटिन बोर्ड | फोटो: मोहम्मद हम्माद/दिप्रिंट

कोविड ने भले ही झटका दिया, लेकिन केजीएफ: चैप्टर 2 (2022), पठान (2023), एनिमल (2023), जवान (2024), स्त्री 2 (2024) और पुष्पा 2 (2025) जैसी फिल्मों के साथ कारोबार फिर उठने लगा. जब पठान लगी, तो पूरी पुरानी दिल्ली उमड़ पड़ी — शाहरुख खान और सलमान खान, दोनों के फैंस का जीत वाला मेल. सालों में, डिलाइट में फिल्म देखना उसके सादे-से माहौल के कारण ‘रील-वर्थी’ भी बन गया है.

आज थिएटर की सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धा ओटीटी और लाइव एंटरटेनमेंट से है, लेकिन उनकी सबसे बड़ी शिकायत यह है कि फिल्ममेकर हाउसफुल भीड़ खींचने के लिए पर्याप्त काम नहीं कर रहे हैं.

शशांक ने कहा, “हम चाहते हैं कि सिनेमा ऐसा बने कि लोग मजबूर हों थिएटर में लौटकर फिल्म देखें. इसके लिए फिल्ममेकर्स को वैसी फिल्में बनानी होंगी. अब कॉपी-पेस्ट का दौर नहीं है. ओटीटी रहेगा, लेकिन अब हमें यह भी सुनिश्चित करना है कि सिनेमा ज़िंदा रहे.”

लेकिन शाश्वत को भरोसा है कि दर्शक कहीं नहीं जा रहे और डिलाइट उनसे भी ज़्यादा समय तक टिकेगा.

उन्होंने कहा, “क्या नए रेस्टोरेंट और पब खुल जाने से वेंगरज़ या बंगाली स्वीट्स बंद हो गए? डिलाइट की अपनी विरासत है और उसमें नॉस्टैल्जिया भी है. बेहद अमीर लोग आबादी का सिर्फ 5 फीसदी हैं. हम बाकी लोगों के बारे में सोचते हैं और वे सिनेमा के हकदार हैं. हम उन्हीं के लिए यहां हैं.”

जैसे-जैसे आसमान अंधेरा होता है, दो ऑटो रिक्शा चालक फोयर में खड़े होकर थोड़ा सुस्ता रहे हैं और टिकट के रेट देख रहे हैं.

सलाम ने कहा, “मैं नोएडा में था, जब मैंने एक रिक्शा चालक से पूछा कि वह इतनी रात तक सवारी का इंतज़ार क्यों कर रहा है. उसने कहा कि वह शाहरुख खान की फिल्म देखना चाहता है, लेकिन टिकट 300 रुपये का है. वह तभी देख सकता है, अगर कोई सवारी देर रात का अतिरिक्त किराया दे दे.” नोएडा में शायद ही कोई सिंगल-स्क्रीन थिएटर चालू हो.

25 साल के शोएब के लिए, जो यहां का नियमित दर्शक है, यह अकेलेपन का तोड़ है.

उन्होंने कहा, “सिंगल स्क्रीन की एक अलग वाइब होती है. मैं आश्रम में रहता हूं, लेकिन फिल्म देखने यहां आता हूं, मल्टीप्लेक्स में देखने के बाद भी. मज़ाकिया कमेंट, सीटियां और तालियां — सब मिलकर आपको एक समुदाय का हिस्सा महसूस कराते हैं. अगर मुझे शांति से देखना हो, तो वह मैं अपने कमरे में भी कर सकता हूं.”

वह उस दिन सैंयारा देखने आए थे, एक ऐसी फिल्म, जिसने अपने बदकिस्मत प्रेमियों की कहानी से युवा दर्शकों को दीवाना बना दिया है.

उन्होंने कहा, “मेरी एक्स ने मुझे धोखा दिया. मैं टूटा हुआ आशिक हूं और रोना चाहता हूं. रोने के लिए यह सबसे अच्छी जगह है.”

(यह भारत में सिंगल-स्क्रीन थिएटरों पर तीन हिस्सों की सीरीज़ की दूसरी रिपोर्ट है. पहली यहां पढ़ें.)

(इस ग्राउंड रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: मल्टीप्लेक्स के दौर में भी बॉलीवुड का फेवरेट क्यों है राजमंदिर? जयपुर का सिंगल-स्क्रीन जो आज भी मिसाल है


 

share & View comments